समाज एनकाउंटर पर जश्न मनाता है, तो उसका कारण है: उन्नाव की बेटी भी कल मर गई

समाज ने आज तक किसी निर्दोष की हत्या पर जश्न नहीं मनाया है। हमारी सामूहिक संवेदना ऐसे मामलों में हमेशा सही निर्णय लेती है। ये लाशें भले ही क़ानूनी प्रक्रिया के बिना गिरी हैं, लेकिन इनका गिरना किसी भी तर्क से गलत नहीं।

रात के 12 बज कर 43 मिनट हो रहे थे। दिन भर हैदराबाद एनकाउंटर की खबरों पर लोगों के विचार पढ़ता रहा। उसी बीच उन्नाव की लड़की के बारे में भी खबर आई कि कोर्ट में केस की तारीख पर जा रही थी, रास्ते में पाँचों आरोपितों ने, जिनमें से दो ने उसके साथ पिछले साल दिसम्बर में बलात्कार किया था, तेल छिड़क कर आग लगा दिया

आग लगाने की घटना गुरुवार (दिसंबर 5) की थी। साल भर पहले पीड़िता का, शुभम और शिवम त्रिवेदी ने, अपहरण करने के बाद उसके साथ बलात्कार किया था। मार्च 2019 में पुलिस ने केस दर्ज किया। 30 नवम्बर को इन्हें बेल मिली। गुरुवार को जब पीड़िता रायबरेली कोर्ट जा रही थी तब शिवम और शुभम के अलावा हरिशंकर त्रिवेदी, राम किशोर त्रिवेदी और उमेश बाजपाई ने उसे पीटा, चाकुओं से गोदा और फिर आग लगा दी।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आग लगने के बाद भी पीड़िता लगभग एक किलोमीटर तक भागती रही और मदद माँगती रही। अंत में, खुद ही 112 नंबर पर फोन कर के शिकायत की। बाद में लखनऊ के अस्पताल में इलाज शुरु हुआ, फिर उसे दिल्ली लाया गया जहाँ अपना बयान लिखवाने के बाद उन्नाव की बिटिया की हृदयाघात के कारण कल रात 11:40 पर मृत्यु हो गई

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हैदराबाद वाले मामले में पुलिस ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि चूँकि कैदियों के हाथ खुले हुए थे, तो उन्होंने हथियार छीन कर पुलिस पर हमला बोल दिया और जवाबी फ़ायरिंग में उनकी गोली लगने से मौत हो गई। हालाँकि, बलात्कारियों से सहानुभूति रखने वालों को इस बयान पर विश्वास नहीं हो रहा, और उन्होंने यहाँ तक कहा है कि ऐसी कहानियाँ अब फिल्मों में भी नहीं दिखाई जातीं।

अधिकांश लोगों को कल सुबह की यह खबर अच्छी लगी। नेताओं ने, मंत्रियों ने, पत्रकारों ने और बुद्धिजीवियों ने इस घटना की न सही, पर परिणाम पर अवश्य प्रसन्नता जताई। एनकाउंटर पर कई लोगों ने अलग-अलग विचार रखे कि पुलिस का कहना अगर सही भी है तो भी इसमें गलती पुलिस की है कि उसकी तैयारी इतनी लचर थी कि कैदियों ने उनके हथियार छीन लिए।

मूलतः, जश्न न मनाने वालों का पक्ष यह रहा कि अगर एनकाउंटर को ही समाधान मान लिया जाएगा तो हम एक वहशी समाज हो जाएँगे जहाँ कानून-व्यवस्था की परवाह किसी को नहीं रहेगी। किसी ने इसे मॉब जस्टिस या भीड़ का न्याय कह कर उसकी निंदा की। ओवैसी जैसे नेताओं और शेखर गुप्ता जैसे पत्रकारों ने सीधा एनकाउंटर को माफिया-स्टायल बताते हुए सवाल किए कि पुलिस और आइसिस या तालिबान में क्या अंतर रह गया है।

न्यायिक प्रक्रिया और बुद्धिजीवी

हैदराबाद वाले कांड में कहा जा रहा है कि न्यायिक प्रक्रिया फॉलो नहीं की गई, लोगों का कानून पर विश्वास नहीं है, और वो विक्षिप्त हो गए हैं अगर उन्हें यह एनकाउंटर सही लग रहा है। लेकिन ऐसा कहने वाले लोग यह बात बड़ी आसानी से भूल जाते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया तो बाईस साल चली थी याकूब मेमन के लिए, तब तो आपने लिखा था- एंड दे हैंग्ड याकूब!

अफजल गुरु को जब न्यायिक प्रक्रिया से फाँसी मिलती है तो आप उसे शहीद कहते हैं या फिर बुद्धिजीवियों की जुबान में ‘एक्स्ट्रा जुडिशियल किलिंग’ कह कर भर्त्सना करते हैं। अयोध्या मामले में जब यही प्रक्रिया अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँचती है तो आप ही कहते हैं कि हमें अपनी अंतरात्मा से पूछना चाहिए कि न्याय हुआ है कि नहीं? जस्टिस लोया के मसले पर प्रक्रिया से चलने के बाद सुप्रीम कोर्ट कोई गलती नहीं पाता तब आप हर रात छाती पीटते हैं कि गलत हो रहा है।

फिर मैं यह कैसे मान लूँ कि दस साल तक मोहम्मद आरिफ पर केस चलता, और तब उसे सजा-ए-मौत मिलती तब आप यह न कह रहे होते कि ‘और उन्होंने आरिफ को भी टाँग दिया’? क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया पर आपका विश्वास सिर्फ तभी होता है जब फैसला आपके मन की मुराद पूरा करने जैसा रहा हो। फिर मैं यह कैसे मान लूँ कि आपको डॉ रेड्डी के बलात्कारियों और हत्यारों, या डॉ रेड्डी के परिवार वालों से कोई भी मतलब है? आप बस हर तंत्र को झकझोड़ना चाह रहे हैं ताकि लोग सड़कों पर उतर आएँ और दंगे करें।

यही लक्ष्य है इन लोगों का जो सिर्फ एक एनकाउंटर को, जिस देश में इतनी बड़ी जनसंख्या है, जहाँ हर मिनट कहीं न कहीं कोई जघन्य हत्या या बलात्कार जैसे कुकृत्य होते रहते हैं, ऐसे दिखा रहे हैं मानो हर मिनट बस एनकाउंटर ही हो रहे हैं।

आखिर समाज जश्न क्यों मना रहा है?

प्रश्न यह नहीं है कि एनकाउंटर सही है या गलत। हम कभी भी नहीं जान सकते कि एनकाउंटर योजना बना कर हुआ या फिर पुलिस जो कह रही है वो सत्य है। इसलिए लोग अपना-अपना पक्ष रख रहे हैं। प्रश्न यह है कि एक सभ्य समाज ऐसे असामान्य तरीकों पर जश्न क्यों मना रहा है? प्रश्न यह है कि जो हैदराबाद के नहीं हैं, जो डॉ रेड्डी को जानते तक नहीं, वो क्यों खुश हैं?

मैं एक पत्रकार के तौर पर इस एनकाउंटर पर यही कहना चाहता हूँ कि या तो ऐसा कानून बने कि अगर बलात्कारियों ने स्वीकार लिया हो, ओपन एंड शट केस हो, वीभत्स हो, तो पुलिस उन्हें चौराहे पर भीड़ के हवाले कर सकती है, या पुलिस सतर्क हो कर, अपने हथियार जोर से पकड़ कर, कैदियों के हाथ में हथकड़ी डाल कर कहीं भी लाया-ले जाया करे। एनकाउंटर का सच मैं नहीं जानता लेकिन मैं यह मानता हूँ कि इन चारों आरोपितों की मौत ज़रूरी थी क्योंकि डॉ रेड्डी वापस नहीं आ सकती पर ऐसे लोगों का समाज में रहना गलत है। हालाँकि, ये मौत उन्हें एक सजा के तौर पर कोर्ट से मिलती, महीने भर में मिलती, मर्सी पटीशन रिजेक्ट हो कर मिलती, तो बेहतर होता।

एक भाई, बेटा, दोस्त या सामान्य नागरिक के तौर पर, जिसने कल ही यह भी सुना कि उन्नाव की उस लड़की के साथ क्या हुआ, ऐसे एनकाउंटरों के परिणाम सुन कर खुशी क्यों नहीं होगी? एक नागरिक के तौर पर हमने न्याय और पुलिस व्यवस्था को टूटते हुए देखा है। हैदराबाद के बलात्कारियों का एनकाउंटर किसी को मॉब जस्टिस भले लग रहा है, लेकिन ये कोई सामान्य घटना नहीं है, ये एक हर दिन होने वाली बात नहीं है। यह एक अपवाद है।

जब नागरिक ऐसे मामलों से उब जाते हैं तो फिर ऐसी मौतों का जश्न मनाते हैं। इसलिए ऐसे मामलों में जब किसी की हत्या ही न्यायोचित थी, भले ही उस पर केस न चला हो, आम नागरिक के लिए यह एक छोटी-सी जीत है, जिस पर खुश होने का उन्हें हक है। इससे कोई तंत्र बिखर नहीं कर रहा, समाज कहीं नहीं जा रहा। इससे समाज को लगा है कि कर्मों का फैसला ऐसे भी होता है और ये दानव भगवान की कृपा से मारे गए हैं। समाज को हम दोषी तब मानते जब किसी निरपराध व्यक्ति को मार दिया जाता और पुलिस पर फूल बरसाए जाते।

समाज की नीयत पर सवाल तब उठाए जाते जब इस समाज ने किसी निर्दोष की हत्या पर ताली बजाई हो। समाज की सामूहिक संवेदना पर तब प्रश्नचिह्न लगाना उचित होता अगर भ्रम की स्थिति वाले मामले में, या किसी छोटे अपराध के आरोपित को, किसी ने सरे आम गोली मार दी, या पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया। समाज ने आज तक किसी निर्दोष की हत्या पर जश्न नहीं मनाया है। हमारी सामूहिक संवेदना ऐसे मामलों में हमेशा सही निर्णय लेती है। ये लाशें भले ही क़ानूनी प्रक्रिया के बिना गिरी हैं, लेकिन इनका गिरना किसी भी तर्क से गलत नहीं।

जो लोग समाज को असभ्य, वहशी और दरिंदगी वाला कह रहे हैं, उन्हें यह मत भूलना चाहिए कि दरिंदा यहाँ कौन था। अगर आपको उन चार बलात्कारियों में दरिंदगी नहीं दिख रही जिन्होंने एक अकेली लड़की के विश्वास को तोड़ा, धोखे से कहीं ले जा कर बलात्कार किया, जान ले ली, लाश के साथ भी बलात्कार किया, फिर लाश को जला दिया, फिर वापस देखने आए कि लाश जली है या नहीं, तो फिर आपको मनोचिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए।

समाज जश्न मनाने को स्वतंत्र भी है, और अपनी जगह सही भी है। इसी समाज ने अपराधियों को जेल से बेल पर बाहर आने के बाद बलात्कार पीड़िता और उसके पति को जान से मारते भी देखा है। इसी समाज ने सैकड़ों बार अपराधियों को सजा काट कर बाहर आने के बाद दोबारा वही अपराध करते देखा है, जो जघन्य की श्रेणी में आते हैं। यहाँ न्यायिक व्यवस्था समाज के सामने बिखर रही है, उसकी उम्मीदों को तोड़ रही है।

इसलिए, न्यायिक व्यवस्था से परे जब किसी भी तरह से न्याय हो जाता है तो समाज जश्न मनाता है। समाज किसी सामान्य घटना पर जश्न नहीं मना रहा, वो जानता और मानता है कि एनकाउंटर में हुई घटना विलक्षण है, सालों में एक बार होने वाली घटना है, हजारों बलात्कारियों के बाहर होने के बावजूद चार की ही मौत का समाचार लाने वाली घटना है। इसलिए समाज इसे एक प्रतीक के रूप में देखता है। समाज इसे उस उम्मीद के रूप में देखता है कि क्या पता कुछ बलात्कारी इस घटना से भी डरें, उन्हें यह याद रहे कि एक बार पुलिस ने यह भी किया था।

समाज की सामूहिक सोच हमेशा हमारी और आपकी वैयक्तिक सोच से ऊपर होती है। इसलिए न्यायिक व्यवस्था में, कई देशों में ज्यूरी का सिस्टम होता है, जहाँ कई लोग एक केस को सुनते हैं, और अपनी राय देते हैं। वहाँ सिर्फ कानून की दलीलें ही नहीं, संदर्भ और मानसिक अवस्था, सामाजिक व्यवस्था को भी ध्यान में लिया जाता है। आप एक ज्यूरी बिठा दीजिए, पुलिस अगर यह भी कह दे कि उन्होंने जान-बूझ कर एनकाउंटर किया, फिर भी ज्यूरी उन्हें बाइज़्ज़त रिहा कर देगी।

पॉलिटिकली करेक्ट लोग

मानवाधिकारों की बात और न्याय के रास्ते चलने की बात करने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अपराधियों के मानवाधिकार नहीं होते। अगर होते तो वो संवैधानिक स्वतंत्रता का लाभ ले रहे होते, न कि उन्हें जेलों में बंद किया जाता। अब बात यह आती है कि डॉ रेड्डी के बलात्कारी और हत्यारे तो अभियुक्त थे, अपराधी नहीं, वो अब स्वयं को बचाने कैसे आएँगे? सही बात है! लेकिन डॉ रेड्डी को भी तो यही तर्क मिलना चाहिए न? क्या वो जीवित है यह बताने के लिए कि इन चारों ने जो किया, वो कैसे किया? जितनी जानकारी उपलब्ध है, जो पुलिस ने बताया है वो अपने आप में इतनी विश्वसनीय है कि समाज आज उनकी मौत पर फूल बरसा रहा है। पुलिस के पास उनके डीएनए के सैंपल हैं, उसके आधार पर बलात्कार अगर कन्फर्म हो जाता है, तो हत्या भी कन्फर्म हो जाएगी। इसलिए मानवाधिकारों का रोना रोना बंद कीजिए।

कल तक जो लोग कह रहे थे कि जिंदा जला देना चाहिए, हत्या कर देनी चाहिए वो अब ऐसे पलट गए हैं जैसे इन हैवानों के होने से प्याज के दाम कम हो जाते और देश से भुखमरी गायब हो जाती। सनद रहे कि ऐसे लोगों की हत्या से आपकी बहन और बेटियाँ कुछ हद तक सुरक्षित हैं। अब लोग कह रहे हैं कि न्यायिक प्रक्रिया से फाँसी होती तो ठीक रहता! भारतीय क़ानून की किस किताब में अपराधी को जलाने की सजा है? किस किताब में बीच चौराहे पर पत्थर मारने की सजा है?

चूँकि एक एनकाउंटर हो गया है, और आपके भीतर का ‘पोलिटिकली करेक्ट’ हृदय धड़कने लगा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि इस घटना से मिला परिणाम गलत है। घटना गलत हो सकती है, जो कि पुलिस साबित करेगी कोर्ट में लेकिन परिणाम और भी भयावह होते, तो भी समाज को स्वीकार्य होता। हम लोग हर बलात्कार के बाद अपनी संवेदना में बहुत कुछ लिखते हैं, सिस्टम को गाली देते हैं, बताते हैं कि कैसे फलाना बिशप रेप के बाद भी घूम रहा है, लेकिन जब उसी को किसी कारण से जो सजा कोर्ट से मिलती, वो सड़क हादसे में मिल जाए तो क्या आप खुश नहीं होते? इसका मतलब है कि आपको मतलब परिणाम से तो है लेकिन वो गिफ्टरैप में लिपटा हुआ आना चाहिए।

किसी देश में पत्थर मारने की सजा भी तो है, आप ने ही कई बार बलात्कारियों के लिए ऐसी सजा का समर्थन किया है, क्या तब आपके भीतर का वहशीपना बाहर नहीं आ रहा था? पोलिटकिली करेक्ट होने के चक्कर में हम सबने ‘आतंक का कोई मजहब नहीं होता’ भी गाया है। मत गाइए ऐसे गीत। हाँ, यह भी याद रखिए कि जो हुआ है वो अपवाद है, पुलिस हर बलात्कारी को ऐसे ही नहीं मार रही। लेकिन, पुलिस को बिना जाँच के फिल्मी कहानी बनाने वाला कह देना बताता है कि आप कहीं न कहीं बलात्कारियों के पक्ष में हैं। बलात्कारियों के पक्ष में मत रहिए, उनका जाना ही उचित है, तरीका चाहे जो भी हो।

समाज को हक है उबलने का

इसलिए, अगर यह समाज हर दूसरे दिन बलात्कार की जघन्य घटनाओं के बारे में सुनता है, पढ़ता है, उससे दो-चार होता है, तो इस समाज का क्रोध कहीं तो अभिव्यक्त होगा ही। वो कहीं तो रास्ता ढूँढेगा प्रस्फुटित होने का। जब यह समाज देख रहा है कि भले ही कोई न्यायिक प्रक्रिया अपनाए, या तारीखों के चक्कर में घूमता रहे, उसे अपराधी मौका देख कर जला ही देगा, तो फिर वह समाज कल अखबार में यह खबर देख कर खुश क्यों नहीं होगा कि उन्नाव की बेटी के हत्यारों को यूपी पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया।

इसके पीछे पुलिस चाहे कितनी ही वाहियात कहानी क्यों न बना ले, समाज उसे पूरी तरह से माफ करने को तैयार क्यों नहीं रहेगा? उन्नाव की पीड़िता को यही तंत्र सुरक्षा नहीं दे सका, उसके जैसे हजारों को इस तंत्र ने बाहर छोड़ रखा है जो बार-बार अपराध कर रहे हैं, जो संसद में पहुँच गए हैं, जो मंत्री हैं, मुख्यमंत्री हैं… समाज ने इन सबको देखा है।

इसलिए, समाज ऐसे मौकों पर जश्न मनाता है जब वो जानता है कि सही क्या है, गलत क्या है। समाज को अच्छे से पता है कि पुलिस की कहानी में कितना दम है, लेकिन वो ‘विलिंग सस्पेंशन ऑफ डिस्बिलीफ़’ की राह चल पड़ता है और कहता है कि भैया आपकी कहानी बिलकुल सच्ची है, हमें पूरा यकीन है कि उन अपराधियों ने आपकी बंदूक छीन ली होगी, और आप पर गोली चलाई होगी।

ऐसा मानने के लिए समाज को बाध्य भी इसी तंत्र ने किया है। समाज इसलिए किसी भी तरह से गलत नहीं है जब वो इन अपराधियों की मौत पर जश्न मनाता है। इन अपराधियों को मौत के अलावा और कोई सजा मिलनी ही नहीं चाहिए थी। ऐसे लोगों की समाज में जरूरत नहीं है। लोग टैक्निकैलिटीज़ पर सवाल उठाते रहें, लेकिन एक नागरिक के तौर पर, जो हर दिन इसी देश की इसी न्यायिक व्यवस्था को नेताओं के बिस्तर पर, अमीरों के स्वीमिंग पूल में और बड़े वकीलों की जेब में देखता है, तो वो ऐसे दिनों का इंतजार करता है जब हैदराबाद की तर्ज पर उन्नाव की बेटी के लिए भी ‘न्याय’ उन पाँचों, शुभम त्रिवेदी, शिवम त्रिवेदी, राम किशोर त्रिवेदी, हरिशंकर त्रिवेदी और उमेश बाजपाई की लाश के रूप में मिले।

और हाँ, गोली अगर भौंहों के बीचों-बीच लगी हो, तो और भी बढ़िया।

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शरजील इमाम
शरजील इमाम वामपंथियों के प्रोपेगंडा पोर्टल 'द वायर' में कॉलम भी लिखता है। प्रोपेगंडा पोर्टल न्यूजलॉन्ड्री के शरजील उस्मानी ने इमाम का समर्थन किया है। जेएनयू छात्र संघ की काउंसलर आफरीन फातिमा ने भी इमाम का समर्थन करते हुए लिखा कि सरकार उससे डर गई है।

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