कॉन्ग्रेस को ‘चमार रेजीमेंट’ का समर्थन: दलितों को ‘दलित’ बनाए रखने की नई राजनीति

मोदी के प्रति नफरत और सपा-बसपा से चलती लगातार नाराज़गी का नतीजा यह निकला कि चंद्रशेखर ने कॉन्ग्रेस पार्टी के उस मसूद को वोट देने की माँग की है, जिसने 2014 में पीएम के खिलाफ़ 'बोटी-बोटी' वाला बयान देकर सुर्खियों में जगह पाई थी।

बीते दिनों बसपा सुप्रीमो मायावती और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण के बीच काफ़ी राजनीतिक खींचतान देखने को मिली थी। परिणाम स्वरूप भीम आर्मी प्रमुख ने समुदाय के सदस्यों से सहारनपुर लोकसभा क्षेत्र में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार मसूद को वोट देने की बात कही है। कयास लगाए जा रहे हैं कि ‘रावण’ के इस ऐलान से बसपा-सपा-रालोद के गठबंधन को झटका लग सकता है।

खबरों की मानें तो चंद्रशेखर ने यह ऐलान सोमवार (अप्रैल 8, 2019) की देर रात किया है। मायावती के समानांतर राजनीति करने वाले चंद्रशेखर हाल ही में चमार रेजीमेंट की माँग को लेकर चर्चा में आए थे। इस दौरान उन्होंने अखिलेश पर जमकर निशाना भी साधा था। दूसरी ओर खुद को मायावती का बेटा बताने वाले चंद्रशेखर ने उन्हें कुछ समय पहले मनुवादी भी करार दिया था। जिससे साफ़ जाहिर हो गया था कि वह सपा-बसपा के गठबंधन से नाखुश हैं। इन आरोपों के चलते मायावती ने उन्हें भाजपा का एजेंट बताते हुए कहा था कि वो दलितों के वोटों को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

ऐसी राजनीतिक छींटाकशी के बीच रावण का ऐलान दर्शाता है कि कभी खुद को चुनावों से दूर रखने की बात करने वाले के लिए आज सिर्फ़ राजनीति ही महत्वपूर्ण रह गई है। याद दिला दें कि कुछ समय पहले रावण ने अपने ही पूर्व बयान को झूठा साबित करते हुए ऐलान किया था कि ‘वो वहीं से चुनाव लड़ेगा, जहाँ से मोदी चुनाव लड़ेंगे।’ मोदी को लेकर नफरत और सपा-बसपा से चलती लगातार नाराज़गी का नतीजा यह निकला है कि चंद्रशेखर ने कॉन्ग्रेस पार्टी के उस मसूद को वोट देने की माँग की है, जिसने 2014 में पीएम के खिलाफ़ ‘बोटी-बोटी’ वाला बयान देकर सुर्खियों में जगह पाई थी।

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याद दिला दें कि कुछ समय पहले भीम आर्मी के एक नेता ने बसपा-सपा कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाया था कि उन्होंने रैली में चंद्रशेखर की तस्वीर लेकर आए कुछ दलितों के साथ मारपीट की और उनके पोस्टर फाड़ दिए थे। उन्होंने कहा था कि जब कोई भीम आर्मी के समर्थन में नहीं आया, तब मसूद ने उसकी मदद की थी।

अब ऐसे में सोचने वाली बात है कि हमेशा से दलित उत्थान पर बड़ी-बड़ी बात करने वाले चंद्रशेखर क्या वाकई में दलितों की स्थिति को लेकर गंभीर हैं? अगर हैं, तो फिर उन्होंने कॉन्ग्रेस को समर्थन देने का फैसला क्यों किया? क्योंकि भले ही मसूद ने उस समय आकर उनका समर्थन किया हो जब उनके साथ कोई नहीं था लेकिन यह भी तो सच है कि देश की सत्ता सबसे अधिक वर्षों तक कॉन्ग्रेस (जिससे मसूद जुड़े हैं) पार्टी के पास ही थी। लेकिन इस दौरान कभी भी पार्टी ने दलितों के उत्थान के लिए कोई कदम नहीं उठाया। कॉन्ग्रेस ने हमेशा देश में जाति/धर्म को आधार बनाकर लोगों में फूट डालने का प्रयास किया ताकि वो घृणा की भड़की आग में अपनी राजनीति की रोटियाँ सेंकती रहे।

मसूद को समर्थन देना भावनात्मक तौर पर और निजी स्तर पर सही हो सकता है, लेकिन जब आप दलित संगठन के प्रमुख हों, और दलितों के अधिकारों की लड़ाई की बात करते हों, तब ऐसा कदम उठाना कहाँ तक उचित है… चंद्रशेखर का कॉन्ग्रेस को समर्थन देना दिखाता है कि वह केवल खुद को दलितों का हितैषी बताकर समाज में एक जाना-माना चेहरा बनकर उभरना चाहते थे। और अब जब वो उस मुकाम पर पहुँच गए हैं कि अस्पताल में भर्ती होने पर राज बब्बर और प्रियंका गाँधी जैसे बड़े लोग उनका हाल लेने पहुँच रहे हैं तो वो दलितों के मुद्दों को दरकिनार करके सिर्फ़ अपनी राजनीति साध रहे हैं।

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"वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन पर जासूसी का आरोप लगा था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ लगे सारे आरोपों को निराधार पाया था। वे निर्दोष बरी हुए। लेकिन, किसी को नहीं पता है कि उनके ख़िलाफ़ साज़िश किसने रची? ये सब रतन सहगल ने किया। सहगल हामिद अंसारी का क़रीबी है।"

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