1 दिसंबर 2025 को लोकसभा और राज्यसभा का शीतकालीन सत्र शुरू हुआ। उम्मीद थी कि सत्र की शुरुआत जनहित, विकास और आवश्यक कानूनों पर गंभीर चर्चा से होगी, लेकिन शुरुआत होते ही सदन शोर-शराबे में डूब गया।
इस हंगामे का केंद्र था SIR यानी Special Intensive Revision, जो वोटर-लिस्ट के पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। विपक्ष का आरोप है कि SIR में गड़बड़ी हुई है और यह लोकतांत्रिक अधिकारों से छेड़छाड़ का मामला है, इसलिए इसे संसद में उठाया जाना चाहिए। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि SIR एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसे चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत किया जाता है, इसलिए यह संसद में चर्चा का विषय नहीं हो सकता।
असल सवाल यह है कि अगर SIR इतना ही गंभीर मुद्दा था, तो विपक्ष ने इसे पहले क्यों नहीं उठाया? क्यों हमेशा की तरह वही सियासी नाटक, वही टकराव ठीक उस दिन शुरू होता है जब संसद सत्र खुलता है? यह लोकतांत्रिक चिंता कम और राजनीतिक रणनीति ज्यादा लगती है। विपक्ष अक्सर सत्र से पहले जिस तैयारी का दावा करता है। वह हर बार सदन में हंगामे के रूप में सामने आती है।
विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं है। SIR, दिल्ली ब्लास्ट, प्रदूषण, महँगाई और बेरोजगारी जैसे विषय सूची में शामिल हैं। लेकिन, क्या ये मुद्दे वास्तव में जनता के लाभ के लिए उठाए जा रहे हैं, या सिर्फ राजनीतिक विरोध जताने के हथियार बन चुके हैं? विपक्ष का रवैया बताता है कि वह ‘जनहित’ से ज्यादा ‘राजनीतिक संदेश’ देने में दिलचस्पी रखता है। उद्देश्य यह नहीं कि सरकार से जवाब लिया जाए, बल्कि यह दिखाना कि सरकार जनता के खिलाफ काम कर रही है, चाहे तथ्य कुछ भी हों।
सत्ता पक्ष भी पीछे नहीं रहता। वह विपक्ष के हर आरोप को ‘हंगामा करने की आदत’ और ‘पुरानी पराजयों की बौखलाहट’ बता कर उसे खारिज कर देता है। लोकतंत्र केवल सत्ता पक्ष की सफाई या विपक्ष के आक्रोश का मंच नहीं है। यह देश के लिए वास्तविक समाधान खोजने की जगह है। जब सदन बार-बार ठप होता है, तो आम जनता का नुकसान होता है, किसी पार्टी का नहीं।
इस सत्र में सरकार कई अहम बिल लाने वाली है। एटॉमिक एनर्जी में सुधार, कॉर्पोरेट कानूनों में बदलाव, उच्च शिक्षा में सुधार और अन्य विकास संबंधी प्रस्ताव। ये ऐसे मुद्दे हैं, जो सीधे तौर पर देश की प्रगति से जुड़े हुए हैं। लेकिन अगर सदन SIR पर हंगामे में ही फंस गया, तो इन कानूनों पर चर्चा का क्या होगा? संसद का समय सीमित होता है, लेकिन सियासत की भूख असीमित।
विपक्ष की भूमिका केवल आलोचना करना नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष की असली ताकत उसकी रचनात्मकता, तर्क, और जनता की वास्तविक आवाज़ उठाने की क्षमता में होती है। लेकिन जब हर मुद्दे पर हंगामा किया जाए, हर चर्चा को शोर में बदल दिया जाए, और हर सत्र को लड़ाई का मैदान बना दिया जाए, तो यह लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। विपक्ष का काम सरकार को जवाबदेह बनाना है, न कि सदन को बंधक बनाना।
SIR पर विपक्ष के सवाल गलत नहीं हैं। वोटर-लिस्ट की शुचिता महत्वपूर्ण है। लेकिन तरीका भी महत्वपूर्ण होता है। क्या संसद में हंगामा ही एकमात्र तरीका है? क्या अदालतें, चुनाव आयोग, संसदीय समितियां या आधिकारिक शिकायतें पर्याप्त नहीं? जवाब है हैं, लेकिन राजनीति में शोर, कैमरे और सुर्खियाँ अक्सर समाधान से ज्यादा आकर्षक लगते हैं।
सत्ता पक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष की आशंकाओं को पूरी तरह नजरअंदाज न करे। लोकतंत्र में संवाद ही रास्ता है। लेकिन संवाद तभी संभव है, जब दोनों पक्ष तैयार हों और दुर्भाग्य से यह तैयारी अक्सर दिखाई नहीं देती।
इस शीतकालीन सत्र की शुरुआत ने फिर साबित कर दिया कि हमारी संसद अब विचारों का मंच कम और सियासत का रंगमंच ज्यादा बन गई है। यहाँ नाटक है, स्क्रिप्ट है, अभिनेता हैं बस गायब है जनता का हित। अगर सरकार और विपक्ष दोनों यह नहीं समझेंगे कि संसद राष्ट्रहित के लिए है, पार्टीहित के लिए नहीं, तो हर सत्र इसी तरह हंगामे में बीतेगा और विकास पीछे छूटता जाएगा।
भारत की जनता अब यह नाटक रोज-रोज देखने की आदी हो चुकी है। लेकिन आदी होना समाधान नहीं है। असली सवाल है क्या हमारा लोकतंत्र केवल सियासी प्रदर्शन का मंच बनता जाएगा, या कभी वास्तविक जनहित की राजनीति भी इसमें जगह पाएगी?
यह सत्र उस सवाल का जवाब देगा अगर सदन चलने दिया गया तो।


