चीन की प्रवक्ता ने बताया ‘अपना क्षेत्र’
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने जम्मू-कश्मीर में शक्सगाम घाटी पर भारत के दावे को खारिज करते हुए कहा है कि ये चीन का इलाका है इसलिए ‘अपने’ इलाके में इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना पूरी तरह से सही है।
#BREAKING: China provoked India yet again, claiming Indian territory as their own. Chinese Foreign Minister Spokesperson has rejected India's claim to the Shaksgam Valley in Jammu & Kashmir.
— Aditya Raj Kaul (@AdityaRajKaul) January 13, 2026
"The territory you mentioned belongs to China. It’s fully justified for China to conduct… pic.twitter.com/HY2yBekBZ7
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि जिस इलाके को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वह चीन का ही हिस्सा है। अपने इलाके में इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना चीन का अधिकार है और इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता।
माओ निंग ने आगे कहा कि चीन और पाकिस्तान ने 1963 में भारत के विरोध के बावजूद पीओके के क्षेत्र को लेकर समझौता किया था। इस दौरान दोनों देशों ने सीमा तय की थी। चीन इस क्षेत्र से सीपीईसी के तहत आर्थिक गलियारा बनाना चाहता है। हालाँकि चीन ने साफ कहा है कि चीन पाक सीमा समझौते और सीपीईसी का कश्मीर मुद्दे से कोई लेना देना नहीं है। इस पर चीन का रुख पहले जैसा ही है।
कश्मीर को चीन इतिहास से जुड़ा जटिल मुद्दा मानता है और भारत-पाकिस्तान के आपसी बातचीत से सुलझाने का हिमायती है। हालाँकि चीन यह भी कहता है कि वह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सम्मान करता है।
चीन- पाकिस्तान सीमा समझौते का भारत ने किया विरोध
शक्सगाम घाटी भारतीय इलाका है। भारत ने 1963 में साइन किए गए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी। भारत ने लगातार इस समझौते को गैर-कानूनी और अमान्य करार दिया है। भारत चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को भी मान्यता नहीं देता है, क्योंकि ये आर्थिक गलियारा उस भारतीय इलाके से होकर गुजरता है, जिस पर पाकिस्तान ने जबरदस्ती और गैर-कानूनी तरीके से कब्जा किया हुआ है। इसमें कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान जैसे इलाके भी शामिल हैं।
#MEABriefing ||
— All India Radio News (@airnewsalerts) January 9, 2026
The Ministry of External Affairs (@MEAIndia) spokesperson Randhir Jaiswal expresses concerns over Chinese infra development in the Shaksgam Valley.
He says, 'Shaksgam valley is Indian territory' & 'We have consistently protested with the Chinese side against… pic.twitter.com/T3ZAmF7Pty
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 9 जनवरी 2026 को कहा है कि CPEC के तहत चीन PoK की शक्सगाम घाटी में इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है जो पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा, ” हम चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को मान्यता नहीं देते, क्योंकि यह भारत के उस इलाके से होकर गुजरता है, जो पाकिस्तान के जबरन और अवैध कब्जे में है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न हिस्सा हैं। यह बात पाकिस्तान और चीन दोनों को कई बार साफ-साफ बताई जा चुकी है।”
रणधीर जायसवाल ने कहा कि शक्सगाम घाटी भारत का हिस्सा है और भारत 1963 में हुए तथाकथित चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते को कभी मान्यता नहीं दी है और समझौते को हमेशा अवैध माना है।
1962 में चीन से भारत की जंग के बाद पाकिस्तान और चीन में ‘दोस्ती’ हो गई। चीन और पाकिस्तान में सीमा का निर्धारण किया। इसमें भारतीय क्षेत्र, जो पाकिस्तान के कब्जे में था, उसे भी बाँटा गया। पाकिस्तान ने 1948 में कब्जाए शक्सगाम घाटी के 5180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन को दे दिया।
समझौते के तहत घाटियों, नदियों आदि को सीमा के निर्धारण का आधार बनाया गया। हालाँकि भारत ने इसका पुरजोर विरोध किया। इस तरह से शक्सगाम घाटी जैसे भारतीय क्षेत्र चीन के कब्जे में आ गए।
CPEC का भारत करता रहा है विरोध
चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा चीन के शिंजियांग प्रांत से पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित ग्वादर बंदरगाह तक बनाया जा रहा आर्थिक गलियारा है। इस पर करीब 5 लाख करोड़ रुपए चीन खर्च कर रहा है। इसका मकसद चीन की पहुँच को अरब सागर तक पहुँचाना है।
CPEC के तहत चीन सड़क, बंदरगाह, रेलवे और ऊर्जा प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है। ये आर्थिक गलियारा पीओके के गिलगिट-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है। ये क्षेत्र भारत का है, जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा कर रखा है।
ये प्रोजेक्ट भारत को घेरने की कोशिश भी है। चीन की विस्तारवादी नीति जगजाहिर है। भारत के अक्साई चिन पर चीन ने कब्जा कर रखा है। पीओके के कुछ क्षेत्रों को पाकिस्तान ने अवैध तरीके से चीन को दे दिया है। अरुणाचल के कुछ हिस्सों पर चीन ने कब्जा कर रखा है। ऐसे में अरब सागर तक चीन की जबरदस्ती पहुँच से भारत के गुजरात जैसे राज्यों के लिए नई मुसीबत पैदा होगी।
वहीं चीन को नए कॉरिडोर से क्रूड ऑयल ले जाना आसान होगा क्योंकि अभी चीन की 80 फीसदी क्रूड ऑयल मलक्का की खाड़ी से होते हुए चीन तक पहुँचता है, जिससे उस पर खर्च काफी आता है। ये रास्ता 16 हजार किलोमीटर का है।
अगर कॉरिडोर से चीन का व्यापार हुआ तो दूरी 5 हजार किलोमीटर कम हो जाएगी। चीन मालदीप, श्रीलंका, बांग्लादेश समेत तमाम हिंद महासागर के देशों से अपनी दोस्ती बढ़ा रहा है। इस रास्ते से इन तक पहुँचने की दूरी भी कम हो जाएगी। दूसरी ओर चीनी नौसेना अरब सागर से लेकर हिंद महासागर पर नजर रखेगी। उत्तर में तिब्बत पर कब्जा कर चीन वैसे ही भारतीय सीमा पर खड़ा है।
कई सालों से शक्सगाम घाटी में इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा चीन
अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन ने शक्सगाम घाटी में 10 मीटर चौड़ी सड़क का लगभग 75 किलोमीटर हिस्सा पहले ही बना लिया है, जबकि आगे भी कंस्ट्रक्शन जारी है। इससे पहले, चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने सड़क का 36 किलोमीटर हिस्सा बनाया था। इस सड़क के लगातार कंस्ट्रक्शन से चीन भारत के सियाचिन के करीब पहुँच रहा है।
सैटेलाइट इमेज से पता चलता है कि यह सड़क शक्सगाम घाटी के बाहर दो चीनी मिलिट्री पोस्ट से जुड़ी है। इनमें से एक इस इलाके में काम कर रही PLA यूनिट का हेडक्वार्टर हो सकता है। यह सड़क इसलिए अहम है क्योंकि यह ट्रांस-काराकोरम इलाके में है, जो ऐतिहासिक रूप से कश्मीर का हिस्सा है। PoK और शक्सगाम घाटी समेत पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान ने गैर-कानूनी तरीके से चीन को दे दिया था।
POK के गिलगित-बाल्टिस्तान में अवैध तरीके से 2021 में एक सड़क बनाने का प्लान किया गया था जो मुज़फ़्फ़राबाद को मुस्तग दर्रे से जोड़ती। मुस्तग दर्रा पाकिस्तान बॉर्डर पर शक्सगाम घाटी से लगता है। बताया गया था कि यह सड़क शिनजियांग में यारकंद से जुड़ेगी, जिसका मतलब है कि यह सड़क शक्सगाम घाटी से होकर चीन के नेशनल हाईवे G219 से जुड़ेगी।
#Exclusive
— Nature Desai (@NatureDesai) April 21, 2024
Thread:
In a significant development, 🇨🇳 road has breached the border at Aghil Pass (4805 m) and entered the lower Shaksgam valley of Kashmir, 🇮🇳 with the road-head now less than 30 miles from 🇮🇳 Siachen
This permanently answers the question of Shaksgam for 🇮🇳
1/4 pic.twitter.com/TyjMcUqz2S
हालाँकि यह सड़क पाकिस्तान के कब्जे वाले गिलगित-बाल्टिस्तान में यूरेनियम जैसे मिनरल्स के परिवहन के लिए बनाई गई है, लेकिन भारत के खिलाफ जंग में चीन और पाकिस्तान इस सड़क का इस्तेमाल मिलिट्री ऑपरेशन के लिए कर सकते हैं।

खास बात यह है कि जिस सड़क की बात हो रही है, वह अघिल दर्रे में है। यह दर्रा पहले से तिब्बत के साथ कश्मीर का बॉर्डर रहा है। 1960 में भारत-चीन बॉर्डर पर बातचीत के दौरान चीनी पक्ष से कहा कि भारत सरकार के आधिकारिक मैप में ये इलाका भारत में दिखाते हैं। इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया के 1907 एडिशन मैप और सर्वे ऑफ इंडिया के पब्लिश किए गए पॉलिटिकल मैप मे भी ये भारत का हिस्सा है।”

पाकिस्तान ने चीन को वह इलाका दिया, जो कभी उसका था ही नहीं
शक्सगाम घाटी काराकोरम पहाड़ों की रेंज में एक ऊँचाई वाला इलाका है, जो करीब 5,180 किलोमीटर तक फैला है। यह घाटी सियाचिन ग्लेशियर के उत्तर में है। खास दर्रों के पास होने और PoK में चीन के शिनजियांग के साथ इसके कनेक्शन को देखते हुए इसका सामरिक महत्व बहुत है। हालाँकि 1963 के चीन-पाकिस्तान का अवैध समझौता इसके जड़ में है, हालाँकि ये विवाद 1947 से ही चला आ रहा है।
1947 में इस्लामिक तरीके से भारत के बंटवारे से पहले, शक्सगाम घाटी जम्मू और कश्मीर रियासत का हिस्सा थी। इस सियासत के राजा हरि सिंह थे। यह इलाका हुंजा के लोकल सरदार मीर के राज में आता था। हुंजा ने हिंदू महाराजा के अधिकार को माना। इतिहास गवाह है कि शक्सगाम घाटी और रस्कम घाटी जम्मू और कश्मीर की सीमाओं में शामिल थी। 19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश सर्वे ने भी इसे माना था। हालाँकि चीन ने किंग राजवंश के नाम पर ऐतिहासिक संबंधों के आधार पर इस पर दावे किए, लेकिन उन्हें औपचारिक रूप नहीं दिया गया।

भारत के बंटवारे और 1947 में पाकिस्तान के बनने के बाद, पाकिस्तान के सपोर्ट वाले कबायली हमलावरों ने जम्मू और कश्मीर पर हमला किया, जिससे पहला भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू हो गया। युद्ध के बीच, महाराजा हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन यानी विलय पत्र पर साइन किए, जिससे शक्सगाम घाटी सहित पूरा जम्मू और कश्मीर औपचारिक रूप से भारत का हिस्सा बन गया।
लेकिन, लड़ाई के दौरान पाकिस्तान ने उत्तरी कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जिसमें शक्सगाम घाटी तक जाने वाले इलाके भी शामिल थे, क्योंकि यह कब्जा गैर-कानूनी था, इसलिए शक्सगाम घाटी समेत पूरा इलाका इंटरनेशनल कानून के मुताबिक आज भी भारतीय इलाका है।
यह माना जाता है कि चीन-पाकिस्तान के रिश्ते तभी मजबूत हुए, जब पाकिस्तान और चीन ने गैर-कानूनी CPEC के लिए हाथ मिलाया। लेकिन, पाकिस्तान लंबे समय से चीन को मना रहा है। चीन-पाकिस्तान के रिश्तों में छह दशकों का मिलिट्री सहयोग, आर्थिक और डिप्लोमैटिक तालमेल, 1963 में शक्सगाम घाटी पर समझौता, 1970 के दशक में न्यूक्लियर सहयोग की शुरुआत, 2013 में ग्वादर का ट्रांसफर और CPEC का ऑफिशियल लॉन्च शामिल है।
1962 में चीन-भारत युद्ध के बाद, पाकिस्तान ने चीन के साथ रिश्ते मज़बूत करने का मौका हाथ से जाने नहीं दिया। 2 मार्च 1963 को, चीन और पाकिस्तान ने चीन-पाकिस्तान फ्रंटियर एग्रीमेंट पर साइन किए। इस एग्रीमेंट के तहत पाकिस्तान ने दूसरे इलाकों में ‘सीमा एडजस्ट’ करने के बदले शक्सगाम वैली का कंट्रोल चीन को दे दिया। हालाँकि, यह एग्रीमेंट कंडीशनल था, जिसमें कहा गया था कि दिया गया इलाका कश्मीर मुद्दे पर भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले किसी भी सेटलमेंट में फाइनल रेजोल्यूशन के अधीन होगा।
गैर-कानूनी होने के अलावा यह समझौता बहुत गलत था। चीन शक्सगाम वैली पर कंट्रोल कैसे कर सकता है, इसे अपने शिनजियांग प्रांत में कैसे मिला सकता है, जबकि यह भी दावा कर सकता है कि यह इलाका कश्मीर पर फाइनल रेजोल्यूशन के अधीन होगा? मान लीजिए, अगर भारत और पाकिस्तान कश्मीर पर सहमत हो जाते हैं, और शक्सगाम वैली को भारत को वापस करने का फैसला किया जाता है, तो क्या चीन, वहां इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी इन्वेस्टमेंट करने के बाद, स्ट्रेटेजिक रूप से महत्वपूर्ण वैली को भारत को सौंप देगा?
भारत ने 1963 के चीन-पाकिस्तान एग्रीमेंट को लगातार इस आधार पर खारिज किया है कि पाकिस्तान ने जम्मू और कश्मीर के उन हिस्सों पर गैर-कानूनी कब्जा कर लिया है जिन्हें अब PoK कहा जाता है, और इस तरह उसके पास भारत के इलाके पर बातचीत करने या उसे सौंपने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। क्योंकि विलय के समय शक्सगाम घाटी जम्मू और कश्मीर का हिस्सा थी, इसलिए PoK पर पाकिस्तान का कंट्रोल एक गैर-कानूनी कब्जा है।
पाकिस्तान को चीन के साथ भारतीय इलाके के बारे में द्विपक्षीय समझौता करने का कोई हक नहीं था। यह नहीं भूलना चाहिए कि हुंजा के मीर ने महाराजा हरि सिंह के अधिकार को मान्यता दी थी, और महाराजा ने कानूनी तौर पर और अपनी मर्जी से पूरा जम्मू और कश्मीर भारत को दे दिया था।
PoK सरकार ने 1949 में पाकिस्तान सरकार के साथ कराची एग्रीमेंट किए, जिसमें गिलगित-बाल्टिस्तान के सभी ज़मीनी अधिकार पाकिस्तान को दे दिए गए थे। खबर है कि इस एग्रीमेंट पर मुश्ताक अहमद गुरमानी (कश्मीर मामलों के मंत्री), सरदार मोहम्मद इब्राहिम खान (तथाकथित ‘आजाद कश्मीर’ के प्रेसिडेंट) और चौधरी गुलाम अब्बास ने साइन किए थे।
समझौते में तथाकथित ‘आजाद कश्मीर’ ने गिलगित-बाल्टिस्तान का पूरा एडमिनिस्ट्रेशन पाकिस्तान को सौंप दिया (जिसने इस इलाके का कुछ हिस्सा चीन को दे दिया)। इसी इलाके से पाकिस्तान ने 5000 स्क्वायर किलोमीटर (शक्सगाम घाटी) चीन को सौंप दिया था।
असल में सरदार इब्राहिम ने बाद में बताया कि उनके साइन नकली किए गए थे। दरअसल उनका साइन मुहम्मद दीन तासीर ने किए थे। कराची एग्रीमेंट पर साइन करने के तुरंत बाद इब्राहिम को पद से हटा दिया गया।
चाहे PoK पर कब्जा हो या शक्सगाम घाटी को सौंपना, पाकिस्तान पहले से ही एक गैर-कानूनी कब्जा करने वाला रहा है, जिसके पास पूरे जम्मू-कश्मीर इलाके के बारे में किसी भी देश के साथ कोई भी एग्रीमेंट करने का कोई कानूनी हक नहीं है।
भारत ने शक्सगाम घाटी में जमीनी हकीकत को बदलने की कोशिशों के खिलाफ चीन के सामने लगातार विरोध जताया है। अभी भी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का पुरजोर विरोध कर रहा है और 1963 में शक्सघाटी को चीनी कब्जे में दिए जाने का विरोध किया था। भारत अपने हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने का अधिकार भी रखता है। पड़ोसियों के रवैये पर भारत का स्टैंड हमेशा साफ रहा है।


