जिस सभ्यता की कालगणना का प्रथम उच्चार ही शक्ति साधना से होता है, वह सभ्यता स्वभाव से कभी भीरु नहीं हो सकती। किंतु इतिहास की विडंबना देखिए कि निरंतर आक्रमणों और वैचारिक उपनिवेशवाद ने उसी समाज के मन में ऐसी मानसिक जड़ता भर दी कि शक्ति उपासना का जीवंत दर्शन कर्मकांड में सिमटता चला गया। शस्त्र पूजन प्रतीक बनकर रह गया। शौर्य के संस्कार क्षीण पड़ते गए।
चैत्र नवरात्र केवल घटस्थापना, व्रत और मंत्रोच्चार तक सीमित अनुष्ठान नहीं है। यह साधना, संयम और शक्ति उपासना का वह नौ दिवसीय तप है, जिसने भारत को विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठा दिलाई।
शक्ति केवल देवी का स्वरूप नहीं है। वह जीवन के प्रत्येक आयाम में सक्रिय चेतना है। इसी दृष्टि से भारत में स्त्री को ‘शक्ति’, मातृभूमि को ‘भारत माता’ और प्रकृति को पूज्य माना गया। यह वह सांस्कृतिक दृष्टि है, जिसमें आध्यात्म, समाज और प्रकृति परस्पर एक सूत्र में बँधे हैं।
नवरात्र का अर्थ है- अंधकार पर चेतना का विजय अभियान। इन नौ दिनों में जिस आदिशक्ति की आराधना होती है, वह ऐसी ऊर्जा है जो सृजन भी हैं और संहार भी। करुणा भी हैं और पराक्रम भी। भारतीय परंपरा ने इसी शक्ति को ‘देवी’ रूप में प्रतिष्ठित किया है।
देवी दुर्गा मातृत्व का ही नहीं, अन्याय के विनाश का भी प्रतीक हैं। उनके हाथों में शस्त्र इसलिए हैं, क्योंकि भारतीय दर्शन अन्याय के समक्ष निष्क्रिय सहिष्णुता को धर्म नहीं मानता। शक्ति उपासना का संदेश स्पष्ट है- धर्मरक्षा के लिए सामर्थ्य अनिवार्य है।
इतिहास बताता है कि जब भारत ने शक्ति साधना को जीवित रखा, तब वह विश्व में सम्मानित रहा। जब आत्मबल से विमुख हुआ, तब दासता और अपमान का भागी बना, क्योंकि शक्ति के अभाव में अहिंसा विवशता बन जाती है।
भीरुता वाली इसी मानसिक जड़ता को तोड़ने का पर्व है- नवरात्र। यह आत्मरक्षा, आत्मसम्मान और धर्मनिष्ठ साहस का जागरण है। यह स्मरण कराता है कि सज्जनता का अर्थ समर्पण नहीं होता। सहिष्णुता का अर्थ आत्मविस्मृति नहीं है।
नवरात्र की पूर्णता रामनवमी पर होती है। भगवान श्रीराम भारतीय मानस के केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि आचरण की मर्यादा, शासन की नैतिकता और सामाजिक संतुलन के आदर्श हैं। यदि नवरात्र शक्ति का प्रतीक है तो रामनवमी मर्यादा का संदेश।
शक्ति बिना मर्यादा, विनाशकारी होती है और मर्यादा बिना शक्ति दुर्बलता का प्रतीक। भारतीय दर्शन इन दोनों के संतुलन की शिक्षा देता है।
यही संतुलन भारत की सांस्कृतिक आत्मा का मूल है। इसमें साहस भी है और संवेदनशीलता भी। पराक्रम भी है और करुणा भी।
चैत्र नवरात्र और रामनवमी भारतीय आत्मा के दो आयाम हैं- शक्ति और मर्यादा। एक साहस देती है, दूसरी दिशा। एक अन्याय के विरुद्ध खड़ा करती है, दूसरी संयम सिखाती है। बताती हैं कि हिंदुत्व किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान का नाम नहीं, बल्कि भारत की जीवन पद्धति का वह सांस्कृतिक स्वरूप है, जिसमें अनेक देवपरंपराएँ, भाषाएँ और लोकाचार समाहित हैं। यही सांस्कृतिक चेतना भारत को केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि जीवंत सभ्यता बनाती है।
यही सांस्कृतिक आत्मविश्वास, राष्ट्रशक्ति का आधार है। राष्ट्र केवल सीमाओं से सुरक्षित नहीं होता। वह नागरिकों के आत्मबल से सुरक्षित होता है। मानसिक दुर्बलता किसी भी राष्ट्र को भीतर से खोखला कर देती है।
यह संतोष की बात है कि आधुनिक भारत में अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रवृत्ति तेज हुई है। मंदिरों में बढ़ती श्रद्धा, तीर्थयात्राओं का विस्तार और पारिवारिक परंपराओं का पुनर्जीवन संकेत देते हैं कि भारत अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति पुनः सजग हो रहा है। अब परंपरा पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का आधार मानी जा रही है।
स्मरण रहे कि शक्ति साधना से विमुख समाज अपनी पहचान खो देता है। मर्यादा त्यागने वाला समाज अराजकता में डूब जाता है। भारत का मार्ग इन दोनों के संतुलन में है।


