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DW न्यूज, ध्रुव राठी और KAS: NGO, एक्टिविज्म के सहारे भारत के खिलाफ जर्मनी की वैचारिक जंग; जानिए क्यों राहुल गाँधी पहुँचे हर्टी स्कूल

दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने मान लिया था कि जर्मनी अब सिर्फ एक व्यापारिक साझेदार भर रह जाएगा। वास्तविकता यह है कि शुरुआती झटकों के बाद जर्मनी कभी हाशिए पर गया ही नहीं। उसकी वापसी टैंकों और मिसाइलों के साथ नहीं हुई बल्कि संस्थाओं, नैतिकता और लोकतंत्र की भाषा के जरिए हुई।

2023 में भारत की एक अदालत ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को मानहानि के एक मामले में दोषी ठहराया। उन्हें सजा सुनाई गई और कुछ समय के लिए उनकी लोकसभा सदस्यता भी रद्द हुई। यह मामला पूरी तरह भारत का था, नागरिक से लेकर अदालत और कानून तक सब भारतीय थे लेकिन इस फैसले पर सबसे पहला अंतरराष्ट्रीय बयान भारत के किसी पड़ोसी या रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी से नहीं बल्कि जर्मनी से आया। जर्मन विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह स्थिति पर नजर बनाए हुए है और उम्मीद करता है कि न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं होगा।

यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। सवाल यह नहीं कि बयान आया बल्कि यह कि जर्मनी को क्यों लगा कि उसे भारत के एक आंतरिक न्यायिक मामले पर टिप्पणी करनी चाहिए। यही सवाल आज उस बड़ी पजल की हिस्सा बनता है जिसे अब तक अक्सर नजरअंदाज किया गया है।

DW न्यूज और हिंदी-उर्दू स्पेस में जर्मनी की मौजूदगी

आमतौर पर जब भारत में विदेशी दखल, रेजिम चेंज या नैरेटिव वॉर की चर्चा होती है, तो उंगलियाँ सीधे अमेरिका की ओर उठती हैं। CIA, USAID और डीप स्टेट जैसे शब्द आम हो चुके हैं लेकिन इसी शोर में एक देश अक्सर बिना ध्यान खींचे निकल जाता है- जर्मनी।

BBC और Voice of America के अलावा अगर किसी विदेशी शक्ति ने भारत के हिंदी-उर्दू स्पेस को रणनीतिक रूप से साधा, तो वह न रूस था, न फ्रांस बल्कि वह जर्मनी था। डॉयचे वेले (DW) न्यूज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्ष 2024 में DW के हिंदी-उर्दू प्लेटफॉर्म को भारत में 60 साल पूरे हुए। टैक्सपेयर्स के पैसे से चलने वाला यह स्टेट-फंडेड मीडिया भारत कवरेज में एक साफ पैटर्न दिखाता है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय मीडिया और बहुसंख्यक समाज पर लगातार हमले, कोविड काल में ‘out of control India‘ जैसे नैरेटिव, कश्मीर में सुरक्षा बलों को ‘occupying force‘ कहना और अलगाववादी स्वरों को मंच देना शामिल है।

BBC की भारत में गहरी पैठ को औपनिवेशिक और कॉमनवेल्थ इतिहास से समझा जा सकता है लेकिन DW की इतनी लंबी और सुसंगठित मौजूदगी को संयोग नहीं कहा जा सकता। यह जर्मनी की नई सॉफ्ट पावर रणनीति का हिस्सा है जिसमें कम शोर लेकिन गहरी पैठ के साथ नैरेटिव सेट करना शामिल है।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद का जर्मनी: टैंकों से नहीं, विचारों से वापसी

दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने मान लिया था कि जर्मनी अब सिर्फ एक व्यापारिक साझेदार भर रह जाएगा। वास्तविकता यह है कि शुरुआती झटकों के बाद जर्मनी कभी हाशिए पर गया ही नहीं। उसकी वापसी टैंकों और मिसाइलों के साथ नहीं हुई बल्कि संस्थाओं, नैतिकता और लोकतंत्र की भाषा के जरिए हुई।

युद्ध के बाद जर्मनी ने ‘Wandel durch Handel‘ यानी ‘व्यापार के जरिए बदलाव’ की नीति अपनाई जिसमें कम राजनीति, कम नैतिक उपदेश और ज्यादा आर्थिक-सॉफ्ट पावर थी। यह उसका पहला चरण था। अब जर्मनी खुद को केवल आर्थिक शक्ति नहीं बल्कि एक ‘मोरल सुपरपावर‘ के रूप में पेश करना चाहता है जो दुनिया को बताए कि लोकतंत्र कैसा होना चाहिए, मानवाधिकार क्या होते हैं और आजादी की सही परिभाषा क्या है।

यहीं से समस्या शुरू होती है। जब कोई देश खुद को नैतिक निर्णायक मान लेता है, तो दूसरों की संप्रभुता उसे बाधा लगने लगती है। भारत, जो अपने लोकतंत्र के लिए पश्चिमी देशों से प्रमाणपत्र नहीं चाहता है वो स्वाभाविक रूप से इस टकराव का केंद्र बन जाता है।

अपराधबोध से नैतिक दादागिरी तक

जर्मनी की आधुनिक विदेश नीति उसके नाजी अतीत और यहूदियों के नरसंहार के गहरे अपराधबोध से जुड़ी है। दशकों तक चले इस अपराधबोध से निकलने के लिए जर्मनी ने ‘मोरल रीब्रांडिंग’ का रास्ता चुना यानी खुद को दुनिया का नैतिक शिक्षक बना लेना। समय के साथ यह प्रायश्चित दखल में बदलता गया। इस दखल का नतीजा भारत जैसे देशों के लोकतंत्र को ‘सुधारने’ की जिद में नजर आने लगा।

अमेरिका जहाँ खुले सैन्य ऑपरेशन, तख्तापल्ट और युद्ध करता है। वहीं, जर्मनी का तरीका शांत और संस्थागत है और वो NGOs, अकादमिक नेटवर्क, मीडिया और फाउंडेशन्स के जरिए विचारधारा का विस्तार। यही कारण है कि जर्मनी कम दिखाई देता है लेकिन जमीनी स्तर पर उसकी पकड़ कहीं ज्यादा गहरी होती है।

भारत में जर्मनी के फ्रंट्स

भारत में जर्मनी का प्रभाव कई चेहरों में दिखता है जैसे सिविल सोसायटी, अकादमिक नेटवर्क, मीडिया, डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स और ‘डेमोक्रेटिक बैकस्लाइडिंग’ का फ्रेम आदि। इनके चेहरे अलग हैं, दिशा एक ही है।

ऐसा भी नहीं है कि किसी का ध्यान जर्मनी के इन तरीकों पर कभी गया ही नहीं। ऑपइंडिया ने जब CSDS पर रिसर्च की थी तो हमने बताया था कि CSDS जैसी संस्थाओं के पीछे जर्मनी की भूमिका कितनी गहरी है। हमारे इस रिसर्च पेपर में आप पढ़ भी सकते हैं कि जर्मनी अपनी संस्थाओं को उन देशों में सक्रिय होने के लिए फंडिंग दे रहा है जहाँ उसने मान लिया है कि ‘लोकतंत्र खतरे में है’।

यही कारण है कि जर्मन विदेश मंत्रालय अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी, मणिपुर हिंसा या अन्य भारतीय आंतरिक मामलों पर बयान देने से नहीं हिचकता। यह केवल कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि जर्मनी की उस नई विदेश नीति का हिस्सा है, जिसमें ‘मानवाधिकारों की रक्षा, देश की अपनी संप्रभुता से ऊपर’ रखी जाती है।

राहुल गाँधी, हर्टी स्कूल और नैरेटिव एक्सपोर्ट

इसी संदर्भ में राहुल गाँधी की जर्मनी यात्राओं को भी देखा जाता है। हाल ही में उन्होंने जर्मनी के हर्टी स्कूल ऑफ गवर्नेंस में लेक्चर दिया। यह संस्थान भी नाजी अतीत के ‘प्रायश्चित’ से जुड़ा है। यह स्कूल जिस हर्टी फाउंडेशन ने बनाया था, वो असल में 19वीं सदी के एक बड़े डिपार्टमेंट स्टोर (Tietz department store) से आया है लेकिन नाजी दौर में इस यहूदी टिट्ज़ परिवार की संपत्ति को आर्यीकरण (Aryanization) के नाम पर छीन लिया गया था, जिससे फाउंडेशन को फायदा पहुँचा। यह फाउंडेशन अब ‘प्रायश्चित’ के नाम पर ‘लोकतंत्र को मजबूत करने’ के लिए भारी निवेश करता है।

अब यह कथित ‘प्रायश्चित’ दूसरे देशों के लोकतंत्र में दखल डालने का बहाना बन गया है जिसमें भारत जैसे देशों की राजनीति में अपनी नीतियों और विचारों को थोपना शामिल है। जब ऐसे मंचों से जब राहुल गाँधी ‘Institutional Capture’ या ‘People will fight each other’ जैसे बयान देते हैं, तो यह केवल भाषण नहीं रह जाते बल्कि यह एक नैरेटिव का निर्यात होता है। और इसका असल इंजन है KAS।

KAS: एक वैचारिक इंजन

कोनराड आडेनाउअर श्टिफ्टुंग (Konrad Adenauer Stiftung) जिसे संक्षेप में KAS कहा जाता है, इस पूरी कहानी का सबसे अहम किरदार है। यह कोई न्यूट्रल NGO या सामान्य थिंक-टैंक नहीं है। KAS दरअसल जर्मनी की सत्तारूढ़ राजनीतिक परंपरा की वैचारिक मशीन है, जिसकी जड़ें सीधे Christian Democratic Union (CDU) में जाती हैं। खुद KAS अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है कि वह CDU से politically affiliated संस्था है। इसमें कोई पर्दा नहीं है, कोई संकोच नहीं है।

इसमें हैरानी भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि CDU और KAS, इन दोनों के पीछे जो वैचारिक आत्मा थी, वह एक ही व्यक्ति था- कोनराड आडेनाउअर (Konrad Adenauer)। यदि इस एक व्यक्ति को समझ लिया जाए, तो न केवल आधुनिक जर्मनी की राजनीति को समझा जा सकता है, बल्कि यह भी समझ में आता है कि आज जर्मनी कई मोर्चों पर इतना बेचैन और आक्रामक क्यों दिखाई देता है।

कोनराड आडेनाउअर: जर्मनी के पहले चांसलर की कहानी

कोनराड आडेनाउअर कोई साधारण नेता नहीं थे। वे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिम जर्मनी के पहले चांसलर बने। नाजी तबाही के बाद खंडहरों में खड़े जर्मनी को दोबारा उठाने और उसे पश्चिमी दुनिया की मुख्यधारा में वापस लाने वाला चेहरा वही थे। उन्होंने जर्मनी को अलग-थलग नहीं छोड़ा। उन्होंने जर्मनी को अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के साथ जोड़ा, NATO में शामिल कराया और यूरोपीय एकीकरण की नींव रखी, जिसकी शुरुआत European Coal and Steel Community से हुई। यह सब केवल सत्ता या रणनीति की राजनीति नहीं थी। इसके पीछे एक गहरी वैचारिक योजना थी।

कोनराड कट्टर रोमन कैथोलिक थे। वे पूरी जिंदगी बाइबिल पढ़ते रहे और राजनीति को ईसाई नैतिकता से अलग मानने को तैयार नहीं थे। उनका विश्वास था कि ईसाई सामाजिक मूल्यों के बिना कोई भी समाज टिकाऊ नहीं हो सकता। उनके लिए यूरोप केवल भौगोलिक इकाई नहीं बल्कि एक Christian civilization था और यदि उसमें से ईसाई मूल्य निकाल दिए गए, तो वह सभ्यता खोखली हो जाएगी।

इसी कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कोनराड की नजर में असली वैश्विक संघर्ष था- ईसाई सभ्यता बनाम मार्क्सवाद। वे कम्युनिज्म को नाजीवाद जितना ही खतरनाक मानते थे और सोवियत संघ को स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा समझते थे। यही सोच उन्हें NATO और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी तक ले गई।

इसी वैचारिक आधार पर Christian Democratic Union (CDU) का गठन हुआ। CDU कोई सामान्य पार्टी नहीं थी। इसे जानबूझकर इस तरह गढ़ा गया कि सदियों से बँटे कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट एक मंच पर आ सकें और ईसाई सिद्धांतों पर आधारित राजनीति कर सकें। कोनराड का मानना था कि राजनीति को ईसाई नैतिकता से चलना चाहिए।

पेशे से वकील कोनराड 1917 में कोलोन के मेयर बने लेकिन 1933 में नाजियों के सत्ता में आते ही उन्हें पद से हटा दिया गया। नाजी शासन के दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा। 1944 में हिटलर की हत्या की कोशिश के बाद गेस्टापो (नाजियों की सीक्रेट पुलिस) ने उन्हें फिर गिरफ्तार किया। युद्ध के बाद वह राइनलैंड के Christian Democratic दल के अध्यक्ष बने फिर British Zone के CDU का अध्यक्ष इसके बाद Parliamentary Council का राष्ट्रपति और अंततः पश्चिम जर्मनी का चांसलर बन गए।

20 दिसंबर 1955 को CDU से जुड़े नेताओं ने Society for Christian Democratic Educational Work नामक संस्था बनाई, जिसका उद्देश्य शिक्षा, रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के जरिए ईसाई लोकतांत्रिक विचारधारा को फैलाना था। 1964 में इस संस्था का नाम बदलकर Konrad Adenauer Stiftung रखा गया। यानी KAS सीधे तौर पर CDU की वैचारिक विरासत और कोनराड आडेनाउअर की सोच का संस्थागत विस्तार है।

भारत और दुनिया में KAS का वैचारिक युद्ध

आज यही KAS भारत में सक्रिय है। यह CSDS जैसी संस्थाओं को फंडिंग देता है। इन्हीं के जरिए भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए जाते हैं, बहुसंख्यक समाज को निशाना बनाया जाता है और संप्रभुता को कमजोर करने वाले नैरेटिव गढ़े जाते हैं। जानकारी के अनुसार 2016 से अब तक KAS ने CSDS को 2.6 करोड़ रुपए से अधिक की फंडिंग दी है।

कागजों पर KAS शिक्षा, रिसर्च और स्कॉलरशिप की बात करता है लेकिन जमीनी स्तर पर इसका काम युवाओं को ट्रेन करना, पॉलिसी नैरेटिव बनाना और मीडिया व अकादमिक नेटवर्क तैयार करना है। इससे सीधे सरकारें नहीं गिरतीं लेकिन समाज की सोच बदली जाती है। आज सरकारें टैंकों से नहीं बल्कि विचारों और डिजिटल नैरेटिव्स से अस्थिर होती हैं।

भारत से जुड़े मामलों पर जर्मनी के बयान, केजरीवाल की गिरफ्तारी, मणिपुर हिंसा या मानवाधिकार बनाम संप्रभुता ये सब इसी वैचारिक फ्रेम से आते हैं। KAS जैसे संगठन टैंक नहीं भेजते बल्कि वे विचार, नेटवर्क और नैरेटिव भेजते हैं।

यह मॉडल अमेरिका के USAID जैसा है। फर्क यह है कि USAID अमेरिकी मॉडल को बढ़ावा देता है जबकि KAS यूरोपीय और विशेष रूप से जर्मन रास्ते को। KAS देशों को EU मॉडल के अनुरूप ढालने की कोशिश करता है। इसी कारण दोनों संस्थाओं के बीच कई देशों में टकराव भी दिखता है। KAS चाहती है कि देश यूरोप से जुड़ें और USAID चाहती है कि देश अमेरिका के अनुसार चलें।

इतिहास में भी जर्मनी का भारत को लेकर रुख इसी रणनीति से तय रहा है। 1961 में गोवा मुक्ति पर पश्चिम जर्मनी ने भारत की आलोचना की क्योंकि पुर्तगाल NATO का सदस्य था। 1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान भी शुरुआत में जर्मनी ने भारत की आलोचना की। 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद जर्मनी ने सहायता रोकी और भारत पर NPT में शामिल होने का दबाव डाला।

जर्मन राजनीति का श्टिफ्टुंग मॉडल

जर्मनी की राजनीतिक व्यवस्था में एक अनोखी चीज है Stiftung यानी राजनीतिक फाउंडेशन्स। ये फाउंडेशन पार्टियों से जुड़े होते हैं, सरकारी फंड लेते हैं और दुनिया भर में ‘लोकतंत्र सिखाने’ निकलते हैं। भारत में इनके पैटर्न के कारण गृह मंत्रालय ने कई बार सख्त रुख अपनाया है। इसी प्रक्रिया में CPR और Oxfam India जैसे संगठनों के FCRA लाइसेंस रद्द हुए हैं।

जर्मनी की इस रणनीति के तीन प्रमुख स्तंभ उसके राजनीतिक फाउंडेशन मॉडल Stiftung में दिखाई देते हैं। पहला नाम फ़्रीडरिष एबर्ट श्टिफ्टुंग (Friedrich Ebert Stiftung- FES) का है। यह संस्था जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) से जुड़ी मानी जाती है। आरोप है कि FES उन गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को फंड देती है, जो ‘लेबर राइट्स’ के नाम पर औद्योगिक अशांति को बढ़ावा देते हैं और विकास परियोजनाओं का विरोध करते हैं। वर्ष 2022 में FES की एक रिपोर्ट को लेकर विवाद हुआ था, जिसमें भारत की तुलना authoritarian regimes से की गई थी और ‘cow vigilantes’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था।

दूसरी संस्था है हाइनरिष बॉएल श्टिफ्टुंग (Heinrich Böll Stiftung- HBS) जो जर्मनी की ग्रीन पार्टी से जुड़ी है। भारत को लेकर सबसे आक्रामक रुख इसी संस्था का बताया जाता है। कोयला परियोजनाओं, न्यूक्लियर एनर्जी, अडानी जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से लेकर आरोग्य सेतु ऐप तक, HBS ने कई मुद्दों पर आपत्ति जताई है। जाँच एजेंसियों द्वारा जब कई मामलों में money trail खंगाली गई, तो कुछ मामलों में उसका सिरा इन जर्मन फाउंडेशनों तक पहुँचने की बात सामने आई।

तीसरी अहम संस्था है कोनराड आडेनाउअर श्टिफ्टुंग (Konrad Adenauer Stiftung- KAS), जो जर्मनी की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) से जुड़ी है। KAS का फोकस युवाओं, पॉलिसी मेकर्स और अकादमिक जगत पर बताया जाता है। यह संस्था सर्वे, फेलोशिप और विभिन्न प्रोग्राम्स के जरिए सरकार विरोधी विचारधाराओं को वैचारिक रूप देने का काम करती है। मीडिया, रिसर्च और ट्रेनिंग तीनों क्षेत्रों में KAS एक साथ सक्रिय रहती है।

Feminist Foreign Policy: नैतिकता या दखल?

जर्मनी की विदेश नीति में एक नया शब्द हाल के वर्षों में बार-बार सामने आया है- Feminist Foreign Policy। जर्मनी की विदेश मंत्री ऐनालेना बेयरबॉक ने इसे ‘महिलाओं के अधिकार और समानता’ के नाम पर पेश किया। लेकिन भारत के संदर्भ में इस नीति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। भारत के मामले में जर्मनी की इस नीति के तहत दिए गए कई बयान विवादों में रहे हैं। कश्मीर मुद्दे पर जर्मनी का पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाते हुए संयुक्त राष्ट्र के दखल की बात करना, मणिपुर हिंसा को ‘हिंदू बनाम ईसाई’ के फ्रेम में पेश करना और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी पर सार्वजनिक टिप्पणी करना इन सबको भारत की ‘रेड लाइन’ पार करने के उदाहरण के रूप में देखा गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि जर्मनी केवल कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है बल्कि उसने भारत में डिजिटल और सूचना युद्ध के लिए भी कई मोर्चे तैयार किए हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया की अहम भूमिका मानी जाती है। जर्मनी के सरकारी मीडिया संस्थान डॉयचे वेले (DW) का नाम पहले भी इन बहसों में आ चुका है।

इसके अलावा, कुछ भारतीय डिजिटल प्लेटफॉर्म और मीडिया संस्थानों के जर्मनी से जुड़े नेटवर्क भी चर्चा में हैं। द कारवां जैसे मीडिया संस्थान का नाम Konrad Adenauer Stiftung (KAS) के Media Programme Asia नेटवर्क से जुड़ा है। आरोप है कि जर्मनी बदलते समय के साथ अपने सूचना युद्ध की रणनीति और पैकेजिंग दोनों में बदलाव करता रहा है।

इसी कड़ी में कुछ डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स पर भी सवाल उठते हैं, जिनका प्रभाव 2019 के आम चुनाव से पहले अचानक बढ़ा। उदाहरण के तौर पर ध्रुव राठी, जो पहले ज्यादा चर्चित नहीं थे लेकिन बाद में BBC, NDTV जैसे मंचों पर जाति, आरक्षण, गंगा, चुनाव और EVM जैसे संवेदनशील मुद्दों पर दिखाई देने लगे और यूट्यूब पर तेजी से लोकप्रिय हुए।

जर्मनी भारत-विरोधी डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स के लिए एक तरह का सुरक्षित ठिकाना बन गया है। जर्मनी के सख्त प्राइवेसी और फ्री स्पीच कानून उन्हें भारतीय कानूनी कार्रवाई से बचाने में मदद करते हैं।

जर्मनी की Normative Power

विश्लेषकों के मुताबिक, यह सब जर्मनी की उस रणनीति का हिस्सा है जिसे Normative Power कहा जाता है। एक बहुध्रुवीय दुनिया में जर्मनी सैन्य ताकत के बजाय नैरेटिव, संस्थाओं और विचारधाराओं के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। जर्मनी यह तय करने की भूमिका अपने हाथ में रखना चाहता है कि कौन देश ‘लोकतांत्रिक’ है और कौन नहीं।

भारत आज जर्मनी का एक अहम आर्थिक साझेदार है लेकिन जर्मनी का राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग भारत को एक उभरते हुए सभ्यतावादी राज्य (Civilizational State) के रूप में स्वीकार करने में असहज दिखता है। खासतौर पर तब जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में टॉप-3 की दौड़ में भारत के आगे बढ़ने से जर्मनी के पीछे छूटने की आशंका है।

क्या हम इस खेल को पहचान रहे हैं कि आज की जंग बॉर्डर पर नहीं बल्कि संस्थाओं, विचारों और नैरेटिव्स में लड़ी जा रही है। ऑपइंडिया की इन सभी पर नजर बनी हुई है और इसीलिए हम CSDS की तरह ही जर्मनी के बाकी के इन फ्रंट्स पर भी जल्दी ही एक और बड़ी रिसर्च लेकर आएँगे ताकि इस पूरे नेक्सस की बारीकियों और मोडस ऑपरेंडाई से आप भी वाकिफ हो सकें।

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आशीष नौटियाल
आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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