भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से एक छोटे लेकिन खास समुदाय के करीब 250 लोग हाल ही में इजरायल पहुँचे हैं। यह कोई सामान्य यात्रा नहीं, बल्कि पहचान, आस्था और इतिहास से जुड़ी एक लंबी कहानी का हिस्सा है। इन लोगों को ‘बनेई मेनाशे’ कहा जाता है, जो खुद को बाइबिल में वर्णित प्राचीन इस्राएली कबीले ‘मेनाशे’ का वंशज मानते हैं।
इजरायल सरकार ने इन्हें बसाने के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया है, जिसके तहत आने वाले वर्षों में हजारों और लोगों को वहाँ लाया जाएगा। यह पूरी प्रक्रिया केवल प्रवासन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापन और ऐतिहासिक जुड़ाव की एक बड़ी कोशिश मानी जा रही है।
कौन हैं बनेई मेनाशे और क्या है उनका दावा?
बनेई मेनाशे समुदाय मुख्य रूप से भारत के मणिपुर और मिजोरम राज्यों में रहता है। इस समुदाय का दावा है कि वे प्राचीन इस्राएल के ‘लॉस्ट ट्राइब्स’ यानी खोई हुई दस जनजातियों में से एक, मेनाशे कबीले के वंशज हैं। धार्मिक कथाओं के अनुसार, करीब 2700 साल पहले असीरियन साम्राज्य ने इन जनजातियों को उनके मूल स्थान से निर्वासित कर दिया था।
इसके बाद ये लोग अलग-अलग दिशाओं में बिखर गए और समय के साथ उनकी पहचान धुंधली होती चली गई। बनेई मेनाशे की मौखिक परंपराएँ बताती हैं कि उनके पूर्वज फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन से होते हुए अंततः भारत के पूर्वोत्तर इलाकों में पहुँचे।
इस लंबे सफर के दौरान उन्होंने कुछ यहूदी धार्मिक परंपराओं, जैसे खतना और कुछ धार्मिक रीति-रिवाजों को बनाए रखा, जिससे उनके दावे को एक आधार मिलता है।
भारत में जीवन और धार्मिक बदलाव
भारत में बसने के बाद यह समुदाय धीरे-धीरे स्थानीय समाज का हिस्सा बन गया। 19वीं सदी में आए ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में इस समुदाय के अधिकांश लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया। इसके बावजूद उनके भीतर अपनी कथित यहूदी जड़ों को लेकर एक अलग पहचान बनी रही।
समय के साथ इस समुदाय के कुछ लोगों ने अपनी पुरानी परंपराओं और इतिहास को फिर से खोजने की कोशिश की। यही कारण है कि 20वीं सदी के अंत तक आते-आते उन्होंने यहूदी धर्म की ओर वापसी का प्रयास शुरू किया और इजरायल से संपर्क स्थापित किया।
इजरायल की मान्यता और लंबी बहस
बनेई मेनाशे को यहूदी मानने को लेकर लंबे समय तक विवाद चलता रहा। कई धार्मिक और सरकारी संस्थाओं ने उनके दावों पर सवाल उठाए। हालाँकि 2005 में एक अहम मोड़ आया, जब इजरायल के सेफारदी मुख्य रब्बी रब्बी श्लोमो अमर (Rabbi Shlomo Amar) ने उन्हें ‘इजरायल के वंशज’ के रूप में मान्यता दी।
इस मान्यता ने उनके इजरायल प्रवास का रास्ता खोल दिया, लेकिन एक शर्त के साथ, शर्त ये थी कि उन्हें औपचारिक रूप से यहूदी धर्म अपनाना होगा। यानी इजरायल पहुँचने के बाद उन्हें धार्मिक रूपांतरण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, ताकि वे वहाँ की नागरिकता प्राप्त कर सकें।
क्या है ‘ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन’?
इजरायल सरकार ने इस समुदाय को व्यवस्थित तरीके से बसाने के लिए ‘ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन’ नामक एक विशेष अभियान शुरू किया है। इस योजना के तहत आने वाले वर्षों में भारत में रह रहे हजारों बनेई मेनाशे को इजरायल लाया जाएगा। हाल ही में पहुँचे 250 लोग इसी अभियान का पहला जत्था हैं।
सरकार की योजना है कि 2026 के दौरान करीब 1200 और लोगों को इजरायल लाया जाएगा, जबकि कुल मिलाकर लगभग 6000 लोगों को 2030 तक वहाँ बसाने का लक्ष्य है। इस पूरी योजना पर लगभग 90 मिलियन शेकेल (करीब 30 मिलियन डॉलर) खर्च होने का अनुमान है, जिसमें यात्रा, आवास, भाषा प्रशिक्षण और अन्य सुविधाएँ शामिल हैं।
इजरायल में बसने की प्रक्रिया और चुनौतियाँ
इजरायल पहुँचने के बाद इन लोगों को सीधे नागरिकता नहीं मिलती, बल्कि उन्हें एक चरणबद्ध प्रक्रिया से गुजरना होता है। सबसे पहले उन्हें ‘एब्जॉर्प्शन सेंटर’ में रखा जाता है, जहाँ उन्हें हिब्रू भाषा सिखाई जाती है, रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाता है और समाज में घुलने-मिलने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है।
इसके अलावा धार्मिक रूपांतरण भी एक जरूरी प्रक्रिया है, क्योंकि इजरायल के कानून के तहत यहूदी पहचान को आधिकारिक मान्यता देना आवश्यक होता है। यह प्रक्रिया कई बार चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि नए माहौल, भाषा और सांस्कृतिक अंतर के कारण लोगों को खुद को ढालने में समय लगता है।
भावनाएँ, पहचान और नई शुरुआत
इस पूरी कहानी का सबसे भावुक पहलू उन लोगों के अनुभव हैं, जो वर्षों बाद अपने परिवार या समुदाय के सदस्यों से मिलते हैं। एयरपोर्ट पर पहुँचे लोगों का गानों, झंडों और तालियों के साथ जिस तरह स्वागत हुआ, वह इस बात का संकेत है कि यह केवल प्रवासन नहीं, बल्कि ‘घर वापसी’ जैसा अनुभव है।

कई लोग ऐसे भी हैं, जो दशकों पहले इजरायल आ चुके थे और अब अपने पुराने साथियों या रिश्तेदारों से दोबारा मिल रहे हैं। कुछ के लिए यह खुशी का पल है, तो कुछ के लिए बीते समय की यादों से जुड़ा भावनात्मक क्षण।

नई पीढ़ी के सामने एक अलग चुनौती है और वो है अपनी पारंपरिक पहचान को बनाए रखते हुए आधुनिक इजरायली समाज में खुद को स्थापित करना। भाषा, संस्कृति और जीवनशैली के फर्क के बावजूद इस समुदाय के लोग अपने जड़ों से जुड़ने के एहसास को सबसे बड़ा मानते हैं।
एक ऐतिहासिक और सामाजिक प्रयोग
बनेई मेनाशे का इजरायल जाना सिर्फ एक धार्मिक या सामाजिक घटना नहीं है, बल्कि यह एक अनोखा ऐतिहासिक प्रयोग भी है। इसमें हजारों साल पुराने दावों, आधुनिक राजनीति, धार्मिक मान्यताओं और मानवीय भावनाओं का मिश्रण देखने को मिलता है।
इजरायल की नीति हमेशा से दुनिया भर के यहूदियों को एक जगह लाने की रही है और यह अभियान उसी दिशा में एक और कदम है। वहीं बनेई मेनाशे के लिए यह अपने इतिहास को फिर से जीने और एक नई पहचान बनाने का मौका है।
इस तरह पूर्वोत्तर भारत के छोटे-छोटे गाँवों से निकलकर इजरायल तक पहुँचने की यह कहानी सिर्फ दूरी तय करने की नहीं, बल्कि समय, संस्कृति और विश्वास के लंबे सफर की कहानी है।


