तमिलनाडु के उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन के बयान ने देश की सियासत और वैचारिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। स्टालिन का दावा है कि ‘द्रविड़ विचारधारा’ और ‘इस्लाम के सिद्धांत’ एक समान हैं। इस बयान के बाद अब दोनों विचारधाराओं की ‘कुंडली’ मिलाई जा रही है और यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह समानता वास्तव में सिद्धांतों पर आधारित है या फिर यह केवल ‘सनातन विरोध’ के नाम पर किया गया एक समझौता है। आलोचकों का मानना है कि यह ‘मैच मेड इन फिरदौस’ (स्वर्ग में बनी जोड़ी) असल में हिंदू धर्म के खिलाफ एक सुनियोजित मोर्चाबंदी है।
Tamil Nadu के Deputy CM उदयनिधि स्टालिन के अनुसार द्रविड़ विचारधारा और इस्लाम के सिद्धांत एक ही हैं। स्टालिन जो कह रहे हैं वह बिल्कुल सही बात है। इन दोनों विचारधारों में सच में कोई भी अंतर नहीं है।
— ऑपइंडिया (@OpIndia_in) March 19, 2026
पेरियार ने भी मूर्तियां तोड़ी थी और इस्लामी आक्रांताओं ने भी वही किया। पेरियार… pic.twitter.com/IWGv48Lo7G
बुतपरस्ती से नफरत और मूर्तियों का विरोधाभास
द्रविड आंदोलन और इस्लाम के बीच सबसे बड़ा साझा बिंदु ‘मूर्तियों से नफरत’ को बताया जाता है। जहाँ पेरियार ने गणेश जी की मूर्तियाँ तोड़कर इसे ‘अंधविश्वास’ करार दिया, वहीं इस्लाम का आधार ही ‘बुतशिकन’ (मूर्ति तोड़ने वाला) होने पर टिका है।
लेकिन यहाँ एक बड़ा विरोधाभास भी है। पेरियार मूर्ति पूजा के खिलाफ थे, फिर भी आज तमिलनाडु के हर चौराहे पर उनकी अपनी मूर्तियाँ लगी हैं। सवाल यह उठता है कि अगर हिंदू देवी-देवता अंधविश्वास हैं, तो पेरियार की मूर्तियाँ क्या ‘क्रांति’ का प्रतीक हैं? क्या यह केवल अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ा गया तर्क नहीं है?
बिचौलिया हटाओ, नया ठेकेदार लाओ
दोनों विचारधाराएँ दावा करती हैं कि उन्हें भगवान और इंसान के बीच कोई बिचौलिया नहीं चाहिए। द्रविड राजनीति ‘ब्राह्मणवाद’ को कोसती है क्योंकि वह पुरोहित लाता है, वहीं इस्लाम में ‘नौ प्रीस्टहुड’ (कोई पुरोहित वर्ग नहीं) का दावा किया जाता है।
मगर हकीकत इसके उलट है। एक तरफ उलेमा और मौलानाओं के बिना समुदाय का पत्ता नहीं हिलता, तो दूसरी तरफ द्रविड ‘आइडियोलॉग्स’ के बिना राजनीति अधूरी है। ऐसा लगता है कि पुराने बिचौलियों को हटाकर केवल नए ‘ठेकेदार’ बैठा दिए गए हैं।
बराबरी का ‘चाइनीज वर्जन’ और चयनात्मक न्याय
बराबरी और भाईचारे की बातें दोनों तरफ जोर-शोर से की जाती हैं। इस्लाम में ‘उम्माह’ के भीतर सब बराबर हैं और द्रविड़ विचारधारा में ‘गैर-ब्राह्मण’ सब बराबर हैं। लेकिन इस घेरे के बाहर जो है, उसके लिए कोई जगह नहीं है।
बाहर वालों के लिए ‘काफिर’ या ‘आर्य’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया एक परिवार है) को साजिश बताने वाले लोग अपनी इस ‘एक्सक्यूसिव मेंबरशिप’ को सामाजिक न्याय कहते हैं, जो केवल उनके लिए समूह तक सीमित है।
अभिव्यक्ति की आजादी का ‘मर्डर’ और भाषा फोबिया
इन दोनों ही विचारधाराओं में ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ यानि सवाल उठाने की गुंजाइश खत्म होती दिखती है। इस्लाम में किताब अंतिम सत्य है और द्रविड़ आंदोलन में पेरियार की बातें पत्थर की लकीर। सवाल उठाने पर एक तरफ व्यक्ति ‘संघी’ करार दिया जाता है, तो दूसरी तरफ ‘गुस्ताख’।
साथ ही, दोनों को संस्कृत भाषा से गहरी एलर्जी है। उनके लिए संस्कृत बोलना गुलामी है, लेकिन अरबी या अंग्रेजी को अपना लेना प्रगतिशीलता है। यह मानसिक विरोधाभास उनकी वैचारिक गहराई पर सवाल खड़े करता है।
विक्टिम कार्ड और फेमिनिज्म का दोहरा चेहरा
इन दोनों को जोड़ने वाला सबसे बड़ा गोंद ‘विक्टिम कार्ड’ है। द्रविड़ राजनीति कहती है कि उत्तर भारत ने उन पर जुल्म किया और इस्लाम कहता है कि पूरी दुनिया उनके खिलाफ साजिश कर रही है। सत्ता और संसाधन पास होने के बावजूद खुद को पीड़ित दिखाना इनकी रणनीति का हिस्सा है।
रही बात महिला सशक्तिकरण की, तो द्रविड़ नेता पेरियार के नाम पर मंगलसूत्र तोड़ने की बात तो करते हैं, लेकिन क्या उनमें 7वीं सदी के शरिया कानूनों को चुनौती देने का साहस है? यहाँ आकर इनका ‘फेमिनिज्म’ खामोश हो जाता है।
अंतत: यह स्पष्ट होता है कि यह गठबंधन सिद्धांतों का नहीं, बल्कि ‘सनातन’ के खिलाफ एक ‘ज्वाइंट वेंचर’ मात्र है। स्टालिन के लिए अब एक ही बड़ा सवाल बचाता है कि यदि द्रविड और इस्लाम एक हैं, तो क्या वह इस्लाम की इस बुनियादी आयत से भी सहमत हैं कि ‘अल्लाह के अलावा कोई दूसरा ईश्वर नहीं हैं’? क्या वह अपने सार्वजनिक जीवन में इस कट्टरता को स्वीकार करेंगे?


