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1 राज्य में मिली सत्ता, पर CM ही तय नहीं कर पा रही कॉन्ग्रेस: जानिए केरल कॉन्ग्रेस में क्यों छिड़ा है संग्राम

केरल विधानसभा चुनाव में 140 में से 102 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल करने वाली कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली UDF अब मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर बड़े राजनीतिक संकट में फंस गई है। चुनाव नतीजों के कई दिन बाद भी पार्टी किसी एक नाम पर सहमति नहीं बना पाई है।

केरल की राजनीति में एक कहावत मशहूर है कि यहाँ की जनता हर पाँच साल में ‘चाबी’ बदल देती है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में केरल की जनता ने न सिर्फ चाबी बदली, बल्कि यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के हाथों में सत्ता का ऐसा मज़बूत संदूक थमा दिया जिसकी उम्मीद शायद खुद कॉन्ग्रेस को भी नहीं थी। 140 सीटों वाली विधानसभा में 102 सीटें जीतना किसी चमत्कार से कम नहीं है, खासकर तब जब सामने पिनाराई विजयन जैसा कद्दावर वामपंथी चेहरा हो।

लेकिन राजनीति की विडंबना देखिए। जहाँ इस प्रचंड जीत के बाद केरल की सड़कों पर जश्न का सैलाब होना चाहिए था, वहाँ तिरुवनंतपुरम से लेकर दिल्ली तक कॉन्ग्रेस के गलियारों में सन्नाटा और ‘सस्पेंस’ पसरा हुआ है। चुनाव नतीजे आए छह दिन बीत चुके हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस अब तक यह तय नहीं कर पाई है कि इस ऐतिहासिक जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी एक है और दावेदार तीन और इसी त्रिकोणीय मुकाबले ने हाईकमान की रातों की नींद उड़ा दी है।

पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस को सिर्फ एक ही राज्य में सत्ता मिली, लेकिन वहाँ भी मुख्यमंत्री का चेहरा तय नहीं हो पाया। भारी बहुमत के बावजूद पार्टी के अंदर गुटीय कलह, खींचतान और लॉबिंग ने सारा माहौल बिगाड़ दिया है। चुनाव के छह दिन बाद भी (11 मई 2026 तक) सस्पेंस बरकरार है। यह स्थिति न सिर्फ केरल की जनता को परेशान कर रही है, बल्कि पूरे देश में कॉन्ग्रेस की छवि पर सवाल उठा रही है।

ऐतिहासिक जीत मिली लेकर असमंजस भी अभूतपूर्व

बता दें कि 10 साल के लंबे वनवास के बाद कॉन्ग्रेस गठबंधन (UDF) ने केरल में वापसी की है। 102 सीटों का आँकड़ा यह बताता है कि जनता ने वामपंथी सरकार के खिलाफ बदलाव की लहर पैदा की थी। लेकिन जीत के तुरंत बाद जो स्थिति बनी, उसने ‘ओवरकॉन्फिडेंस’ और ‘आंतरिक कलह’ की पुरानी बीमारी को फिर से उजागर कर दिया है।

इस बीच, जो विपक्षी दल इस फिराक में थे कि कॉन्ग्रेस कमजोर पड़ेगी और वे सीट बँटवारे में दबाव बनाएँगे, जनता के फैसले ने उनकी रणनीतियों पर पानी फेर दिया। अब वही लोग सोशल मीडिया पर तंज़ और बेचैनी के ज़रिए अपना दर्द बयाँ कर रहे हैं। लेकिन असली दर्द तो खुद कॉन्ग्रेस के भीतर है, जहाँ मुख्यमंत्री पद को लेकर म्यान से तलवारें निकल चुकी हैं।

मुख्यमंत्री पद की रेस में आँकड़ों का गणित और गुटीय समीकरण

केरल कॉन्ग्रेस में इस समय शक्ति प्रदर्शन का दौर चल रहा है। सूत्रों के अनुसार, विधायकों का समर्थन तीन गुटों में बँटा हुआ है। इसमें पहला गुट है केसी वेणुगोपाल का, जो अलाप्पुझा से लोकसभा सांसद होने के साथ ही कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। बताया जा रहा है कि इनके समर्थन में 43 विधायक हैं।

दूसरा गुट है वीडी सतीसन का, जो अभी तक नेता प्रतिपक्ष के पद पर थे। उनके समर्थन में 35 विधायक बताए जा रहे हैं। इसके अलावा केरल में कॉन्ग्रेस का तीसरा गुट भी है, जिसकी अगुवाई रमेश चेन्नीथला कर रहे हैं। वो 2021 तक नेता प्रतिपक्ष थे। वरिष्ठता क्रम के आधार पर वो अपना दावा ठोंक रहे हैं। उसके साथ 22 विधायक बताए जा रहे हैं।

केसी वेणुगोपाल हैं हाईकमान की पहली पसंद

केसी वेणुगोपाल फिलहाल अलाप्पुझा से सांसद हैं और राहुल गाँधी के सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों में गिने जाते हैं। राहुल गाँधी चाहते हैं कि वेणुगोपाल केरल की कमान संभालें ताकि राज्य में संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल रहे। संगठन पर उनकी पकड़ और दिल्ली में उनके रसूख ने उन्हें रेस में सबसे आगे कर दिया है। लेकिन पेच यह है कि वे विधायक नहीं हैं, और राज्य के स्थानीय नेताओं का एक धड़ा उन्हें ‘दिल्ली का थोपा हुआ नेता’ मान रहा है।

जमीनी संघर्ष का चेहरा हैं वीडी सतीसन

वीडी सतीसन ने विपक्ष के नेता के तौर पर पिछले पाँच सालों में सदन के भीतर और बाहर सरकार को घेरा है। कार्यकर्ताओं के बीच उनकी लोकप्रियता काफी अधिक है। सतीसन का तर्क सीधा है कि जब हमने ज़मीन पर लड़ाई लड़ी, तो फल भी हमें ही मिलना चाहिए। उन्होंने वेणुगोपाल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और उन पर ‘विधायकों को डराने’ और ‘गुटबाजी को बढ़ावा देने’ के गंभीर आरोप लगाए हैं

राजनीति के मँझे खिलाड़ी हैं रमेश चेन्नीथला

वैसे ये भी कह सकते हैं कि रमेश चेन्नीथला कॉन्ग्रेस के पुराने चावल हैं। 2021 की हार के बाद उन्हें किनारे कर दिया गया था, लेकिन इस बार उनके पास भी 22 विधायकों का समर्थन है। वे एक ‘डार्क हॉर्स’ की तरह इंतजार कर रहे हैं कि अगर वेणुगोपाल और सतीसन की लड़ाई में डेडलॉक (गतिरोध) होता है, तो समझौता उम्मीदवार के रूप में उनका नाम सामने आ जाए।

दिल्ली में बैठकों का दौर और राहुल गाँधी की चुनौती

मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर बैठकों का सिलसिला थमा नहीं है। राहुल गाँधी व्यक्तिगत रूप से इस मामले को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। 11 मई तक की जानकारी के मुताबिक, राहुल गाँधी ने वीडी सतीसन से सीधी बात की है। सूत्रों का कहना है कि जब सतीसन से उनके खिलाफ लगे पोस्टरों और वेणुगोपाल के विरोध पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने दो टूक शब्दों में कह दिया कि वे वेणुगोपाल के नाम पर सहमत नहीं हैं।

सतीसन का आरोप है कि वेणुगोपाल ने महासचिव पद का दुरुपयोग करते हुए विधायकों पर एक खास गुट में शामिल होने का दबाव बनाया। यह विवाद इतना बढ़ गया है कि पार्टी अब अगले दो दिनों तक कार्यकर्ताओं और असंतुष्ट विधायकों को ‘मनाने’ की रणनीति पर काम कर रही है।

दरअसल, कॉन्ग्रेस की समस्या यह है कि वह जीत को संभाल नहीं पाती। जहाँ भाजपा जैसी पार्टियाँ चुनाव नतीजे आने के 24 घंटे के भीतर मुख्यमंत्री तय कर देती हैं, वहीं कॉन्ग्रेस में लोकतंत्र के नाम पर होने वाली गुटबाजी अक्सर सरकार की शुरुआत को ही कमजोर कर देती है।

बीजेपी का तंज और ‘मजेदार’ पॉलिटिक्स

कॉन्ग्रेस की इस सिरफुटौवल पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) मज़े लेने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली में तंज कसते हुए कहा, “अरे भाई, केरलम में पूर्ण बहुमत है, वहाँ तो सरकार बना लो। ये लोग नेता तय नहीं कर पा रहे। शायद ये लोग ढाई-ढाई साल के लिए सरकार चलाएँगे या एक-एक साल के लिए पाँच मुख्यमंत्री बनाएँगे।”

प्रधानमंत्री का यह बयान कॉन्ग्रेस की उस कमजोरी पर चोट करता है जहाँ राजस्थान, छत्तीसगढ़ और अब कर्नाटक जैसे राज्यों में ‘सत्ता के बँटवारे’ के फॉर्मूले ने पार्टी को नुकसान पहुँचाया है।

वहीं केरल बीजेपी अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक पोस्ट के जरिए चुटकी ली। उन्होंने एक व्यंग्य का जवाब देते हुए संकेत दिया कि दिल्ली की बीजेपी चाहती है कि वेणुगोपाल दिल्ली में रहें (क्योंकि वहाँ वे कोई खतरा नहीं हैं), जबकि केरल बीजेपी चाहती है कि वे केरल आ जाएँ (ताकि कॉन्ग्रेस की गुटबाजी और बढ़े)। चंद्रशेखर का ‘जिपर-माउथ’ इमोजी वाला जवाब यह बताने के लिए काफी है कि विपक्षी खेमा कॉन्ग्रेस की इस आंतरिक कलह का आनंद ले रहा है। हालाँकि बाद में उन्होंने ये ट्वीट डिलीट कर दिया।

राजीव चंद्रशेखर के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

पोस्टर वॉर और सोशल मीडिया पर जंग

केरल की सड़कों पर इस समय फ्लेक्स और पोस्टरों की बाढ़ आई हुई है। सतीसन के समर्थकों ने ऐसे पोस्टर लगाए हैं जिनमें वेणुगोपाल का मजाक उड़ाया गया है। जवाब में वेणुगोपाल के समर्थकों ने उनकी ‘दिल्ली वाली ताकत’ का प्रदर्शन किया है। सोशल मीडिया पर दोनों नेताओं की ‘आईटी सेनाएँ’ आपस में भिड़ी हुई हैं। यह स्थिति उस जनता के लिए निराशाजनक है जिसने ‘स्थिर सरकार’ की उम्मीद में कॉन्ग्रेस को वोट दिया था।

कॉन्ग्रेस के सामने अब तीन ही रास्ते बचे हैं-

  • वेणुगोपाल को कमान: राहुल गाँधी अपनी जिद पर अड़े रहें और वेणुगोपाल को सीएम बना दें, लेकिन इससे सतीसन का गुट बगावत कर सकता है।
  • सतीसन की ताजपोशी: स्थानीय भावनाओं का सम्मान करते हुए सतीसन को मुख्यमंत्री बनाया जाए, लेकिन इससे वेणुगोपाल और हाईकमान के दबदबे को ठेस पहुँचेगी।
  • रोटेशन फॉर्मूला: ढाई साल सतीसन और ढाई साल वेणुगोपाल। लेकिन इतिहास गवाह है कि यह फॉर्मूला कॉन्ग्रेस के लिए हमेशा आत्मघाती साबित हुआ है।

कॉन्ग्रेस ने खुद बनाई है ये स्थिति, उसी पर पड़ेगी भारी

केरल में कॉन्ग्रेस की यह स्थिति ‘गरीबी में आटा गीला’ जैसी नहीं, बल्कि ‘अमीरी में रास्ता भूलने’ जैसी है। 102 सीटों का प्रचंड बहुमत होने के बावजूद नेता तय न कर पाना पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी को दर्शाता है। 11 मई 2026 की तारीख तक केरल की जनता अभी भी अपने मुख्यमंत्री का चेहरा देखने का इंतज़ार कर रही है।

यदि कॉन्ग्रेस ने अगले 48 घंटों में कोई ठोस फैसला नहीं लिया, तो यह ऐतिहासिक जीत उसके लिए गले की फाँस बन सकती है। जनता जब जवाब देती है, तो वह बड़े-बड़े राजनीतिक गणित बिगाड़ देती है। केरल की जनता ने अपना काम कर दिया है, अब बारी कॉन्ग्रेस हाईकमान की है कि वह ‘कन्फ्यूजन’ को खत्म करे या फिर ‘कलह’ को अपनी नियति मान ले।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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