हिंदू विरोधी इस्लामी-वामपंथी गुट लंबे समय से ऑपइंडिया को निशाना बना रहे हैं। संस्थान के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए गए, मुकदमें चलाए गए। विज्ञापन से होने वाले राजस्व में कटौती के लिए अभियान चलाया गया। घटिया ‘शोध’ पत्रों और अन्य तरीकों से चुप कराने का प्रयास लगातार किया जा रहा है।
ऑपइंडिया को 2022 में लीसेस्टर में हुई हिंसा पर अपनी रिपोर्टिंग के लिए (एक बार फिर) टारगेट किया गया है। इस बार सोरोस की फंडिंग वाली लंदन के एसओएएस विश्वविद्यालय के माध्यम से निशाना बनाया जा रहा है।
23 फरवरी 2026 को स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (SOAS) ने ‘ बेटर टुगेदर: अंडरस्टैंडिंग द 2022 वायलेंस इन लीसेस्टर’ शीर्षक से अपनी 218 पृष्ठों की रिपोर्ट जारी की । इस रिपोर्ट में लीसेस्टर में हुई हिंसा और तनाव के लिए हिन्दुओं को दोषी ठहराया गया है। इससे पहले शुरुआती रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘किसी एक समुदाय या समूह को दोषी नहीं ठहराया जा सकता’। अब हिंदुओं और हिंदुत्व के खिलाफ एक पूरा अध्याय और सिफारिशें लिखी गई हैं।
OpIndia ने पहले बताया था कि हिंदू-विरोधी पृष्ठभूमि वाले SOAS विश्वविद्यालय के शोधकर्ता हिन्दू विरोधी बातें करेंगे। ऐसा ही हुआ है। इनलोगों ने हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद को ‘अतिवादी’ बताते हुए इसे ‘राजनीतिक इस्लामवाद’ की तरह बताया है।
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि एसओएएस विश्वविद्यालय ने लीसेस्टर हिंसा को लेकर जो प्रोपेगेंडा रिपोर्ट तैयार किया है, उसमें ऑपइंडिया को निशाना बनाया गया है। 2022 में लीसेस्टर में हुई घटनाओं पर सोशल मीडिया के प्रभाव और इसके विपरीत विश्लेषण करने वाले रिपोर्ट ने हैशटैग #HindusUnderAttack के तहत भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, विशेष रूप से लीसेस्टर में हिंदुओं पर इस्लामी हमलों के खिलाफ आवाज उठाने वाले हिंदू सोशल मीडिया यूजर्स का मजाक उड़ाया गया।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि 2022 में लीसेस्टर हिंसा के दौरान सोशल मीडिया पर तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया, जिसमें ऑपइंडिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
“ट्वीटों में सबसे ज्यादा शेयर किए गए 30 यूआरएल में से 11 ऑपइंडिया के थे। रिपोर्ट में दावा किया गया कि प्लेटफॉर्म नरेंद्र मोदी, भाजपा और हिंदुत्व की राजनीति का समर्थन करने वाला मीडिया आउटलेट है।
रिपोर्ट के मुताबिक, “हेनरी जैक्सन सोसाइटी की शोधकर्ता शार्लोट लिटिलवुड के जीबी न्यूज को दिए गए साक्षात्कार के आधार पर ऑपइंडिया ने आरोप लगाया था कि ‘इस्लामवादी’ कश्मीर की तरह ही लीसेस्टर से हिंदुओं को निकालने की माँग कर रहे थे।”
ऑपइंडिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा या हिंदुत्व की राजनीति का समर्थन नहीं करता है। बिना किसी राजनीति के ऑपइंडिया हिंदुओं, हिंदू धर्म और हिंदुत्व का समर्थन करता है। ‘राजनीति’ शब्द का प्रयोग करके यह जताना कि हम किसी राजनीतिक दल का हिस्सा हैं या उसकी शाखा हैं, तथ्यात्मक रूप से गलत है। यूजीसी के नए नियम को लेकर ऑपइंडिया की कवरेज से स्पष्ट है, हमने भाजपा, मोदी सरकार और उनकी विशिष्ट नीतियों की समय-समय पर आलोचना की है।
हालाँकि, यह पहली बार नहीं है कि ऑपइंडिया की लीसेस्टर हिंसा की कवरेज ने इस्लामी-वामपंथी गुट को नाराज किया हो।
जब ऑपइंडिया के लेखों ने कथित तौर पर सोशल मीडिया ट्रेंड्स में काफी लोकप्रिय हुआ, जब लीसेस्टर में हिंदुओं पर हुए हमलों को उजागर किया गया। हालाँकि इसका बीबीसी ने जमकर विरोध किया। हिंदुओं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हिंसा के बारे में फर्जी खबरें और दुष्प्रचार फैलाने के लिए कुख्यात बीबीसी ने 24 सितंबर 2022 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें उसने दावा किया कि #HindusUnderAttackinUK हैशटैग के तहत साझा किए गए शीर्ष 30 यूआरएल ऑपइंडिया के लेखों के थे।
बीबीसी ने हैशटैग को ‘गलत’ बताकर खारिज करने की कोशिश की। उसने ऑपइंडिया के एक लेख की व्यापक ‘पहुँच’ को लेकर भी बात की, जो हेनरी जैक्सन सोसाइटी की शोधकर्ता शार्लोट लिटिलवुड की इस चिंता पर आधारित था कि मुसलमानों से हिंसा की धमकियों के कारण कम से कम 9 परिवार लीसेस्टर छोड़कर चले गए थे।

उस वक्त लीसेस्टरशायर पुलिस ने कहा था कि उन्हें लीसेस्टर छोड़कर जाने वाले हिंदू परिवारों की जानकारी नहीं है, इसलिए बीबीसी ने यह सुझाव देने की कोशिश की कि ऑपइंडिया ने गलत सूचना फैलाई है। हालाँकि इस दौरान यह देखा गया कि बीबीसी ने खुद मुस्लिम पक्ष द्वारा फैलाई गई गलत सूचना और हिंसा को कम करके दिखाने की कोशिश की।
बीबीसी ने दावा किया कि#HindusUnderAttackinLeicester के तहत ट्रेंड कर रहे 30 OpIndia यूआरएल में से, ब्रिटिश मीडिया ने केवल ‘हिंदुओं द्वारा लीसेस्टर छोड़ने’ की रिपोर्ट को ही प्रमुखता से दिखाया, जो ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदुत्व-समर्थक तत्वों’ को बढ़ावा देने के लिए उपयोगी सामग्री को चुन-चुनकर इस्तेमाल करने का एक विशिष्ट उदाहरण है, जिन्होंने इस्लामवादियों की तुलना में अधिक गलत सूचना फैलाई।
बीबीसी ने इस हैशटैग का इस्तेमाल करके शेयर किए गए टॉप 30 यूआरएल की जाँच की। बीबीसी के लेख में कहा गया है कि इनमें से 11 लिंक न्यूज वेबसाइट OpIndia.com के लेखों के थे, जो खुद को ‘भारत का सही पक्ष आप तक पहुँचाने वाली वेबसाइट’ बताती है। बीबीसी के मुताबिक, लेखों को ‘फर्जी अकाउंट’ के साथ-साथ असली अकाउंट द्वारा भी बड़े पैमाने पर शेयर किया गया था, जिनमें से कुछ के लाखों फॉलोअर्स थे।
ऑप इंडिया के एक लेख में हेनरी जैक्सन सोसाइटी की ब्रिटिश शोधकर्ता शार्लोट लिटिलवुड का हवाला दिया गया था, जिन्होंने जीबी न्यूज को बताया था कि मुसलमानों से हिंसा की धमकियों के कारण कई हिंदू परिवार लीसेस्टर छोड़कर चले गए थे। इस लेख को लगभग 2,500 बार रीट्वीट किया गया था। लीसेस्टर पुलिस ने बाद में कहा कि उन्हें परिवारों के पलायन की किसी भी रिपोर्ट की जानकारी नहीं थी।
ऑप इंडिया ने 2022 में ही इस बात पर प्रकाश डाला था कि बीबीसी की लीसेस्टर हिंसा की रिपोर्टिंग में हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह साफ झलक रहा था, जिसमें हिंदुत्व और भाजपा-आरएसएस को खलनायक के रूप में पेश करने का जानबूझकर प्रयास किया गया था, जबकि हिंसा का आरएसएस, भाजपा, तथाकथित दक्षिणपंथी चरमपंथियों या फासीवादी विचारधारा से कोई संबंध नहीं था। बीबीसी की लीसेस्टर हिंसा की कवरेज ने उस समय ब्रिटिश हिंदू समुदाय में रोष भर दिया था।
“क्या लेस्टर में गलत सूचना ने आग में घी डालने का काम किया?” शीर्षक वाली अपनी रिपोर्ट में बीबीसी ने कहा, ” कुछ लोग इस अशांति और उस पर हुई प्रतिक्रिया को हिंदुत्व विचारधारा से जोड़ते हैं। उनका मानना है कि भारतीय राजनीति को शहर में आयात किया जा रहा है, लेकिन बीबीसी को अब तक अशांति से पहले ऐसे समूहों से कोई सीधा संबंध नहीं मिला है।”
देखने में तो ऐसा लग रहा था कि बीबीसी लेस्टर में हुई हिंसा को सीधे तौर पर हिंदुत्व से न जोड़कर निष्पक्षता बरत रहा है, लेकिन हिंसा की ‘जाँच’ करने के बावजूद बीबीसी को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि झड़पें मुसलमानों ने शुरू की थीं, जबकि वीडियो सबूतों से इसकी पुष्टि होती दिख रही थी।
हिंदुओं के खिलाफ हिंसा भड़काने वाले लोगों में से एक माजिद फ्रीमैन का नाम लेने के बावजूद बीबीसी ने अपना संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया और गलत सूचना फैलाने का आरोप हिंदुओं पर ही लगाया। यहाँ तक कि बीबीसी ने फ्रीमैन का साक्षात्कार भी लिया ।
ऑपइंडिया ने उस समय इस बात पर जोर दिया कि शिवालय के पवित्र भगवा ध्वज का अपमान एक मुस्लिम व्यक्ति ने किया था, लेकिन बीबीसी ये बताने की कोशिश कर रहा था कि यह कृत्य संभवतः किसी हिंदू द्वारा किया गया।
बीबीसी ने इस बात पर भी अफसोस जताया था कि लीसेस्टर में हिंदुओं को भारत के हिंदुओं का समर्थन मिला। भारतीयों की सोशल मीडिया पर व्यापक उपस्थिति है, फिर भी बीबीसी ने भारत से शुरू हुई लीसेस्टर हिंसा के बारे में अंग्रेजी में किए गए 20,000 ट्वीट्स के विश्लेषण के आधार पर सुझाव दिया कि यह “हैशटैग का हेरफेर” था। इसमें ये दावा किया गया कि भारत से मिले हिंदू समर्थन ने लीसेस्टर में हिंसा को और बढ़ा दिया। इस हास्यास्पद दावे का जिक्र हाल ही में जारी एसओएएस जाँच में भी मिलता है।
न्यूज़क्लिक ने बीबीसी के हिंदू-विरोधी प्रचार को और बढ़ावा दिया
वामपंथी प्रचार माध्यम न्यूजक्लिक ने 2022 के लीसेस्टर हिंसा के संदर्भ में हिंदुओं के खिलाफ दुष्प्रचार को बढ़ावा देने के लिए बीबीसी की रिपोर्ट को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। यहाँ तक कि माजिद फ्रीमैन एक मुस्लिम लड़की के अपहरण का हिन्दुओं पर आरोप लगाते हुए फर्जी खबर फैलाई, न्यूजक्लिक ने उसे हिंदुओं के खिलाफ हिंसा फैलाने वाला नहीं कहा, बल्कि ‘सामुदायिक कार्यकर्ता’ बताया।

न्यूजक्लिक का हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह किसी से छिपा नहीं है। न्यूजक्लिक पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) से कथित संबंधों को लेकर भी जाँच चल रही है। 2024 में दिल्ली पुलिस द्वारा दायर आरोपपत्र में चीनी सरकार को ‘धनदाता’ बताया गया। भारत-विरोधी विचारों, विशेष रूप से कश्मीर और किसानों के विरोध प्रदर्शनों को भड़काने के लिए धन भेजा गया था। यह मामला अभी अदालत में चल रहा है।
2021 में OpIndia ने NewsClick के संबंधों की विस्तृत जाँच की और खुलासा किया कि यह कई ऐसे व्यक्तियों से जुड़ा था, जो नियमित रूप से भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं। इनमें शहरी नक्सली, तीस्ता सीतलवाड, अभिसार शर्मा और कई अन्य शामिल हैं। OpIndia की वह जाँच यहाँ पढ़ी जा सकती है।
पाकिस्तान की समर्थक ‘द ब्रिज इनिशिएटिव’ ने ‘ब्रिटेन में हिंदुत्व’ नामक एक दुष्प्रचार रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें लीसेस्टर हिंसा के लिए हिंदुत्व को दोषी ठहराया गया और ‘ऑप इंडिया’ को मुस्लिम पीड़ित होने का ढोंग न करने के लिए निशाना बनाया गया।
नवंबर 2023 में, अमेरिका के जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के तहत द ब्रिज इनिशिएटिव ने ‘ब्रिटेन में हिंदुत्व’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट में हिंदुत्व को महज एक ‘राजनीतिक विचारधारा’ कहा गया और इसे हिंदू धर्म से अलग करने का प्रयास किया गया।

रिपोर्ट में कहा गया, “यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि हिंदुत्व, हिंदू धर्म नहीं है। हिंदुत्व एक आधुनिक राजनीतिक विचारधारा है, जिसका उपयोग व्यक्ति और समूह एक विशिष्ट पहचान बनाने और अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा को उचित ठहराने के लिए करते हैं। हिंदू राष्ट्रवादी एक जातीय-धार्मिक राज्य बनाना चाहते हैं, जिसे हिंदू राष्ट्र के नाम से जाना जाता है।” रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदुत्व का यह अलगाववादी दृष्टिकोण हिंदू धर्म की सोच से अलग है।
‘केस स्टडी: 2022 लीसेस्टर दंगे’ शीर्षक वाले अध्याय में , द ब्रिज इनिशिएटिव ने बार-बार मुसलमानों को पीड़ित दिखाने की कोशिश की, जबकि झड़पें मुसलमानों द्वारा ही शुरू की गई थीं। रिपोर्ट में इस्लामी जिहाद से भी बड़ा खतरा साबित करने के लिए कुख्यात हिंदू विरोधियों क्रिस एलन, द गार्जियन की आइना जे खान और हनाह-एलिस पीटरसन, हिंदुत्व वॉच के पाकिस्तानी प्रशासक रकीब हामिद नाइक और अन्य लोगों का हवाला दिया गया।

यह याद रखना जरूरी है कि लीसेस्टर के मेयर पीटर सोल्सबी ने लीसेस्टर हिंसा की ‘स्वतंत्र जाँच’ का नेतृत्व करने के लिए क्रिस एलन को नामित किया था। हालाँकि स्थानीय हिंदू संगठनों के विरोध के बाद उन्हें पद से हटना पड़ा।
इस रिपोर्ट ने शोकत आदम जैसे इस्लामवादियों द्वारा फैलाए जा रहे मुस्लिम उत्पीड़न के दुष्प्रचार को और भी बल दिया। शोकत आदम को बेलग्रेव को कथित तौर पर ‘हिंदू इलाका’ कहे जाने पर आपत्ति थी, लेकिन ग्रीन रोड इलाके को मुस्लिम इलाका कहे जाने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी। ऑपइंडिया ने पहले बताया था कि शोकत आदम लंबे समय से ‘मुस्लिम एंगेजमेंट एंड डेवलपमेंट’ (MEND) नामक एक कट्टरपंथी इस्लामी संगठन से जुड़े हुए हैं और ‘लीसेस्टर चेयर’ का पद भी संभाल चुके हैं। शोकत आदम ने अपने मुस्लिमों द्वारा लीसेस्टर में की गई हिंसा को ‘उकसावे की प्रतिक्रिया’ बताकर कम आँकने की कोशिश की।
ब्रिज इनिशिएटिव- कम्युनिटी पॉलिसी फोरम की रिपोर्ट ने हिंदू बहुल क्षेत्र में मस्जिद के निर्माण के आवेदन पर आपत्ति जताने वाले हिंदुओं को ‘इस्लामोफोब’ के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया।
द ब्रिज इनिशिएटिव ने ऑपइंडिया, विशेष रूप से प्रधान संपादक नूपुर शर्मा को उनके उस ट्वीट के लिए निशाना बनाया, जिसमें उन्होंने बढ़ते तनाव के बीच लेस्टर से लगभग 200 हिंदू परिवारों के विस्थापित होने की खबरों पर चिंता जताई थी। अपने ट्वीट में शर्मा ने लेस्टरशायर पुलिस को टैग किया था। इसके बावजूद द ब्रिज इनिशिएटिव और अब एसओएएस जाँच समिति ने उसी ट्वीट का इस्तेमाल यह सुझाव देने के लिए किया है कि ऑपइंडिया गलत सूचना फैला रहा था।

ऑपइंडिया ने एसओएएस जाँच पर अपनी रिपोर्ट में सोरोस की फंडिंग रिपोर्ट को ‘दुष्प्रचार’ कहा था। एसओएएस रिपोर्ट की तरह ही द ब्रिज इनिशिएटिव ने भी हेनरी जैक्सन सोसाइटी की शार्लोट लिटिलवुड के उस दावे को झूठा बताया, जिसमें हिंसा के डर से नौ हिंदू परिवारों के लेस्टर छोड़ने की बात कही गई थी।

इसमें बीबीसी की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया, जिसमें दावा किया गया था कि हैशटैग ‘#ProtectLeicesterHindus’, ‘#StopLeicesterIslamicTerrorism’, ‘#HindusUnderAttackInLeicester’, ‘#HinduUnderAttackUK’ और ‘#HinduHateInUK’ का इस्तेमाल करने वाले शीर्ष 30 यूआरएल में से 11 ऑपइंडिया द्वारा लिखे गए लेखों के थे। जाहिर तौर पर बीबीसी की तरह ही, एसओएएस और द ब्रिज इनिशिएटिव भी ऑपइंडिया की ‘असाधारण अंतरराष्ट्रीय पहुँच’ से नाराज थे।
एसओएएस जाँच की तरह द ब्रिज ने भी इस्लामी कट्टरपंथियों के दुष्प्रचार को फैलाया और हिन्दुओं के खिलाफ माहौल बनाया। हालाँकि, इसने माजिद फ्रीमैन और मोहम्मद हिजाब जैसे इस्लामी कट्टरपंथियों को ‘सामुदायिक कार्यकर्ता’ और ‘मुस्लिम सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर’ कहा गया।

रिपोर्ट में मोहम्मद हिजाब को महज एक मुस्लिम सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बताया गया, जबकि उनके वीडियो में कही गई बातों का हवाला भी दिया गया। इसमें हिंदुओं के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल दिया गया था। हैरानी की बात नहीं है कि द ब्रिज इनिशिएटिव को अल्लाहू अकबर चिल्लाते हुए मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदुओं पर हमला करना आपत्तिजनक और आतंकित करने वाला नहीं लगा, लेकिन पवित्र जय श्री राम का नारा ‘हिंदू राष्ट्रवादी युद्ध’ की घोषणा लग गया।
द ब्रिज इनिशिएटिव के पिछले कारनामे और भी दिलचस्प हैं। अक्टूबर 2022 में, इनिशिएटिव ने 40 पन्नों की एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें दावा किया गया कि भारत में मुसलमान नरसंहार के आठवें चरण में हैं। इसमें कहा गया कि भारत में मुसलमानों का लगातार नरसंहार हो रहा है। इसे ग्रेगरी स्टैंटन द्वारा बनाए गए 10 चरणों में से आठवें चरण में है। आठवें चरण में संपत्ति हड़पना, जबरन विस्थापन, बस्तियाँ उजाड़ना और नजरबंदी शामिल हैं। जबकि भारत में धर्म के आधार पर निशाना बनाने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।
इसने अयोध्या राम मंदिर फैसले और काशी के ज्ञानवापी विवाद को भी ‘मुस्लिम विरोधी’ करार दिया। इसके अलावा, इसने यह झूठी खबर भी फैलाई कि सीएए मोदी सरकार की मुस्लिम विरोधी नीति का नतीजा है। सच्चाई यह है कि सीएए पड़ोसी देशों से प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
ब्रिज इनिशिएटिव ‘इस्लामोफोबिया पर एक बहु-वर्षीय अनुसंधान परियोजना’ का हिस्सा है। यह वाशिंगटन डीसी में जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के प्रिंस अलवलीद बिन तलाल सेंटर फॉर मुस्लिम-क्रिश्चियन अंडरस्टैंडिंग (एसीएमसीयू) के तहत काम करता है। एसीएमसीयू की स्थापना 2005 में सऊदी अरब के अरबपति व्यवसायी अलवलीद बिन तलाल अल सऊद द्वारा 20 मिलियन डॉलर के दान से की गई थी। तलाल एक विवादास्पद व्यवसायी रहे हैं और भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार भी हो चुके हैं।

रिपोर्ट के प्रमुख शोधकर्ता मोबशरा तज़ामल हैं, जो पाकिस्तान मूल के हैं और उन्होंने इस्लामी समाज और संस्कृति में स्नातकोत्तर किया है। जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उनके प्रोफाइल में बताया गया है कि ‘उनका वर्तमान शोध वैश्विक इस्लामोफोबिया पर केंद्रित है, जिसमें विशेष रूप से उइघुर मुसलमानों को निशाना बनाने वाले चीन के अभियान और निगरानी तकनीक के उपयोग, जातीय राष्ट्रवाद के उदय और इस्लामोफोबिया ‘उद्योग’ के वित्तीय और ट्रांस-अटलांटिक संबंधों पर है।’

द ब्रिज इनिशिएटिव के अन्य प्रमुख सदस्यों में पाकिस्तानी मूल के शोधकर्ता अरसलान इफ्तिखार भी शामिल हैं। अरसलान इफ्तिखार अमेरिकी राजनेता और लुसियाना के पूर्व गवर्नर बॉबी जिंदल के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणियों के लिए कुख्यात हैं। एमएसएनबीसी पर एक कार्यक्रम में जिंदल के बारे में इफ्तिखार ने कहा था, “ऐसा लगता है कि वह रिपब्लिकन राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी के लिए दक्षिणपंथी रुख अपनाते हुए अपनी त्वचा से कुछ भूरापन मिटाने की कोशिश कर रहे हैं।” इस टिप्पणी से भारी आक्रोश फैल गया था और एमएसएनबीसी ने घोषणा की थी कि इफ्तिखार अब चैनल पर दोबारा नहीं दिखाई देंगे।
संगठन के अन्य सदस्य फरीद हाफेज हैं, जिनकी आतंकी फांडिंग और मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध होने के आरोप में ऑस्ट्रिया में जाँच की गई थी। ऑस्ट्रियाई अधिकारियों ने 2020 में उनके वियना स्थित घर पर छापा मारा और ऑपरेशन लक्सर के तहत वर्षों तक उन पर नजर रखने के बाद उनसे पूछताछ की।
साफ है कि बौद्धिक दिखावे के पीछे द ब्रिज इनिशिएटिव एक इस्लामी प्रचार तंत्र है, जो हिंदुओं और अन्य समुदायों और नेताओं को निशाना बनाता है। ये लोग इस्लामी वर्चस्व और कट्टरपंथ का विरोध करते हैं।
कॉमनवेल्थ मैगजीन, द टाइम्स, वाइस और द कारवां: नाम अलग, लक्ष्य एक
ऑपइंडिया 2022 से ही भारत और विदेशों में इस्लामी-वामपंथी मीडिया द्वारा लीसेस्टर हिंसा की कवरेज के लिए ऑपइंडिया को निशाना बनाने का एक सुनियोजित प्रयास देखा गया है। ब्रिटेन के कॉमनवेल्थ मैगजीन ने 28 सितंबर 2022 को एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें उसने न केवल लीसेस्टर हिंसा के लिए हिंदुओं को दोषी ठहराते हुए मुस्लिम पीड़ित होने का झूठा दावा किया, बल्कि ऑपइंडिया द्वारा लीसेस्टर में हिंदू विरोधी हिंसा को ‘इस्लामी उत्पात’ करार देने की भी जमकर आलोचना की।

द गार्जियन ने लीसेस्टर में इस्लामी हिंसा को छिपाने की कोशिश की। 2022 में ऑपइंडिया ने द गार्जियन की पत्रकार आइना जे खान द्वारा लीसेस्टर में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा का दोष खुद पर लेने की रणनीति का पर्दाफाश किया था।
19 सितंबर 2022 को प्रकाशित एक बौद्धिक रूप से बेईमानी भरे लेख में , खान ने स्पष्ट रूप से धार्मिक पहचान को हिंदू प्रदर्शनकारियों के समूहों से जोड़ा था, जिसमें ‘हिंदू पुरुषों का विरोध’ और ‘हिंदू पुरुषों को मार्च करते हुए फिल्माया गया’ जैसे वाक्यांशों का प्रयोग किया गया था।
हालाँकि उन्होंने चतुराई से उस व्यक्ति के धार्मिक जुड़ाव का जिक्र नहीं किया जिसने एक हिंदू मंदिर का अपमान किया और भगवा झंडा उखाड़ कर फेंका था। हिंदू पूजा स्थल का अपमान करने वाले अपने सह-धर्मी को बचाने के प्रयास में, आइना जे खान ने ‘अच्छे इमाम’ का सहारा लिया।
द गार्जियन की पत्रकार ने इस तरह सार्वजनिक चर्चा को अपने ही धर्म के एक व्यक्ति द्वारा मंदिर पर किए गए क्रूर हमले से हटाकर एक ‘मूकदर्शक’ इमाम की ओर मोड़ने की कोशिश की। जब ऑपइंडिया ने उनकी रिपोर्टिंग में स्पष्ट विसंगति की ओर इशारा किया, तो आइना जे खान ने इसका कड़ा विरोध किया और आलोचना को ‘इस्लामोफोबिया’ करार दिया।
17 अक्टूबर 2022 को , यहूदी विरोधी संगठन ‘स्टॉप फंडिंग हेट (एसएफएच)’ ने ‘द गार्जियन’ का पर्दाफाश करने के लिए ऑपइंडिया पर हमला बोला ।
‘स्टॉप फंडिंग हेट’ संगठन ने ऑपइंडिया को मिलने वाले विज्ञापन को रोकने की पूरी कोशिश की। ऑप इंडिया ने लेस्टर के हिंदुओं की वास्तविक दुर्दशा को दुनिया के सामने उजागर किया था, जो इस्लामवादियों और मीडिया उद्योग में उनके समर्थकों की दया पर निर्भर थे।
ब्रिटेन के ‘अतिवाद-विरोधी’ थिंक टैंक, इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक डायलॉग (आईएसडी) ने अक्टूबर 2022 में ‘लीसेस्टर में हिंसा: ऑनलाइन हिंसा और ऑफलाइन नतीजों को समझना’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें लीसेस्टर हिंसा के लिए मुख्य रूप से हिंदुओं को दोषी ठहराया गया और माजिद फ्रीमैन और मोहम्मद हिजाब जैसे इस्लामवादियों की भूमिका को कम करके आँका गया। टॉमी रॉबिन्सन ने ऑपइंडिया के एक लेख को साझा कर ऑपइंडिया को निशाना बनाया। लेख में ऑपइंडिया ने मुसलमानों को 2022 की हिंदू-विरोधी लीसेस्टर हिंसा के लिए दोषी ठहराया था।

द टाइम्स ने भी लेस्टर में ‘हिंदुत्व’ से जुड़े तनाव की बात की और ऑपइंडिया पर सितंबर 2022 में लेस्टर की घटनाओं को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाए । ऑपइंडिया को ‘हिंदू राष्ट्रवादी तत्वों’ में से एक बताया।
भारतीय वामपंथी प्रचार पत्रिका ‘द कारवां’ ने भी ऑपइंडिया द्वारा लीसेस्टर हिंसा की कवरेज के लिए निशाना बनाया। ‘एजेंट ऑरेंज: ऑपइंडिया की पत्रकारिता-विरोधी गतिविधियों का जहरीला धंधा’ शीर्षक वाले अपने लेख में , कारवां की लेखिका अमृता सिंह ने ऑपइंडिया को लीसेस्टर हिंसा की कवरेज में नफरत फैलाने वाले के रूप में बताया। बता दें कि ‘द कारवां’ देश में इस्लामी आतंकी हमलों में भारतीय सेना के शहीदों की जातिगत संरचना का अध्ययन करने को प्राथमिकता देती है।

मोहन जे दत्ता के ‘अकादमिक शोध पत्र’ में लेस्टर कवरेज को लेकर OpIndia को ‘हिंदुत्व प्रचार तंत्र’ का हिस्सा बताया गया
मोहन जे दत्ता द्वारा लिखित एक शोध-सह-प्रचार पत्र में हिंदुत्व और हिंदुओं को विशेष रूप से 2022 के लीसेस्टर हिंसा के संदर्भ में बदनाम किया गया और ऑपइंडिया पर भी हमला किया गया। इसमें ऑपइंडिया के X हैंडल और इसकी प्रधान संपादक नूपुर शर्मा को ‘हिंदुत्व प्रचार तंत्र का हिस्सा बताया गया, जो नफरत फैला रहा है।’

जब ऑपइंडिया ने लीसेस्टर हिंसा रिपोर्ट में ‘द गार्जियन’ की पत्रकार आइना जे खान के हिंदू विरोधी पूर्वाग्रह को उजागर किया, तो उसे ‘इस्लामोफोबिया’ पीड़ित बताया गया

इसके अलावा श्री सनातन हिंदू मंदिर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की योजना बना रहे इस्लामवादियों की आलोचना करने वाले ऑपइंडिया के लेख को निशाना बनाया गया और लेस्टर में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में मंदिर की संलिप्तता का झूठा आरोप लगाया गया।
ब्रिटेन की संसद द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव पर ऑपइंडिया पर हमला
ब्रिटेन की संसद में एक प्रस्ताव रखा गया था, जिसमें भारत में ‘लोकतंत्र के पतन’ की काल्पनिक और मनगढ़ंत कहानी को सनसनीखेज तरीके से पेश किया गया था। याचिका में हिंदुत्व और हिंदू अधिकार समूहों की निंदा करते हुए इसे ‘अतिवादी’ विचारधारा बताया गया था। इसके बाद, इसमें ऑपइंडिया को निशाना बनाते हुए दावा किया गया कि हिंदुत्व समर्थक मीडिया संगठन की सामग्री ‘नफरत और धार्मिक ध्रुवीकरण’ को बढ़ावा देता है।

सीआईए के सहयोगी बेलिंगकैट ने ऑप इंडिया को उसकी बेबाक हिंदू समर्थक रिपोर्टिंग के लिए निशाना बनाया
सीआईए का मुखपत्र कहा जाने वाला बेलिंगकैट ने पहले भी ऑपइंडिया पर हमले किए थे। पूजा चौधरी द्वारा लिखित एक रिपोर्ट में बेलिंगकैट ने ऑपइंडिया की इस्लामी अपराधों की आलोचना करने वाली हिंदू-समर्थक रिपोर्टिंग को ‘मुस्लिम-विरोधी’ बताया । इसने अलीशान जाफरी जैसे इस्लामी फर्जी समाचार फैलाने वालों के हवाले दिए, जिन्होंने ऑपइंडिया की तुलना डेर स्टर्मर जैसे नाजी प्रचारक समाचार पत्रों से की थी। ऑपइंडिया की संपादकीय शैली और लहजे पर सामान्य हमलों के अलावा, बेलिंगकैट के इस घटिया लेख ने लीसेस्टर हिंसा के दौरान तनाव बढ़ने के लिए ऑपइंडिया के लेखों को भी जिम्मेदार ठहराया।
बेलिंगकैट को नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (एनईडी) से दान मिलता है। इस संगठन को विशेष रूप से विदेशों में अमेरिकी हितों को बढ़ावा देने वाले संगठनों की सहायता के लिए स्थापित किया गया है। इसे पश्चिमी सरकारी संस्थानों, खास कर यूरोपीय और ब्रिटिश स्रोतों से भी धन प्राप्त होता है। रूसी सरकार और दूसरे लोगों ने बेलिंगकैट पर पश्चिमी खुफिया एजेंसियों का एजेंट होने का सीधा आरोप लगाया है। बेलिंगकैट के भारत विरोधी संगठन रिपोर्टर्स सैन्स फ्रंटियर्स (आरएसएफ) से भी संबंध हैं।
दरअसल, बेलिंगकैट के सह-संस्थापक एलन वेनस्टीन ने एक बार सार्वजनिक रूप से खुलासा किया था कि आज हम जो कुछ भी करते हैं, उसका बहुत सारा काम 25 साल पहले सीआईए द्वारा गुप्त रूप से किया जाता था।

मिडिल ईस्ट की वामपंथी मीडिया लीसेस्टर हिंसा की हिंदू-विरोधी एसओएएस जाँच को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है, जबकि हिंदू इसकी निंदा कर रहे हैं।
हमने यहाँ जिन लेखों और शोध पत्रों पर चर्चा की, जो OpIndia को निशाना बना रहे थे, उन सभी ने एक-दूसरे को ‘विश्वसनीय’ स्रोत के रूप में उद्धृत किया गया था। इससे उद्धरणों का एक ऐसा चक्र बन गया, जो हिंदुत्व को धार्मिक चरमपंथ का सबसे बड़ा खतरा, यहाँ तक कि इस्लामी जिहाद से भी बड़ा, साबित करने का प्रयास किया गया। इस्लामी-वामपंथी मीडिया भी हिंदू-विरोधी दुष्प्रचार को प्रभावी ढंग से बढ़ावा देने में अपनी भूमिका निभा रहा है।
23 फरवरी 2026 को सोरोस द्वारा फंडिंग एसओएएस विश्वविद्यालय की 2022 की हिंदू विरोधी लीसेस्टर हिंसा की जाँच रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद से, वैश्विक स्तर पर इस्लामी-वामपंथी मीडिया ने इसे ‘हिंदुत्व से ओतप्रोत लीसेस्टर हिंसा’ जैसी सुर्खियों के साथ खूब उछाला है।
भारतीय समाचार आउटलेट मध्यमाम ने अपनी रिपोर्ट को इस शीर्षक से प्रकाशित किया , “लीसेस्टर में हुए प्रदर्शनों में हिंदुत्व वाले नारे गूँजे, जिससे अशांति की स्थिति उत्पन्न हुई- जाँच”

इसी बीच मिडिल ईस्ट आई ने ‘लीसेस्टर दंगे: जाँच में पाया गया कि हिंदू राष्ट्रवादी विचारों और गलत सूचनाओं से फैली अशांति में भूमिका निभाई’ शीर्षक से अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की।

इस्लामी-वामपंथी प्रचार पोर्टल द वायर ने एसओएएस विश्वविद्यालय द्वारा निर्मित हिंदू-विरोधी बकवास को बढ़ावा दिया है और अपनी रिपोर्ट को “हिंदुत्व के नारों के कारण 2022 में लीसेस्टर हिंसा में वृद्धि हुई: रिपोर्ट” शीर्षक दिया।
इससे साफ है कि सुनियोजित रूप से एक समूह ने इस्लामी चरमपंथ और हिंसा को सही ठहराने के लिए निराधार हिंदू-विरोधी दुष्प्रचार को बढ़ावा दिया। 2022 से उन्हीं घिसे-पिटे विचारों को दोहरा कर लेस्टर में हिंदू-विरोधी हिंसा के OpIndia के खुलासे को गलत करार देने की कोशिश OpIndia को उसके मिशन से विचलित नहीं कर सकते।
चाहे लेस्टर की हिंसा हो, बांग्लादेश और पाकिस्तान में या भारत में हिंदुओं का उत्पीड़न हो, या दुनिया के किसी भी कोने में, OpIndia ने वह सब कुछ रिपोर्ट किया है और करता रहेगा जिसे वामपंथी और मेनस्ट्रीम मीडिया ने अनदेखा किया। हम हिंदू-विरोधी हिंसक इस्लामवादियों को सही ठहराने और उन्हें मानवीय दिखाने के इस्लामी-वामपंथी प्रयासों के लिए हिंदुओं और हिंदुत्व को बलि का बकरा नहीं बनने देंगे, चाहे कितने ही ‘शोध पत्र’, विरोधी खबरें और बदनाम करने की साजिश हमारे खिलाफ की जाए।
(मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


