मॉरीशस ने मालदीव के साथ अपने सभी राजनयिक संबंध तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिए हैं। यह फैसला चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता को लेकर मालदीव के बदले हुए रुख के बाद लिया गया है। दोनों ही देश भारत के करीबी मित्र माने जाते हैं, ऐसे में यह विवाद क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा संतुलन के लिहाज से भी अहम हो जाता है। सवाल यह है कि आखिर चागोस द्वीप समूह को लेकर ऐसा क्या हुआ कि दो दोस्त देशों के रिश्ते इतनी तेजी से बिगड़ गए?
🚨BREAKING:
— India Defence Daily (@IndiaDefDaily) February 27, 2026
MAURITIUS SUSPENDS ALL DIPLOMATIC TIES WITH MALDIVES OVER CHAGOS ISSUE pic.twitter.com/nO3HWBF63m
चागोस द्वीप समूह: क्यों है इतना रणनीतिक महत्व?
चागोस द्वीप समूह हिंद महासागर के मध्य में स्थित 60 से अधिक छोटे द्वीपों का एक समूह है। यह मॉरीशस से लगभग 2,200 किलोमीटर उत्तर-पूर्व और मालदीव के दक्षिण में स्थित है। इसका सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण द्वीप डिएगो गार्सिया है।
भौगोलिक स्थिति के कारण यह इलाका सैन्य और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है। यहाँ से मध्य पूर्व, दक्षिण एशिया और अफ्रीका के बड़े हिस्से पर नजर रखना आसान हो जाता है। इसी रणनीतिक महत्व के कारण अमेरिका ने शीत युद्ध के दौरान यहाँ अपना एक बड़ा सैन्य अड्डा स्थापित किया।
आज भी डिएगो गार्सिया पर स्थित अमेरिकी सैन्य बेस दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण विदेशी सैन्य ठिकानों में गिना जाता है, जिसका इस्तेमाल कई बड़े सैन्य अभियानों में किया जा चुका है।
1965 का बँटवारा और ब्रिटेन की भूमिका
चागोस द्वीप समूह और मॉरीशस दोनों ही लंबे समय तक ब्रिटेन के उपनिवेश रहे। जब 1968 में मॉरीशस को आजादी मिलने वाली थी, तब उससे तीन साल पहले 1965 में ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह को मॉरीशस से अलग कर दिया। इसके बाद इस क्षेत्र को ‘ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र’ नाम दिया गया।
मॉरीशस का आरोप रहा है कि यह फैसला उस पर दबाव डालकर लिया गया था और यह अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। ब्रिटेन ने इसके बदले मॉरीशस को मामूली मुआवजा दिया, जिसे मॉरीशस ने कभी भी न्यायसंगत नहीं माना। यहीं से चागोस को लेकर कानूनी और कूटनीतिक लड़ाई की नींव पड़ी।
डिएगो गार्सिया पर सैन्य अड्डा बनाने के लिए अमेरिका की शर्त थी कि वहाँ कोई स्थानीय आबादी नहीं होनी चाहिए। इसके चलते 1967 से 1973 के बीच ब्रिटेन ने चागोस के करीब 1,500 से 2,000 मूल निवासियों को जबरन वहाँ से हटा दिया।
इन लोगों को मॉरीशस और सेशेल्स में बसाया गया, लेकिन उन्हें अपने पैतृक द्वीप पर लौटने की अनुमति नहीं दी गई। यह जबरन विस्थापन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार का गंभीर मुद्दा बन गया। दशकों से चागोस के मूल निवासी अपने घर लौटने की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें पूर्ण न्याय नहीं मिल पाया है।
अंतरराष्ट्रीय अदालत का फैसला और ब्रिटेन-मॉरीशस समझौता
मॉरीशस ने चागोस पर अपनी संप्रभुता को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। 2019 में अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि चागोस को मॉरीशस से अलग करना गैर-कानूनी था और ब्रिटेन को इसे जल्द से जल्द वापस करना चाहिए। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी भारी बहुमत से इसी तरह का प्रस्ताव पारित किया।
अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने के बाद आखिरकार ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच एक समझौता हुआ। इसके तहत ब्रिटेन ने चागोस द्वीप समूह पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता देने पर सहमति जताई। हालाँकि डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी सैन्य अड्डा लंबी अवधि के पट्टे पर बना रहेगा। यह समझौता मॉरीशस के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना गया।
मालदीव का बदला रुख और बढ़ता कूटनीतिक संकट
मालदीव और चागोस के बीच समुद्री सीमा को लेकर पहले से ही विवाद रहा है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून न्यायाधिकरण ने इस मामले में मॉरीशस के पक्ष में फैसला दिया था और मालदीव की पिछली सरकार ने भी मॉरीशस के दावे का समर्थन किया था। लेकिन हाल ही में मालदीव सरकार ने अपना रुख बदल लिया।
मालदीव के राष्ट्रपति ने चागोस द्वीप समूह पर मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता देने से इनकार कर दिया और ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते पर भी आपत्ति जताई। उनका दावा है कि चागोस पर मालदीव का दावा ज्यादा मजबूत है और यह उसके समुद्री हितों से जुड़ा मामला है। इसी बदले हुए रुख को मॉरीशस ने अपनी संप्रभुता के खिलाफ सीधी चुनौती माना।
इसके जवाब में मॉरीशस की कैबिनेट ने मालदीव के साथ सभी राजनयिक संबंध तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का फैसला लिया। इस कदम से दोनों देशों के रिश्तों में तीखा तनाव आ गया है और पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में कूटनीतिक हलचल बढ़ गई है।
चागोस द्वीप समूह का विवाद केवल दो देशों के बीच सीमा या संप्रभुता की लड़ाई नहीं है। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानून, महाशक्तियों की रणनीति, क्षेत्रीय सुरक्षा और मानवाधिकार जैसे कई जटिल पहलू जुड़े हुए हैं। मालदीव और मॉरीशस के बीच बढ़ता यह टकराव आने वाले समय में हिंद महासागर क्षेत्र की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।


