क्या है JASSM-ER मिसाइल: तकनीक और ताकत का घातक मेल
JASSM-ER (Joint Air-to-Surface Standoff Missile-Extended Range) एक एयर-टू-सरफेस क्रूज मिसाइल है। इसे लड़ाकू विमान या बमवर्षक विमान से लॉन्च किया जाता है और यह जमीन पर मौजूद टारगेट को बेहद सटीक तरीके से नष्ट करती है। इसकी खास बात यह है कि इसे दागने के लिए विमान को दुश्मन के एयरस्पेस में घुसने की जरूरत नहीं होती। यह दूर से लॉन्च होकर अपने लक्ष्य तक खुद रास्ता तय करती है।
इसमें आधुनिक गाइडेंस सिस्टम लगे होते हैं, जैसे GPS और इन्फ्रारेड ट्रैकिंग, जिसकी मदद से यह रास्ते में आने वाली बाधाओं को पार करते हुए सीधे अपने टारगेट तक पहुँचती है। इसे खास तौर पर उन ठिकानों को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है जो बेहद सुरक्षित होते हैं, जैसे बंकर, एयरबेस, कमांड सेंटर और हथियार निर्माण इकाइयाँ।
असली ताकत: मारक क्षमता, स्टेल्थ और सटीक हमला
JASSM-ER को खतरनाक बनाने वाली सबसे बड़ी चीज इसकी लंबी मारक क्षमता है। यह करीब 600 मील यानी लगभग 965 किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक हमला कर सकती है, जिससे अमेरिकी विमान सुरक्षित दूरी पर रहते हुए भी दुश्मन को निशाना बना सकते हैं। इसके साथ ही इसका स्टेल्थ डिजाइन इसे रडार से बचने में मदद करता है।
यानी दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को अक्सर यह मिसाइल तब तक दिखाई नहीं देती, जब तक बहुत देर न हो जाए। तीसरी अहम बात इसकी सटीकता है। यह मिसाइल अपने टारगेट को बहुत कम त्रुटि के साथ हिट करती है, जिससे कम संख्या में भी बड़े और प्रभावी हमले किए जा सकते हैं।
यही वजह है कि इसे खास तौर पर हाई-वैल्यू और हाई-सिक्योरिटी टारगेट्स के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है।
अमेरिका की रणनीति: ‘स्टैंडऑफ वॉरफेयर’ का खेल
ईरान के खिलाफ अमेरिका ने जो रणनीति अपनाई है, वह सीधे टकराव से अलग है। अमेरिका अपने विमान और पायलटों को खतरे में डालने के बजाय दूरी से लगातार हमले कर रहा है। इसे ‘स्टैंडऑफ वॉरफेयर’ कहा जाता है। इस रणनीति के तहत अमेरिका ने अपने वैश्विक हथियार भंडार को भी फिर से व्यवस्थित किया है।
पैसिफिक क्षेत्र, जहाँ चीन के खिलाफ तैयारी रहती है, वहाँ से भी मिसाइलें हटाकर मिडिल ईस्ट में भेजी गई हैं। ब्रिटेन के एयरबेस तक को इस ऑपरेशन में शामिल किया गया है। B-52 और B-1B जैसे बमवर्षक विमानों से लगातार JASSM-ER मिसाइलें दागी जा रही हैं, ताकि ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को कमजोर किया जा सके और उसके अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जा सके।
तेजी से घटता भंडार अमेरिका के लिए बन रहा चुनौती
इस युद्ध का सबसे बड़ा असर अमेरिका के हथियार भंडार पर दिख रहा है। युद्ध शुरू होने से पहले उसके पास करीब 2,300 JASSM-ER मिसाइलें थीं, लेकिन कुछ ही हफ्तों में 1,000 से ज्यादा का इस्तेमाल हो चुका है। बाकी बची मिसाइलों में भी कई तकनीकी रूप से खराब हैं और इस्तेमाल के लायक नहीं हैं।
यह अमेरिका के लिए एक बड़ा रणनीतिक जोखिम बन गया है, क्योंकि इतनी तेज खपत के बाद भविष्य में चीन जैसे बड़े प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ उसकी तैयारी कमजोर हो सकती है। मिसाइल बनाने वाली कंपनी लॉकहीड मार्टिन (Lockheed Martin) उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रही है लेकिन जितनी तेजी से मिसाइलें खर्च हो रही हैं, उतनी तेजी से उनका उत्पादन नहीं हो पा रहा।
ईरान भी अभी भी पूरी तरह कमजोर नहीं
अमेरिका और उसके सहयोगियों का दावा है कि उन्होंने ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम को काफी हद तक नष्ट कर दिया है। लेकिन हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि स्थिति पूरी तरह एकतरफा नहीं है। ईरान ने अमेरिकी F-15E और A-10 जैसे लड़ाकू विमानों को मार गिराया है, साथ ही कई MQ-9 ड्रोन और रेस्क्यू हेलीकॉप्टर भी निशाना बने हैं।
इससे यह साफ होता है कि ईरान अभी भी जवाब देने की क्षमता रखता है और उसका एयर डिफेंस पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ईरान लगातार जवाबी कार्रवाई कर रहा है। अब तक वह 1,600 से ज्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें और करीब 4,000 ड्रोन दाग चुका है। इन हमलों को रोकने के लिए अमेरिका को भारी मात्रा में इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।
Patriot और THAAD जैसे डिफेंस सिस्टम लगातार सक्रिय हैं, लेकिन इनकी भी सीमाएँ हैं। अगर यह युद्ध लंबा चलता है, तो अमेरिका के लिए सिर्फ हमला करना ही नहीं, बल्कि अपने डिफेंस सिस्टम को बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
ट्रंप ने दी थी ‘स्टोन एज’ में भेजने की चेतावनी
गौरतलब है कि ट्रम्प ने अपने एक हालिया भाषण में कहा था, “अगले दो से तीन हफ्तों में, हम उन्हें वापस ‘स्टोन एज’ (पाषाण युग) में ले जाएँगे जहाँ वे होने चाहिए।” हालाँकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इसका मतलब ईरान के नागरिकों, सेना या सरकार के लिए क्या है।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान के बाद यह माना जा रहा है कि अमेरिका अब ईरान के सबसे अहम आर्थिक और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बना सकता है। खासतौर पर तेल टर्मिनल, ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर और सैन्य उत्पादन केंद्र अमेरिका के संभावित टारगेट हो सकते हैं। खर्ग द्वीप जैसे स्थान, जो ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, खास फोकस में हो सकते हैं।
इसके अलावा अमेरिकी नौसेना, मरीन और पैराट्रूपर्स की बढ़ती तैनाती यह संकेत देती है कि जरूरत पड़ने पर जमीनी ऑपरेशन भी शुरू किया जा सकता है। JASSM-ER मिसाइलें अमेरिका को इस युद्ध में बड़ी तकनीकी बढ़त देती हैं। अब आने वाले हफ्ते ही तय करेंगे कि ट्रंप की ‘पाषाण युग’ वाली चेतावनी असल में किस दिशा में जाती है।


