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Saturday, May 30, 2020
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आज शरजील है, तब मुहम्मद शफी था: उस समय भी हिंदू भेंट चढ़े थे, आज भी निशाना वही हैं

आज नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की विरोध की आड़ में देश को अराजकता की आग में ढकेलने की और असम के बहाने देश के टुकड़े-टुकड़े करने के जो मॅंसूबे नजर आ रहे हैं, ऐसा ही कुछ अस्सी के दशक में कश्मीर में दिखा था। उस समय की चुप्पी 90 का दशक आते-आते कितनी भारी पड़ी यह पूरी दुनिया ने देखा।

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अजीत झा
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इतालवी दार्शनिक सिसरो ने कहा है कि यह न जानना कि आपके जन्म से पहले क्या हुआ, हमेशा शिशु बना रहना है।

जब आप अतीत को खॅंगालते हैं तो दिल्ली के शाहीन बाग में एक महीने से ज्यादा वक्त से जो कुछ चल रहा है वह नया नहीं लगता है। झारखंड के लोहरदगा में एक शांतिपूर्ण जुलूस पर हमले में भी कुछ नया नहीं दिखता। न हिंदुत्व की कब्र खुदने के नारों में नयापन है और न शरजील इमाम के जहर उगलते वीडियो में। राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए मुसलमानों को उकसाना और उनके घृणा उगलते जुबान पर कॉन्ग्रेस का होठ सिलना भी नया नहीं है।

पन्ने पलटते चलिए और तार जुड़ते जाएँगे। आज नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की विरोध की आड़ में देश को अराजकता की आग में ढकेलने की और असम के बहाने देश के टुकड़े-टुकड़े करने के जो मॅंसूबे नजर आ रहे हैं, ऐसा ही कुछ अस्सी के दशक में कश्मीर में दिखा था। उस समय की चुप्पी 90 का दशक आते-आते कितनी भारी पड़ी यह पूरी दुनिया ने देखा। करीब 4 लाख कश्मीरी पंडित रातोंरात अपना घर और अपनी संपत्ति छोड़ जान बचाकर भागने को मजबूर हुए। कश्मीर को आजाद कराने का षड्यंत्र रचा गया। उसे आतंकवाद की आग में झोंक दिया गया।

शरजील इमाम के जो वीडियो सामने आए हैं उनमें वह गॉंधी को 20वीं सदी का सबसे बड़ा फासिस्ट नेता बताता है। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि 80 के दशक में कश्मीर में भी गॉंधी को लेकर ऐसे ही भाव थे। कश्मीर: समस्या और समाधान में जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन ने इस घटना का​ विस्तार से जिक्र किया है। साल 1988 का था। दो अक्टूबर यानी गॉंधी जयंती पर श्रीनगर हाई कोर्ट में राष्ट्रपिता की प्रतिमा स्थापित की जानी थी। देश के मुख्य न्यायाधीश आरएस पाठक को प्रतिमा की स्थापना करनी थी। कुछ मुस्लिम वकीलों ने इसका विरोध किया। अव्यवस्था फैलाने की धमकी दी। सरकार झुक गई और कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया।

इसका नतीजा क्या निकला? बकौल जगमोहन धर्मनिरपेक्ष देश के एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की अदालत में गॉंधी की प्रतिमा स्थापित नहीं हो पाई। विरोध कर रहे वकीलों का अगुआ था जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का वकील मुहम्मद शफी बट्ट। वह नेशनल कॉन्फ्रेंस से जुड़ा था और इस घटना के अगले ही साल 1989 में उसे श्रीनगर से लोकसभा का टिकट भी मिल गया। उस समय राज्य की सत्ता में कॉन्ग्रेस भी साझेदार थी। लेकिन, राजनीतिक फायदे के लिए उसने भी चुप्पी साधी रखी।

अब आप समझ सकते हैं कि बीते साल जब राज्य में आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निरस्त किया गया तो जम्मू-कश्मीर के पारिवारिक राजनीतिक दलों के साथ-साथ कॉन्ग्रेस भी क्यों हाय-तौबा मचा रही थी। जो कॉन्ग्रेस गोडसे का नाम लेकर गॉंधी की विरासत पर दावा करती है, उसने मुहम्मद शफी बट्ट के सामने घुटने टेक दिए थे।

केवल राजनीतिक दल ही नहीं, बकौल जगमोहन- जो लोग राज्य में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे थे उनकी भी मानसिकता ऐसी ही थी। मसलन, जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस मुफ्ती बहाउद्दीन फारूकी अपनी विचारार्थ याचिका में कहते हैं- 42 वर्ष पूर्व जम्मू-कश्मीर राज्य के लोगों की इच्छा के विरुद्ध भारत ने चालबाजी, धोखे और जबरदस्ती से अपने में विलय कर लिया।

साभार: कश्मीर: समस्या और समाधान

अब आज के हालात पर गौर करिए। वैसे ही नारें, वैसी ही साजिशें दिखेंगी। मजहबी उन्माद के वहीं चेहरे नजर आएँगे। उनकी कारगुजारियों पर दम साधी कॉन्ग्रेस उसी तरह खड़ी दिखेगी। शायद इसलिए, जर्मन दार्शनिक वाल्टर बेंजामिन ने कहा था- पिछली पीढ़ियों और वर्तमान पीढ़ियों के बीच एक गुप्त सहमति है।

सो, इस नापाक सहमति पर चुप्पी तोड़ने का वक्त आ गया है।

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