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विरोध प्रदर्शन के नाम पर हल्ला, हिंदुओं का उत्पीड़न करके सब शांत: बांग्लादेश से लेकर पाकिस्तान के कट्टरपंथियों का पैटर्न एक, पहला नहीं है ‘दीपू चन्द्र’ केस

यह इस बात की गवाह है कि बांग्लादेश में हिंदू होना अब अपनी जान हथेली पर लेकर चलने जैसा है। ईशनिंदा का आरोप कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि कट्टरपंथियों के लिए हिंदुओं के कत्ल का एक 'लाइसेंस' बन चुका है। दीपू चंद्र की जलती हुई चिता और रिदॉय रोबी दास जैसी नृशंस हत्याएँ यह साबित करती हैं कि जब मजहबी उन्माद सर चढ़कर बोलता है, तो कानून और इंसानियत दोनों दम तोड़ देते हैं।

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा मचाया जा रहा बवाल हर जगह सुर्खियों में है। विरोध प्रदर्शन के नाम पर लूट, हिंसा और हत्याओं को जिस तरह अंजाम दिया जा रहा है ये किसी से छिपा नहीं है। इस बीच दीपू चंद्र नाम के हिंदू का नाम सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। दीपू इन्हीं इस्लामी कट्टरपंथियों की बर्बरता का शिकार हुआ एक नाम है जिसे ईशनिंदा के इल्जाम में घेरकर मार दिया गया।

सोशल मीडिया पर दीपू की सारी वीडियोज मौजूद हैं। किसी में वो थाने में बैठा दिख रहा है, किसी में वो इस्लामी कट्टरपंथियों से घिरा दिख रहा है, किसी में सैंकड़ों कट्टरपंथी उसे नंगा करके मार रहे हैं और किसी में उसे पेड़ से लटकाकर जलाया जा रहा है।

ये वीडियोज इतनी हृदयविदारक हैं कि एक सामान्य इंसान के लिए इन्हें देखना मुश्किल हो जाए। जैसे-जैसे लोगों के पास ये वीडियो पहुँच रही है उसके साथ सवाल भी उठ रहे हैं कि बांग्लादेश में हिंदू किस डर-दहशत में रह रहे हैं।

विरोध प्रदर्शन का पुराना ‘खूनी पैटर्न’

खैर! इस वक्त चूँकि बांग्लादेश में हिंसा की चर्चा हर जगह है इसलिए हम और आप दीपू पर बात भी कर रहे हैं वरना हकीकत तो यही है कि इस्लामी कट्टरपंथियों के विरोध प्रदर्शन का यही पैटर्न है। वो पहले किसी मुद्दे के नाम पर विरोध करने सड़क पर आते हैं और अंत हिंदुओं के साथ उत्पीड़न, महिलाओं पर हत्याचार और हत्याओं से ही होता है।

बांग्लादेश में करीब 1 साल ही हुआ है जब शेख हसीना को सत्ता से निकालने के लिए हिंसा भड़की थी। उस समय उसे छात्रों का प्रदर्शन कहकर सराहा जा रहा था पर जमीन पर क्या हो रहा था वो याद है क्या आपको? उस हिंसा में 100+ मौत हुई थी जिसमें हिंदू पार्षद हरधन रॉय हारा और काजल रॉय जैसे लोगों के नाम शामिल थे। इस्लामी कट्टरपंथियों ने उस हिंसा में भी चुन-चुनकर हिंदुओं को निशाना बनाया था। न नेता छोड़े गए थे और न ही पत्रकार न कलाकार।

कट्टरपंथियों ने सबको निशाना बनाया था और जिन्हें छोड़ा था उनकी आपबीती और ज्यादा दर्दनाक थी। हिंदू महिलाओं को दो विकल्प दिए गए थे या तो वो रेप करवाएँ-घर लुटवाएँ या फिर अपने परिजनों की मौत होते सामने देखें।

ईशनिंदा: अल्पसंख्यकों के खिलाफ सबसे आसान हथियार

ये आईना सिर्फ 1 साल पहले छात्र क्रांति के नाम पर फैलाई गई हिंदू विरोधी हिंसा का नहीं, बल्कि इतिहास में हुए ज्यादातर इस्लामी कट्टरपंथियों के प्रदर्शन की सच्चाई है जिसे शुरुआत में विरोध का नाम दिया जाता और उसका अंत हिंदुओं के उत्पीड़न व कत्ल से होता है। इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है जब नारा-ए-तकबीर और अल्लाह-हू-अकबर जैसे नारों की गूँज के बीच हिंदू मार दिए गए।

बांग्लादेश जैसे इस्लामी मुल्कों में हिंदुओं के उत्पीड़न के लिए के लिए ईशनिंदा जैसे इल्जाम एक बहुत आसान हथियार है जिसका इस्तेमाल ये कभी भी किसी के भी खिलाफ कर लेते हैं। इसी साल की बात करें चटगाँव के पटेंगा काठगढ़ में हिंदू युवक को मुस्लिम भीड़ ने अगवा करके जमकर प्रताड़ित किया था। लड़के का नाम प्रांत तालुकदार था। भीड़ ने उस समय उस पर भी ईशनिंदा का आरोप लगाया था।

इसी तरह दिसंबर 2024 में एक घटना सामने आई थी जब आकाश दास नाम के युवक पर ईशनिंदा का इल्जाम लगाकर इस्लामी भीड़ विरोध करने सड़क पर आई थी और उसका अंत उन्होंने 130 हिंदू घरों व 20 मंदिरों को जलाकर किया था।

इससे पहले नवंबर 2024 में करीमगंज उपजिला में रहने वाले रिदॉय रोबी दास की हत्या कर दी गई थी। रिदॉय नाई का काम करता था और उन्हें 3 मौलानाओं ने किडनैप कर बुरी तरह पीटा और यातनाएँ दी, जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी। इसमें मौलानाओं ने मुस्लिम युवती से प्रेम संबंध का कारण बताया था।

उससे पहले अक्तूबर 2024 में एक उन्मादी मुस्लिम भीड़ ने हृदय पाल नामक एक हिंदू लड़के पर पैगंबर मुहम्मद के अपमान का आरोप लगाकर फरीदपुर जिले के बोलमारी में कादिरदी डिग्री कॉलेज को घेर लिया था और मारने की कोशिश की गई थी।

अफवाहें और सरहद पार की दरिंदगी

बांग्लादेश के खगराचारी और रंगमती में मुस्लिम भीड़ ने धनंजय और रुबेल त्रिपुरा नामक हिंदू अल्पसंख्यकों की हत्या की थी। यह हिंसा एक मुस्लिम अपराधी की मौत के बाद फैलाई गई अफवाह के कारण हुई थी। जिसमें जनजातीय और अल्पसंख्यक समुदायों ने बंगालियों पर हमला बताया था।

एक और मामला पाकिस्तान के सियालकोट से सामने आया था, जहाँ एक श्रीलंकाई शख्स प्रियांथा कुमारा को ईशनिंदा के आरोप में उग्र इस्लामी भीड़ ने प्रताड़ित किया था और जलाकर मार डाला था। इस भयानक और दर्दनाक घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

यह इस बात की गवाह है कि बांग्लादेश में हिंदू होना अब अपनी जान हथेली पर लेकर चलने जैसा है। ईशनिंदा का आरोप कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि कट्टरपंथियों के लिए हिंदुओं के कत्ल का एक ‘लाइसेंस’ बन चुका है। दीपू चंद्र की जलती हुई चिता और रिदॉय रोबी दास जैसी नृशंस हत्याएँ यह साबित करती हैं कि जब मजहबी उन्माद सर चढ़कर बोलता है, तो कानून और इंसानियत दोनों दम तोड़ देते हैं।

सबसे डरावनी बात यह है कि इन हमलों को अक्सर ‘जन आक्रोश’ या ‘राजनीतिक विरोध’ का जामा पहना दिया जाता है, जबकि हकीकत में यह हिंदुओं के खिलाफ एक सोची-समझी नफरत है। पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक, पैटर्न एक ही है- अफवाह फैलाओ, भीड़ जुटाओ और हिंदुओं को खत्म कर दो। यदि दुनिया ने अब भी इन कट्टरपंथियों के खूनी खेल पर चुप्पी नहीं तोड़ी, तो दक्षिण एशिया से अल्पसंख्यकों का नामोनिशान मिटाने की यह साजिश सफल हो जाएगी।

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