कल्पना कीजिए एक ऐसी रात की, जहाँ चारों तरफ सन्नाटा हो, लेकिन अचानक आसमान से हजारों सफेद छतरियाँ (पैराशूट) नीचे आने लगें। रडार को कानो-कान खबर न हो और देखते ही देखते दुश्मन के सबसे सुरक्षित किले, उसके हवाई अड्डे और उसके संचार केंद्र कब्जे में ले लिए जाएँ। यह किसी हॉलीवुड फिल्म का सीन नहीं, बल्कि अमेरिकी सेना की उस ‘घातक चाल’ का हिस्सा है जिसे दुनिया ’82nd एयरबोर्न डिवीजन’ के नाम से जानती है।
मिडिल ईस्ट में पिछले तीन हफ्तों से बारूद की गंध फैली हुई है। इजरायल और ईरान के बीच मिसाइलों का आदान-प्रदान अब एक बड़े जमीनी युद्ध की आहट दे रहा है। इसी बीच खबर आती है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सबसे भरोसेमंद और ‘इमीडिएट रिस्पॉन्स फोर्स’ (IRF) को एक्टिव कर दिया है। पेंटागन के गलियारों से छनकर आ रही खबरें बता रही हैं कि करीब 3,000 जांबाज सैनिक किसी भी वक्त ईरान की सीमाओं के करीब लैंड कर सकते हैं।
यह वो सैनिक हैं जिन्हें न सड़क चाहिए, न बंदरगाह और न ही किसी देश की अनुमति। इन्हें बस एक आदेश चाहिए और अगले 18 घंटों के भीतर ये दुनिया के किसी भी कोने में जंग का रुख पलटने की ताकत रखते हैं। आखिर क्या है इस फोर्स का रहस्य? क्यों ईरान जैसा देश भी इस नाम से सतर्क हो जाता है? आइए, इस ‘आसमानी सेना’ के इतिहास, ताकत और भविष्य की रणनीति को विस्तार से समझते हैं।
82nd एयरबोर्न: वो ‘ऑल अमेरिकन’ योद्धा जो हवा से करते हैं वार
82nd एयरबोर्न डिवीजन अमेरिकी सेना की कोई सामान्य पैदल सेना नहीं है। इन्हें ‘All American’ (AA) कहा जाता है क्योंकि इसकी स्थापना के समय इसमें अमेरिका के हर राज्य के सैनिक शामिल थे। इनकी सबसे बड़ी ताकत इनकी गति और हमला करने का तरीका है। जहाँ सामान्य सेना को युद्ध के मैदान तक पहुँचने के लिए टैंकों, ट्रकों और जहाजों के बेड़े की जरूरत होती है, वहीं ये सैनिक आसमान से सीधे दुश्मन की छाती पर उतरते हैं।
पेंटागन ने इन्हें ‘इमीडिएट रिस्पॉन्स फोर्स’ का दर्जा दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आज रात व्हाइट हाउस से आदेश निकलता है, तो कल दोपहर तक ये सैनिक साजो-सामान के साथ ईरान के किसी भी रणनीतिक ठिकाने पर मौजूद होंगे। ये सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-130 हरक्यूलिस जैसे विशाल विमानों से हजारों फीट की ऊंचाई से कूदते हैं। इनके पास हल्के लेकिन बेहद आधुनिक हथियार होते हैं जो इन्हें तेजी से मूव करने की आजादी देते हैं। इनका मुख्य काम होता है ‘शॉक एंड ऑ’ (Shock and Awe) यानी दुश्मन को हैरान और परेशान कर देना।
ये यूनिट आमतौर पर मुख्य सेना के आने से पहले रास्ता साफ करती है। इनका लक्ष्य होता है दुश्मन के एयरफील्ड्स पर कब्जा करना, ताकि बाद में अमेरिका के भारी टैंक और हजारों की संख्या में अन्य सैनिक वहाँ आसानी से लैंड कर सकें। इनके पैराट्रूपर्स रात के घने अंधेरे में भी जीपीएस और नाइट विजन की मदद से सटीक लैंडिंग करने में माहिर होते हैं, जो इन्हें दुनिया की सबसे प्रोफेशनल पैराशूट यूनिट बनाता है।
इतिहास के पन्नों में दर्ज खूनी दास्ताँ: जब हिटलर की सेना के छूटे थे पसीने
82nd एयरबोर्न का इतिहास वीरता और बलिदान की मिसालों से भरा पड़ा है। इस डिवीजन की असली पहचान द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बनी। 6 जून 1944, जिसे दुनिया ‘D-Day’ के नाम से जानती है, उस दिन जब मित्र देशों की सेनाएँ समुद्र के रास्ते फ्रांस के नॉर्मंडी तट पर उतरने वाली थीं, उससे ठीक 5 घंटे पहले 12,000 पैराट्रूपर्स ने दुश्मन की लाइनों के पीछे छलांग लगा दी थी।
उनका मकसद था हिटलर की नाजी सेना की सप्लाई लाइन काट देना और पुलों पर कब्जा करना। बिना किसी अतिरिक्त मदद के, इन जांबाजों ने 33 दिनों तक लगातार खूनी संघर्ष किया और यूरोप की आजादी की नींव रखी। इसके बाद 1991 के खाड़ी युद्ध में जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर कब्जा किया, तब इसी डिवीजन ने ‘डेजर्ट शील्ड’ ऑपरेशन के तहत सबसे पहले सऊदी अरब पहुँचकर मोर्चा संभाला था।
2003 के इराक युद्ध में भी इनकी भूमिका निर्णायक रही। सिर्फ 100 घंटों की जमीनी लड़ाई में इन्होंने इराक के बड़े शहरों पर नियंत्रण कर लिया था। हालाँकि, इनका इतिहास सिर्फ जीत का ही नहीं रहा है। वियतनाम और हाल के वर्षों में अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका की लंबी खिंचती जंग ने इस एलीट फोर्स की साख पर सवाल भी उठाए। आलोचकों का मानना है कि ये फोर्स हमला करने में तो माहिर है, लेकिन किसी देश पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखने के लिए इन्हें काफी संघर्ष करना पड़ता है।
मिडिल ईस्ट में तैनाती के मायने: ट्रंप की शांति नीति या युद्ध का नया अध्याय?
वर्तमान में मिडिल ईस्ट के हालात किसी जलते हुए ज्वालामुखी जैसे हैं। एक तरफ ट्रंप प्रशासन सार्वजनिक रूप से शांति और समझौतों की बात कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ 3,000 से 4,000 सैनिकों की यह तैनाती कुछ और ही इशारा कर रही है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग से इन सैनिकों की रवानगी का मतलब है कि अमेरिका अब ‘वेट एंड वॉच’ की नीति से आगे निकल चुका है।
यह तैनाती केवल ईरान को डराने के लिए नहीं है, बल्कि यह इजरायल को एक सुरक्षा कवच देने की कोशिश भी है। अगर ईरान या उसके समर्थित गुट (जैसे हिजबुल्लाह या हूती) इजरायल पर कोई बड़ा जमीनी हमला करते हैं, तो 82nd एयरबोर्न वो पहली दीवार होगी जिसे उन्हें पार करना होगा। इसके अलावा, हाल ही में यूएसएस बॉक्सर और मरीन एक्सपीडिशनरी यूनिट की तैनाती ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका ‘जल, थल और नभ’ तीनों मोर्चों पर ईरान को घेरने की तैयारी कर चुका है।
ईरान भी इस खतरे से अनजान नहीं है। पिछले 20 सालों से ईरान ने अपनी सेना को इसी तरह के ‘एसिमेट्रिक वॉरफेयर’ (Asymmetric Warfare) के लिए तैयार किया है। ईरान के पास दुनिया का सबसे बड़ा मिसाइल प्रोग्राम और ड्रोन नेटवर्क है। अगर 82nd एयरबोर्न के सैनिक जमीन पर उतरते हैं, तो उन्हें ईरान की ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स’ (IRGC) से कड़ी टक्कर मिल सकती है, जो गुरिल्ला युद्ध में माहिर माने जाते हैं।
काबुल से तेहरान तक: क्या दोहराया जाएगा इतिहास?
अगस्त 2021 का वो मंजर पूरी दुनिया को याद है, जब अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना वापस जा रही थी और काबुल एयरपोर्ट पर हजारों लोगों की भीड़ अपनी जान बचाने के लिए भाग रही थी। उस अफरातफरी के माहौल में हामिद करजई इंटरनेशनल एयरपोर्ट को सुरक्षित रखने और रेस्क्यू ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा करने का जिम्मा इसी 82nd एयरबोर्न डिवीजन के पास था। उन्होंने सबसे कठिन परिस्थितियों में वहाँ से हजारों लोगों को निकाला।
लेकिन आज चुनौती अलग है। अफगानिस्तान में वे जा रहे थे, लेकिन ईरान में उन्हें शायद ‘घुसना’ पड़े। 82वीं एयरबोर्न की सबसे बड़ी परीक्षा उनकी ‘क्विक रिएक्शन’ क्षमता की होगी। क्या वे ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देकर लैंड कर पाएँगे? क्या वे बिना भारी नुकसान के अपने लक्ष्यों को हासिल कर पाएँगे? ये वो सवाल हैं जिनका जवाब पेंटागन के पास भी शायद पूरी तरह नहीं है।
पेंटागन के अधिकारियों का कहना है कि हर सैनिक को विशेष ट्रेनिंग दी गई है ताकि वे शहरी इलाकों से लेकर रेगिस्तान तक, हर जगह लड़ सकें। उनके पास अब पहले से कहीं अधिक एडवांस्ड ड्रोन, प्रिसीजन गाइडेड हथियार और जैमिंग डिवाइसेस हैं। यह तकनीक उन्हें दुश्मन के रडार से बचने और सीधे उनके कमांड सेंटर पर वार करने की शक्ति देती है।
क्या यह तीसरे विश्व युद्ध की दस्तक है?
डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य रणनीति हमेशा से अनिश्चित रही है। एक तरफ वे अमेरिकी सैनिकों को ‘अंतहीन युद्धों’ से वापस लाने का वादा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ इस तरह की आक्रामक तैनाती उनके ‘अमेरिका फर्स्ट’ और ‘स्ट्रेंथ थ्रू पीस’ (शक्ति के जरिए शांति) के नारे को पुख्ता करती है। 82nd एयरबोर्न का मैदान में उतरना इस बात का संकेत है कि अगर बातचीत विफल हुई, तो अमेरिका अपनी पूरी सैन्य ताकत का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेगा।
अगर ये 3,000 सैनिक मिडिल ईस्ट की धरती पर कदम रखते हैं, तो यह जंग केवल दो देशों के बीच नहीं रह जाएगी। यह दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति और एक क्षेत्रीय शक्ति के बीच के वजूद की लड़ाई बन जाएगी। दुनिया की नजरें अब उन 18 घंटों पर टिकी हैं, जो किसी भी वक्त आदेश मिलते ही शुरू हो सकते हैं।


