बंगाल की चुनावी हिंसा की सबसे बड़ी कवरेज, इतनी हिंसा कि मेनस्ट्रीम मीडिया चर्चा भी नहीं करता

बंगाल की चुनावी हिंसा ने पिछले एक साल में 30 से अधिक जानें ली हैं। भाजपा कार्यकर्ता की उँगली काटने से लेकर, नेताओं पर हिंसक हमले, आगजनी और वोटरों के बूथ तक जाने ही न देने का काम तृणमूल के गुंडों ने खूब किया है।

बंगाल पर ताजा ख़बर यह है कि आज चुनाव आयोग की नींद टूटी और उन्होंने बंगाल में हो रही चुनावी हिंसा पर संज्ञान लेते हुए चुनाव प्रचार पर अनुच्छेद 324 का प्रयोग करते हुए एक दिन पहले ही रोक लगा दी। आयोग ने अपने बयान में कहा कि कई पार्टियों ने उनसे बंगाल में हो रही हिंसा पर शिकायत दर्ज की थी और उन्होंने भी पाया कि कई जिलों में जिला प्रशासन और जिला पुलिस ने हर प्रत्याशी और पार्टी को समान रूप से सुरक्षा और बाकी सुविधाएँ नहीं प्रदान की।

आयोग ने कहा कि आम मतदाताओं की सुरक्षा चिंतनीय है और उन्हें बंगाल में स्वछंद और भयमुक्त वातावरण नहीं मिल पा रहा। आयोग ने यह भी कहा कि इस अनुच्छेद का प्रयोग शायद पहली बार हुआ है और अगर ऐसी ही स्थिति बनी तो वो फिर इसके प्रयोग से नहीं हिचकेंगे। हालाँकि, चुनाव आयोग ने यह नहीं बताया कि वो किस चुनाव में इसका प्रयोग करेंगे क्योंकि लोकसभा चुनाव तो अब लगभग निपट ही गया है और एक दिन पहले प्रचार रोक कर उन्होंने कोई तीर तो मारा नहीं है।

चुनाव आयोग इस लोकसभा चुनाव में, बंगाल के मामले में पूरी तरह से निकम्मी, डरपोक और ग़ैरज़िम्मेदार साबित हुई है। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ, वो आगे अच्छे तरीके से साबित हो जाएगा। छठे चरण के मतदान हो जाने के बाद, सिर्फ एक चरण के मतदान बचे रहने पर चुनाव आयोग ने जिस तरह का एक्शन लिया है उसे अंग्रेज़ी में ‘टू लिटिल, टू लेट’, यानी ‘बहुत देर से, बहुत कम’ कहा जाता है।

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मैं अब आप लोगों के सामने पिछले कुछ चरणों में तृणमूल के गुंडों और बंगाल प्रशासन की मिलीभगत से बंगाल में हुई हिंसा, मतदान के दौरान मतदाताओं को डराने, धमकाने, प्रॉक्सी वोटिंग करने, कार्यकर्ताओं की हत्या, पोलिंग अजेंट की पिटाई, विरोधी पार्टियों को रैली की इजाज़त न देने, हेलिकॉप्टर उतरने न देने से लेकर लगभग हर चुनावी क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी और नेताओं की गाड़ी तोड़ने, पोलिंग अजेंट की उँगली काटने तक, तथा बेतरतीब होती रही मार-पीट, तोड़-फोड़ एवं आगजनी आदि की घटनाओं का ज़िक्र करने जा रहा हूँ।

बंगाल की तस्वीर जो हरी नहीं, रक्तरंजित है

14 मई को तृणमूल के गुंडों ने भाजपा नेता अरविन्द मेनन के साथ कई जिला स्तर के नेताओं को पीटा। साथ ही, तुहीन मंडल नामक नेता के घर में भी उत्पात मचाया। इस साल की जनवरी के मामले को दोहराते हुए, ममता बनर्जी ने 13 मई को अमित शाह की जाधवपुर रैली के लिए इजाज़त नहीं दी और उनके हेलिकॉप्टर को उतरने से मना कर दिया गया। इसके साथ ही, दर्जनों भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं को मध्यरात्रि में उनके होटलों से कोलकाता पुलिस ने उठा लिया।

12 मई को ही मेदिनीपुर में हिन्दुओं को वोट देने से रोका गया। उसी दिन तृणमूल के गुंडों को मोदी के पोस्टर फाड़ते देखा गया। भाजपा प्रत्याशी भारती घोष की गाड़ी पर हमला हुआ और ममता के गुंडों ने उन्हें वोट डालने से भी रोका। इसी दिन छठे चरण के चुनाव के दौरान तृणमूल और भाजपा के एक-एक कार्यकर्ता की हत्या की गई, तथा दो और भाजपा कार्यकर्ताओं पर गोली चलाई गई। साथ ही, घटाल क्षेत्र में सुरक्षाबलों और ग्रामीणों पर कुछ दूसरे ग्रामीण लोगों ने पत्थरबाज़ी की।

7 मई को हिमांता बिसवा शर्मा और दिलीप घोष की गाड़ियों पर हमले किए गए। 6 मई को पाँचवे चरण के चुनाव के दौरान भाजपा पोलिंग एजेंट को क्रूरता से पीटा गया, वहीं भाजपा के बैरकपुर प्रत्याशी अर्जुन सिंह पर तृणमूल के गुंडों ने हमला किया। साथ ही, वहाँ के वोटरों को डराने-धमकाने की बातें भी सामने आईं। उसी दिन हुगली जिले में ईवीएम को तोड़ने की घटना हुई। वहीं, भाजपा प्रत्याशी लॉकेट चटर्जी की कार पर तृणमूल के गुंडों ने अटैक किया और शीशे तोड़ दिए। बनगाँव से ख़बर आई कि वहाँ तृणमूल के लोग वोटरों को बूथ में घुसने से ही रोक रहे थे।

1 मई को सीपीएम पोलिंग अजेंट शेख़ ख़िलाफ़त के घर को ममता दीदी के गुंडों ने आग के हवाले कर दिया। बीरभूम में भाजपा पोलिंग अजेंट की उँगली काट दी गई इन्हीं गुंडों के द्वारा। बाबुल सुप्रियो की कार को भी तोड़ा गया था। भाजपा नेता अपूर्बा चक्रवर्ती को इस्लामपुर में तृणमूल के गुंडों ने बुरी तरह से पीटा। सिलीगुड़ी में भाजपा कार्यकर्ता उत्तम मंडल और उनके भाई गौतम मंडल को तृणमूल के गुंडों ने मतिगारा क्षेत्र में पीटा और उनके दुकान में तोड़-फोड़ की। बाँकुरा के रानीबंध में भाजपा कार्यकर्ता अजीत मुर्मु को कथित तौर पर ममता दीदी के गुंडों ने इतना मारा कि अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई।

29 अप्रैल को दुबराजपुर इलाके में सुरक्षाबलों और ग्रामीणों में झड़प हो गई और उन्हें ब्लैंक फायर करना पड़ा। उसी दिन, आसनसोल में हो रहे दंगों पर तृणमूल नेत्री मुनमून सेन का जवाब था कि उन्हें बेड टी नहीं मिला। इंडिया टुडे और रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों पर भी बंगाल के चुनावी हिंसा पर रिपोर्टिंग के दौरान हमले किए गए, जिसमें महिला पत्रकार भी शामिल थीं। आश्चर्य की बात यह है कि एडिटर्स गिल्ड ने इस पर चुप्पी बनाए रखी। वस्तुतः, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

पूर्वी बर्दवान में तृणमूल के लोगों द्वारा कैमरे पर ईवीएम में दूसरों के वोट डालते देखे जाने पर चुनाव आयोग ने उस अफसर को सस्पैंड किया। इसी तरह 23 अप्रैल को भी तृणमूल के पोलिंग अजेंट और बूथ के प्रेज़ाइडिंग अफसर खुद ही वोट डालते पाए गए।

18 अप्रैल को रायगंज के हिन्दू मतदाताओं को वोटिंग करने से रोका गया और उनकी जगह कोई और वोट डालता रहा। कुछ लोग अगर वहाँ पहुँचे भी तो किसी और ने ही उनका वोट डाल रखा था। उसी दिन भाजपा के एक कार्यकर्ता शिशुपाल की लाश पेड़ से लटकती मिली। ये घटना परुलिया में हुई जहाँ पिछले साल भी दो और भाजपा कार्यकर्ताओं, त्रिलोचन महतो और दुलाल कुमार, की लाशें मिली थीं। महतो की लाश पेड़ से लटकी हुई थी, और दुलाल की एक हाय-टेंशन वाले बिजली के पोल पर।

इसी दिन एक साथ कई और खबरें आई थीं कि एक जगह ईवीएम पर भाजपा के प्रत्याशी के नाम और चिह्न पर काला टेप लगा हुआ मिला। कहीं से ट्वीट आया कि ममता के तृणमूल पार्टी के लोग सीआरपीएफ़ की वर्दी पहन कर घूम रहे हैं। एक ख़बर थी कि तृणमूल नेता ऑडियो क्लिप में बूथ क़ब्ज़ा करने की बात कह रहा है। एक ख़बर थी कि तृणमूल नेता अपने कार्यकर्ताओं को कह रहा है कि सीआरपीएफ़ आदि के जवानों को खदेड़ कर मारो और भगा दो।

मेनस्ट्रीम मीडिया और बंगाल की चुनावी हिंसा की कवरेज

मेनस्ट्रीम मीडिया में आपको ऐसी खबरें नहीं मिलेंगी। आपको यहाँ रवीश कुमार जैसे धूर्त लोग मिलेंगे जो बैलेंस करते रहेंगे कि भाजपा वाले मरे, तो तृणमूल वाले भी मरे हैं। इस समय रवीश कुमार यह बहुत ही कन्वीनिएंटली भूल जाते हैं कि राज्य सरकार ममता बनर्जी की है और किसी की भी हत्या की ज़िम्मेदारी उसी सरकार की है, चाहे मरने या मारने वाला कोई भी हो। इस मामले में ममता बनर्जी पूरी तरह से असफल रही हैं।

आप जब भी बंगाल और चुनावी हिंसा पर कुछ सर्च करेंगे तो अधिकतर बार आपको एक आँकड़ा मिल जाएगा जिसमें इस बात को छुपाने की पूरी कोशिश होगी कि ममता बनर्जी के कार्यकाल में हिंसक घटनाओं और हत्या का सिलसिला थमता ही नहीं। वहाँ आपको खबरों का पूरा दायरा इतने में समेट दिया जाएगा कि बंगाल तो हिंसा का गढ़ रहा ही है। अरे भाई! ‘रहा ही है’ से क्या मतलब? यहाँ पहले भी हिंसा होती रही तो क्या ममता बनर्जी को क्लीन चिट दे दें?

दुर्भाग्य से मेनस्ट्रीम मीडिया यही करता है। वह आपको 2003 में हुए पंचायत चुनावों में हुई हत्याओं की संख्या बता देगा और कहेगा कि पिछले साल के पंचायत चुनावों में एक नया रिकॉर्ड बना जिसमें सबसे ज़्यादा प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिए गए। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक ख़बर के अनुसार 2018 के पंचायत चुनावों में बंगाल में 25, तो हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार 29 लोगों की हत्या हुई। इन 29 में से 13 लोग सिर्फ एक दिन में मार दिए गए। लेकिन मुख्यधारा की मीडिया को तो इसमें रुचि है कि 2003 में तो 76 मरे थे, जिनमें से 45 मुर्शीदाबाद से थे।

ये किस तरह का माहौल है?

इसकी बात कोई नहीं करता कि ये जो माहौल बना है, ये किस तरह का माहौल है। क्या ये डर का माहौल है? क्या ये आपातकाल वाला माहौल है? क्या दो-चार गौरक्षकों और गौतस्करों वाली घटनाओं पर सीधे मोदी से जवाब माँगने वाले पत्रकारों का समुदाय विशेष यह बताएगा कि आखिर ऐसा क्या है बंगाल में कि मजहबी दंगे हर जगह पर कुकुरमुत्तों की तरह हो जाते हैं। यहाँ पर किसकी शह पर यह हो रहा है? आखिर विरोधी पार्टियों के काडर की हत्या इतनी सहजता से कैसे हो जाती है?

क्या यही माहौल यह सुनिश्चित नहीं करता कि लोग चुनावों में ममता और उसकी पार्टी से डर कर रहें? आपका पड़ोसी किसी दिन पेड़ पर ख़ून से लथपथ लटका मिले और संदेश हो कि भाजपा को वोट देने पर यही हश्र होगा, तो आप कौन-सा विकल्प चुनेंगे? पंचायत चुनावों में आप कैसे प्रत्याशी बनेंगे जब तृणमूल के गुंडे सर पर तलवार लेकर मँडरा रहे हों? आखिर आप नोमिनेशन कैसे करेंगे?

यही तो कारण है कि आज के दौर में भी 48,650 पंचायत सीटों में से 16,814; 9,217 पंचायत समिति सीटों में से 3,059; और 825 ज़िला परिषद सीटों में से 203 पर निर्विरोध चुनाव हुए। आप यह सोचिए कि तृणमूल लगभग एक तिहाई, यानी 30% सीटों पर निर्विरोध जीत जाती है! कमाल की बात नहीं है ये? बीरभूम जैसी जगहों पर 90% सीट पर तृणमूल के खिलाफ कोई खड़ा ही नहीं हुआ!

चुनाव आयोग और राष्ट्रपति से अपील

बंगाल पूरी तरह से धधक रहा है। अगर हमारे देश के चुनाव आयोग को चुनावों के समय होने वाली हिंसा का भान छठे चरण के चुनाव हो जाने के बाद, अंतिम चरण के चुनाव से तीन दिन पहले होता है तो इसका सीधा मतलब है कि यह संस्था इस मामले में बिलकुल ही बेकार साबित हुई है। आखिर चुनाव आयोग को किस बात का इंतजार है?

सत्तारूढ़ पार्टी के पोलिंग अजेंट बूथों के भीतर वोट डाल रहे हैं, तृणमूल के गुंडों ने हर लोकसभा क्षेत्र में विरोधी पार्टियों के नेताओं के कार से लेकर घर तक पर हमले किए हैं, लोगों को डरा कर वोट कराया जा रहा है, लोगों को वोट करने से रोका जा रहा है, कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है, सुरक्षाबलों से झड़पें हो रही हैं, रैलियाँ रोकी जा रही हैं…

आखिर चुनाव आयोग क्या पोलिंग बूथ में बम फटने के इंतजार में है? इस तरह की कुव्यवस्था पर संज्ञान लेने में इतना समय कैसे लग गया? और आप करते भी क्या हैं? चुनाव प्रचार रुकवा देते हैं एक दिन पहले! इससे क्या हो जाएगा? जब सारी बात चुनावों के दिन होने वाली गड़बड़ियों और हिंसा पर आधारित है, तो प्रचार रोक कर चुनाव आयोग क्या बताना चाह रहा है?

इस मामले में राष्ट्रपति को संज्ञान ले कर, चुनाव आयोग को निर्देश देना चाहिए कि ऐसे संवेदनशील इलाके में मतदाताओं के लिए अगर सुरक्षित माहौल नहीं है, जो आयोग ने स्वयं ही माना है, तो मतदान दोबारा कराया जाए। आयोग की यह ज़िम्मेदारी है कि मतदाता बिना भय के वोट करे और मतदान कराने वाले तमाम अधिकारी भी भयमुक्त होकर उचित कार्यवाही करें।

अभी चक्कर यह है कि बाहर से आए मतदान कराने वाले अधिकारी, ऐसे मामलों में बस किसी भी तरह मतदान के वो चंद घंटे ज़िंदा रह कर घर को वापस जाने के लिए निकाल देते हैं। उन पर ‘संवेदनशील’ इलाके के नाम पर इतना दबाव होता है कि वो वहाँ के दबंगों के भरोसे ही मतदान करवाते हैं। उन्हें लगता है कि ज़िंदा रहना उनकी प्राथमिकता है, और वो वही करते भी हैं।

अगर राज्य स्वयं ही गुंडों को पाले, उनसे पूरा का पूरा बूथ मैनेज करवाए, उनके नेता यह आदेश देते पाए जाएँ कि सुरक्षाबलों को घेर कर मारो, उनके गुंडे इतने बदनाम हों कि वहाँ आनेवाला अधिकारी ईवीएम ही उन्हें सौंप दे, तो फिर इसमें चुनाव सही तरीके से कैसे हो पाएगा?

यही कारण है कि बंगाल में हुए चुनाव रद्द किए जाएँ और सारे सुरक्षा बलों को एक साथ बंगाल में रख कर, नए सिरे से, पूरी सुरक्षा के साथ, मतदान दोबारा कराए जाएँ। चाहे परिणाम किसी के भी पक्ष में जाए, मतलब उससे नहीं है। मतलब इससे है कि एक भी वोट जबरदस्ती न दिलवाया जाए। मतलब इससे है कि हर मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग अपनी इच्छा से करे। मतलब इससे है कि चुनाव हिंसा और डर के माहौल से मुक्त हो।

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बरखा दत्त
मीडिया गिरोह ऐसे आंदोलनों की तलाश में रहता है, जहाँ अपना कुछ दाँव पर न लगे और मलाई काटने को खूब मिले। बरखा दत्त का ट्वीट इसकी प्रतिध्वनि है। यूॅं ही नहीं कहते- तू चल मैं आता हूँ, चुपड़ी रोटी खाता हूँ, ठण्डा पानी पीता हूँ, हरी डाल पर बैठा हूँ।

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