Thursday, September 24, 2020
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3 बड़े राज्यों में BJP को मात देने वाली कॉन्ग्रेस की हालत पतली: कारण ‘पुत्र-प्रेम’ और ‘प्रदेश निकाला’

हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्यों में कॉन्ग्रेस की सरकार तो बनी लेकिन सत्ता से बाहर हुई भाजपा ने शायद हार के बाद की भी तैयारियाँ पहले से ही कर रखी थी।

हिंदी पट्टी के तीन बड़े राज्य- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में 2018 के अंतिम महीनों में चुनाव हुए। तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकारें थी। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 वर्षों से भाजपा सत्ता में काबिज़ थी, राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में पिछले 5 वर्षों से भाजपा की सरकार चल रही थी। जहाँ राजस्थान में पिछले कुछ चुनावों से भाजपा और कॉन्ग्रेस बारी-बारी से शासन करती आई हैं, मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री के रूप में अपने चौथे कार्यकाल से कुछ ही दूर रह गए। हाँ, छत्तीसगढ़ में ज़रूर कॉन्ग्रेस को एकतरफा जीत मिली लेकिन मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह की छवि पॉजिटिव है या नेगेटिव, इसे लेकर दोनों ही प्रमुख दलों में संशय है। भाजपा के सबसे लम्बे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें जनता के बीच ‘चावल वाले बाबा’ के नाम से जाना गया। तीनों राज्यों में कॉन्ग्रेस की सरकार तो बनी लेकिन सत्ता से बाहर हुई भाजपा ने शायद हार के बाद की भी तैयारियाँ पहले से ही कर रखी थी।

सिंधिया बाहर, कर्ज माफी पर आक्रोश और शिवराज की छवि

सबसे पहले बात करते हैं मध्य प्रदेश की क्योंकि तीनो राज्यों में सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें इसी राज्य में आती हैं। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के बारे में हाल ही में साध्वी प्रज्ञा ने तंज कसा कि वह सिर्फ़ छिंदवाड़ा के मुख्यमंत्री हो कर रह गए हैं। एक तरह से उनकी बात बहुत हद तक सही है क्योंकि छिंदवाड़ा से कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ चुनाव लड़ रहे हैं और आपको बता दें कि कमलनाथ ने चुनाव प्रचार ख़त्म होने के अंतिम 2 दिन छिंदवाड़ा में गुज़ारे ताकि अपने बेटे की जीत सुनिश्चित कर सकें। नकुल नाथ अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं और पिता कमलनाथ का सारा ध्यान अपने बेटे की जीत सुनिश्चित करने पर है। छिंदवाड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले 40 वर्षों से यहाँ कमलनाथ सांसद हैं। बीच में एक वर्ष के लिए भाजपा ने यहाँ जीत दर्ज की थी और एक वर्ष उनकी पत्नी अलका नाथ सांसद रही थीं।

मध्य प्रदेश में कमलनाथ के काफ़ी हद तक छिंदवाड़ा और अपने पुत्र में सीमित हो जाने के कारण कॉन्ग्रेस को घाटा होना तय है। प्रदेश के उप मुख्यमंत्री और विधानसभा चुनावों के दौरान काफ़ी मेहनत करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश की ज़िम्मेदारी दे दी गई है। इस क्रम में उनके पास न तो मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी के लिए समय है और न ही सरकार के लिए। उत्तर प्रदेश का रण पूरे भारत में सबसे कठिन है और कुछ हलकों में चर्चा यह भी है कि सिंधिया को वहाँ बलि का बकरा बनाने के लिए भेजा गया है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच फँसे सिंधिया की स्थिति का अंदाज़ा इसी बात से लगा लीजिए कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता भी उनसे नाराज़ हैं। सिंधिया को कार्यकर्ताओं ने निष्क्रिय बताया

सर्वविदित है, कमलनाथ और सिंधिया, दोनों ही एमपी में सीएम पद के दावेदार थे और राहुल गाँधी ने मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा से पहले दोनों के साथ फोटो डालकर यह जताने की कोशिश की थी कि पार्टी में सब ठीक है। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि राज्य में सत्ता के 2 केंद्र न हो जाएँ, इसे देखते हुए सिंधिया को बाहर रखा जा रहा है। बीच में यह भी ख़बर आई थी कि कमलनाथ चाहते हैं कि दिग्विजय अगर चुनावी राजनीति में वापसी करते हैं तो वह राज्य की सबसे कठिन सीट चुनें और फलस्वरूप उन्हें भोपाल से लड़ाया गया जहाँ पिछले 8 चुनावों या यूँ कहें 30 सालों से भाजपा का कब्ज़ा है। साध्वी प्रज्ञा के आने से यहाँ मुक़ाबला और रोचक हो गया।

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मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस को विधानसभा चुनावों जैसी सफलता न मिलने के पीछे एक और कारण यह भी हो सकता है कि जिस कर्ज़ माफ़ी के मुद्दे पर पूरा विधानसभा चुनाव केंद्रित था, उस पर कोई ख़ास प्रोग्रेस नहीं हुई है। किसानों में आक्रोश है और आचार संहिता से पहले ही इसका बहाना बना कर अधिकतर किसानों को चुनाव बाद कर्ज़ माफ़ करने की बात कही गई। ऊपर से इसमें बड़े स्तर पर अनियमितता की ख़बरें आईं। कई किसानों का एक रुपया और दस रुपया का कर्ज़ माफ़ हुआ। भाजपा को इस आक्रोश का फायदा मिल सकता है। शिवराज सिंह चौहान की छवि चुनाव हारने के बाद और बढ़ी है क्योंकि उन्होंने क़रीबी मामला होने के बावजूद जोड़-तोड़ की कोशिश नहीं की और कॉन्ग्रेस सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में सहर्ष गए।

राजस्थान के रण में मोदी फैक्टर महत्वपूर्ण

राजस्थान में विधानसभा चुनाव पूरी तरह वसुंधरा राजे पर केंद्रित था। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि भाजपा ने जनता के रुख को भाँपते हुए चुनाव से ऐन पूर्व इसे वसुंधरा केंद्रित बना दिया ताकि केंद्र सरकार के विरुद्ध किसी भी तरह की नेगेटिव बातें न हो। राजस्थान में चले ‘वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं’ को इसी क्रम में देखा गया। इसीलिए राष्ट्रीय मीडिया में भी यहाँ के चुनाव परिणाम को राज्य सरकार के प्रति नाराज़गी और ‘Anti-Incumbency’ फैक्टर की वजह से कॉन्ग्रेस के पक्ष में जाना माना गया। राजस्थान में केंद्र सरकार के प्रति नाराज़गी का कोई मुद्दा ही नहीं रहा और इस बारे में बात ही नहीं हुई। इससे भाजपा को मोदी के नाम पर फिर से चुनाव में जाने का मौक़ा मिल गया।

अभी हाल ही में कॉन्ग्रेस नेता व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने एक सभा में कहा कि राज्य में भाजपा सरकार के पाँच वर्षों में मोदी और वसुंधरा के बीच 36 का आँकड़ा चलता रहा। इस नैरेटिव के भाजपा के पक्ष में जाने की उम्मीद इसीलिए है क्योंकि अगर प्रदेश में वसुंधरा के प्रति लोगों में नाराज़गी होगी भी तो यह मोदी के प्रति सहानुभूति में बदल जाएगी। कॉन्ग्रेस ने अनजाने में ही सही, मोदी-वसुंधरा को अलग-अलग रखकर लोगों को यह अहसास दिला दिया है कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अंतर है। पाकिस्तान से लगे राजस्थान में एयर स्ट्राइक के बाद यह माहौल बना है कि मोदी सरकार दुश्मनों को कड़ी भाषा में जवाब देने में सक्षम है और देश को लेकर सजग है।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत नकुल नाथ की तरह ही अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं और जोधपुर में उनका मुक़ाबला मौजूदा भाजपा सांसद गजेंद्र सिंह से है। कमलनाथ की तरह ही अशोक गहलोत का भी ध्यान अपने बेटे की जीत सुनिश्चित करने पर है और सामने पिछले चुनाव में 66% से भी अधिक वोट पाने वाले गजेंद्र सिंह शेखावत के होने के कारण पिता-पुत्र इस सीट को गम्भीरतापूर्वक ले रहे हैं। यहाँ से 5 बार सांसद रहे अशोक गहलोत की भी स्थिति ऐसी ही है जैसी छिंदवाड़ा में कमलनाथ की। बस अंतर इतना है कि जोधपुर में विपक्षी प्रत्याशी बहुत ज़्यादा मज़बूत है। जोधपुर से 300 किलोमीटर की दूरी पर पाकिस्तानी सीमा है और बालाकोट यहाँ भी मुद्दा है।

छत्तीसगढ़ में ‘महाराजा’ को बाहर भेजा

छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार काफ़ी शॉकिंग थी क्योंकि अधिकतर एग्जिट पोल्स भी यहाँ भाजपा के पक्ष में खंडित जनादेश की भविष्यवाणी कर रहे थे। लेकिन, यहाँ मध्य प्रदेश और राजस्थान से अलग परिणाम आए। मुक़ाबला एकतरफा रहा और कॉन्ग्रेस को आसान जीत मिली। परिणाम यह हुआ कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे जो कि अभी सांसद हैं, सहित राज्य के सभी 10 सांसदों का टिकट काट दिया गया। हार का खामियाज़ा उन सभी को भुगतना पड़ा और सीधा पार्टी हाईकमान द्वारा लिए गए निर्णय में पिछले चुनाव में जीती गई 10 की 10 सीटों पर नए प्रत्याशी उतारे गए। हाल में बढ़ी नक्सली घटनाओं को भी भाजपा ने मुद्दा बनाया है।

छत्तीसगढ़ को लेकर अभी अनुमान लगाना काफ़ी मुश्किल है लेकिन प्रदेश में कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े नेता और सरजुगा के महाराजा त्रिभुनेश्वर शरण सिंह देव को ओडिशा का प्रभारी बना कर भेज दिया गया है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव को छत्तीसगढ़ से बाहर भेजना कॉन्ग्रेस की उसी नई रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जहाँ प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े नेता को मुख्यमंत्री के साथ टकराव रोकने के लिए किसी अन्य राज्य का प्रभार दे दिया जाता है। भाजपा ने अभी तक रमन सिंह का नाम उस आक्रामकता के साथ प्रयोग नहीं किया है, जैसा वह पिछले चुनावों में करती आई है। यहाँ भी पार्टी मोदी के नाम पर ही पूरी तरह मैदान में है और वो भी सारे नए चेहरों के साथ।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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