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85 साल बाद बिहार में CWC की बैठक, लेफ्ट की 12 सीटों पर दावा, मुकेश सहनी को भाव नहीं: कॉन्ग्रेस के ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ से INDI गठबंधन का दम फूला

बढ़ते दबाव से अकुलाए तेजस्वी यादव यात्रा पर निकल गए हैं। सभी सीटों पर अपने चेहरे के चुनाव लड़ने की बात कह रहे। बिहार कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की सीट पर राजद दावा कर रही है।

बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विधानसभा चुनाव की घोषणा बस होने ही वाली है और राज्य की 243 सीटों पर जंग छिड़ने वाली है। एक तरफ सत्ताधारी एनडीए है, जिसमें नीतीश कुमार की जेडीयू और भाजपा की जोड़ी मजबूत दिख रही है। दूसरी तरफ विपक्ष का इंडी गठबंधन, जो महागठबंधन के नाम से जाना जाता है। लेकिन विपक्षी खेमे में अभी से ही घमासान मचा हुआ है।

सीएम पद का चेहरा तय नहीं, सीटों के बँटवारे पर लड़ाई और छोटे सहयोगियों की बगावत… ये सब मिलकर गठबंधन को कमजोर कर रहे हैं। क्या ये आंतरिक कलह इंडी गठबंधन को लेकर डूब जाएगी? ये बड़ा सवाल है। इस लेख में हम यही समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर बिहार की राजनीति में क्या कुछ चल रहा है।

बिखरने लगा है इंडी गठबंधन

बिहार चुनाव अक्टूबर-नवंबर में होने की उम्मीद है। 2020 के चुनावों में महागठबंधन ने 243 में से 110 सीटें जीती थीं, लेकिन सत्ता से बाहर रह गया। अब 2025 में वापसी की कोशिश है, लेकिन गठबंधन के अंदर ही सब कुछ उलझा पड़ा है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सबसे बड़ा दाँव खेल रही है, जबकि कॉन्ग्रेस अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने पर अड़ी हुई है। वामपंथी दल, विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) जैसे छोटे साथी भी अपनी दुकान चलाने को बेताब हैं। जानकार कहते हैं कि अगर ये विवाद न सुलझे, तो गठबंधन का वोट बँट सकता है।

सीएम चेहरा: तेजस्वी बनाम कोई और?

सबसे बड़ा सवाल है- अगर (मान लेते हैं) महागठबंधन जीत गया, तो बिहार का अगला सीएम कौन बनेगा? तेजस्वी यादव खुद को इस पद का मजबूत दावेदार मानते हैं। वे 2020 में डिप्टी सीएम रह चुके हैं। लेकिन कॉन्ग्रेस ने अभी तक उनके नाम को स्वीकृति ही नहीं दी है। पार्टी के नेता कहते हैं कि बिना चेहरे के चुनाव लड़ना जोखिम भरा है, लेकिन तेजस्वी को अकेले आगे बढ़ाना गठबंधन के लिए ठीक नहीं।

इस बात की खीज में हाल ही में तेजस्वी ने बयान दे दिया कि वे सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। ये बयान सीट बँटवारे की बातचीत के ठहराव के बीच आया, और इसे गठबंधन के अंदर दबाव की रणनीति माना जा रहा है। तेजस्वी ने कहा, “वोटरों से अपील है कि मेरे नाम पर वोट दें, चाहे कोई भी सीट हो।” ये सुनते ही सहयोगी दल हैरान रह गए। कॉन्ग्रेस ने इसे “तेजस्वी जी का अपना स्टैंड” बताया, लेकिन अंदरखाने में नाराजगी साफ दिख रही है।

कॉन्ग्रेस की नजरें राहुल गाँधी पर हैं। वे बिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाल चुके हैं, जो ‘उसकी नजर में’ काफी सफल रही। यात्रा में तेजस्वी के साथ उनकी जोड़ी ने विपक्षी एकता का संदेश दिया, लेकिन अब ये यात्रा कॉन्ग्रेस को ज्यादा सीटें दिलाने का हथियार बन गई है। राहुल ने यात्रा के जरिए वोटर लिस्ट से नाम कटने का मुद्दा उठाया, हालाँकि ये बैकफायर कर गया।

ये अलग बात है कि इंडी गठबंधन के अंदर राहुल की यात्रा सीएम चेहरे की बहस को और उलझा रही है। वामपंथी दलों का कहना है कि कहा कि कॉन्ग्रेस को यथार्थवादी होना चाहिए और आरजेडी को लचीला। अगर चेहरा तय न हुआ, तो गठबंधन का वोटर कन्फ्यूज हो सकता है। एनडीए तो नीतीश कुमार को ही आगे रख रहा है, जो स्थिरता का प्रतीक बने हुए हैं।

बँटवारे में कॉन्ग्रेस की माँग 70-75 सीट

अब बात सीटों की। 2020 में कॉन्ग्रेस ने 70 सीटें लड़ीं, लेकिन सिर्फ 19 जीतीं। अब पार्टी कम से कम 70-75 सीटें माँग रही है। राहुल की यात्रा के बाद कॉन्ग्रेस का हौसला बढ़ा है, और वे कहते हैं कि ‘खराब सीटें ही क्यों मिलें?’ इनमें से 12-15 सीटें वामपंथी दलों की हैं, जो पहले जीत चुकी हैं। आरजेडी ये माँग मानने को तैयार नहीं। वे कहते हैं कि 2020 का फॉर्मूला ही ठीक है, जिसमें आरजेडी को 144, कॉन्ग्रेस को 70 और बाकी सहयोगियों को बाँटा गया था।

इस बीच, कॉन्ग्रेस ने दबाव बनाने के लिए पटना में केंद्रीय कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक बुलाई है। ये 1940 के बाद बिहार में पहली बार हो रहा है। 24 2025 सितंबर को राहुल गाँधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और सभी राज्य प्रभारियों के साथ बैठक होगी। कॉन्ग्रेस के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरू ने कहा, “ये सिर्फ बिहार का मुद्दा नहीं, पूरे देश का है। हम दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं।? एनडीए ने इसपर तंज कसा है कि कॉन्ग्रेस सीटों के लिए दबाव डाल रही है।

कॉन्ग्रेस के इस माँग से वामपंथी दल नाराज हैं। सीपीआई(एमएल) के दीपंकर भट्टाचार्य ने 4-5 दिन पहले बयान दिया कि कॉन्ग्रेस की ज्यादा माँग से उनकी सीटें खतरे में हैं। गठबंधन अब 5 से बढ़कर 9 दलों का हो गया है – आरजेडी, कॉन्ग्रेस, वामपंथी, वीआईपी, जेएमएम, एलजेपी(रा) जैसे नए साथी जुड़े हैं। ये ‘समृद्धि की समस्या’ बन गई है, जहाँ सीटें कम हैं और दावेदार ज्यादा। अगर बात न बनी, तो छोटे दल बगावत कर सकते हैं।

मुकेश साहनी का डिप्टी सीएम का सपना

गठबंधन में एक और टेंशन पॉइंट है – विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के मुखिया मुकेश साहनी। वे हर हाल में डिप्टी सीएम का पद चाहते हैं। साहनी कहते हैं, “तेजस्वी दूल्हा नंबर एक, मैं नंबर दो।” वे 60-70 सीटें माँग रहे हैं, खासकर ईबीसी वोटों के लिए।

पहले आरजेडी ने उन्हें इग्नोर किया, तो वे कॉन्ग्रेस के करीब चले गए। राहुल की यात्रा में वे बराबर खड़े दिखे। लेकिन अब कॉन्ग्रेस भी ठंडी पड़ गई है। साहनी की माँग से बातचीत जटिल हो गई है। जानकार कहते हैं कि अगर साहनी को जगह न मिली, तो वे एनडीए की ओर रुख कर सकते हैं। ये गठबंधन के लिए बड़ा झटका होगा, क्योंकि वीआईपी के पास निषाद समुदाय का मजबूत वोट बैंक है।

आरजेडी की आक्रामक रणनीति, यात्रा और उम्मीदवार की घोषणा

आरजेडी ने जवाबी कार्रवाई तेज कर दी है। पहले कॉन्ग्रेस की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ का समापन पटना में होना था, लेकिन आरजेडी ने इसे रोका। इसके बाद तेजस्वी ने बिना सहयोगियों के ‘बिहार अधिकार यात्रा’ शुरू कर दी। ये यात्रा बेरोजगारी और अपराध पर केंद्रित है और तेजस्वी इसमें खुद को मजबूत नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। यात्रा राहुल की कामयाबी को कंसोलिडेट करने का बहाना है, लेकिन असल में गठबंधन में अपनी प्रधानता दिखाने की कोशिश है।

सबसे तीखा कदम कुटुंबा सीट पर उठाया गया। यहाँ कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश कुमार विधायक हैं। आरजेडी कार्यकर्ताओं ने बिना सीट बँटवारे का फॉर्मूले तय हुए ही अपनी तरफ से आरजेडी उम्मीदवार के तौर पर एक नाम भी सामने कर दिया। इस उम्मीदवार का नाम सुरेश राम पासवान है, जो स्थानीय स्तर पर मजबूत माने जाते हैं। ये सीट अभी तक गठबंधन के बँटवारे में नहीं आई, फिर भी आरजेडी ने दावा ठोंक दिया।

13 सितंबर को कॉन्ग्रेस ने कुटुंबा में सम्मेलन किया, तो 15 को घोषणा कर आरजेडी ने 18 को अपना कार्यक्रम रखा। दोनों तरफ से दूसरे दल का कोई नेता नहीं पहुँचा। ये कदम साफ बताता है कि आरजेडी कॉन्ग्रेस को आगे बढ़ने नहीं देना चाहती। प्रदेश अध्यक्ष की सीट पर ही दाँव खेलकर वे मैक्सिमम प्रेशर डाल रही हैं।

अतिमहत्वाकांक्षा कहीं पड़ न जाए भारी

जानकारों का मानना है कि गठबंधन को जल्द फैसला लेना होगा। तेजस्वी की महत्वाकांक्षा अच्छी है, लेकिन गठबंधन की भावना जरूरी। कॉन्ग्रेस अगर 60 सीटों पर मान गई, तो बात बन सकती है। मुकेश साहनी जैसे सहयोगियों को संतुष्ट करना भी चुनौती है। कुल मिलाकर, बिहार चुनाव सिर्फ सीटों की जंग नहीं, बल्कि गठबंधनों की परीक्षा है। क्या इंडी गठबंधन इन चुनौतियों से पार पा लेगा या एनडीए फिर बाजी मार लेगा? आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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