भारत की राजनीति में समाजवाद के पुरोधा माने जाने वाले डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कभी कहा था कि ‘पिछड़े पावें सौ में साठ’। लेकिन डॉक्टर लोहिया को ये नारा देते समय शायद बिल्कुल भी ये आभास नहीं था कि भविष्य उनके ही नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियाँ पिछड़ा का मतलब सिर्फ दो जातिवर्ग तक समेट देंगीं।
जी हाँ, कुछ ऐसा ही किया है समाजवादी पार्टी ने। आप सबको ये बात पता है कि समाजवादी पार्टी, देश की बाकी कथित सेक्युलर पार्टियों की तरह ही एक परिवार प्राइवेट लिमिटेड है। लेकिन क्या आपको पता है कि पार्टी में अगर टॉप के लोग छोड़ भी दिए जाएँ तो भी तस्वीर नहीं बदलतीं?
दरअसल हम बात कर रहे हैं समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश के संगठन की। समाजवादी पार्टी भले ही आज PDA यानी पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यक का राग अलापती हो लेकिन उसका मूल चरित्र यानी मुस्लिम यादव समीकरण नहीं बदला है।
दलितों को तो शायद उसने सिर्फ नाम के लिए ही जोड़ा है। समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश में संगठन यादव और मुस्लिमों से डोमिनेटेड है। और ये कोई हवा हवाई बात नहीं है, ना ही कोई पूर्वाग्रह… बल्कि डाटा यह बात कह रहा है।
ऑपइंडिया की जाँच में सामने आए तथ्य चौंकाने वाले हैं। हमारी जाँच में पता चला है कि समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश में 66% जिलाध्यक्ष यादव और मुस्लिम हैं। यानी दो तिहाई पदों पर सिर्फ इन्हीं समूहों का कब्जा है। और इसमें भी ज्यादा बड़ा कब्जा अखिलेश यादव ने अपने सजातीयों यानी यादवों को दिलाया है।
चाहे अमरोहा हो या बलिया, चाहे सोनभद्र हो या बरेली! आपको जिलाध्यक्ष के नाम पर सिर्फ़ एक ही जाति के लोग दिखाई पड़ेंगे। ऊपर से नीचे तक आपको एक ही जाति का नाम बार बार आते हुए दिखेगा। हमने आपको भागीदारी का गणित बताया।
अब आते हैं नंबर्स पर। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का संगठन 76 जिलों में बाँटा हुआ है। इन 76 जिलों में से अभी 75 पर जिलाध्यक्ष नियुक्त हैं और 1 जिलाध्यक्ष का पद खाली है। थोड़ा शॉकिंग और नॉट सो शॉकिंग बात ये है कि इन 75 में से 35 जिलों में जिलाध्यक्ष नियुक्त करने के लिए अखिलेश यादव ने अपने सजातीयों को तरजीह दी है।
और ऐसा करने के पीछे कास्ट पॉलिटिक्स के अलावा और कोई रीजन नहीं समझ आता। क्योंकि ऐसे जिलों में भी उन्होंने अपने सजातीयों को जिलाध्यक्ष बनाया है, जहाँ इस जाति की आबादी एकदम सीमित है। दरअसल, समस्या इस बात से नहीं है कि यादवों को रिप्रजेंटेशन मिल रहा है, बल्कि समस्या ये है कि समाजवादी पार्टी सामाजिक न्याय जैसे शब्द दिन में 40 बार मल्टीविटामिन कैप्सूल की तरह यूज करती है।
अखिलेश यादव PDA पर ज़ोर देते हैं, जिसमें पिछड़ा का मतलब उन्होंने अपनी जाति को मान लिया है और अल्पसंख्यक के नाम पर बस मुस्लिम हैं। दलित इस पूरी कहानी से ग़ायब है। वापस लिस्ट पर लौटते हैं। समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्षों में 35 यादवों के साथ ही 15 मुस्लिम जिलाध्यक्ष हैं।
मुस्लिम जिलाध्यकों को भी लेकिन उन्हीं जिलों तक सीमित कर दिया गया है जहाँ उनकी आबादी ठीकठाक है, अधिकांश मुस्लिम जिलाध्यक्ष पश्चिमी यूपी में हैं जहाँ कई जिलों में मुस्लिम आबादी 25% से ज्यादा है और कई मामलों में तो ये 50% के आसपास है।
लेकिन अखिलेश यादव ने अपनी जाति के विषय में ये बाध्यता नहीं लगा रखी। कन्नौज, फर्रुखाबाद, बदायूँ और आजमगढ़ या चंदौली जैसे जिलों में तो माना जा सकता है कि जाति को प्रतिनिधित्व दिया गया है लेकिन जिन जिलों में दलितों की आबादी ज्यादा है, उन्हें लिस्ट से ग़ायब कर दिया गया है।
समाजवादी पार्टी की पूरी लिस्ट अगर आप देखेंगे तो पता चलेगा कि यहाँ दलित ढूँढने से भी नहीं मिल रहे, जो दलित प्रदेश की आबादी में लगभग 20% का हिस्सा रखते हैं, उन्हें जिलों की जिम्मेदारी इक्का दुक्का ही दी गई है। ये हाल तब है जब समाजवादी पार्टी का पूरा जोर PDA पॉलिटिक्स पर है।
सीतापुर जैसे जिले जहाँ दलित आबादी प्रदेश में सबसे ज्यादा है, वहाँ भी समाजवादी पार्टी ने हाल ही में अपना जिलाध्यक्ष बदला है और शमीम कौसर सिद्दीकी को ये जिम्मेदारी दी है। यानी 15 लाख की आबादी में समाजवादी पार्टी को एक भी उपयुक्त दलित चेहरा नहीं मिला।
समस्या ये है कि समाजवादी पार्टी, बसपा का वोटबैंक तो हिलाना चाहती है, दलितों को अपनी साइड तो करना चाहती है लेकिन अपनी पुरानी आदतें नहीं छोड़ना चाहती। इन फैक्ट वो इस बात के लिए बिल्कुल राजी नहीं है कि संगठन में उनको जगह दी जाए, जिससे उनका कोई दख़ल निर्णय लेने
और दलितों की बात छोड़ दीजिए, ख़ुद को पिछड़ों का पुरोधा बताने वाले अखिलेश यादव ने अपने जिलाध्यक्षों में कहीं भी बाक़ी पिछड़ी जातियों को भी हिस्सा नहीं दिया है। लोधी, कहार, निषाद, कुर्मी जो जातियाँ यूपी में प्रोमिनेंट हैं, उनको भी कोई खास तवज्जो समाजवादी पार्टी ने नहीं दी है।
और ये तब हो रहा है जब ये जातियाँ लगातार अपनी भागीदारी के लिए प्रयास कर रहे हैं, यूपी में इन जातियों को लंबे समय से अपना हक नहीं मिला है। OBC में कुछ जातियों ने ही प्रॉमिनेंस लिया हुआ है और इनकी भी इच्छा है कि इन्हें राजनीतिक भागीदारी मिले।
समाजवादी पार्टी प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा दल होकर ये काम नही कर रही। यानी लोहिया के चेलों ने लोहिया के ही आइडियाज़ की तिलांजलि दे दी है। वैसे लोहिया ने ही कभी कहा था कि आगे चलके मेरे चेले मेरे सारे आदर्शों की तिलांजलि दे दें तो मुझे दुख नहीं होगा। कमोबेश वैसा ही हुआ है।
आप सोच रहे होंगे कि हम लगातार जिलाध्यक्षों की बात क्यों कर रहे रहे हैं, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि जिलाध्यक्ष किसी भी पार्टी संगठन का आधार होते हैं, ये वो पिलर्स होते हैं जिनके ऊपर पार्टी खड़ी होती है। वैसे समाजवादी पार्टी जैसे दलों में निर्णय बेहद केंद्रित तरीके से लिए जाते हैं, लेकिन जिलाध्यक्ष तब भी बड़े स्तर पर निर्णय प्रभावित करते हैं।
वो केंद्रीय नेतृत्व और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच लिंक का काम करते हैं और इससे भी ज्यादा ये दिखाते हैं कि पार्टी कितना डाइवर्सिटी में विश्वास रखती है। और इसी मोर्चे पर समाजवादी पार्टी औंधे मुँह गिर जाती है। समाजवादी पार्टी कभी कभार ब्राह्मणों से भी फ्लर्टिंग करती रहती है, आप इस लिस्ट में शायद कोई भी ब्राह्मण ना पाएँ।
राजपूतों का भी उत्तर प्रदेश में ठीकठाक वोट है और उनकी सहभागिता जरूरी है लेकिन यहाँ भी समाजवादी पार्टी गंभीर नजर नहीं आती। वैसे समाजवादी पार्टी में एक जाति या मज़हब की कहानी सिर्फ़ जिले तक ही सीमित नहीं है। अगर आप इसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की संरचना भी देखेंगे तो यहाँ भी 30% हिस्सा दो कम्युनिटी के पास है।
इसमें भी टॉप के 4 लोगों में से तीन अखिलेश ख़ुद और उनके चाचा शिवपाल और रामगोपाल हैं, इसके अलावा आजम ख़ान का नाम टॉप पर लिखा गया है। कुल मिलाकर बात ये है कि समाजवादी पार्टी अपने आप को कितना भी PDA के रैपर में पैक करे, उसका पुराना MY लिफ़ाफ़ा कहीं नहीं जा रहा।
और वैसे भी समाजवादी पार्टी की पूरी पॉलिटिक्स उत्तर प्रदेश में बसपा और भाजपा के ही ख़िलाफ़ रही है। बसपा के ख़िलाफ़ लड़ाइए का मतलब समाजवादी पार्टी के नेता एंटी दलित पॉलिटिक्स से लेते आए हैं। और इस का सबूत ये है कि जैसे ही 2012 में उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी जीत कर आई थी, तुरंत दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा शुरू हो गई थी।
साल 2012 में 3 मार्च का दिन था, यूपी में विधानसभा चुनाव पूरे हुए थे इलेक्शन रिजल्ट्स में सपा को 224 सीटों के साथ मेजॉरिटी मिली थी और बसपा बाहर हो चुकी थी।
बस बसपा का सत्ता से बाहर होना था और समाजवादी पार्टी के लठैतों को हिसाब चुकता करने का मौक़ा मिल गया था। सपा की जीत के अगले 36 घंटों में दलितों के साथ क्या हुआ, सुनते जाइए। सपा की जीत के बाद तुरंत सीतापुर के भंबिया गाँव में दलितों के लगभग एक दर्जन घर जला दिए गए।
और ऐसा क्यों हुआ? दलितों ने बताया कि उन्होंने इलेक्शन में एक इंडिपेंडेट कैंडिडेट को समर्थन किया था, इसलिए उनके घर पर चुनाव के बाद तुरंत हमला हुआ। लेकिन अगर आप सोच रहे हो कि ये कोई आइसोलेटेड इंसिडेंट था, तो आप गलती कर रहे हैं।
सीतापुर से लगभग 500 किलोमीटर दूर आगरा में बसपा समर्थित एक ग्राम प्रधान पति की हत्या कर दी गई। हत्या का आरोप सपा के लठैतों पर। इसी दिन बलिया के भुज छपरा गाँव में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर पाँच दलित महिलाओं और बच्चों को बुरी तरह मारने−पीटने के आरोप लगे।
बताया गया कि जैसे ही समाजवादी पार्टी वालों को यह पता चला कि इस गांव के ज्यादातर लोगों ने जेडीयू को वोट दिया था तो 40 से ज्यादा लठैत गाँव में घुसे और मारपीट की। और समाजवादी पार्टी आज भले ही अपने हर पोस्ट में PDA का जिक्र करती हो लेकिन उसने सत्ता में आने के बाद दलित प्रतीकों को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
अखिलेश यादव ने सीएम बनने के बाद जुलाई 2012 में उन 8 जिलों के नाम बदल दिए थे, जिनके नाम मायावती ने सीएम रहते हुए दलित विचारकों पर रखें थे। इसमें छत्रपति शाहूजी महाराज नगर को अमेठी, रमाबाई नगर को कानपुर देहात, भीम नगर को संभल, प्रबुद्ध नगर को शामली और पंचशील नगर को हापुड़ कर दिया गया था।
मायावती सरकार में जो भी योजनाएँ दलित आइकॉन्स के नाम पर थीं, उनके नाम बदलना भी समाजवादी सरकार की प्रियोरोटी थी। अखिलेश यादव की सरकार ने मई 2012 में ही अंबेडकर ग्राम सभा विकास योजना, कांशीराम शहरी आवास योजना, सावित्री बाई फुले बालिका शिक्षा सहायता योजना जैसी लगभग 26 स्कीम्स के नाम चेंज कर दिए गए।
ऐसे में आज जब समाजवादी पार्टी PDA पॉलिटिक्स की बात करती है तो मामला काफ़ी हास्यास्पद हो जाता है, हालाँकि ये काम कितना हाफ हार्टेड तरीके से किया जा रहा है, वो मैंने आपको पुरानी घटनाएँ और जिलाध्यक्षों की लिस्ट दिखा कर बता दिया।


