Sunday, April 18, 2021
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रेड कॉरिडोर से ग्राउंड रिपोर्ट: पूर्व माओवादियों के भरोसे TMC, झारग्राम और जंगलमहल में खिलेगा कमल?

जहाँ ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव 'करो या मरो' जैसा है, वहीं 2019 के चुनाव में जीत का स्वाद चख चुकी बीजेपी 'सोनार बांग्ला' के सुनहरे अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहेगी।

कोलकाता से करीब 160 किलोमीटर का सफर तय कर हम झारग्राम/झाड़ग्राम शहर पहुँचे। लोधासुली जंगल से गुजरते वक्त पेड़ों के ताजा पत्ते न केवल वसंत की गवाही दे रहे थे, बल्कि यहाँ की 4 सीटों पर बदलती सियासी हवा का भी इशारा कर रहे थे। इन 4 सीटों सहित पश्चिम बंगाल की 30 विधानसभा सीटों पर पहले चरण में 27 मार्च को वोट पड़े।

झारग्राम (Jhargram) छोटा नागपुर के पठार में बसा बिहार और झारखंड की सीमा से सटा भौगौलिक दृष्टि से सूखा और शुष्क क्षेत्र है। इस इलाके में वर्षों तक माओवादियों का कब्जा रहा। यह रेड कॉरिडोर आंध्र प्रदेश, ओडिशा और छत्तीसगढ़ तक फैला था। यहाँ पहुँचने के बाद ठेले चाय की चुस्कियाँ ले हम अपनी मंजिल की ओर बढ़े।

स्थानीय लोगों से बातचीत में हमें ‘इलाका बंदी’ का पता चला। जिसका मतलब होता है कि अपनी अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के हिसाब से गाँव के लोगों के इलाके बँटे हुए हैं। लोगों में आपसी फूट इतनी अधिक गहरी है कि स्थानीय पत्रकार भी अपने हितों के हिसाब से जर्नलिज्म कर रहे हैं। अगर कभी कोई यहाँ का दौरा भी करता है तो उसे यहाँ के लोग नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते हैं।

झारग्राम पहुँचने पर हमने एक होटल व्यवसायी से मुलाकात की, जो सभी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं की मेजबानी करता है। पहचान सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर, क्योंकि इससे उन्हें और उनके परिवार को खतरा हो सकता था, वे बातचीत को राजी हुए। होटल संचालक ने बताया कि क्षेत्र के लोगों के बीच वर्तमान राजनीतिक पार्टी के खिलाफ असंतोष भरा हुआ है। वह एक भाजपा कार्यकर्ता था, जो पार्टी के लिए चुपचाप काम कर रहा था। उसने बताया कि भाजपा ने उसे दरिकनार कर दिया था। उसे अपनी जिंदगी प्यारी है, इसलिए वह चुपचाप काम कर रहा है। वह टीएमसी से बीजेपी में आने वाले कार्यकर्ताओं को जमीनी स्तर पर एकत्रित कर रहे हैं, ताकि टीएमसी को हराकर बंगाल में कमल खिलाया जा सके।

हालाँकि, अच्छी सड़कों से लोग संतुष्ट हैं, जिनकी 34 साल के वामपंथी शासन के दौरान कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन ममता के शासनकाल में रोजगार की कमी के कारण लोगों में काफी असंतोष है। इसी कारण ममता बनर्जी ने झारग्राम और जंगलमहल में सबसे ज्यादा सबसे ज्यादा लामबंदी की है। यहाँ लोगों से जब हमने उनका नाम और वो किसे वोट देंगे का सवाल पूछा तो अधिकतर लोगों ने बताने से इनकार कर दिया। सब के अलग-अलग मत थे। लेकिन, एक चीज सभी को एक सूत्र में पिरो रही थी और वो ये कि सभी टीएमसी के खिलाफ एकजुट थे। स्थानीय लोगों का एक सुर में कहना था कि तृणमूल ने उनके साथ दोहरा खेल खेला है।

चुनाव में इस बार टीएमसी ने मेदिनीपुर से हाल ही में पार्टी में शामिल हुईं जून मलैया को उतारा है। वह बांग्ला फिल्मों का लोकप्रिय चेहरा हैं। कभी यह सीट सीपीआई का गढ़ मानी जाती थी, सीपीएम ने यहाँ से इस बार पूर्व विधायक कामाख्या घोष के बेटे तरुण कुमार घोष पर दांव खेला है। भाजपा ने पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष समित कुमार दास को उतारा है। वहीं, झारग्राम सीट से संथाली फिल्मों की अभिनेत्री और पूर्व विधायक चूनीबाला हांसदा की बेटी बिरबा तृणमूल कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं। सीपीएम नेता मधुजा सेनोरॉय का मुकाबला बीजेपी के सुखमय सतपथी से है।

2000 के दशक के अंत में, जब झारग्राम और जंगलमहल माओवादी हिंसा का पर्याय बन चुका था, उस दौरान टीएमसी ने उन्हें आत्मसमर्पण कर अपनी पार्टी में शामिल होने या फिर गोली खाने अथवा झूठे केसों में फँसाने की धमकी दी थी। बातचीत के दौरान एक नाम विशेष तौर पर सामने आया जो इस क्षेत्र में शांति प्रकिया को बहाल करने और माओवादियों को मौका देने में काम कर रही थी। वह नाम भारती घोष का है। भारती घोष कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चहेती पुलिस अफसर थीं। उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान ममता को माँ कहा था।

आईपीएस अधिकारी भारती घोष पहले पश्चिम बंगाल सीआईडी में तैनात थीं। वह हार्वर्ड विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से स्नातक हैं। घोष ने 2019 में अपनी सर्विस से वीआरएस लेकर बीजेपी ज्वाइन कर ली थी। पार्टी ने 2019 के चुनाव में उन्हें घाटल निर्वाचन क्षेत्र से चुनावी मैदान में उतारा था।

2021 विधानसभा चुनाव में घोष कोलकाता से 103 किलोमीटर दूर पश्चिम मेदिनीपुर जिले की डेबरा विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी की उम्मीदवार हैं। यहाँ उनके खिलाफ इसी साल फरवरी में टीएमसी में शामिल पूर्व आईपीएस अधिकारी हुमायूँ कबीर चुनावी मैदान में हैं। माओवादी नेता किशनजी के मारे जाने के बाद निचले स्तर के माओवादियों के साथ आंतरिक साँठगाँठ कर तृणमूल कॉन्ग्रेस ने बंगाल में कथित शांति लाने में कामयाब रही थी। इसी का फायदा उठाते हुए ममता ने माओवादी कमांडर रहे छत्रधर महतो को 2020 में TMC में शामिल कराया था। महतो, लालगढ़ में 2008-2011 के माओवादी समर्थित आदिवासी आंदोलन का चेहरा था। लगभग 11 साल तक जेल की सलाखों के पीछे बिताने के बाद कुछ महीने पहले ही वह रिहा हुआ है।

महतो के पार्टी में शामिल होने के बाद पश्चिम बंगाल चुनाव में टीएमसी बड़ी आबादी का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रही है। ग्रामीण भी इस क्षेत्र में माओवादियों की उपस्थिति को स्वीकार करते हैं। लेकिन उनका मानना है कि यहाँ पर कोई भी नेतृत्वकर्ता नहीं है। बाँकुरा के एक होटल में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं से बातचीत हुई। इस दौरान अधिकांश का कहना था कि क्षेत्र में सड़कों और प्रकाश की व्यवस्था में सुधार हुआ है। लेकिन, एक बुजुर्ग ने स्थानीय प्राइमरी हेल्थ केयर सेंटर को लेकर अपनी नाराजगी जताई। उन्होंने बताया कि यहाँ पर पीएचसी तीन नर्सों और एक डॉक्टर के साथ शुरू हुई थी, लेकिन अब यहाँ केवल एक नर्स बस बची है। आपातस्थिति में लोगों को बलकुरा ​​मेडिकल कॉलेज या कोलकाता जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

चाय पीते हुए एक युवक ने बताया कि तृणमूल ने 2018 में पंचायत चुनावों के दौरान किसी भी विपक्षी दल को नामांकन दाखिल करने से रोकने के लिए ‘अनावश्यक हिंसा’ की थी। इसी कारण यहाँ टीएमसी निर्विरोध जीती थी। युवक ने कहा, “यहाँ के लोग अपनी गाढ़ी कमाई को लेकर डरे हुए हैं, जिसे उन्होंने शारदा, नारद और रोज वैली चिट फंड घोटालों में खो दिया था। लेकिन नौकरी के अवसरों की कमी ने हम में से अधिकांश को अपना मूल स्थान छोड़ने और निजी क्षेत्र में अच्छी नौकरी पाने के लिए कोलकाता जाने के लिए मजबूर कर दिया है। उद्योगों की कमी के कारण यहाँ किसे नौकरी मिलेगी?”

बीजेपी समर्थक जतिन लाहिड़ी इस बार ‘पसंदीदा मोदी सरकार’ की जीत को लेकर शर्त लगाने को तैयार हैं। उनका आकलन 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान 42 लोकसभा सीटों में से भाजपा को मिली 18 सीटों पर आधारित था। हालाँकि, जतिन के ही गाँव के एक व्यक्ति ने मोदी सरकार की नीतियों और किसान आंदोलन पर उसके रुख की आलोचना भी की।

EwokeTV के साथ राज्य के पश्चिमी जिलों की यात्रा से यह तो अंदाजा लग ही जाता है कि नतीजों को लेकर कोई भी अनुमान लगाना मुश्किल है। मौसमी चुनावी पंडित भी इससे बच रहे। लिहाजा स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है कि अंतिम क्षणों में बंगाल का चुनाव किस ओर झुकेगा। जहाँ ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव ‘करो या मरो’ जैसा है, वहीं 2019 के चुनाव में जीत का स्वाद चख चुकी बीजेपी ‘सोनार बांग्ला’ के सुनहरे अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहेगी।

(यह ग्राउंड रिपोर्ट ऑपइंडिया आपके लिए Ewoke.tv के सहयोग से लेकर आया है)

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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