Tuesday, April 13, 2021
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जब हुआ मंदिरों का ध्वंस, तब किस दोजख में था सौहार्द? – यह ‘हिंदू’ बनने का वक्त, ‘सेकुलर’ नौटंकी से बचो

वाजपेयी ने कहा था कि राम का मंदिर छल और छद्म से नहीं बनेगा। राम का मंदिर अगर बनेगा तो एक नैतिक विश्वास के बल पर बनेगा। वो वक्त करीब आ गया है। हिंदू अपने गौरव के प्रतीक, अपने नैतिक बल के प्रतीक को मजहबी रामभक्त की ईंट, मिट्टी और श्रद्धा से दूषित नहीं होने देगा।

दिसंबर 17, 1992 के दिन, लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था- “जहाँ मैंने आरंभ किया था, मैं वहीं समाप्त करना चाह रहा हूँ। मैंने कहा था कि देश तिराहे पर खड़ा है। एक तरह की सांप्रदायिकता को बढ़ावा देकर, एक तरह की कट्टरता को बढ़ावा देकर, आप दूसरी तरह की कट्टरता से नहीं लड़ें, मगर आप यही कर रहे हैं और अब इस समय आइए, हम एक नई शुरुआत करें। अयोध्या, जैसा मैंने शुरू में कहा था कि अवसर में बदला जा सकता है।”

वाजपेयी करीब तीन दशक पहले जिस सांप्रदायिकता और कट्टरता को लेकर आगाह कर रहे थे, क्या वह जमशेद खान के यह कहने से, “हमने इस्लाम अपनाया और इस्लाम के अनुसार ही हम प्रार्थना करते हैं। लेकिन धर्म बदलने से हमारे पूर्वज नहीं बदल जाते। राम हमारे पूर्वज थे और हम अपने हिंदू भाइयों के साथ इसे मनाएँगे।”, खत्म हो गई है?

या सईद अहमद के यह कहने से, “हम भारतीय मुस्लिम मानते हैं कि राम इमाम-ए-हिंद थे और मैं अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के दौरान मौजूद रहूँगा।”, से वह समय आ गया है जिसका जिक्र वाजपेयी कर रहे थे?

या राशिद अंसारी जब कहते हैं, “अगर हमें गर्भगृह में जाने का मौका मिलता है, जहाँ शिलान्यास किया जाएगा, तो यह हमारे लिए आशीर्वाद की तरह होगा। अगर सुरक्षा वजहों से हमारा प्रवेश रोका जाता है तो हम बाहर से जश्न का हिस्सा बनेंगे।”, तो वह एक नई शुरुआत की बात कर रहे होते हैं? या फिर छत्तीसगढ़ से भूमि पूजन के लिए ईंट लेकर फैज खान की यात्रा को अवसर में बदला जा सकता है?

सवाल कई हैं और ‘अच्छा हिंदू’ ‘रामभक्त मजहबी’ पर लहालोट हुआ जा रहा है। 5 अगस्त को अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का भूमिपूजन होगा। देश के प्रधानमंत्री मौजूद होंगे। साधु-संत और भव्य राम मंदिर की संघर्ष यात्रा के कई पथिक भी उपस्थित रहेंगे। कितना आसान, कितना मधुर लगता है सब कुछ।

लेकिन हिंदू के सवाल यहीं से खड़े होते हैं। क्या उत्तर प्रदेश और केंद्र में आज बीजेपी की सरकार न होती, तब भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह सब इतना ही आसान होता है? ‘अच्छा हिंदू’ कहेगा कि क्यों नहीं?

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कौन सी सरकार जाएगी। लेकिन हिंदू मन सवाल करता है कि शाहबानो के हक में भी फैसला इसी सुप्रीम कोर्ट ने दिया था, पर एक सरकार ही थी जो इसके खिलाफ अध्यादेश ले आई।

हिंदू मन कहता है कि वो भी एक यूपी की ही सरकार थी, जिसने राम भक्त कार सेवकों की लाश से अयोध्या और सरयू को पाट दिया था। फिर 1992 की वह बीजेपी सरकार भी थी, जिसने राम भक्तों पर गोली चलाने का आदेश देने की जगह, सत्ता का बलिदान कर दिया।

हिंदू मन को अचानक से राम मंदिर पर पैदा सौहार्द्र से शक होता है। लेकिन यह जान कर भी कि रामलला के पक्ष में फैसला आने पर सुप्रीम कोर्ट की नीयत पर सवाल उठाए गए थे, अच्छा हिंदू ‘मजहबी रामभक्त’ पर मर मिटेगा। उसके तर्क बड़े भोले होंगे। वह कहेगा मैं अपने घर में पूजा करूँ और मेरा कोई खास मजहब का मित्र आएगा तो मैं कैसे मना कर दूँगा।

वह भावनाओं के ज्वार में उतराता जाएगा। और यह ज्वार कौन पैदा कर रहा है। वही मीडिया, वही वामपंथी। चूँकि तमाम तीन तिकड़म के बाबवजूद जब वे भव्य राम मंदिर के निर्माण में अड़ंगा नहीं डाल पा रहे हैं तो मीठी गोली से शिकार पर उतर आए हैं और वे भी जानते हैं अच्छा हिंदू इस जाल में फँसेगा।

लेकिन हिंदू यह जानना चाहता है कि अयोध्या, मथुरा, काशी सहित देश के तमाम हिस्सों में मंदिरों का ध्वंस कर उस पर मस्जिद खड़े करने के भागीदार (जिनके नाम भी जमशेद, सईद और फैज जैसा ही कुछ रहा होगा) के पूर्वज राम नहीं थे। तब किस दोजख में दबा था यह सौहार्द्र?

1856 में मिर्जा जान ने लिखा था,

“मुगल बादशाहों ने बनारस और काशी में मंदिरों को तोड़कर उनके मलबे से मस्जिदें बनाईं। ऐसा ही अयोध्या में हुआ। अयोध्या राम के पिता की राजधानी कही जाती है। यह हिंदुओं के लिए पूजा का सबसे पवित्र स्थान है। यहाँ मंदिर की एक-एक दीवार को तोड़कर उसके मलबे और पत्थरों से ही मस्जिद बनाई गई। जहाँ विशाल मंदिर था उसे तोड़कर मैदान कर दिया गया। उसे ही मस्जिद का अहाता बनाया गया। बादशाह बाबर ने यह काम तो बहुत अच्छा किया, 1526 में मंदिर को तोड़कर शानदार मस्जिद बनवाई, लेकिन मुश्किल यह है कि अभी भी यह मस्जिद सीता की रसोई मस्जिद के तौर पर ही जानी जाती है।”

नवाबों की हुकूमत खत्म होने के बाद अंग्रेजों के जमाने में 1858 में बाबरी मस्जिद के मुअज्जीन ने जो कोर्ट में अपील की थी, उसमें भी इसे जन्मस्थान मस्जिद बताया था। उसका कहना था कि मस्जिद सैकड़ों साल से वीरान है और हिंदू ही वहाँ पूजा करते आ रहे हैं।

अंग्रेजी हुकूमत के गजेटियर से लेकर तमाम दस्तावेज यह बताते हैं कि वह जगह रामलला की थी। यह सब जानने के बाद हिंदू मन पूछना चाहता है कि फिर आजाद भारत में नेहरू ने रामलला की मूर्ति उस जगह से क्यों हटवानी चाही थी?

क्यों इतना लंबा संघर्ष हिंदुओं को करना पड़ा? क्यों इतनी लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई? क्या तब जमशेद और फैज के कौम को यह नहीं पता था कि उनके पूर्वज कौन थे? क्या उन्हें यह दिव्य ज्ञान अगस्त 05, 2020 की तारीख तय होने के बाद हुई?

अच्छा हिंदू कहेगा- “छोड़ो कल की बातें कल की बात पुरानी।” फिर जमशेद और फैज के पूर्वजों की बात भी तो पुरानी ही है। जमशेद और फैज की आज की पहचान तो कहती है कि बुतपरस्ती हराम है। उनके लिए हम काफिर हैं। वैसे भी धर्म आस्था का मसला है। जीवन जीने का सलीका है। जिनके लिए हिंदुत्व की जीवनशैली नापाक है, उनकी मिट्टी, उनकी आस्था का हिंदू क्यों आचार डालें। जमशेद और फैज जैसे यह भी तो कह सकते हैं कि भूमि पूजन के पवित्र मौके पर हम अपने पूर्वजों के धर्म में वापसी करेंगे।

लेकिन वे न ऐसा कुछ कहेंगे और न करेंगे। वे मोहरे हैं। उनसे आप सवाल करेंगे तो मीडिया आपको कट्टर हिंदू बताएगा। बताएगा कि ​आप सेकुलर भारत के लिए खतरनाक हैं। और आप सर्टिफिकेट पाने की लालसा में अच्छा हिंदू बनने को तैयार हो जाएँगे।

फिर भी हिंदू मन इस मीडिया से पूछता रहेगा, तुम्हारी क्यों सुने? तुमने मंदिर के पैरोकार रहे परमहंस रामचंद्र दास को कट्टर और बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी को उदरावाद का प्रतीक बताया। ‘मुस्लिम इंडिया’ नाम से अखबार प्रकाशित करने वाला, गणतंत्र दिवस को ब्लैक डे के तौर पर मनाने का आह्वान करने वाला सैयद शहाबुद्दीन तुम्हारे लिए प्रोग्रेसिव मजहब का था।

लेकिन साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती, विनय कटियार जैसों को उन्मादी बताया। राम सेवकों की लाश बिछाने वाला मौलाना मुलायम तुम्हारे लिए समाजवादी है और राम रथ यात्रा निकालने वाला आडवाणी सांप्रदायिक।

हम तुम्हारी इन साजिशों को अब खूब समझते हैं। हम हिंदू बनेंगे। नहीं बनना अब तुम्हारे लिए अच्छा हिंदू। हम जानते हैं कि प्रोगेसिव कट्टरपंथी, उदारवादी कट्टरपंथी तुम्हारे गढ़े वे शब्द हैं, जिससे तुम इनके जिहादी मानसिकता पर पर्दा डालते हो। जिस मौलाना आजाद को तुम उदारवादी बताते रहे, उसने आजाद भारत की शिक्षा-व्यवस्था को वह शक्ल दी, जिससे मजहब विशेष का खूनी इतिहास दब जाए और हिंदू अपनी पहचान पर शर्मिंदा हों।

वाजपेयी ने कहा था राम का मंदिर छल और छद्म से नहीं बनेगा। राम का मंदिर अगर बनेगा तो एक नैतिक विश्वास के बल पर बनेगा। वो वक्त करीब आ गया है। हिंदू अपने गौरव के प्रतीक, अपने नैतिक बल के प्रतीक को मजहबी रामभक्त की ईंट, मिट्टी और श्रद्धा से दूषित नहीं होने देगा।

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अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

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