Wednesday, September 29, 2021
Homeराजनीतिराजीव गाँधी मरते समय PM थे, सीताराम केसरी अध्यक्ष नहीं: कॉन्ग्रेस अपनी वेबसाइट से...

राजीव गाँधी मरते समय PM थे, सीताराम केसरी अध्यक्ष नहीं: कॉन्ग्रेस अपनी वेबसाइट से फैला रही फेक न्यूज़

इन दोनों घटनाओं का इतने आस-पास होना, वह भी उस समय जब कॉन्ग्रेस और देश में 'गाँधी' उपनाम की महत्ता पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं, महज संयोग है? या क्षत्रपों को परिवार के वफादारों का संदेश?

परिवारवाद में कॉन्ग्रेस किस कदर डूबी है, इसकी बानगी तो राहुल गाँधी के पैरों में गिरकर उनसे अध्यक्ष पद न छोड़ने की पार्टी की चिरौरी से ही दिख गई थी। लेकिन अब पार्टी परिवार की मुराद में इतना डूब गई है कि इतिहास को भी बदलने पर आमादा है। राजीव गाँधी को पार्टी की वेबसाइट पर मरते समय भारत का तत्कालीन प्रधानमंत्री बताया गया है जबकि सच्चाई यह है कि उस समय भारत के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर हुआ करते थे। इसके अलावा पार्टी की वेबसाइट पर पूर्व अध्यक्ष सीताराम केसरी को पार्टी के अध्यक्षों की सूची से भी हटा दिया गया है।

राहुल गाँधी की जीवनी में बताया राजीव को तत्कालीन प्रधानमंत्री

अपने (नि?)वर्तमान अध्यक्ष और राजीव गाँधी के बेटे राहुल गाँधी की पार्टी वेबसाइट पर प्रकाशित जीवनी में कॉन्ग्रेस ने लिखा है कि अपनी मृत्यु के समय (21 मई, 1991 को) राहुल के पिता राजीव गाँधी भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री थे। यह पूरी तरह गलत है। राजीव की हत्या के समय उनकी सरकार न केवल जा चुकी थी बल्कि उसके बाद प्रधानमंत्री बनने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह की भी सरकार गिर कर चंद्रशेखर की सरकार आ गई थी, जिसे पहले तो राजीव गाँधी का ही समर्थन जिलाए हुए था, और बाद में राजीव गाँधी ने समर्थन वापस ले लिया था, जिसके बाद देश में नई लोकसभा के निर्वाचन की प्रक्रिया चल रही थी। उसी दौरान प्रचार करते हुए राजीव गाँधी की लिट्टे के दहशतगर्दों ने हत्या कर दी थी

राफेल-राफेल का झूठा राग गाने वाले राहुल गाँधी की कॉन्ग्रेस भी उतनी ही झूठी निकली

और ऐसा भी नहीं है कि यह कोई टाइपिंग की गलती, क्लेरिकल मिस्टेक या तथ्यों की ग़लतफ़हमी हो- क्योंकि ऐसा कुछ तो केवल एक बार हो सकता है, बार-बार नहीं। जबकि कॉन्ग्रेस की वेबसाइट पर एक बार नहीं बल्कि दो बार राजीव गाँधी को उनकी हत्या के समय भारत का तत्कालीन प्रधानमंत्री बताया गया है।

न खाता न बही, कॉन्ग्रेस से केसरी की याद मिटी

कॉन्ग्रेस में सीताराम केसरी का 1996 से 1998 तक कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष होना आज गाँधी परिवार की आँखों में चाहे जितना खटके मगर यह एक ऐतिहासिक तथ्य है- उतना ही जितना कि यह कि सोनिया गाँधी को पार्टी अध्यक्षा बनाने के लिए 14 मार्च 1998 को केसरी को एक कमरे में बंद कर एक तरह से जबरदस्ती, गुंडागर्दी का सहारा लिया गया था। और अब कॉन्ग्रेस इस आँखों के काँटे को मिटा कर तारीख बदलने की कोशिश कर रही है।

पार्टी के 1990 के बाद के अध्यक्षों की सूची में से सीताराम केसरी का नाम गायब है।

दोनों घटनाएँ संयोग, या कुछ और?

इन दोनों घटनाओं का इतने आस-पास होना, वह भी उस समय जब कॉन्ग्रेस और देश में ‘गाँधी’ उपनाम की महत्ता पर गंभीर प्रश्नचिह्न हैं, महज संयोग है? या फिर कॉन्ग्रेस के इतिहास से (और भारत के भी इतिहास से) गाँधी के इतर चरित्रों को आधिकारिक तौर पर हटाने की कोशिश? यह तो तय है कि कॉन्ग्रेस की वेबसाइट पर राजीव गाँधी के कार्यकाल का ‘विस्तार’ कर दिए जाने से न इस देश का इतिहास पुनर्लिखित कर वीपी सिंह और चंद्रशेखर को भुला दिया जाएगा, न ही सीताराम केसरी को बाकी पार्टियाँ और देश मिटा देगा। लेकिन क्या इससे यह संदेश दिए जाने की कोशिश हो रही है कि “गाँधी इज़ कॉन्ग्रेस, कॉन्ग्रेस इज़ गाँधी”? क्या कॉन्ग्रेस अपने कैडर में राहुल गाँधी के हटने की उम्मीद में महत्वाकांक्षा पाले क्षत्रपों (शशि थरूर लोकसभा में कॉन्ग्रेस के मुखिया बनने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं करण थापर को इंटरव्यू में) को यह संदेश दे रही है कि कॉन्ग्रेस के लिए नेहरू-गाँधी-वाड्रा परिवार इतना जरूरी है कि उसे बनाए रखने के लिए पार्टी इतिहास पुनर्लिखित भी करेगी, अगर जरूरी हुआ- इसलिए क्षत्रप सब्जबाग न पालें…

 

  सहयोग करें  

एनडीटीवी हो या 'द वायर', इन्हें कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

‘उमर खालिद को मिली मुस्लिम होने की सजा’: कन्हैया के कॉन्ग्रेस ज्वाइन करने पर छलका जेल में बंद ‘दंगाई’ के लिए कट्टरपंथियों का दर्द

उमर खालिद को पिछले साल 14 सितंबर को गिरफ्तार किया गया था, वो भी उत्तर पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा के मामले में। उसपे ट्रंप दौरे के दौरान साजिश रचने का आरोप है

कॉन्ग्रेस आलाकमान ने नहीं स्वीकारा सिद्धू का इस्तीफा- सुल्ताना, परगट और ढींगरा के मंत्री पदों से दिए इस्तीफे से बैकफुट पर पार्टी: रिपोर्ट्स

सुल्ताना ने कहा, ''सिद्धू साहब सिद्धांतों के आदमी हैं। वह पंजाब और पंजाबियत के लिए लड़ रहे हैं। नवजोत सिंह सिद्धू के साथ एकजुटता दिखाते हुए’ इस्तीफा दे रही हूँ।"

प्रचलित ख़बरें

- विज्ञापन -

हमसे जुड़ें

295,307FansLike
125,039FollowersFollow
410,000SubscribersSubscribe