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हिमाचल प्रदेश के इतिहास में पहली बार सिकुड़ गया राज्य का बजट, CM से लेकर DM तक की सैलरी में कटौती: समझें- कैसे कॉन्ग्रेस की नीतियों से राज्य हुआ बर्बाद

सुखविंदर सिंह सुक्खू की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने अपने चौथे बजट में कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिन्हें ‘सख्त लेकिन जरूरी’ बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर राज्य को इस स्थिति तक पहुँचाया किसने?

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने शनिवार (21 मार्च 2026) को वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 54,928 करोड़ रुपए का बजट पेश किया, जो पिछले वर्ष के 58,514 करोड़ रुपए से 3,586 करोड़ रुपए कम है। इसके साथ ही हिमाचल प्रदेश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि बजट का आकार घटा दिया गया। पिछले वर्ष जहाँ बजट 58,514 करोड़ रुपए था, वहीं इस बार इसे घटाकर 54,928 करोड़ रुपए कर दिया गया। यह लगभग 3,500–4,000 करोड़ रुपए की कटौती है।

यह कटौती महज संख्यात्मक नहीं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था की गंभीर बीमारी का प्रतीक है। बजट का कम होना केवल एक आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह राज्य की आर्थिक स्थिति की गंभीरता का संकेत है। आमतौर पर राज्यों का बजट हर साल बढ़ता है, क्योंकि विकास कार्य, महंगाई और जनसंख्या की जरूरतें बढ़ती हैं। लेकिन यहाँ उल्टा हुआ यानी सरकार के पास खर्च करने के लिए संसाधन कम पड़ गए।

इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने अपने वेतन में 50 प्रतिशत, उपमुख्यमंत्री और मंत्रियों के वेतन में 30 प्रतिशत, विधायकों के वेतन में 20 प्रतिशत की कटौती की घोषणा की है। ग्रुप-ए और ग्रुप-बी अधिकारियों के वेतन का 3 प्रतिशत, मुख्य सचिव, एसीएस, पीएस और डीजीपी स्तर के अधिकारियों का 30 प्रतिशत तथा अन्य उच्चाधिकारियों का 20 प्रतिशत वेतन अगले छह महीनों के लिए स्थगित किया गया है। बोर्ड-निगम के चेयरमैन, वाइस चेयरमैन और सलाहकारों के वेतन में भी 20 प्रतिशत कटौती होगी। ग्रुप-सी और डी कर्मचारी तथा पेंशनभोगी इससे अछूते रहेंगे, लेकिन न्यायपालिका से भी सहयोग की अपील की गई है।

यह फैसला ‘वित्तीय अनुशासन’ के नाम पर लिया गया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कॉन्ग्रेस सरकार की अकर्मण्यता, चुनावी फ्रीबीज के जाल और कुप्रबंधन ने राज्य के खजाने को खोखला कर दिया है। कमाई के स्रोत सूख गए हैं, जबकि खर्च दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। यह एक राज्य का हाल नहीं है, बल्कि कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक और डीएमके शासित तमिलनाडु (जो कॉन्ग्रेस की विचारधारा से प्रेरित है) भी इसी रास्ते पर चल रहे हैं।

इस रिपोर्ट में हम विस्तार से विश्लेषण करेंगे कि कैसे सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार ने हिमाचल को फ्रीबीज का शिकार बनाया, कैसे वादे पूरे नहीं हुए, बजट कटौती से किन क्षेत्रों को नुकसान होगा, जनता पर क्या असर पड़ेगा और यह कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय नीति का हिस्सा कैसे है।

कॉन्ग्रेस की फ्रीबीज संस्कृति: हिमाचल की आर्थिक तबाही का मूल कारण

कॉन्ग्रेस ने 2022 के विधानसभा चुनाव में हिमाचल प्रदेश में सत्ता हासिल करने के लिए भारी-भरकम वादे किए थे, जिसमें पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की बहाली, महिलाओं को 1,500 रुपए मासिक भत्ता, 300 यूनिट मुफ्त बिजली, युवाओं को रोजगार, किसानों को एमएसपी और बागवानी को बढ़ावा देना शामिल था।

सुखविंदर सिंह सुक्खू ने इन वादों को ‘जनहित’ का नाम देकर लागू किया, लेकिन इनकी लागत राज्य की क्षमता से कहीं ज्यादा थी। ओपीएस की बहाली अकेले 1,000 करोड़ रुपए सालाना अतिरिक्त बोझ डाल रही है, जो 1.36 लाख कर्मचारियों को लाभ देती है। महिलाओं के भत्ते, मुफ्त बिजली और अन्य सब्सिडी ने राजस्व व्यय को आसमान छू लिया।

पिछले तीन वर्षों में कॉन्ग्रेस सरकार ने लगभग 45,000 करोड़ रुपए का नया कर्ज लिया, कुल कर्ज 1 लाख करोड़ रुपए के पार पहुँच गया। ब्याज अदायगी अकेले 13 रुपए प्रति 100 रुपए व्यय में जा रही है। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता संदीपनी भारद्वाज का कहना है यह कर्जा लेकर घी पीने वाली नीति है।

इस बजट में राज्य का राजस्व घाटा 6,577 करोड़ रुपए अनुमानित है, जबकि राजकोषीय घाटा 9,698 करोड़ रुपए (जीएसडीपी का 3.49 प्रतिशत) हो गया है। केंद्र द्वारा राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद होने को कॉन्ग्रेस बहाना बना रही है, जिसमें वार्षिक 8,105 करोड़ रुपए का नुकसान होना है, लेकिन सच्चाई यह है कि फ्रीबीज और कुप्रबंधन ने पहले ही खजाना खाली कर दिया था।

कॉन्ग्रेस सरकार ने दोगुना किया कर्ज

पिछली भाजपा सरकार के समय भी कर्ज बढ़ा था, लेकिन कॉन्ग्रेस ने उसे दोगुना कर दिया। कॉन्ग्रेस की ‘आइडियोलॉजी’ फ्रीबीज पर टिकी है, न कि विकास पर।

अब देखिए कि सुक्खू सरकार ने बोर्ड-निगमों में चेयरमैनों का मानदेय 30,000 से 80,000 रुपए बढ़ाया, फिर कटौती का दिखावा किया है। उन्होंने पंचायतों के 15वें वित्त आयोग के फंड वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की, जो लोकतंत्र पर हमला है। यही नहीं, सुक्खू सरकार में दूध खरीद पर सीमा लगा दी गई, जबकि किसानों की 120 करोड़ रुपए की देनदारी लंबित है। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश की रीढ़ यानी बागवानी की भी सुक्खू सरकार ने अनदेखी की, जिसकी वजह से केंद्र प्रायोजित 3,300 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट्स लागू नहीं हो सके और धन वापसी की नौबत तक आ गई।

यह अकर्मण्यता है। सुक्खू ने कहा कि बजट में ग्रामीण अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य पर कोई कटौती नहीं है, लेकिन वास्तविकता एक दम उलट है। कुल व्यय में वेतन-पेंशन-ब्याज पर 61 रुपए प्रति 100 रुपए खर्च हो रहे हैं, जबकि पूंजीगत कार्यों पर सिर्फ 20 रुपए। ऐसे में विकास कार्य रुकेंगे, क्योंकि बजट घटने से लोक निर्माण, जल शक्ति जैसे विभाग प्रभावित होंगे, भले ही सीएम दावा करें कि इन पर कटौती नहीं की गई है।

CAG रिपोर्ट साफ कहती है कि हिमाचल प्रदेश ने भाजपा शासनकाल में 2018-19 से 2021-22 तक राजस्व अधिशेष दिखाया, लेकिन कॉन्ग्रेस के हाथ में कमान आने के बाद से लगातार घाटा हो रहा है। 15वें वित्त आयोग का अनुदान राजस्व घाटा खत्म करने के लिए था, लेकिन कॉन्ग्रेस ने फ्रीबीज पर उड़ा दिया। बकाया गारंटी 3,188 करोड़ रुपए, जो जीएसडीपी का 1.2 प्रतिशत है।

वेतन कटौती से क्या होंगे नुकसान

हिमाचल प्रदेश में वेतन कटौती वित्तीय आपातकाल का संकेत है। सरकार का दावा है कि इससे खजाने पर दबाव कम होगा, लेकिन हकीकत ये है कि इससे विकास कार्यों पर सीधा असर पड़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कें, सिंचाई, बिजली परियोजनाएं अधर में लटकेंगी। शिक्षा और स्वास्थ्य में शिक्षक-डॉक्टर भर्ती रुकेंगी।

इस सरकार में आम आदमी को रोजगार नहीं मिल रहा है। युवा बेरोजगार, महिलाओं को 1,500 रुपए मिल भी रहे तो महंगाई में घुल गए। किसानों को दूध-फल बेचने में परेशानी हो रही है। पेंशनभोगी और ग्रुप-सी/डी कर्मचारी बच गए, लेकिन कुल मिलाकर माहौल निराशा का है। सुक्खू सरकार के इस कदम से प्रति व्यक्ति व्यय घटेगा, जिससे विकास दर धीमी पड़ेगी।

कॉन्ग्रेस शासित राज्यों का बुरा हाल

कॉन्ग्रेस ने जो चुनावी वादे किए थे, उन्हें भी पूरे नहीं कर पाई। ये एक राज्य का हाल नहीं है, बल्कि कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक भी इसी रास्ते की तरफ बढ़ रहा है। तमिलनाडु का भी यही हाल है। राज्य लगातार कर्ज ले रहे हैं, जबकि कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्य परपंरागत तरीके से समृद्ध माने जाते हैं और इनकी कमाई भी बहुत अधिक है। लेकिन कॉन्ग्रेस इन राज्यों में फ्रीबीज का वादा करके सत्ता में आई और पूरे राज्य को बर्बाद कर गई।

हिमाचल की अर्थव्यवस्था पर संकट

हिमाचल प्रदेश की राजनीति और अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ से आगे का रास्ता बेहद चुनौतीपूर्ण है। हालिया बजट में जो तस्वीर सामने आई है, उसने न सिर्फ वित्तीय संकट को उजागर किया है, बल्कि यह भी दिखाया है कि राज्य की आर्थिक संरचना कितनी कमजोर हो चुकी है।

हिमाचल प्रदेश की मौजूदा स्थिति एक चेतावनी है केवल एक राज्य के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए। सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार का यह फैसला कि वह अपने और अधिकारियों के वेतन में कटौती करेगी, एक साहसिक कदम जरूर है, लेकिन यह उस गहरे संकट का लक्षण भी है, जिसमें राज्य फंस चुका है। हिमाचल की यह कहानी केवल एक राज्य की आर्थिक रिपोर्ट नहीं, बल्कि उस राजनीति का आईना है, जहाँ अल्पकालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक स्थिरता को नजरअंदाज किया गया।

सुखविंदर सिंह सुक्खू की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने अपने चौथे बजट में कई ऐसे फैसले लिए हैं, जिन्हें ‘सख्त लेकिन जरूरी’ बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर राज्य को इस स्थिति तक पहुँचाया किसने? अब देखना यह है कि क्या यह संकट सुधार का अवसर बनता है या फिर यह आर्थिक गिरावट की लंबी कहानी की शुरुआत है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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