अमेरिकी सीनेटर चक शूमर ने गुनीशा कौर नाम की एक खालिस्तान समर्थक महिला को अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (USCIRF) में नियुक्त करने का एलान किया है। बता दें कि USCIRF का भारत और उसके आंतरिक मामलों के खिलाफ फर्जी खबरें फैलाने का पुराना इतिहास रहा है।
पेशे से डॉक्टर और मानवाधिकार रिसर्च की कथित विशेषज्ञ गुनीशा कौर को आयोग में शामिल होने वाली ‘पहली सिख’ के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि उनके भारत-विरोधी और खालिस्तान समर्थक रुख को छुपाया जा रहा है। वह अगले 2 साल तक USCIRF के 9 कमिश्नरों में से एक के रूप में काम करेंगी।
अमेरिकी सीनेटर चक शूमर ने अपने बयान में कहा, “मुझे पूरा भरोसा है कि वह आयोग में अपनी सेवा के दौरान अपने गहरे मेडिकल, एकेडमिक, रिसर्च, धार्मिक और लीडरशिप के अनुभवों का फायदा पहुँचाएँगी।”
खालिस्तान समर्थक प्रोपेगैंडा का इतिहास
गुनीशा कौर साल 2009 से ही 1984 के दंगों के दौरान सिखों पर हुए अत्याचारों को उजागर करने के बहाने खालिस्तान समर्थक प्रोपेगैंडा फैलाने में जुटी हुई हैं। इस सिलसिले में उन्होंने ‘लॉस्ट इन हिस्ट्री: 1984 रिकंस्ट्रक्टेड’ नाम की एक किताब भी लिखी है।
अपनी किताब में कौर ने आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को “1970 और 1980 के दशक की शुरुआत में सिखों का एक करिश्माई और प्रभावशाली नेता” बताया था। उन्होंने उसे एक ‘धार्मिक नेता’ भी कहा और दावा किया कि भारत सरकार ने उसे जानबूझकर एक चरमपंथी और अलगाववादी के रूप में पेश किया।
किताब में USCIRF की इस नई कमिश्नर ने भिंडरावाले की देखरेख में खालिस्तानियों द्वारा हिंदुओं पर किए गए हमलों का दोष भी भारत सरकार पर मढ़ दिया। गुनीशा कौर ने दावा किया, “इस दौरान हिंदुओं के खिलाफ जो भी हिंसा की घटनाएं हुईं, चाहे वे सरकार द्वारा प्रायोजित थीं या किसी स्वतंत्र गुट द्वारा की गईं, उनका आरोप आमतौर पर जरनैल सिंह पर ही लगा दिया गया।”

किताब में आगे उन्होंने आरोप लगाया कि भारत सरकार ने उत्तरी भारत की हिंदू आबादी का राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए जरनैल सिंह भिंडरावाले की छवि को खराब किया।
आतंकवादी का बचाव करते हुए कौर ने लिखा, “जरनैल सिंह पर जो आरोप थे वे मामूली थे, जिनमें सबसे गंभीर आरोप उन पर भड़काऊ भाषण देने का था।”
यह उनकी उस कट्टरपंथी सोच को दिखाता है जो एक आतंकवादी को हर तरह से सही ठहराने की कोशिश करती है।
जून 2013 में गुनीशा कौर ने ‘हफिंगटन पोस्ट’ के कंट्रीब्यूटर प्लेटफॉर्म पर इसी तरह का एक लेख लिखा था। इस वेबसाइट पर लिखा होता है कि लिखने वाले अपने काम के खुद जिम्मेदार हैं और आजादी से पोस्ट कर सकते हैं।

इस लेख की मुख्य तस्वीर के कैप्शन में आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को ‘संत’ और ‘सिख नेता’ बताया गया था, जबकि खालिस्तान को ‘एक स्वतंत्र सिख राज्य की कल्पना को दिया गया नाम’ लिखा गया था।
भारत विरोधी बयानबाजी का अतीत
इसके बाद दिसंबर 2020 में USCIRF की यह नई कमिश्नर सीएनएन (CNN) जैसे विदेशी वामपंथी प्रकाशनों में भारत विरोधी नैरेटिव फैलाने में व्यस्त थीं। गुनीशा कौर ने एक साझा लेख लिखा, जिसमें झूठा आरोप लगाया गया कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए 3 कृषि कानून किसी तरह ‘छोटे किसानों को नुकसान पहुँचा रहे हैं और बड़े कॉरपोरेट्स को फायदा दे रहे हैं’।
इस लेख में ‘पुलिस की बर्बरता’ को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के साथ-साथ खालिस्तान के एजेंडे को यह कहकर सही ठहराने की कोशिश की गई कि ‘पंजाब में सिखों का एक हिस्सा आत्मनिर्णय के लिए सालों से सशस्त्र विद्रोह में शामिल था।’ किसानों की परेशानी उठाने के बहाने प्रोपेगैंडा फैलाने वाली गुनीशा कौर ने इसमें भी खालिस्तानी एजेंडा घुसा दिया।
बता दें कि अलग-अलग राज्यों के मौजूदा कृषि उपज मंडी समिति (APMC) कानूनों में कमियों को देखते हुए, नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 में एक एकीकृत राष्ट्रीय कृषि बाजार (NAM) की घोषणा की थी। ई-नाम (e-NAM) पूरे भारत का एक इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है जो मौजूदा मंडियों को जोड़कर कृषि उपजों के लिए एक साझा राष्ट्रीय बाजार बनाता है। सुधारों को आगे बढ़ाते हुए मोदी सरकार ने तीन कृषि कानून पेश किए ताकि फसलों का व्यापार आसान हो सके और किसानों को मंडियों के बाहर भी एक प्रतिस्पर्धी बाजार मिल सके।

मोदी सरकार द्वारा लाए गए ये तीन कानून थे- कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। हालांकि, देश की आंतरिक स्थिरता बनाए रखने के लिए बाद में इन्हें वापस ले लिया गया था।
इसके 3 साल बाद दिसंबर 2023 में गुनीशा कौर ने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को खराब करने के लिए ‘टाइम’ (Time) मैगजीन में एक और लेख लिखा। इस लेख का शीर्षक था, ‘व्हाई इंडिया इज टारगेटिंग सिखों एट होम एंड अराउंड द वर्ल्ड’ (भारत देश और दुनिया भर में सिखों को निशाना क्यों बना रहा है)।
इसमें उन्होंने खालिस्तानी दावों को बढ़ावा देने के लिए झूठ फैलाया कि भारत सरकार विदेशों में रहने वाले सिखों पर कथित अत्याचार कर रही है। कौर ने आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत का हाथ होने के बेबुनियाद दावों को फिर से दोहराया।

दिलचस्प बात यह है कि कनाडा के अखबार ‘द ग्लोब एंड मेल’ के मुताबिक आतंकवादी कैंप चलाने वाले निज्जर को USCIRF की नई कमिश्नर ने सिर्फ ‘एक कनाडाई नागरिक’ बताया। वहीं भारत में प्रतिबंधित संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ चलाने वाले वांटेड आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू को भी उन्होंने ‘एक सिख कार्यकर्ता और अमेरिकी नागरिक’ के रूप में पेश किया।
खालिस्तान की वकालत करते हुए गुनीशा कौर ने लिखा, “मोदी सरकार सिखों के आत्मनिर्णय की माँगों से इतनी असुरक्षित क्यों महसूस करती है कि वे अमेरिका और कनाडा जैसे वैश्विक महाशक्तियों के साथ अपने संबंधों को भी दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं?”
वह यहाँ भी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले की तारीफ करना नहीं भूलीं और उसे फिर से ‘एक मजहबी सैक्ट का करिश्माई सिख नेता’ बताया।
अब जब USCIRF में एक जानी-मानी खालिस्तान समर्थक को नियुक्त कर दिया गया है, तो भारत के खिलाफ और अधिक बयानबाजी, उसके आंतरिक मामलों में दखलअंदाजी और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में भारत की छवि को खराब करने की कोशिशों की आशंका बढ़ गई है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


