रवीश जी गालियाँ आपके पत्रकारिता से तंग जनता का आक्रोश है, इसे भारत-माँ के नाम मत कीजिए

'ज़िंदा गाड़ दूँगा', 'आँखे निकाल लूँगा', यहाँ तक कि खीझी माँ भी अपने बच्चे को बोल देती है कि 'मर क्यों नहीं जाते'! इनमें से जो भी ऐसा बोलता है, वो ऐसा चाहता नहीं सर और न ही करता है बल्कि वो खीझा हुआ है, तंग है, ऐसा करने का मक़सद सिर्फ़ ये जताना होता है कि कुछ तो गड़बड़ है, अन्याय पूर्ण है जो नहीं होना चाहिए।

परम आदरणीय रवीश जी,

आज आपकी फिर बहुत जोर से याद आयी, यूँ ही नहीं, मैंने कल आपका राष्ट्र के नाम सन्देश पढ़ा तो ख़ुद को आपको याद करने से नहीं रोक पाया। आपको तो पता ही होगा कि आप एक ‘महान’ पत्रकार हैं। पर रवीश जी, आपको जो महानता हासिल हुई है क्या उसका सर्टिफिकेट आपने ख़ुद छापा या इस देश के लोगों ने आपको इतना सम्मान दिया कि आप पत्रकारिता के एक पर्याय बने? बहुतों ने आपको देखकर आपके जैसा बनना चाहा। ऐसे कई लोगों से तो मैं मिला भी हूँ। जो लोग आपके प्राइम टाइम का बेसब्री से इंतज़ार करते थे।

वो आज आपका नाम सुनते ही कंटेंट ख़ुद बताने लगते हैं कि आपने क्या लिखा होगा? आज हम उस दौर में जी रहे हैं जब ख़ुद आपको ही ये अपील करनी पड़ रही है दर्शकों से कि ‘आप टीवी से दूर रहें। हमारी तो नौकरी है, हमें तो प्राइम टाइम करना ही होगा लेकिन अब यहाँ भी आपके देखने-जानने-समझने लायक कुछ भी नहीं है।’ इसलिए अब मुझसे उम्मीदे न रखें। सोचिए ना आज-कल आपने प्राइम टाइम का क्या हाल कर दिया है। आपने तो एक तरह से हथियार ही डाल दिया कि अब हमसे पत्रकारिता नहीं हो पाएगा। अब जो कर रहा हूँ बस यही मुझमें शेष है। आपके अंदर इतना खोखलापन देखकर सच में बहुत दुःख हो रहा है रवीश जी।

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ख़ैर, कल रवीश जी आपने लिखा कि लोग आपको गालियाँ दे रहे हैं। सच में यह जानकर बहुत दुःख हुआ। पर सर, क्या आपने सोचा कभी कि क्यों दे रहे हैं? ऐसा आप क्या कर रहे हैं जो आपको पत्रकारिता के सिरमौर बनाने वाले दर्शक आज आपसे ख़फ़ा हैं। क्या आपने ये भी सोचा कि कौन लोग हैं ये, जो आपको गालियाँ दे रहे हैं? आपने तो बड़ी आसानी से इनके लिए एक वर्ग चुना ‘देश भक्त’। क्या आपके हिसाब से देश भक्ति की यही परिभाषा है। क्या जो आपको गालियाँ नहीं दे रहे वो देश भक्त नहीं, कुछ और हैं?

रवीश जी, आपने गौर किया कि आप पिछले कुछ सालों से पत्रकारिता के नाम पर जो कर रहे हैं वो क्या है? पूरे देश को काला-सफ़ेद दो वर्गों में बाँटने का पराक्रम करके भी आपके हाथ कुछ नहीं लगा। आपको भी मालूम है कि इनके बीच भी कई शेड हैं। जानते हैं सर, यह वही शेड हैं, जो अब उभर कर सामने आ रहे हैं। जो पहले आपको ठीक से नहीं समझ पा रहे थे। जब वो खुल कर बोलने लगे तो आपने उन्हें ‘भक्त’ कहा, सम्मान वश नहीं बल्कि गाली के रूप में ही जबकि आपको अच्छी तरह पता है कि आप जो कर रहे हैं वह भी वही है बस आपका तारणहार अलग है या आप खुद ही भगवान बनने की लालसा में किसी का तारणहार बनने के लिए जी जान से लगे हैं?

आपने पहले इस देश के युवाओं को ललकारा कि तो थोड़ा पढ़ लिख लिया करो। यही गलती कॉन्ग्रेस ने केज़रीवाल को राजनीति के लिए ललकार कर और मोदी को गाली देकर की थी। एक ने ऐसी राजनीति की कि लोग कहते हैं इसे देखकर गिरगिट भी रंग बदलना छोड़ दिया है। और जब मोदी को ललकारा तो उन्होंने विकास को आगे कर कॉन्ग्रेस को पीछे छोड़ दिया। बहरहाल, आपकी बात जम गई युवाओं को। जब पढ़ने लगे तो उनको आपकी पत्रकारिता में झोल नज़र आने लगा सर। शुरुआत में वो ग़लती कर रहे थे तो आपने फिर उन्हें राह दिखाई कि व्हाट्सप यूनिवर्सिटी नहीं बल्कि सही स्रोतों का इस्तेमाल करें।

रवीश जी आप तो गुरु हैं आपको ख़ुश होना चाहिए, आज आपके वही छात्र जैसे ही आप कुछ भी आधा-अधूरा परोसते हैं वो फटाक से पढ़-वढ़कर उसका ठीक से पोस्टमॉर्टम कर देते हैं। आपके पूरे प्रोपेगंडा की चिन्दी-चिन्दी कर उससे ‘राफ़ेल’ बनाने की कला सीख गए हैं। सर, जैसे-जैसे आपके लेखों में साल दर साल गन्दगी बढ़ती गई। आपके छात्र भी परिपक्व होते गए अब उन्हें आपके बोलने में भी काइयाँपन नज़र आने लगा, आपकी तिरछी मुस्कान में छिपी कुटिलता को भी ये भाँपने लगे और जब आप हें-हें-हें करते हैं न तो पक्का ये समझने लगे कि देश की जनता से पत्रकारिता के नाम पर कुछ बड़ा झोल अब करने वाले हैं आप।

अब सोशल मीडिया से लेकर आप अपने प्राइम टाइम पर जो भी खिचड़ी परोसते हैं, इससे पहले कि आँख मूँदकर आपके भक्त वाह-आह करें, उससे पहले ही आपके छात्र पहचानने लगे हैं कि यह खिचड़ी है किस चीज़ की। क्या-क्या और कौन सा सड़ा-गला सामान उनके गुरु ने स्वाद और सेहत का पर्याय बना कर परोस दिया है। जानते हैं सर, आपके छात्रों की मेधा से देश की आम जनता की भी आँखे खुलने लगी हैं।

पहले आप जो कुछ भी परोस देते थे, जो बेचारे उसे चुपचाप अमृत समझ खा लेते थे। रवीश जी, जानते हैं जो पहले आपका दिया सब कुछ खा लेते थे ना, वो अपना पूरा लिवर, गाल ब्लेडर डैमेज कर बैठे हैं। डॉ. ने उनसे पूछा कि पहले क्या खाते थे, जिससे दिनों-दिन आपकी सेहत गिरती गई। फिर आपके दर्शकों और पाठकों को लगा कि धोख़ा हुआ है हमारे साथ, हमारी भावनाओं और भरोसे का गला घोटा गया है। हर तरफ़ एक आक्रोश पनपने लगा।

जानते हैं रवीश जी जब कोई अपना धोखा दे ना तो ज़्यादा बुरा लगता है। परिणामस्वरुप अचानक से आपके भक्ति का ग्राफ़ गिरने लगा, आपके पूरे गिरोह की नींव डगमगाने लगी तो आप सीधे-सीधे खुलकर सामने आ गए। अब प्रोपेगंडा ही आपके लिए ख़बर हो गई। पर कम्बख़्त जब वो भी नहीं चला तो आपने अभी-अभी जागी जनता को फिर से सोने को कह दिया, पर ये सम्भव न हुआ।

रवीश जी, जिसे आप जिसे गाली कह रहे हैं वो गाली नहीं, बल्कि आपसे खीझी हुई जनता का आक्रोश है। ये आइना है आपके लिए कि आप अपना पुनः मूल्यांकन करें और जानें कि आप कौन सी गलती कर रहे हैं? आपकी अपनी भक्त जनता भी जब आपसे उकता कर अपना आक्रोश व्यक्त करने लगी है तो आपने और आपके गिरोह ने ‘भक्त’ शब्द को ही गाली बना दिया और अब ‘देश भक्ति’ के पीछे पड़े हैं।

रवीश जी, आपने कहा कि आपको जो गालियाँ दी गईं, उसमें माँ-बहनों के जननांगों को केंद्रित किया गया है। दुर्भाग्य है, ऐसा नहीं होना चाहिए। मैं भी इसके सख्त ख़िलाफ़ हूँ। जनता और आपके छात्रों को अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए या तो संसदीय गालियां ईज़ाद करनी चाहिए या फिर कोई और तरीका अपनाना चाहिए। पर जानते हैं रवीश जी, मुझे जो लग रहा है, ये आम जनता है। ये आपके जितना क्रिएटिव नहीं कि ‘देश भक्ति’ को ही गाली बना दे। रवीश जी, आपके एक पुराने छात्र ने तो खुलकर ये स्वीकार किया कि ये बस आपके प्रोपेगंडा से ऊबी जनता का आक्रोश है।

आप तो विद्वान हैं रवीश जी, जानते ही होंगे कि जब हम गुस्से में होते हैं तो यूँ ही किसी को बोल देते हैं कि ‘ज़िंदा गाड़ दूँगा’, ‘आँखे निकाल लूँगा’, यहाँ तक कि खीझी माँ भी अपने बच्चे को बोल देती है कि ‘मर क्यों नहीं जाते’! इनमें से जो भी ऐसा बोलता है वो ऐसा चाहता नहीं सर और न ही करता है बल्कि वो खीझा हुआ है, तंग है, ऐसा करने का मक़सद सिर्फ़ ये जताना होता है कि कुछ तो गड़बड़ है, अन्याय पूर्ण है जो नहीं होना चाहिए।

पर सर आपने तो हद कर दी। जब आपको तारीफें मिली, प्रसिद्धि मिली, आज आप जो कुछ हैं जब वो सब मिला तो आपने कभी नहीं कहा कि ये सब ‘भारत माँ’ की वजह से है। और जब आपको आपके विचारों और पत्रकारिता के नाम पर प्रोपेगंडा से त्रस्त जनता और आपके अपने ही छात्रों का आक्रोश झेलना पड़ रहा है तो आप आज कह रहे हैं कि ये सभी गालियाँ मैं ‘भारत माँ’ को समर्पित कर रहा हूँ। क्या आप की नज़र में आज ‘भारत माँ’ यही डिज़र्व करती हैं?

दूसरे शब्दों में आज आप देश भक्तों का सहारा ले परोक्ष रूप से ही सही पत्रकारिता के नाम पर भारत माँ को गाली नहीं दे रहे?

अभी भी वक़्त है रवीश जी लौट आइए। पत्रकारिता का वो सुनहरा दौर फिर से ले आइए। जिस दिन से आप फिर से पत्रकारिता करने लगेंगे, देश की यही जनता, आपके भक्त और पुराने छात्र आपके तारीफ़ में कसीदें पढ़ते नज़र आएँगे। हमारे यहाँ तो कहावत है कि सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते। छोड़ दीजिए ना ये प्रोपेगंडा, मत कीजिए ‘देश भक्ति’ और भारत-माँ को गाली बनाने का कुत्सित प्रयास।

देश सिर्फ़ सीमाओं की घेराबंदी नहीं बल्कि वहाँ के लोगों के अंदर व्याप्त उसके प्रति प्रबल भावनाओं से बनता है, विकसित होता है। जिस दिन से आपने फिर से पत्रकारिता शुरू कर दी ना रवीश जी, ये आक्रोशित लोग जिसे आपने पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया है, जिनके आप मनोनीत गुरु हैं, यूँ अपने अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरुपयोग करना छोड़ देंगी, ये सब इस पीढ़ी ने आप ही से सीखा है। बस आपने थोड़ा नाटकीय ढंग से उसमे काइयाँपन भी मिलाकर फेंट लिया है और ये आपसे विमुख आपके भक्त, आपके पूर्व छात्र आज भी सीधे-सरल बने हुए हैं।

सधन्यवाद
पत्रकारिता के अच्छे दिनों के लिए कृतसंकल्प एक पत्रकार

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