Friday, January 22, 2021
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कोरोना जैसे संकटों को लाइलाज बना सकती है बेहिसाब जनसंख्या

अगर हम 'लॉकडाउन' जैसे अत्यंत प्रभावी उपायों के बावजूद इस महामारी के फैलाव को रोक पाने में असफल होते हैं, तो देश की भारी जनसंख्या के अनुपात में स्वास्थ्य-सुविधाओं और साधनों की भारी कमी मानव-जीवन की क्षति को कई गुना बढ़ा डालेगी।

कोरोना संकट ने आज एक बार फिर थॉमस माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत को प्रासंगिक बना दिया है। सन् 1798 में इस ब्रिटिश अर्थशास्त्री ने अपने बहुचर्चित लेख ‘एन एस्से ऑन द प्रिन्सिपल ऑफ़ पॉपुलेशन’ में प्रतिपादित किया था कि ‘प्रकृति अपने संसाधनों के अनुसार अकाल, आपदा, महामारी, युद्ध आदि के द्वारा जनसंख्या को नियंत्रित करती रहती है।’ ऐसा करना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि ‘जनसंख्या वृद्धि गुणात्मक (x) रूप में होती है, जबकि संसाधनों में वृद्धि धनात्मक (+) रूप में’ ही हो पाती है। इस बेतहाशा बढ़ती हुई जनसंख्या की असीमित भौतिक आवश्यकताएँ प्रकृति को कुरूप बनाकर क्रुद्ध करती हैं।

एक ओर, विश्व के अनेक अविकसित और अल्प-विकसित देशों में बेतहाशा बढ़ती हुई जनसंख्या आज भी एक बड़ी चुनौती है। वहीं दूसरी ओर, जिन विकसित देशों ने जनसंख्या को नियंत्रित कर लिया है, वहाँ उपभोक्तावाद चरम पर होने के कारण उनकी भौतिक आवश्यकताएँ और प्राकृतिक दोहन अनियंत्रित और असीमित है। परिणामस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इस असह्य दबाव को संतुलित करने के लिए जनसंख्या को नियंत्रित करने के साथ-साथ उपभोग को भी सीमित करने की आवश्यकता है।

जनसंख्या और संसाधनों के असंतुलन के कारण बाढ़, भूकंप, चक्रवात आदि प्राकृतिक आपदाएँ; प्लेग, स्वाइन फ्लू, कोरोना संक्रमण जैसी महामारियाँ और तमाम छोटे-बड़े युद्धों आदि की निरंतरता बनी रहती है। इनमें लाखों-करोड़ों लोग असमय काल-कवलित होते रहते हैं। अंध-उपभोग और अति-संग्रह से भी समाज में अपराध और अनैतिकता बढ़ती है और मनुष्यता क्रमशः क्षतिग्रस्त होती है।

तेजी से बढ़ती जनसंख्या भारत के लिए एक समस्या

भारत देश में भी तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। आज भारत की जनसंख्या 130 करोड़ से भी अधिक है। भारत जनसंख्या की दृष्टि से चीन के बाद विश्व में दूसरे स्थान पर है। एक अनुमान के अनुसार 2030 तक भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा।

उल्लेखनीय यह भी है कि भारत का जनसंख्या घनत्व चीन से लगभग तीन गुना अधिक है। यह तथ्य सर्वाधिक विचारणीय और चिंताजनक है। इस समस्या से निपटने के लिए इधर के कुछ वर्षों में कई संसद सदस्य निजी विधेयक लेकर आए हैं। उनमें भाजपा के राकेश सिन्हा एवं अजय भट्ट, शिवसेना के अनिल देसाई और कॉन्ग्रेस के अभिषेक मनु सिंघवी आदि प्रमुख हैं।

इन सभी निजी विधेयकों की केन्द्रीय चिंता सुरसा के मुँह की तरह लगातार बढ़ती जा रही जनसंख्या को नियंत्रित करना है। हालाँकि, दुःखद सच्चाई यह है कि इतनी बड़ी और भयावह समस्या होने के बावजूद इससे निपटने के लिए लाए गए इन विधेयकों में से कोई भी पास होकर कानून नहीं बन सका है।

ऐसा न हो पाने की कई राजनीतिक वजहें हैं। यह सीधे-सीधे वोट बैंक की राजनीति से जुड़ा हुआ मामला है। जिनकी जितनी अधिक जनसंख्या, उनके उतने अधिक वोट और उनकी उतनी ही अधिक सुनवाई… लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जनसंख्या निर्णायक दबाव-समूह होती है। जनसंख्या नियंत्रण विधेयक को मुस्लिम और दलित-पिछड़ा एवं गरीब विरोधी कहकर दुष्प्रचार किया जाता है। इन समुदायों की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल तो उसका विरोध करते ही हैं, अन्य राजनीतिक दल भी वोटों के संभावित नुकसान की आशंका के कारण निर्णायक पहल करने से बचते हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि समस्त भारतवासी इस विकराल बन चुकी समस्या के बारे में सोचें और उसके समाधान की दिशा में सक्रिय हों।  

सीमित संसाधनों पर बढ़ती जनसंख्या का दवाब

भारत जैसे विकासशील देश में संसाधन और सुविधाएँ सीमित हैं। इन सीमित संसाधनों पर बढ़ती हुई जनसंख्या का बेहिसाब दबाव है। इसी कारण हमारे देश में भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार आदि आधारभूत आवश्यकताओं के लिए जबर्दस्त मारामारी है। सरकारी विद्यालयों-अस्पतालों से लेकर नामी-गिरामी निजी विद्यालयों-अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, हवाई अड्डों, होटल-रेस्टोरेंटों, पर्यटन-स्थलों, सड़कों, बाजारों, थानों-न्यायालयों, सरकारी कार्यालयों आदि जगहों पर बेहिसाब भीड़ रहती है। प्रत्येक स्थान पर लम्बी-लम्बी लाइनें रोजमर्रा का दृश्य है। छोटी-छोटी सुविधाओं और जरूरतों के लिए लम्बी प्रतीक्षा स्थायी जीवन-स्थिति है।

कुछ परंपरागत अर्थशास्त्री इसे अर्थव्यवस्था की गतिशीलता और विकास का सूचक मानते और बताते हैं। परन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं है। वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि जनसंख्या और मानव संसाधन में अंतर होता है। कमाने वाले हाथों और खाने वाले मुँह में पारस्परिक अनुपात होना आवश्यक है। वर्तमान युग तो मशीन और तकनीक का है। इस कलयुग में तो कमाने वाले हाथों को सोचने वाले मस्तिष्क ने काफी हद तक प्रतिस्थापित कर दिया है।

गौरतलब है कि जनसंख्या को मानव संसाधन बनाने के लिए आधारभूत ढाँचे, साधन-संसाधन और सुविधाओं की आवश्यकता होती है। अनिवार्य पौष्टिक आहार, पेयजल, समुचित स्वास्थ्य, स्तरीय शिक्षा और कौशल विकास की व्यवस्थाओं/सुविधाओं द्वारा ही जनसंख्या को मानव संसाधन बनाया जा सकता है।

भारत जैसे विकासशील देश की तो खैर बिसात ही क्या पर किसी विकसित देश में भी ये संसाधन और सुविधाएँ असीमित नहीं हो सकती हैं। कृषि भूमि और उसकी उत्पादन क्षमता, अन्यान्य प्राकृतिक संसाधन; यहाँ तक कि शुद्ध जल और वायु भी असीमित नहीं हैं। साधन-सुविधाओं के अभाव और बढ़ते अपराध के अंतर्संबंध को भी नज़रन्दाज नहीं किया जाना चाहिए। जनसंख्या, अशिक्षा, गरीबी, अस्वास्थ्य, पर्यावरण असंतुलन व प्राकृतिक क्षरण के दुश्चक्र (VICIOUS CYCLE) से हम सब अनभिज्ञ नहीं हैं।

इन सभी सुविधाओं के अभाव और संसाधनों पर निरंतर बढ़ते दबाव ने न सिर्फ मानव-स्वभाव और चरित्र को विकृत किया है, बल्कि प्रकृति के स्वरूप को भी बदरंग और विध्वसंक बना डाला है। प्रकृति मनुष्य की सबसे निकटस्थ मित्र और सहचरी होती है, किन्तु अत्यधिक दोहन और शोषण ने उसे शत्रु और संहारक बना दिया है। इसलिए लगातार प्राकृतिक आपदाएँ आती रहती हैं। मानव द्वारा प्रकृति के अति-दोहन से उत्पन्न पर्यावरण असंतुलन इन आपदाओं का आदिस्रोत है।

जनसंख्या की असमानता आर्थिक-शैक्षणिक तथा धार्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक परिस्थिति पर भी निर्भर

भारत में जनसंख्या का अत्यंत असमान वितरण है। जनसंख्या की यह असमानता न सिर्फ आर्थिक-शैक्षणिक स्तर बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक-सामाजिक परिस्थिति पर भी निर्भर करती है। उल्लेखनीय है कि दक्षिण भारत और पश्चिमी भारत में जनसंख्या की वृद्धि दर या प्रजनन क्षमता दर पूर्वी भारत और उत्तर भारत से काफी कम है। हिंदी प्रदेशों की स्थिति इस मामले में सर्वाधिक चिंताजनक है। यह अकारण या अस्वाभाविक नहीं है कि उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे जिन राज्यों की आर्थिक विकास गति और साक्षरता दर कम है, उनकी जनसंख्या वृद्धि दर बहुत अधिक है। जबकि केरल और गुजरात जैसे राज्यों का मामला इनसे ठीक उलट है।

परिणामस्वरूप देश में जनसांख्यिकीय असंतुलन पैदा हो रहा है। भारत में प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र है। प्रत्येक 25 वर्ष में पिछली जनगणना की जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का परिसीमन किया जाता है। ऐसी स्थिति में जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में पहल की है, उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा और संसद में उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। यह आशंका सिर्फ राज्यों की ही नहीं है, बल्कि तमाम धार्मिक और जातीय समुदायों का भी यही डर है। उनका यह डर और चिंता वाजिब ही है। भारत सरकार को इस दिशा में निर्णायक पहल करते हुए जल्दी-से जल्दी जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाना चाहिए ताकि ऐसी आशंकाओं की समाप्ति के साथ-साथ समावेशी और संतुलित विकास सुनिश्चित किया जा सके।

जनसंख्या का अपेक्षाकृत समान वितरण और जनसांख्यिकीय संतुलन राष्ट्रीय शान्ति और समृद्धि की आधारभूत शर्त है। ‘हम दो हमारे दो’ जैसे जागरूकता कार्यक्रम मात्र इस समस्या का समाधान नहीं हैं। ऐसे जागरूकता कार्यक्रमों की भूमिका तो है किन्तु वही पर्याप्त नहीं है और जनसंख्या नियंत्रण कानून का स्थानापन्न नहीं है।

इन जागरूकता कार्यक्रमों की नई भूमिका इस क़ानून के पक्ष में माहौल बनाने की हो सकती है। निहित स्वार्थों द्वारा इसे जातीय और साम्प्रदायिक रंग दिए जाने की कोशिशों के प्रति भी लोगों को सजग और सावधान किया जा सकता है। साथ ही, तमाम देशवासियों को बेतहाशा बढ़ती हुई जनसंख्या से उनके जीवन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों से भी अवगत कराया जा सकता है। यह एक सर्वस्वीकृत तथ्य है कि एक सीमा से ज्यादा बढ़ जाने पर जनसंख्या अमीरों से कहीं अधिक गरीबों के जीवन-स्तर को प्रभावित करती है। भारत देश उस सीमा को पार कर चुका है।

संजय गाँधी का 5 सूत्रीय कार्यक्रम और राज्यों द्वारा जनसंख्या पर उठाए गए कदम

आपातकाल के दौरान संजय गाँधी ने जो 5 सूत्रीय कार्यक्रम लागू किया था, उसमें जनसंख्या नियंत्रण भी एक था। हालाँकि, उस वक्त इस क़ानून की आड़ में लोगों के साथ अत्यधिक अमानवीय व्यवहार और जोर-जबर्दस्ती की गई थी। उसके बाद भी कई बार जनसंख्या नियंत्रण क़ानून बनाने की छुट-पुट कोशिशें हुईं, किन्तु उनमें गंभीरता और इच्छाशक्ति का अभाव था। इसलिए इस दिशा में आजतक कुछ भी ठोस नहीं हो सका है। बिहार, राजस्थान और हरियाणा जैसे कुछ राज्यों ने पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों के लिए दो से अधिक संतान वाले दंपतियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने जैसी छोटी-मोटी पहल तो की है, पर समस्या की व्यापकता और विकरालता के अनुपात में ये कोशिशें ऊंट के मुँह में जीरे से अधिक नहीं हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर क़ानून बनाकर ही इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। इस क़ानून में दंडात्मक और प्रोत्साहनात्मक- दोनों तरह के प्रावधान करने की आवश्यकता है। जिस दिन यह कानून पारित हो उसके 9 महीने बाद दो से अधिक संतानों वाले दंपतियों को सरकार से मिलने वाली विभिन्न सुविधाओं और लाभकारी योजनाओं के लिए अपात्र मानते हुए वंचित किया जाना चाहिए।

ग्राम-पंचायत से लेकर संसद और पंच से प्रधानमंत्री तक; प्रत्येक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया जाए। तीसरा बच्चा होते ही पिता को और चौथा बच्चा होते ही माँ को मताधिकार से वंचित किया जाए ताकि परिवार के वोट बढ़ाकर अपना महत्व बढ़ाने की प्रवृत्ति को रोका जा सके। नौकरी और प्रोन्नति से भी ऐसे लोगों को वंचित किया जाए। दो से अधिक बच्चे वाले दंपतियों को न सिर्फ विभिन्न कर छूटों से वंचित किया जाए बल्कि संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ाने के लिए उनके ऊपर अच्छा-खासा जनसंख्या अधिभार भी लगाया जाए। इसी प्रकार सिर्फ एक संतान या फिर दो कन्याओं को जन्म देने वाले दंपतियों को अतिरिक्त कर छूट आदि सुविधाएँ दी जाएँ।

ऐसे नौकरी-पेशा लोगों को वन्ध्याकरण/नसबंदी कराने पर दो वेतनवृद्धियों (INCREMENTS) का लाभ दिया जाए। इस प्रकार “दंड और प्रोत्साहन आधारित क़ानून” बनाकर और उसे जमीनी स्तर पर लागू करके ही हम भारत को एक विकसित देश बना सकते हैं। भारत का विश्वशक्ति बनने का सपना सीधे तौर पर जनसंख्या नियंत्रण कानून से जुड़ा है।

अन्य विकासशील देशों ने समझा जनसंख्या और विकास के अंतर्संबंध को

जनसंख्या और विकास का सीधा सम्बन्ध होता है। न सिर्फ चीन जैसे विकसित देश ने बल्कि बांग्लादेश जैसे विकासशील देश ने भी जनसंख्या और विकास के अंतर्संबंध को समझा है। इसलिए चीन ने 1979 में जनसंख्या नीति लागू की और वहाँ शहरी दम्पति के लिए एक संतान और ग्रामीण दम्पति के लिए दो संतान का नियम सख्ती से लागू किया गया।

परिणामस्वरूप उन्होंने अगले 25-30 वर्ष में ही जनसंख्या पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया। इस बीच चीन ने जबर्दस्त आर्थिक विकास करते हुए खुद को अमेरिका के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बना लिया है। चीन ने यह सब इस क़ानून और वहाँ के नागरिकों के संकल्प और सहयोग से संभव किया। अभी हमारा पड़ोसी देश बांग्लादेश भी जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में गंभीर प्रयास कर रहा है।

संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान जैसे देशों ने दिखाया है कि भौगोलिक क्षेत्रफल और अन्यान्य संसाधनों-सुविधाओं और जनसंख्या में आनुपातिक संतुलन स्थापित करके ही राज्य अपने नागरिकों को स्वास्थ्य,शिक्षा,आवास,रोजगार और सामजिक सुरक्षा आदि सुविधाएँ प्रदान कर सकता है।

कल्याणकारी राज्य का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को उपरोक्त आधारभूत सुविधाएँ प्रदान करे। ये सुविधाएँ प्राप्त होने से ही नागरिकों की मानवीय गरिमा भी बहाल हो सकेगी। मानव जीवन का महत्व और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए जनसंख्या नियंत्रण किया जाना आधारभूत और अनिवार्य शर्त है। भारत को जनसंख्या-विस्फोट होने से पहले ही इसे ‘डीफ्यूज’ कर देना चाहिए।

अगर हम ऐसा करने में असफल होते हैं तो न सिर्फ कोरोना संकट से भी बड़ी आपदाएँ झेलनी पड़ेंगी बल्कि उनसे निपटने में भी भारत को भारी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। आज कोरोना संकट के परिणामस्वरूप सरकारों और नागरिक समाज द्वारा किए जा रहे असीम राहत-कार्य के बावजूद मीडिया में भय, भूख और संताप के भयावह दृश्यों की भरमार है। इसका सबसे बड़ा कारण बेहिसाब जनसंख्या है।

अगर हम ‘लॉकडाउन’ जैसे अत्यंत प्रभावी उपायों के बावजूद इस महामारी के फैलाव को रोक पाने में असफल होते हैं, तो देश की भारी जनसंख्या के अनुपात में स्वास्थ्य-सुविधाओं और साधनों की भारी कमी मानव-जीवन की क्षति को कई गुना बढ़ा डालेगी।

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प्रो. रसाल सिंह
प्रोफेसर और अध्यक्ष के रूप में हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। साथ ही, विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता, छात्र कल्याण का भी दायित्व निर्वहन कर रहे हैं। इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाते थे। दो कार्यावधि के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद के निर्वाचित सदस्य रहे हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक और साहित्यिक विषयों पर नियमित लेखन करते हैं। संपर्क-8800886847

 

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