Tuesday, October 27, 2020
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वह बाहुबली जिसके पीछे पड़ी रही यूपी-बिहार की पुलिस: अस्पताल में पूर्व मंत्री पर चलाई गोलियाँ, 15 साल खाई जेल की हवा, मिला RJD का साथ

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्में राजन तिवारी ने कॉलेज के वक्त से ही अपराध की राह पकड़ ली थी। यूपी के कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला का गैंग ज्वाइन कर राजन तिवारी ने जवानी के दिनों में ही साफ कर दिया था कि वह इसी राह पर चलेंगे। पहली बार राजन तिवारी का नाम राष्ट्रीय स्तर पर तब उछला, जब.....

बिहार की राजनीति में अपराध का कॉकटेल किसी से छिपा नहीं है। चुनाव सिर पर है और एक बार फिर से कई बाहुबली अब टिकट पाने की जुगाड़ में लग गए हैं। आज हम बात करेंगे उस नाम की, जिनका सिक्का कभी, ना सिर्फ बिहार बल्कि उत्तर प्रदेश की अपराध की गलियों में भी चला करता था। 

बाहुबलियों की राजनीति, गुनाहों की गलियों से निकले उन सियासतदानों का सच है, जिनके दामन पर यूँ तो कई गुनाहों के दाग हैं, लेकिन सियासत के रसूख से उन्हें अलग पहचान मिलती है। ऐसे लोग खुद को जनता का ‘रहनुमा’ कहते हैं, लेकिन जनता की जुबान में उन्हें कभी अपराधी तो कभी बाहुबली कहा जाता है। बिहार की राजनीति में सक्रिय ऐसे ही लोगों की फेहरिस्त में एक नाम राजन तिवारी का भी है। राजन तिवारी ऐसे बाहुबली हैं, जिनका जलवा दो राज्यों यूपी और बिहार दोनों जगह रहा है।

श्रीप्रकाश शुक्ला के गैंग में सक्रिय रहे राजन तिवारी

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्में राजन तिवारी ने कॉलेज के वक्त से ही अपराध की राह पकड़ ली थी। यूपी के कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला का गैंग ज्वाइन कर राजन तिवारी ने जवानी के दिनों में ही साफ कर दिया था कि वह इसी राह पर चलेंगे। पहली बार राजन तिवारी का नाम राष्ट्रीय स्तर पर तब उछला, जब यूपी सरकार के विधायक रहे वीरेंद्र प्रताप शाही पर हमले में उनका नाम आया। 

यूपी के महराजगंज की लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से विधायक रहे वीरेंद्र प्रताप शाही मूल रूप से गोरखपुर कैंट के निवासी थे। 24 अक्टूबर 1996 को वह गोलघर कार्यालय से अपने घर जा रहे थे, जैसे ही वे कैंट में एक लॉज के पास पहुँचे तो उनकी कार पर बदमाशों ने जमकर फायरिंग की। हमले में शाही की जाँघ में गोली लग गई। लेकिन उनके गनर जयराम की मौके पर ही मौत हो गई। इस वारदात में श्रीप्रकाश शुक्ला और राजन तिवारी समेत चार लोगों को आरोपित बनाया गया था। हालाँकि, सबूतों के अभाव में राजन तिवारी को 2014 में बरी कर दिया गया।

यूपी पुलिस के डर से बिहार में रहने लगे राजन तिवारी

उत्तर प्रदेश में श्रीप्रकाश शुक्ला का एनकाउंटर होने के बाद राजन तिवारी बिहार भाग आए। यहाँ आकर उन्होंने फिर से गैंग बना लिया। यूपी पुलिस के डर से राजन तिवारी बिहार में रहकर ही अपने डर के साम्राज्य को चलाने लगे। इसी दौरान राजन तिवारी का नाम बिहार सरकार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या में आया।

1996 में बिहार में मेधा घोटाला सामने आया। इंजीनियरिंग कॉलेजों में भर्ती कराने के नाम पर खेल हो रहा था। तब मुख्‍यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव ने सीबीआई जाँच की अनुशंसा कर दी तो बृज बिहारी संग उनके रिश्‍ते तल्‍ख हो गए। मंत्री पद तो गया ही, न्‍यायिक हिरासत में भी भेज दिए गए। हालाँकि, वहाँ बृज बिहारी की तबीयत खराब हो गई तो पटना के सबसे पॉश इलाके में बने पटना के इंदिरा गाँधी आयुर्विज्ञान संस्‍थान में भर्ती कराया गया। यहीं उनकी जिंदगी का अंतिम अध्‍याय खून से लिखा जाना था।

गोलियों से छलनी हो गया था बृज बिहारी का शरीर

करीब 8 बजकर 15 मिनट हुए होंगे कि एक टाटा सूमो लगभग बीस कदम दूर आकर रुकी। पीछे एक अंबेसडर भी थी। एक शूटर ने तस्‍दीक की कि ये बृज बिहारी ही हैं और फिर पूरा अस्‍पताल गोलियों की गूँज से दहल उठा। एके-47, कार्बाइन, पिस्‍तौल जो कुछ हाथ में था, उसकी गोलियाँ बदमाशों ने बृज बिहारी के शरीर में उतार दीं। दोनों गाड़‍ियों में आए अपराधी हवा में गोलियाँ बरसाते हुए फरार हो गए। इस हत्याकांड में राजन तिवारी को निचली अदालत से आजीवन करावास की सजा भी हुई, लेकिन सबूतों के अभाव में वह साल 2014 में पटना हाईकोर्ट से बरी हो गए।

राजन तिवारी बिहार में लालू सरकार के मंत्री की हत्या में जा चुके हैं जेल

बृज बिहारी प्रसाद हत्याकांड में राजन तिवारी 15 साल चार महीने जेल में रहे, लेकिन सियासत के गलियारे में उनका रसूख बना रहा। इसकी वजह यह रही कि जेल जाने से पहले राजन तिवारी ने अपने ऊपर लगे दाग को छुपाने के लिए खादी पहन ली। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने आरजेडी का दामन थाम लिया। वह राजनीति में सक्रिय हो गए थे। यही वजह है कि जेल जाने से पहले और रिहा होने के बाद भी राजनीति में सक्रिय रहे।

मंत्री हत्याकांड में जेल जाने से पहले ही राजन तिवारी ने बिहार में सियासी जमीन तलाश ली थी। राजन तिवारी दो बार विधानसभा के लिए चुने गए। वह पूर्वी चंपारण के गोबिदगंज से लोजपा से विधायक रह चुके हैं। इसके अलावा राजन तिवारी 2004 में लोकसभा पहुँचने के लिए भी भाग्य आजमा चुके हैं।

दामन पर लगे दाग को छुड़ाने के लिए राजनीति में आए राजन तिवारी

लंबे समय तक जेल में रहने के चलते उनके रसूख में थोड़ी कमी जरूर आई है, लेकिन वह उसे दोबारा पाने की कोशिश में हैं। जेल से बाहर आने के बाद राजन तिवारी ने 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले लखनऊ में बीजेपी की सदस्यता ली थी। इस पर काफी विवाद हुआ जिसके बाद उन्हें साइडलाइन कर दिया गया। इन दिनों दोबारा से बिहार विधानसभा चुनाव में सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं। इससे पहले उन्होंने 2016 में बीएसपी ज्वाइन किया था, लेकिन वहाँ से टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने बीजेपी का रुख किया है।

लोजपा के प्रति झुकाव दिखा रहे हैं राजन तिवारी

बिहार विधानसभा चुनाव में राजन तिवारी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के प्रति भी झुकाव दिखा रहे हैं। किसी जमाने में लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे राजन तिवारी इन दिनों मीडिया में तेजस्वी यादव की कमियाँ और लोजपा प्रमुख चिराग पासवान की खूबियाँ गिनाने में लगे हैं। इतना ही नहीं राजन तिवारी ये भी मानते हैं कि बीजेपी और लोजपा की दोस्ती अटूट है।

माना जाता है कि बृज बिहारी हत्याकांड में एक साथ जेल जाने वाले पूर्व सांसद सूरजभान सिंह की मदद से राजन तिवारी लोजपा में जाने की कोशिश में हैं। हालाँकि, देखना होगा कि लोजपा या बीजेपी बिहार विधानसभा चुनाव में राजन तिवारी को टिकट देती है या नहीं।

1995 से 1998 के बीच राजन तिवारी के नाम से बिहार थर-थर काँपता था। राजन तिवारी कुख्यात बदमाश श्रीप्रकाश शुक्ला के दाहिना हाथ थे। श्रीप्रकाश शुक्ला ने जब यूपी के सीएम कल्याण सिंह को मारने की सुपारी ली उसके करीब तीन महीने बाद वो अपने गुर्गों के साथ मारा गया। लेकिन राजन तिवारी की जिंदगी की लकीर लंबी थी। वो सिर्फ न जिंदा बचा रहा बल्कि बिहार की राजनीति में ‘भद्र’ बन गया।

यह बात अलग थी कि उनके माथे पर दर्जनों मुकदमे दर्ज थे जिसमें सबसे महत्वपूर्ण बिहार सरकार में मंत्री बृज बिहारी प्रसाद का मर्डर था। राजन तिवारी के बारे में कहा जाता है कि उनके हाथ में एक के 47 हथियार तो होता था लेकिन वो दिमाग से काम करते थे। जिस तरह से श्रीप्रकाश शुक्ला बिना सोचे विचारे फैसला करता था उससे इतर जाकर राजन तिवारी सोचते थे।

प्रीतम सिंह की हत्या में भी आया नाम

वर्तमान में उन पर हत्या, लूट, अपहरण के 10 से अधिक मामले दर्ज हैं। राजन तिवारी पर उत्तर प्रदेश में पूर्व विधायक समेत कइयों की हत्या का आरोप है लेकिन दो दशक पहले एसटीएफ के इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह की हत्या का मामला ऐसा था जिसे लेकर महकमा अब भी क्षुब्ध है। इमानदार और तेज-तर्रार की छवि रखने वाले प्रीतम सिंह एसटीएफ की शुरूआती टीम का हिस्सा थे। माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला तक वह पहुँचने वाले थे कि उसके गुर्गों की गोली का शिकार बन गए। इस घटना के बाद समूचे प्रदेश की पुलिस भी श्रीप्रकाश के पीछे पड़ गई और उसे ढेर कर ही चैन लिया। 

अजीत सरकार हत्याकांड में भी रह चुके हैं आरोपित

राजन तिवारी बहुचर्चित माकपा नेता अजीत सरकार के हत्याकांड में भी आरोपित रह चुके हैं। राजन तिवारी के अलावा इस मामले में पप्पू यादव भी सजा काट चुके हैं। हालाँकि, इस मामले में भी पटना हाईकोर्ट ने दोनों को बरी कर दिया था। इस आपराधिक कृत्य की वजह से राजन तिवारी यूपी पुलिस के लिए वॉन्टेड बन चुके थे। यही वो वक्त था जब राजन तिवारी ने बिहार का रुख किया और कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए राजनीतिक जमीन तलाशने लगे।

बिहार की राजनीति में नेता और अपराधी एक सिक्के के दो पहलू

बिहार में बाहुबलियों का हमेशा बोलबाला रहा, ये किसी न किसी बड़े नेता के मददगार हुआ करते थे। वे उनके लिए बूथ कैप्चरिंग तक करवा देते थे। बदले में नेता भी उनकी हर बात मान लेते थे। कहा तो यहाँ तक जाता है कि बिहार की राजनीति में नेता और अपराधी एक सिक्के के दो पहलू हुआ करते थे। हालाँकि अब यहाँ कानून का राज चलता है। लेकिन, एक समय ऐसा भी था जब सरकार चाहे किसी की हो। लेकिन, राज बाहुबलियों का चलता था। वे खुद कानून बनाते। उनके खौफ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे पुलिस, डीएम और मंत्री तक की जान लेने से नहीं डरते थे, जिससे बिहार की जनता उस वक्त दिन में भी डरती थी।

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