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अब स्किल-सैलरी के आधार पर मिलेगा US का H-1B वीजा, ट्रंप प्रशासन ने खत्म किया लॉटरी सिस्टम: जानिए- इससे कौन और कैसे होंगे प्रभावित

हर साल अमेरिका में 85,000 H-1B वीजा जारी किए जाते हैं। इनमें से 65,000 रेगुलर कैप के तहत और 20,000 अमेरिकी यूनिवर्सिटी से एडवांस्ड डिग्री (मास्टर्स या पीएचडी) वाले कैंडिडेट्स के लिए रिजर्व होते हैं।

अमेरिका के ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा प्रोग्राम में एक बड़ा बदलाव का ऐलान किया है। यह वीजा मुख्य रूप से विदेशी स्किल्ड वर्कर्स, खासकर टेक्नोलॉजी सेक्टर में काम करने वालों के लिए होता है। अब तक इस वीजा को लॉटरी सिस्टम से दिया जाता था, लेकिन अब इसे खत्म कर दिया गया है।

नई व्यवस्था में ज्यादा स्किल्ड और ज्यादा सैलरी वाले विदेशी वर्कर्स को प्राथमिकता मिलेगी। अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने 23 दिसंबर 2025 को इसकी घोषणा की। यह बदलाव 27 फरवरी 2026 से लागू होगा और अगले H-1B कैप रजिस्ट्रेशन सीजन पर असर डालेगा।

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इससे अमेरिकी वर्कर्स की नौकरियाँ और सैलरी सुरक्षित रहेंगी, क्योंकि पुराने सिस्टम में कंपनियाँ कम सैलरी पर विदेशी वर्कर्स हायर करके अमेरिकियों को नुकसान पहुँचा रही थीं।

यह बदलाव ऐसे समय में आया है जब अमेरिका में इमिग्रेशन पॉलिसी को लेकर बहस तेज है। H-1B वीजा मुख्य रूप से इंडियन प्रोफेशनल्स के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 71 प्रतिशत H-1B होल्डर्स भारत से होते हैं। लेकिन नई पॉलिसी से इंडियंस पर भी असर पड़ेगा, खासकर उन पर जो एंट्री लेवल जॉब्स या कम अनुभव वाले हैं।

आइए- इस बदलाव को विस्तार से समझते हैं। पहले जानते हैं कि पुराना सिस्टम कैसा था, फिर नए बदलाव के फायदे-नुकसान और अमेरिका में लगने वाले आरोपों पर चर्चा करेंगे।

लॉटरी पर आधारित था पुराना H-1B वीजा सिस्टम

H-1B वीजा अमेरिका का एक नॉन-इमिग्रेंट वर्क वीजा है, जो स्पेशल ऑक्यूपेशन में काम करने वाले विदेशियों को दिया जाता है। यह मुख्य रूप से आईटी, इंजीनियरिंग, मेडिसिन और अन्य हाई-स्किल्ड फील्ड्स के लिए होता है। हर साल अमेरिका में 85,000 H-1B वीजा जारी किए जाते हैं। इनमें से 65,000 रेगुलर कैप के तहत और 20,000 अमेरिकी यूनिवर्सिटी से एडवांस्ड डिग्री (मास्टर्स या पीएचडी) वाले कैंडिडेट्स के लिए रिजर्व होते हैं।

पुराने सिस्टम में प्रोसेस कुछ इस तरह था: सबसे पहले अमेरिकी कंपनियाँ (जैसे अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल या टीसीएस) विदेशी वर्कर के लिए पेटिशन फाइल करती थीं। हर साल अप्रैल में रजिस्ट्रेशन ओपन होता था, और अगर अप्लिकेशंस कैप से ज्यादा आतीं (जो हमेशा आती थीं, क्योंकि डिमांड बहुत ज्यादा होती है), तो USCIS (यूएस सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज) रैंडम लॉटरी चलाती थी। लॉटरी में सिलेक्ट होने पर ही आगे प्रोसेसिंग होती थी, जिसमें बैकग्राउंड चेक, इंटरव्यू और अप्रूवल शामिल था।

उदाहरण के लिए FY 2025 में लाखों अप्लिकेशंस आईं, लेकिन सिर्फ 85,000 को ही वीजा मिला। अमेजन को सबसे ज्यादा 10,000 से अधिक अप्रूवल मिले, उसके बाद टीसीएस, माइक्रोसॉफ्ट, ऐपल और गूगल। कैलिफोर्निया में सबसे ज्यादा H-1B वर्कर्स रहते हैं। इस लॉटरी सिस्टम की वजह से कई बार कम स्किल्ड या कम सैलरी वाले भी सिलेक्ट हो जाते थे, जबकि हाई स्किल्ड वाले बाहर रह जाते थे। यूजर के शब्दों में कहें तो “लॉटरी में गधे भी चले जाते थे”, मतलब किस्मत पर निर्भर था, स्किल पर नहीं।

अमेरिका में लगते थे H-1B वीजा के गलत इस्तेमाल के आरोप

ट्रंप प्रशासन ने पुराने सिस्टम पर कई आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि अमेरिकी कंपनियाँ H-1B का दुरुपयोग कर रही थीं। वे कम सैलरी पर विदेशी वर्कर्स हायर करके अमेरिकी लोगों को निकाल देती थीं। USCIS स्पोक्सपर्सन मैथ्यू ट्रैगेसर ने कहा, “मौजूदा रैंडम सिलेक्शन प्रक्रिया का दुरुपयोग हो रहा था। अमेरिकी नियोक्ता कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को लाने के लिए इसका फायदा उठा रहे थे, जबकि अमेरिकी कर्मचारियों को ज्यादा वेतन देना पड़ता।”

उदाहरण के तौर पर सितंबर 2025 में ट्रंप ने एक प्रेसिडेंशियल प्रोक्लेमेशन साइन किया, जिसमें कहा गया कि आईटी फर्म्स अमेरिकी वर्कर्स को लेऑफ करके H-1B पर कम सैलरी वाले विदेशियों को हायर कर रही हैं। एक रिपोर्ट में बताया गया कि एक आईटी फर्म ने FY 2025 में 1,700 H-1B वर्कर्स अप्रूव कराए, लेकिन जुलाई में 2,400 अमेरिकी वर्कर्स को निकाल दिया। इससे अमेरिकी वर्कर्स की सैलरी दबती है और जॉब मार्केट में अनफेयर कॉम्पिटिशन होता है। ट्रंप ने इसे ‘अमेरिका फर्स्ट’ पॉलिसी के खिलाफ बताया।

इसके अलावा आउटसोर्सिंग कंपनियाँ (जैसे इंडियन आईटी फर्म्स) पर आरोप लगे कि वे एंट्री लेवल जॉब्स के लिए H-1B यूज करती हैं, जो अमेरिकी ग्रेजुएट्स के लिए होनी चाहिए। इससे यूएस वर्कफोर्स की क्वॉलिटी गिर रही थी।

स्किल और सैलरी पर आधारित वेटेड सिलेक्शन अब नया सिस्टम

अब नया नियम क्या है? DHS ने रैंडम लॉटरी को रिप्लेस करके ‘वेटेड सिलेक्शन प्रोसेस’ लागू किया है। इसमें ज्यादा स्किल्ड और हाई सैलरी वाले कैंडिडेट्स की सिलेक्शन की प्रॉबेबिलिटी बढ़ जाएगी। मतलब, जो पेटिशन हाई वेज लेवल पर फाइल की जाएँगी, उन्हें ज्यादा वेटेज मिलेगा।

ट्रैगेसर ने कहा, “नई वेटेड सिलेक्शन प्रक्रिया कॉन्ग्रेस के इरादे को बेहतर तरीके से पूरा करेगी और अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत बनाएगी। इससे अमेरिकी कंपनियों को ज्यादा वेतन और ज्यादा कुशल विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन करने की प्रेरणा मिलेगी। इन नियामक बदलावों और भविष्य में आने वाले अन्य बदलावों से हम H-1B कार्यक्रम को अपडेट करते रहेंगे, ताकि अमेरिकी व्यवसायों की मदद हो सके, लेकिन अमेरिकी कर्मचारियों को नुकसान पहुंचाने वाले दुरुपयोग को रोका जा सके।”

वीजा की सालाना लिमिट वही रहेगी-65,000 + 20,000। लेकिन अब सिलेक्शन रैंडम नहीं, बल्कि मेरिट बेस्ड होगा। कंपनियों को हाई सैलरी ऑफर करनी पड़ेगी, ताकि सिलेक्शन चाँस बढ़े। यह बदलाव FY 2027 की रजिस्ट्रेशन से लागू होगा।

ट्रंप प्रशासन के फैसले से किन्हें होगा फायदा?

यह बदलाव मुख्य रूप से हाई स्किल्ड और अनुभवी वर्कर्स को फायदा देगा। जो लोग ज्यादा सैलरी वाली जॉब्स के लिए अप्लाई करेंगे, जैसे सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स, डेटा साइंटिस्ट्स या मैनेजमेंट रोल्स, उन्हें आसानी से वीजा मिल सकता है। अमेरिकी वर्कर्स को भी फायदा होगा, क्योंकि कंपनियाँ अब कम सैलरी पर विदेशियों को नहीं हायर कर पाएँगी, जिससे लोकल जॉब्स सुरक्षित रहेंगी।

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि इससे अमेरिका की इकोनॉमी मजबूत होगी, क्योंकि सिर्फ ‘बेस्ट ऑफ द बेस्ट’ टैलेंट आएगा। यूजर के अनुसार, अब अमेरिका ‘घोड़े’ लेगा, मतलब सिर्फ स्किल्ड और अनुभवी लोगों को।

ट्रंप सरकार का फैसला अच्छा है या बुरा

यह बदलाव अच्छा भी है और बुरा भी, निर्भर करता है किस नजरिए से देखें। अच्छा इसलिए कि यह अनफेयर प्रैक्टिस को रोकेगा। अमेरिकी वर्कर्स की सैलरी बढ़ेगी और जॉब मार्केट फेयर बनेगा। हाई स्किल्ड प्रोफेशनल्स के लिए यह मेरिट बेस्ड सिस्टम है, जहाँ किस्मत नहीं, काबिलियत मायने रखेगी। इससे अमेरिका ग्लोबल कॉम्पिटिशन में आगे रहेगा।

लेकिन बुरा इसलिए कि न्यू ग्रेजुएट्स या कम अनुभव वाले विदेशियों के लिए मुश्किल हो जाएगी। इंडियन आईटी प्रोफेशनल्स, जो एंट्री लेवल पर आते हैं, उन्हें नुकसान होगा। कंपनियाँ अब ज्यादा सैलरी ऑफर करने से कतराएंगी, जिससे ओवरऑल H-1B अप्लिकेशंस कम हो सकती हैं। आउटसोर्सिंग फर्म्स पर असर पड़ेगा। इसके अलावा यह बदलाव कंट्रोवर्शियल है, क्योंकि कुछ लोग इसे प्रोटेक्शनिस्ट पॉलिसी कहते हैं, जो ग्लोबल टैलेंट को रोकती है।

ट्रंप प्रशासन के इस फैसले से अन्य क्या असर होंगे

ट्रंप प्रशासन ने H-1B पर और भी सख्ती की है। सितंबर 2025 में नई H-1B अप्लिकेशंस पर 100,000 डॉलर एक्स्ट्रा फीस लगाई गई। इसका मकसद कम सैलरी वाली हायरिंग रोकना था। कैलिफोर्निया समेत 20 स्टेट्स ने इसके खिलाफ मुकदमा दायर किया, लेकिन एक फेडरल जज ने इसे बरकरार रखा।

इसके अलावा दिसंबर 2025 से सोशल मीडिया वेटिंग को एक्सपैंड किया गया। अब सभी H-1B और H-4 अप्लिकेंट्स की ऑनलाइन प्रेजेंस चेक की जाएगी, ताकि सिक्योरिटी थ्रेट्स पता चलें। इससे वीजा इंटरव्यू में देरी हो रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिसंबर में इंडिया में H-1B रिन्यूअल के लिए गए कई लोग फँसे रह गए। उनके अपॉइंटमेंट्स कैंसल हो गए और नए डेट्स मार्च 2026 तक मिले। इमिग्रेशन लॉयर्स का कहना है कि इससे कंपनियाँ इंतजार नहीं कर पाएँगी और रिलेशनशिप्स खराब होंगे।

ट्रंप ने $1 मिलियन ‘गोल्ड कार्ड’ वीजा भी इंट्रोड्यूस किया, जो वेल्थी इंडिविजुअल्स को सिटिजनशिप का रास्ता देता है, लेकिन यह H-1B से अलग है।

ट्रंप प्रशासन के फैसले से भारतीयों पर पड़ेगा कितना असर?

भारत के लिए H-1B बहुत महत्वपूर्ण है। 71% H-1B होल्डर्स इंडियन हैं। नई पॉलिसी से एंट्री लेवल इंडियंस को मुश्किल होगी, लेकिन सीनियर प्रोफेशनल्स को फायदा हो। हालाँकि अब अमेरिका पर निर्भर इंडियन आईटी इंडस्ट्री को रिस्ट्रक्चरिंग करनी पड़ेगी। स्ट्रैंडेड वर्कर्स की समस्या से फैमिलीज प्रभावित हो रही हैं।

पॉइंट्स में समझें बदलाव…

पुराना vs नया प्रोसेस: पुराना – रैंडम लॉटरी; नया – वेटेड सिलेक्शन (हाई वेज को ज्यादा चांस)।
वीजा लिमिट: पहले की तरह 85,000 सालाना।
कम से लागू होगा सिस्टम: 27 फरवरी 2026 से।
फायदे: अमेरिकी जॉब्स सुरक्षित होंगी, हाई टैलेंट को आकर्षित करने पर फोकस।
नुकसान: न्यूकमर्स के लिए मुश्किल होगा वीजा पाना।
अन्य रोक: 100,000 डॉलर फीस, सोशल मीडिया चेक।
भविष्य: H-1B और L-1 वीजा रिफॉर्म एक्ट 2025 में और बदलाव, जैसे यूएस वर्कर्स को डिस्प्लेसमेंट से 180 दिन प्रोटेक्शन।

कुल मिलाकर यह बदलाव अमेरिका की इमिग्रेशन पॉलिसी को ‘अमेरिका फर्स्ट’ की दिशा में ले जा रहा है। जबकि कुछ इसे जरूरी सुधार मानते हैं, दूसरों को लगता है कि इससे इनोवेशन प्रभावित होगा। इंडिया जैसे देशों को अब ज्यादा स्किल डेवलपमेंट पर फोकस करना पड़ेगा। हालाँकि इसका अमेरिका पर भी बुरा असर पड़ सकता है, क्योंकि स्किल्ड लोगों की जरूरत पड़ने पर अब अमेरिकी कंपनियों को भी मोटी रकम चुकानी पड़ेगी।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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