Thursday, June 4, 2020
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सहयोगी दलों को साथ रखने की कला जानते हैं मोदी-शाह, कॉन्ग्रेस की एकता बस मंचों तक ही सीमित

जिन्हें 'तानाशाह' कहते थे, वो सबको मिला कर चल रहा है। लेकिन, जो मंच पर हाथ मिला कर और हाथ उठा कर साथ होने का दावा करते हुए कोलकाता से बंगलोर तक फिर रहे थे, वे एक-दूसरे की पीठ में छुरा घोंप कर अलग-अलग डील फाइनल कर रहे हैं।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गठबंधन धर्म में विश्वास रखते हैं। किसी के व्यवहार इसी बात से लगाया जाता है कि वे अपने से छोटों के साथ कैसा बर्ताव करते हैं। कोई आपसे उम्र में छोटा हो सकता है, कोई पद में, कोई प्रसिद्धि में और राजनीतिक दलों के मामले में संख्याबल यह तय करता है कि कौन छोटा और कौन बड़ा। स्पष्ट है कि विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते भाजपा सबसे बड़ी है, राजग में भी बड़े भाई की भूमिका में है। जहाँ कॉन्ग्रेस हर एक राज्य में गठबंधन बनाने के लिए तरस रही है, भाजपा ने सभी राज्यों में लगभग अपना गठबंधन फाइनल कर लिया है।

नरेंद्र मोदी को हिटलर और तानाशाह कहने वाले विपक्षी दल एक-दूसरे से ख़ुश नहीं हैं और पल-पल पाला बदल रहे हैं जबकि मोदी सभी गठबंधन साथियों को मिला कर आगामी लोकसभा चुनाव की रणभेड़ी बजा चुके हैं। चाहे वो दूर दक्षिण में तमिलनाडु हो या उत्तर-पूर्व में असम, चाहे वो दिल्ली से सटा उत्तर प्रदेश हो या सिख बहुल पंजाब- भाजपा ने हर जगह बिना किसी लाग-लपेट के नया गठबंधन बनाया है और पुराने साथियों को छिटकने से रोका है।

केजरीवाल दिल्ली में कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन करने का सपना देख रहे। कॉन्ग्रेस उन्हें ठुकरा रही। राहुल गाँधी को यूपी के महागठबंधन में एक भी सीट नहीं मिली। बिहार में पेंच फँसा हुआ है। ये कैसे मिला कर चलने वाले नेता हैं जो मंच पर तो एक साथ दिखते हैं लेकिन परदे के पीछे एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं। भाजपा को अलोकतांत्रिक और तानाशाही पार्टी बताने वालों को उनसे सीखना चाहिए कि गठबंधन साथियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। यहाँ हम भाजपा द्वारा किए गए कुछ महत्वपूर्ण गठबंधनों के बारे में बात कर बताएँगे कि कैसे राजग इस फ्रंट पर सबसे ऊपर नज़र आ रहा है। मोदी-शाह की जोड़ी ने जो किया है, उस से आगामी चुनाव में स्वतः ही उनका पलड़ा भारी हो गया है।

अन्नाद्रमुक को मना कर तमिलनाडु में विजयकांत को जोड़ा

2011 से 2016 तक तमिलनाडु में विपक्ष के नेता रहे अभिनेता विजयकांत की बात द्रमुक और अन्नाद्रमुक, दोनों पार्टियों से चल रही थी। उनकी पार्टी डीएमडीके 2014 में राजग का हिस्सा थी लेकिन 2016 तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में उसने वामपंथी संगठनों के साथ गठबंधन किया और अधिकतर सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। 2011 में तमिलनाडु विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी रही डीएमडीके को 2016 में एक भी विधानसभा सीट नहीं मिली। ऐसी स्थिति में राज्य की सत्ताधारी पार्टी अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन कर भाजपा को निश्चिंत हो जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भाजपा ने अन्नाद्रमुक से साफ़-साफ़ कह दिया कि डीएमडीके कितनी भी छोटी पार्टी हो, उसे गठबंधन में लेना चाहिए। अन्नाद्रमुक के नेताओं के कई बार खुलेआम कहा कि वे विजयकांत के साथ इतने मोलभाव नहीं कर सकते लेकिन भाजपा के दबाव के कारण मज़बूरी में उन्हें ऐसा करना पड़ रहा है।

अंततः विजयकांत की पार्टी को 4 सीटें देकर मना लिया गया और तमिलनाडु में भाजपा को एक और गठबंधन सहयोगी मिल गया। यह दिखाता है कि भाजपा ने 37 सांसदों वाली लोकसभा में देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी अन्नाद्रमुक के साथ रहते तमिलनाडु में एक छोटे दल को आदर दिया, वो भी उसकी पुरानी गलती को भूल कर। डीएमडीके वामपंथियों के साथ चली गई थी और भाजपा के पास उस से नाराज़ होने के कई वजह थे लेकिन भाजपा ने सब भूल कर डीएमडीके को अपनाया। यह प्रधानमंत्री की सबको साथ लेकर चलने की नीति को स्पष्ट करता है।

गालियाँ खा कर भी महाराष्ट्र में शिवसेना और यूपी में राजभर को साथ बनाए रखा

महाराष्ट्र में भाजपा के लिए संकट खड़ा हो गया था। शिवसेना सालों से पार्टी पर हमलावर थी। यहाँ तक कि शिवसेना, उसके नेताओं और पार्टी के मुखपत्र सामना ने प्रधानमंत्री मोदी को कई बार निशाना बनाया। जिस तरह से शिवसेना के टुच्चे नेता भी मोदी को लेकर अनाप-शनाप बक रहे थे, भाजपा की उसके साथ गठबंधन न होने की उम्मीद थी। शिवसेना ने सरकार की हर योजना की आलोचना की, गठबंधन तोड़ने की धमकी दी और कई बार तो संसद तक में सरकार का साथ नहीं दिया। लेकिन, देवेंद्र फडणवीस और नितिन गडकरी ने काफ़ी शांति से मैच्युरिटी का परिचय देते हुए न सिर्फ़ गठबंधन बचाया बल्कि शिवसेना को मना कर सीटों की संख्या भी फाइनल कर ली। हाँ, गडकरी ने शिवसेना नेताओं को पीएम के ख़िलाफ़ अपशब्द न बोलने की चेतावनी ज़रूर दी।

अगर कॉन्ग्रेस की सहयोगी पार्टी एनसीपी उसे इस तरह गालियाँ देनी शुरू कर दे और हर एक मंच से पवार सोनिया गाँधी की आलोचना करने लगे तो शायद ही महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस-राकांपा का गठबंधन हो। भाजपा और कॉन्ग्रेस में यही अंतर है।

इसी तरह सुहेलदेव समाज के नेता सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओपी राजभर ने योगी कैबिनेट का हिस्सा होकर भी सीएम योगी और पीएम मोदी की ख़ूब आलोचना की। राजभर ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा भी था कि वह अपने नेता स्वयं हैं। योगी को भी अक्सर तानाशाह बताने की कोशिश की जाती है लेकिन न सिर्फ यूपी में राजभर के सुर बदल गए बल्कि उन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का फिर से संकल्प लिया। इस पार्टी के उम्मीदवारों का जमानत जब्त कराने का पुराना इतिहास रहा है और न तो यूपी में योगी को उनकी ज़रूरत है और न केंद्र में मोदी को (एसबीएसपी के 4 विधायक व शून्य सांसद हैं), लेकिन फिर भी राजग ने उन्हें छिटकने नहीं दिया। यह दर्शाता है कि भाजपा छोटे दलों के साथ भी अच्छी तरह पेश आती है।

असम में एजीपी को 2 महीने में ही वापस मना लिया

असम में भाजपा और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट मिल कर बहुमत की स्थिति में हैं। 128 सदस्यों वाली विधानसभा में अकेले भाजपा के 61 विधायक हैं। एक निर्दलीय भी है। अगर सरकार की स्थिति को देखें तो मुख्यमंत्री सर्बानंद सोणोवाल को अपनी सरकार बचाने या चलाने के लिए असम गण परिषद (एजीपी) की कोई ज़रूरत नहीं है। नागरिकता संशोधन विधेयक भाजपा के ड्रीम प्रोजेक्ट्स में से एक है और इसके विरोधियों को भाजपा करारा जवाब देती आई है। एजीपी ने भी इसी विधेयक को लेकर असम सरकार से समर्थन वापस ले लिया और अपने मंत्रियों को भी इस्तीफा दिला दिया। पार्टी के पास एक भी लोकसभा सांसद नहीं है। 2 महीने पहले राजग से छिटके एजीपी को आज बुधवार को भाजपा ने फिर अपने खेमे में मिला लिया।

एजीपी अध्यक्ष अतुल बोरा ने इस अवसर पर साफ़-साफ़ कहा कि वे भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के निवेदन के कारण पार्टी में वापस आए हैं। अगर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सुदूर असम में एक सांसदों वाली पार्टी से भी स्वयं निवेदन करती है, यह एक बड़ी पार्टी की सौहार्दता और विनम्रता को दिखाता है। यह दिखाता है कि कैसे भाजपा सहयोगी पार्टियों की गलतियों को भी भूल जाती है और गठबंधन के लिए किसी भी प्रकार की रंजिश को आड़े नहीं आने देती।

बिहार में जदयू-लोजपा और पंजाब में अकाली दल

रामविलास पासवान मौसम वैज्ञानिक माने जाते हैं। उनकी पार्टी को मनाने के लिए भाजपा को ख़ास मेहनत करनी पड़ी। पासवान की पार्टी लोजपा से गठबंधन बचाने के लिए स्वयं अमित शाह ने कई राउंड की बैठकें की और अंततः सीटों की साझेदारी फाइनल की गई। ख़ुद नितीश कुमार लोजपा को अपने हिस्से की सीटें देने को तैयार नहीं थे लेकिन भाजपा ने जदयू को भी समझा-बुझा कर रखा और लोजपा अध्यक्ष ने मोदी को पीएम बनाने का संकल्प लिया। जिस तरह से जदयू को भाजपा से सहर्ष स्वीकार किया, वो भी एक राजनीतिक पार्टी की परिपक्वता को दिखाता है। भाजपा के धुर विरोधी लालू परिवार को राजनीती में पुनर्स्थापित करने वाले नितीश कुमार की राजग में धमाकेदार वापसी हुई और भाजपा ने सभी रंजिश भुला कर गठबंधन बनाया।

नरेंद्र मोदी और नितीश कुमार

इसी तरह पंजाब में शिरोमणि अकाली दल को ले लीजिए। अकाली दल भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगियों में से एक है और विपक्ष द्वारा हिन्दुओं की पार्टी कही जाने वाली भाजपा के सिखों की इस पार्टी के साथ जैसे सम्बन्ध हैं, वैसे कॉन्ग्रेस के शायद ही उसकी किसी सहयोगी पार्टी से हो। कर्नाटक में रोंदू कुमारस्वामी के साथ कैसा गठबंधन चल रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। बजट सेशन के पहले दिन अकाली दल ने राजग की बैठक में हिस्सा नहीं लिया। भाजपा ने समय रहते गठबंधन सुनिश्चित किया और पहले की तरह ही पंजाब में दोनों साथ चुनाव लड़ेंगे। इसी तरह कुल मिला कर देखें तो राजग में इस बार 2014 के मुक़ाबले ज्यादा पार्टियाँ हैं।

कुल मिलाकर देखें तो जिसे ‘तानाशाह’ कहा जाता है, वो सबको मिला कर चल रहा है, सहयोगियों की आलोचनाओं को भी बर्दाश्त कर रहा है और नए सहयोगी भी जोड़ रहा है। लेकिन, जो मंच पर हाथ मिला कर और हाथ उठा कर साथ होने का दावा करते हुए कोलकाता से बंगलोर तक फिर रहे थे, वे एक-दूसरे की पीठ में छुरा घोप कर अलग-अलग डील फाइनल कर रहे हैं। विडम्बना भी इसे दख घूँघट से अपना सर ढक ले।

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