अत्यधिक मात्रा में संभोग, घृणा की निर्बाध खेती: वामपंथियों, लिबरलों के हर आंदोलन का एकसूत्री अजेंडा

ये लोग व्यभिचार करने में माहिर हैं, इनकी कुंठित मानसिकता ऐसे आँकड़ों में दिखती है जहाँ जेएनयू लड़कियों से छेड़छाड़ के मामले में देश का अव्वल विश्वविद्यालय बन जाता है। इसलिए ये समलैंगिकों के परेड में भारत माता के लिए लेस्बियन सेक्स पार्टनर ढूँढते नजर आते हैं।

पिछले दिनों दो-तीन आंदोलन हुए हैं, जिसमें भारत के युवाओं ने (और कुछ बुजुर्ग बच्चों ने) भाग लिया। एक आंदोलन जेएनयू में फीस वृद्धि से ले कर उनके कैम्पस में आवाजाही पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों पर हो रहा है। दूसरा, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में जबरदस्ती एक मुसलमान शिक्षक को हिन्दू कर्मकांड, यज्ञ, अनुष्ठान आदि पढ़ाने के लिए नियुक्त करने के विरोध में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के बच्चे कर रहे हैं। वहीं तीसरा प्रदर्शन या मार्च ‘दिल्ली क्वेयर परेड 2019’ के रूप में समलैंगिक संबंधों, सेक्सुअल ओरिएंटेशन एवम् जेंडर की भिन्न अवधारणाओं के समर्थन में किया गया।

जेएनयू और बीएचयू, दोनों ही संस्थानों के प्रदर्शन पर ऑपइंडिया ने काफी लिखा है। हाँ, लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, क्वेयर लोगों के मार्च पर ज्यादा नहीं लिखा गया। वैचारिक रूप से, निजी तौर पर, मैं LGBTQ समुदाय का पक्षधर रहा हूँ। कुछ लोग इसे अप्राकृतिक मान कर, इसे एक बीमारी मानते हैं, जो कि उनकी अभिव्यक्ति हो सकती है, पर मेरे विचार से यह बिलकुल प्राकृतिक है और सामान्य है।

जो चीज प्रकृति में ज्यादा नहीं दिखती, वो अप्राकृतिक नहीं हो जाती। दुनिया में लगभग दस प्रतिशत मानव बाएँ हाथ से कार्य करते हैं। घरों में ऐसे बच्चों को दाहिने हाथ से ही लिखने की आदत पकड़ाने के लिए सारे यत्न किए जाते हैं। कुछ लोग दाहिने हाथ से लिखने लगते हैं, लेकिन बाकी काम बाएँ से ही करने में सहज महसूस करते हैं।

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उसी तरह कुछ लोग विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित नहीं होते, उनकी संख्या कम है। ये उनकी पसंद है कि उन्हें विपरीत लिंग के लोगों का साथ नहीं चाहिए। चूँकि, आपके लिए सारे लोग दाहिने हाथ से ही लिखते दिखते हैं, तो फिर बाएँ वालों को आप बीमार नहीं कह सकते। ये कोई फैशन नहीं है, ये बस है, ऐसा होता है, कम होता है, लेकिन होता है। हमें स्वयं को ही परम सत्ता नहीं माननी चाहिए। दुनिया के दसियों सफल लोग समलैंगिक हैं, और वो मानव समाज के लिए प्रेरणा बन कर गए हैं।

ये मेरी निजी राय है, और आप चाहें तो इससे बिल्कुल भिन्न मत रख सकते हैं, मैं आपका सम्मान करूँगा। किसी को एक खास शारीरिक ढाँचे वाले लड़के या लड़कियाँ ही पसंद आते हैं, किसी को एक खास रंग ही पसंद आता है, कोई गाय पालता है, किसी को बिल्ली पसंद है। गाय पालने वाला यह कहने लगे कि गाय तो दूध देती है, व्यवसाय कर सकते हैं, उससे फायदा है, बिल्ली से क्या मिलता है। फिर वो बिल्ली पालने वालों को गलत निगाह से देखने लगे?

ईश्वर की सत्ता बहुत व्यापक है। इसमें इतनी विविधताएँ हैं कि मानव आज तक उसका पाँच प्रतिशत भी नहीं समझ पाया है। इसलिए इस ब्रह्मांड के एक छोटे गैलेक्सी के, एक छोटे सौर परिवार के, एक छोटे ग्रह के, एक छोटे राष्ट्र में रहने वाले एक बहुत छोटे व्यक्ति हैं हम। हमें अपनी समझ का इतना दम्भ नहीं भरना चाहिए कि हम अपने सीमित अनुभव को सार्वभौम सत्य समझ लें। दिमाग खुला रखिए तो अलग अनुभव मिलेंगे, उसे स्वीकारिए क्योंकि हमारे पास इतनी समझ और समय नहीं है कि हम स्वयं के ही अनुभव से हर बात जान लें।

अब आते हैं प्रदर्शनों पर

प्रदर्शन की आवश्यकता क्यों पड़ती है? खास कर ऐसे प्रदर्शनों की जहाँ किसी मानव की स्वच्छंदता पर सदियों से सामाजिक और दशकों का राजनैतिक पहरा रहा हो, वहाँ हमें रुक कर सोचना चाहिए। आप यह सोचिए कि कल से कोई कानून बना दिया जाए कि लड़के और लड़कियाँ, जब तक शादीशुदा न हों, कहीं भी एक साथ देखे जाने पर जेल में डाल दिए जाएँगे। फिर आपको कैसा लगेगा?

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकों के निजी संबंधों को नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का हनन बताते हुए उसे पिछले साल गैरआपराधिक घोषित कर दिया। ये भारत सरकार के विरुद्ध केस दायर हुआ था, जो एक दशक से चल रहा था। भाजपा की सरकार थी, जिसके कई मंत्रियों ने समलैंगिक संबंधों को मुखर हो कर अप्राकृतिक माना था, उसी सरकार ने इसका विरोध नहीं किया और समानता का अधिकार इन सबको मिला।

जाहिर है कि ऐसे मौकों पर खुशी के साथ-साथ अपने भीतर के क्रोध को भी लोग अभिव्यक्त करेंगे। वो करना भी आवश्यक है वरना दबे हुए भाव आपको पागल बना सकते हैं। इस बात को ले कर दिल्ली में कुछ सालों से LGBTQ समुदाय अपनी परेड निकालती रही है। आम तौर पर यहाँ आजादी को सेलिब्रेट किया जाता है, लोगों को बताया जाता है कि आपको जागरूक होने की जरूरत है, आप आइए और हमें जानिए।

ये सामाजिक जागरूकता के लिए होता है, अपने तरह के लोगों से मिलने का समय होता है और सदियों से दबाई गई स्वतंत्रता को खुले में आजमाने जैसा होता है। आप चाहें तो इनके अस्तित्व को मानें, या नकार दें, वो आपकी मर्जी, लेकिन आपको उनसे घृणा करने का अधिकार नहीं है क्योंकि उनके होने से आपको किसी भी तरह की हानि नहीं पहुँचती।

वामपंथी जहर जब मिलता है ऐसे प्रदर्शनों में

हालाँकि, हाल के दिनों में इन प्रदर्शनों को माओवंशी कामपंथियों ने हायजैक कर लिया है। ऐसे प्रदर्शनों को पूरी तरह से जागरूकता की जद से बाहर निकाल कर इसे भाजपा-विरोधी बना दिया गया है। आप यह सोचिए कि समलैंगिकों के मार्च में, उस सरकार की आलोचना क्यों हो रही है जिसने उन्हें अधिकार दिलाए? जिसे आप बंद सोच वाला कहते हैं, उसके प्रवक्ता ने कहा कि दुनिया बदल रही है और पार्टी इन अधिकारों के समर्थन में है।

फिर यहाँ ऐसी तख्तियाँ क्यों निकल आती हैं कि ‘मैं किसी के भी साथ सो सकती हूँ, पर भाजपाई के साथ नहीं?’ क्या किसी भाजपाई ने आपको बुलाया सोने के लिए साथ में? अगर बुलाया भी हो तो आप निजी तैर पर अपने विचार रख दीजिए, पब्लिक में तख्ती ले कर घूमने का क्या मतलब है? क्या भाजपा ने, या मोदी के मंत्रियों ने, मंत्रालयों के प्रवक्ताओं ने कहीं भी यह कहा है कि भाजपा वालों से सेक्स करें? मुझे नहीं लगता।

फिर ये लोग क्यों बता रहे हैं कि वो किसके साथ संभोग करना चाहेंगी, किसके साथ नहीं। क्या पता भाजपा समर्थकों की सेक्स लाइफ काफी अच्छी हो गई हो क्योंकि वो लोग खुल्लमखुल्ला बता देते हैं कि उनकी विचारधारा क्या है। कम से कम कम्यूनिस्टों की तरह सीडी देने बुला कर, ड्रिंक में ड्रग्स मिला कर हॉस्टलों में बलात्कार तो नहीं करते! हो सकता है कि अपनी विचारधारा सामने लाने पर भाजपा समर्थक लोग काफी एक्टिव लाइफ जी रहे हों! फिर तुम्हें पूछ कौन रहा है कि ऐ लड़की, हम भाजपाई हैं, सेक्स करोगी? नो बडी गिव्स अ शिट हू यू स्लीप विद!

साथ ही, एक लड़की यह तख्ती लिए घूम रही थी कि ‘भारत माता को चाहिए गर्लफ्रेंड’। मुझे नहीं लगता कि भारत माता को ब्वॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड चाहिए, भारत माता ‘भारत माता’ हैं, जिनको अपनी माँओं को गर्लफ्रेंड दिलाना है, बिलकुल दिलाएँ लेकिन भारत माता को छोड़ दें। अब बात वही है कि जिनके दिमाग में दिन रात सेक्स का कीड़ा कुलबुलाता रहे, उनके लिए माँ क्या, बाप क्या! वो तो तख्तियाँ ले कर कुछ भी लिख देंगे। उनके लिए संबंधों की अहमियत शून्य है क्योंकि दुनिया में हरेक जीव बस किसी प्रजाति की नर, मादा या उभयलिंगी है, और सबको सबसे सेक्स कर लेना चाहिए।

तुम्हें गर्लफ्रेंड चाहिए, ब्वायफ्रेंड चाहिए, तीन ब्वॉयफ्रेंड चाहिए, चार गर्लफ्रेंड चाहिए, वो तुम्हारा मसला है। लेकिन इसमें आज भारत माता को खींच रही हो, कल को किसी हिन्दू देवी-देवता को खींच लोगे और तख्ती ले कर बताने लगोगे कि किसको क्या चाहिए। ऐसे लोग किसी भी अच्छे प्रदर्शन को प्रदूषित कर देते हैं और इन जैसों के कारण पूरा मुद्दा परिधि पर ढकेल दिया जाता है।

विरोधों का अक्सर कामपंथी नालायक दूषित करते रहे हैं

इससे भारत माता पर कोई लांछन नहीं लगता। ये तख्ती सीधा उन लोगों को आहत करने के उद्देश्य से उठाया गया जिनकी भारत माता में आस्था है। इसके सहारे उन पर निशाना साधा गया जो राष्ट्र को माँ के रूप में देखते हैं। मतलब यह है कि ऐसे प्रदर्शनों में ऐसे तत्व भीड़ बन कर आ जाते हैं, ताकि उन्हें दो मिनट की ख्याति मिल जाए।

वामपंथियों की यह कला बहुत पुरानी है। इन्हें लगता है कि प्रोटेस्ट किसी भी बात की हो, उन पर इनका पहला अधिकार है, और ये उनके अपने लोग हैं। लगातार जनाधार खोते वामपंथी जब नितम्ब सटा कर स्कूलों के मॉनीटर का चुनाव जीतने को ही ‘मोदी को मिला जवाब’ मानने लगे हैं, तो इनके अजेंडे के लिए भीड़ जुटाना एक दुष्कर कार्य है।

इसलिए आप देख सकते हैं कि ये समलैंगिकों के मार्च में पहुँच जाते हैं जो कि एक सामाजिक अभियान है, और उसे राजनैतिक बना कर ये लोग उसमें अपना अजेंडा घुसा देते हैं। मुझे आश्चर्य होता है LGBTQ लोगों पर जो इन्हें अपना प्लेटफॉर्म दे देते हैं जैसे कि कॉन्ग्रेस या वामपंथियों ने इनके लिए कोई कानून बनाया हो। विडंबना यह है कि जिस सरकार ने न सिर्फ समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से मुक्त कराने में समर्थन दिया, बल्कि अब ट्रांसजेंडर विधेयक भी ले कर आ रही है, उसी सरकार के खिलाफ उसी LGBTQ समुदाय के लोग वामपंथियों को आवाज उठाने दे रहे हैं।

1991 से समलैंगिकों को सहमति से आपस में सेक्स करने की आजादी के लिए कानूनी लड़ाई चल रही थी। 2001 में नाज फाउंडेशन ने इस मुद्दे को उठाया और 2003 में इस पर दिल्ली हायकोर्ट में याचिकाएँ दाखिल हुईं, जिसे खारिज कर दिया गया। फिर 2009 में ये मुद्दा वापस आया और दिल्ली हायकोर्ट ने इनके पक्ष में निर्णय दिया। इसके बाद 2013 में बात सुप्रीम कोर्ट में पहुँची जिसने वापस इस निर्णय को पलट दिया।

आप याद कीजिए कि इन समयों में दिल्ली और केन्द्र में किनकी सरकारें थीं। साथ ही, यह भी याद कीजिए कि पिछले साल किसकी सरकार थी जिसने इस कानून के विरोध में जा कर, समलैंगिकों के हित में निर्णय दिलाया जबकि कोर्ट ने कहा था कि कानून बनाने का काम संसद का है। संसद में बगुमत वाली सरकार चाहती तो फैसला पलट सकती थी, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकारों के उलट यही कथित फासीवादी सरकार इन लोगों के समर्थन में खड़ी हुई।

पहली बार नहीं हुआ है यह

हाल ही में जेएनयू में चल रहे आंदोलन में इन्हीं वामपंथियों ने अपनी मानसिक विकृति का नमूना दिखाया जब इन्होंने एक जगह ‘ब्रह्मणों भारत छोड़ो’ लिख दिया। आप यह सोचिए कि बढ़ी हुई फीस और कैम्पस के नए नियमों को विरोध में ब्राह्मणों की क्या भूमिका है कि उन्हें भारत छोड़ने को कहा जा रहा है? भूमिका यह है कि वामपंथी लम्पटों को एक विरोधी चाहिए जिसके खिलाफ वो विषवमन कर सकें।

चूँकि गरीबों के सारे मुद्दे मोदी ने उठा लिए और उन्हें घर दिया, घर में गैस चूल्हा दिया, बिजली दी, पानी दिया, बल्ब लगवाए, शौचालय बनवाया, बैंक अकाउंट दिया, दुर्घटना बीमा और स्वास्थ्य बीमाएँ दी… तो जाहिर है कि वामपंथी इस बात पर तो बात कर ही नहीं सकते कि गरीबों को लिए क्या किया। पहले गरीबों की स्थिति पर बात की जा सकती थी क्योंकि वाकई सत्तर सालों से उनकी ओर किसी ने इस तरह ध्यान दिया ही नहीं था।

अब वामपंथियों के पास वैसी बात करने के लिए कुछ है ही नहीं तो एक फर्जी मुद्दा उठाया जा रहा है कि ब्राह्मण ही लोगों की राह में खड़े हैं, वही सताते रहे हैं, वही सारी समस्याओं की जड़ में हैं। बात यह है कि वोटिंग पैटर्न बताता कि लोकसभा चुनावों में लोग जाति से ऊपर उठ कर भाजपा को वोट कर रहे हैं। साथ ही कई तरह से बँटा हुआ उत्तर प्रदेश भाजपा को तीन-चौथाई बहुमत दे देता है।

ऐसे समीकरण वामपंथियों को नहीं सुहाते क्योंकि ये आज भी भारत में हो कर कश्मीर और केरल की आजादी के नारे लगाते रहते हैं। भारतीय समाज को तोड़ने के लिए एक दुश्मन खोजना जरूरी है क्योंकि लोग अब सड़क-बिजली-सिलिंडर-बीमा जैसे मुद्दों पर वोट देने लगे हैं। उन्होंने मायावती और मुलायम जैसों की जातिवादी राजनीति को नकारा है।

इसलिए, छात्रों की बढ़ी हुई फीस की बात में ‘ब्राह्मणों भारत छोड़ो’ का तड़का लगा दिया जाता है। उन्हें पता है कि इस आंदोलन को लोग देख रहे हैं तो उसमें ये कलाकारी भी कर दी जाए। आप यह सोचिए कि बीएचयू के आंदोलन में कोई लड़का किसी दीवार पर ‘मुसलमानों भारत छोड़ो’ लिख देता, या ‘फिरोज वापस जाओ’ लिख देता, तो अचानक से पूरा बीएचयू, वहाँ के सारे हिन्दू छात्र, पूरा बनारस और अंततः मोदी के लोकसभा क्षेत्र होने के कारण पूरी भाजपा, भारत सरकार और पूरा हिन्दू समुदाय घेर लिया जाता कि मुसलमानों को भारत से भगाने की योजना बनाई जा रही है।

भला हो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कारी छात्र-छात्राओं और शिक्षकों का जो धर्म पथ से बिना डिगे, डॉक्टर फिरोज खान के बारे में एक भी अपशब्द बोले, उनके पैर छूने को तैयार, लेकिन अपनी आस्था और पारंपरिक नियमों का हवाला देते हुए, भजन-कीर्तन और मंत्रोच्चारण करते हुए अपना विरोध रखा

इसलिए तैयार रहिए, लड़ाई लम्बी है

इसलिए इन वामपंथियों की एक-एक गतिविधि पर नजर रखना आवश्यक है। ये कभी प्रधानमंत्री की हत्या की योजना बनाने वाले शहरी नक्सलियों के समर्थन में खड़े हो जाते हैं, कभी मुसलमान आतंकी को फाँसी से बचाने के लिए दया याचिका पर दस्तखत करते हैं, कभी भारत के टुकड़े करने की बातें करते हैं, और कभी आंतकियों के जनाजे में वैचारिक रूप से शामिल होते हैं।

इनका इतिहास देखिए, इन्होंने हिंसा और नरसंहारों को मुखर सहमति दी है। वामपंथियों ने नरसंहार और हिंसक क्रांति को ग्लैमराइज ही नहीं किया बल्कि इसे एक जरूरत के रूप में प्रस्तुत किया है। ये मानना कि क्रांति का बस एक ही मार्ग है कि ग़रीब हाथ में हँसिया और कुल्हाड़ी लिए दौड़ें और हर अमीर को काट दें, एक आग लगाने वाली बात है। इससे आप उग्रवादियों को तैयार करते हैं क्योंकि ऐसी बातें फैला कर किसी की आर्थिक या सामाजिक स्थिति का फ़ायदा उठाकर उनसे वो कराया जा सके जो सिर्फ भाषणों से संभव नहीं।

ये वामपंथी भाषण देने और लोगों की भावनाओं को भड़काने में बहुत माहिर हैं। आप ज़रा मुझे बताएँ कि किस लेनिन, माओ, ग्वेरा आदि ने एक ग़रीब को सत्ता दे दी कि ‘लो तुम इस देश के सर्वहारा हो, तुम इसे दिशा दो।’ ऐसा नहीं होता क्योंकि जब आपको सत्ता का उन्माद और एक उग्र भीड़ के पागलपन की तालियाँ सुनने की आदत पड़ जाए तो फिर आपको सर्वहारा की याद नहीं आती। आप क्रांति करते हैं सत्ता पाने के लिए, ना कि किसी का भला करने के लिए।

और उसके रास्ते में आने वाले नरसंहारों को आप ‘क्रांति के नाम जायज’ होने की बात एक और स्पीच में कह देते हैं। एक पोस्टर में आप कुछ भी लिख कर कुछ जातियों को एक जाति के खिलाफ खड़ा कर सकते हैं, फिर वो मशाल ले कर आगजनी करते हैं, और नौ लोग मर जाते हैं। नेता ट्वीट करता रहता है, वो स्पीच देता रहता है। यही होती है सर्वहारा की क्रांति में नेता की स्थिति। सर्वहारा, सर्वहारा ही रहता है।

इस सोच और विचारधारा के स्तंभ धीरे धीरे गिर रहे हैं, और गिरते रहेंगे। जिस समय में एक पक्षी की मौत पर लोग कैम्पेन और जुलूस निकालते हैं, वही समय इन कास्ट्रो, ग्वेरा आदि हत्यारों को उनकी जगह जरूर बताएगा। हिसाब तो लिया जाता रहा है, और लिया जाता रहेगा। इस तरह के हिंसक और नरसंहारियों का हिसाब इतिहास करता रहा है, करता रहेगा। जरूरत है नए इतिहासकारों की जो वामपंथी नहीं हैं।

इसलिए, खुद को तैयार कीजिए इनके वैचारिक आतंकवाद का बहिष्कार करने के लिए। ये लोग व्यभिचार करने में माहिर हैं, इनकी कुंठित मानसिकता ऐसे आँकड़ों में दिखती है जहाँ जेएनयू लड़कियों से छेड़छाड़ के मामले में देश का अव्वल विश्वविद्यालय बन जाता है। इसलिए ये समलैंगिकों को परेड में भारत माता के लिए लेस्बियन सेक्स पार्टनर ढूँढते नजर आते हैं।

इनकी जातिवादी सोच से बच कर रहिए क्योंकि 2012 में ‘हमें जातिगत राजनीति से ऊपर उठ कर सोचना चाहिए’ लिखने वाला वामपंथी वागले 2019 में कॉन्ग्रेस की सरकार में सहभागिता देखते ही लिख बैठता है कि ‘ब्राह्मण भाँड़ में जाएँ’। यही इनका असली चेहरा है। ये किसी के सगे नहीं, न गरीबों के, न दलितों के, न मुसलमानों के, न वंचितों के। ये लोग घृणा की राजनीति, बिखरे हुए राष्ट्र और सेक्स के लिए व्याकुल, कुंठित, व्यभिचारी समाज के लिए हल्ला करते हैं। इन्हें वैचारिक रूप से मसल दें।

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