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संदेशखाली पर बंगाल सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने दी राहत, संसद की विशेषाधिकार समिति की कार्रवाई पर लगाई रोक: अब 4 हफ्ते बाद सुनवाई

बंगाल सरकार की याचिका को वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पेश किया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक गतिविधियाँ कभी भी विशेषाधिकार का हिस्सा नहीं हो सकतीं। अब मामले पर चार हफ्ते के बाद सुनवाई होनी है।

बंगाल की संदेशखाली घटना पर संसदीय विशेषाधिकार समिति की कार्रवाई को रोकने के लिए ममता सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजाा खटखटाया था। आज (19 फरवरी 2023) उस पर सुनवाई हुई और सुनवाई के बाद कोर्ट ने कमेटी की कार्रवाई पर अस्थायी रोक लगा दी। साथ ही लोकसभा सचिवालय को इस संबंध में नोटिस भी जारी किया गया। अब मामले की सुनवाई 4 हफ्ते बाद होगी।

इस मामले की सुनवाई भारत के चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला व न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने की। वहीं बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी पेश हुए। सिब्बल ने कहा कि राजनीति गतिविधियाँ कभी भी विशेषाधिकार का हिस्सा नहीं हो सकतीं। दलीलों पर गौर देते हुए पीठ ने संसदीय एथिक्स कमेटी के नोटिस पर ही रोक लगा दी।

बता दें कि लोकसभा सांसद सुकांत मजूमदार की शिकायत पर विशेषाधिकार हनन का नोटिस जारी हुआ था। मजूमदार ने शिकायत की थी कि उन्हें संदेशखाली जाने से रोका गया। इसके बाद संसद की आचार समिति ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव, राज्य पुलिस के डीजीपी समेत कुछ अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस जारी किया था। बंगाल सरकार ने इसी एक्शन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और कार्रवाई रोने की माँग की थी।

कोर्ट ने जब संसदीय एथिक्स कमेटी के नोटिस पर अस्थायी रोक लगाई तो लोकसभा सचिवालय की ओर से पेश अधिवक्ता ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा, “इन लोगों पर कोई आरोप नहीं लगाया जा रहा। यह एक नियमित प्रक्रिया है। एक बार जब कोई सांसद नोटिस भेजता है और अध्यक्ष को लगता है कि मामले पर गौर करने लायक कुछ है तो नोटिस जारी किया जाता है।”

उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव भगवती प्रसाद गोपालिका और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव कुमार को लोकसभा सचिवालय ने सोमवार को पेश होने के लिए नोटिस जारी किया था।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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