The Wire को भारत की हर चीज़ से दिक्कत है, चाहे वो झंडा हो, मंगलयान हो, या ISRO पर फिल्म हो

सवाल यह उठता है कि जिस थाली में वायर खा रहा है, उसमें छेद के लिए इतना उतावला क्यों है। तो जवाब यह है कि वायर की असली जलन भारत से नहीं, भारत के बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय से है। यह भारत-विरोधी कम, हिन्दू-विरोधी अधिक है।

जब कश्मीर से उसका ‘विशेष झंडा’ छीन तिरंगे के नीचे लाया गया, The Wire को तब भी समस्या होती है, और जब संघ कथित तौर पर तिरंगे की बजाय भगवा पसंद करता है तब भी। उन्हें मंगलयान की टीम में मौजूद महिलाओं की ‘शोर के साथ’ बड़ाई से भी दिक्कत है, और अक्षय कुमार के किरदार के चुप और शांत रहने से भी। वे साड़ी वाली महिलाओं द्वारा घर-बाहर दोनों संभाल लेने के विद्या बालन के किरदार की उपलब्धि से भी नाराज़ होते हैं, और तापसी पन्नू के किरदार के कार न चला पाने से भी। इन सबमें समान बात केवल यह है कि उन्हें भारत से जुड़ी, भारतीयता के प्रति गर्व उतपन्न करने वाली हर चीज़ से एलर्जी है।

गोलवलकर, तिंरगा, मोदी

आज वायर में एक लेख छपा जिसका मजमून कुल इतना ही था कि ‘संघी’ मोदी तिरंगा झंडा फ़हराए तो न देशभक्ति जाग सकती है न देश के लिए सम्मान। क्यों? क्योंकि किसी समय गोलवलकर ने तिरंगे का विरोध कर भगवा झंडे की वकालत की थी, और 2001 में जबरन घुस कर अपने मुख्यालय पर तिरंगा फ़हराने वालों के ख़िलाफ़ RSS ने मुकदमा किया था।

गोलवलकर ने उस समय वह बात किस संदर्भ में, किस ‘frame of mind’ में कही थी, उनका पूर्ण मंतव्य क्या था, इसपर एक पंक्ति या अनुच्छेद में बात नहीं हो सकती- यह अपने आप में एक लेख में भी समाने वाला नहीं, एक पूरी किताब का विषय है। इस पर फ़िलहाल इतना कहना पर्याप्त है कि ठीक है, ऐसा गोलवलकर का मानना था, लेकिन हर स्वयंसेवक उनके हर विचार को पूरी तरह आत्मसात करने के लिए मजबूर नहीं है। गोलवलकर “ऊपर वाले का अंतिम संदेशवाहक” नहीं थे कि उनकी बातों से नाइत्तेफ़ाक़ी रखने वालों का सर कलम हो जाएगा संघ में।

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आप मोदी की बात कर रहे हैं तो मोदी के बारे में बात करिए। क्या मोदी के 18 वर्षों के सरकारी, कर उसके भी पहले दशकों के राजनीतिक जीवन में किसी ने तिरंगे के ख़िलाफ़ उनके उद्गार सुने हैं? नहीं सुने होंगे। मकसद दरअसल मोदी नहीं, मोदी के बहाने तिरंगे झंडे और भारत की सम्प्रभुता को पदच्युत करना है। यही मकसद पहले भी था, और आज जब ठसक के साथ तिरंगा कश्मीरी जिहादियों के सीने पर मूँग दल रहा है, बिना अपनी सम्प्रभुता फ़र्ज़ी कश्मीरी झंडे के साथ साझा किए, तो वायर से ऐसे लेखों की उल्टियाँ बढ़-बढ़कर हो रहीं हैं।

और मज़े की बात यह कि 2001 में संघ के मुख्यालय पर तिरंगा फ़हराए जाने पर तालियाँ पीटने वाला वायर कश्मीर में तिरंगे की सम्प्रभुता पर उसी साँस में सवाल खड़े कर रहा है! दोगलेपन की ऐसी सानी मिलना मुश्किल है।

आपको शर्म मंगलयान के नहीं, अपने सस्तेपन पर आनी चाहिए

मंगलयान पर बनी फ़िल्म ‘मिशन मंगल’ की समीक्षा में द वायर के लेखक सीधे-सीधे कहते हैं कि NASA के मंगल मिशन MAVEN (Mars Atmosphere and Volatile Evolution) की ₹6,000 करोड़ लागत के मुकाबले मंगलयान के ₹400 करोड़ में सम्पन्न हो जाने की बात का ज़िक्र उन्हें ‘लज्जित’ करता है। इसमें शर्म की आखिर कौन सी बात है? विकासशील देशों में किसी भी चीज़ की लागत निर्णय के पैमानों में हमेशा ही महत्वपूर्ण पैमाना होती है, और किसी अमीर/विकसित देश के मुकाबले कम में काम कर लेने में शर्म कैसी?

इसके अलावा वह फिल्म में महिलाओं के लगभग हर रूप में प्रदर्शन पर आपत्ति ही जताते हैं। विद्या बालन घर संभालने से लेकर प्रोजेक्ट का निर्देशन तक सब कुछ कर ले रहीं हैं, तो उसमें भी आपत्ति, और तापसी पन्नू को साइंटिस्ट होते हुए भी कार चलाना सीखने में संघर्ष करता दिखाया जा रहा है, तो उसमें भी आपत्ति। साड़ी वाली महिलाओं को बौद्धिक रूप से अग्रणी दिखाया जा रहा है तो उसमें भी वह न जाने कहाँ से ‘स्टीरियोटाइपिंग’ ढूँढ़ लाते हैं, जबकि साड़ी को तो उन्हीं के पत्रकारिता और मीडिया वाले समुदाय विशेष ने ‘पिछड़ी, दबी-कुचली भारतीय महिला का पहनावा’ के रूप में स्टीरियोटाइप किया था।

जब महिला किरदार खाना पकाती दिखे तो उससे भी आपत्ति है, और जब किसी महिला वैज्ञानिक का पति उसके काम की सेना से तुलना कर सम्मान प्रदर्शित करे तो भी आपत्ति। अक्षय कुमार का किरदार धीर-गंभीर, कुछ-कड़क कम बोलने वाले पुरुष का है तो भी आपत्ति, और शरमन जोशी का शर्मीले, सोनाक्षी सिन्हा को ‘इम्प्रेस’ करने की कोशिश कर रहे पुरुष का किरदार है तो भी आपत्ति।

सबसे बड़ी आपत्ति आखिरी वाक्य में- कि अपने अंदर-ही-अंदर, गुमसुम-सी रहने वाली ख़ुशी की बजाय ‘आक्रामक’ होकर भारत की उपलब्धियों का जश्न क्यों मनाना। यही वायर की असली मानसिकता है, यही है इस फ़िल्म से चिढ़ने की असली वजह, कि अगर भारत की उपलब्धि पर चूड़ियाँ तोड़ कर विलाप नहीं कर सकते तो कम-से-कम उसका बखान कर हमारे घावों पर नमक तो मत रगड़ो।

झंडा हो या मंगलयान, असली दुश्मन भारत नहीं हिन्दू हैं

सवाल यह उठता है कि जिस थाली में वायर खा रहा है, उसमें छेद के लिए इतना उतावला क्यों है। तो जवाब यह है कि वायर की असली जलन भारत से नहीं, भारत के बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय से है। यह भारत-विरोधी कम, हिन्दू-विरोधी अधिक है। इसीलिए यह तिंरगे झंडे के मामले में बिना किसी प्रासंगिकता के भगवा झंडे खींच लाता है, ताकि ज़हर यह भरा जा सके कि भारत की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी तिरंगे की आड़ में भगवा झंडा मुसलमान-बहुल कश्मीर पर थोप रही है। जबकि सच इसका उल्टा है। ‘सेक्युलर’ झंडे की सम्प्रभुता हिन्दू-बहुल शेष-भारत को तो मंज़ूर थी, लेकिन मुस्लिम-बहुल कश्मीर को नहीं।

और आज मोदी ने वही करके दिखाया कि कश्मीर का मुस्लिम समुदाय बाकी देश के हिन्दुओं के बराबर में आ गया है। कश्मीर में बिना किसी और झंडे से सर्वोच्चता साझा किए फ़हरा रहा तिरंगा इसी का द्योतक है। यही घाटी के मुसलमानों के भी असंतोष का कारण है, और यही भावना भगवा-तिरंगा को गड्ड-मड्ड करके वायर और भड़काना चाहता है।

मिशन मंगल के मामले में भी यही है। दिक्कत असली यह है कि इसे अंजाम देने वाली महिलाएँ साड़ी-चूड़ी-बिंदी वाली थीं, बुर्के-हिजाब वाली नहीं। यह उस नैरेटिव की पटकथा के विपरीत था, जिसमें साड़ी ‘पिछड़ी, दबी-कुचली हिन्दू महिला’ का पहनावा थी। इसीलिए उनकी उपलब्धि पर बनी फिल्म में सौ खोट न होते हुए भी ‘ढ़ूँढ़ निकालने’ की कोशिश हो रही है, ताकि साड़ी पहनने वाली, हिन्दू रीति-रिवाजों और मूल्यों पर चलने वाली महिलाओं की सफ़लता को, मीडिया में उसके गान को अवैध करार दिया जा सके; ताकि नैरेटिव ज़िंदा रहे।

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