वॉशिंगटन के गलियारों से जो खबरें निकलकर आ रही हैं, वो बताती हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बड़ी उलझन में फँस गए हैं। स्थिति ऐसी है कि एक तरफ तो ईरान के साथ असली युद्ध चल रहा है, जहाँ मिसाइलें और ड्रोन चल रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ ट्रंप के अपने घर यानि ‘व्हाइट हाउस’ के अंदर ही उनके सलाहकारों के बीच बहस छिड़ी हुई है। ट्रंप समझ नहीं पा रहे हैं कि दुनिया के सामने कब और किस तरह यह कहें कि ‘हमने जंग जीत ली है।’ मुसीबत यह है कि जैसे-जैसे मिडिल ईस्ट में यह लड़ाई बढ़ रही है, इसका असर अमेरिका के आम लोगों की जेब पर दिखने लगा है, क्योंकि वहाँ पेट्रोल-डीजल की कीमतें तेजी से ऊपर जा रही हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या ट्रंप इस युद्ध को इसलिए रोकेंगे क्योंकि उनके पास कोई और रास्ता नहीं बचा है, या फिर यह उनका कोई सोचा-समझा मास्टरस्ट्रोक होगा? ट्रंप ने चुनाव के समय वादा किया था कि वे अमेरिका को फालतू की लड़ाइयों में नहीं झोकेंगे, लेकिन अब वे खुद एक बड़े युद्ध के बीच खड़े हैं। अगर वे अभी हमला रोक देते हैं और ईरान की सरकार पहले की तरह टिकी रहती है, तो दुनिया में यह संदेश जा सकता है कि अमेरिका अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया। इसे एक तरह से अमेरिका की ‘दबी हुई हार’ के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि जिस दुश्मन को खत्म करने वे निकले थे, वह तो अपनी जगह पर कायम है।
अंत में सारा मामला इस बात पर टिका है कि ट्रंप अपनी छवि बचाते हैं या अपनी अर्थव्यवस्था। अगर पेट्रोल की कीमतें और बढ़ीं, तो अमेरिका के अंदर ही उनके खिलाफ माहौल बन सकता है। वहीं अगर वे बिना ईरान को पूरी तरह झुकाए पीछे हटते हैं, तो उनके विरोधी उन्हें कमजोर कहेंगे। ट्रंप फिलहाल एक ऐसे मोड़ पर हैं जहाँ से लिया गया हर फैसला बहुत जोखिम भरा है।
व्हाइट हाउस में दो फाड़: अर्थशास्त्री बनाम युद्ध समर्थक
जानकारी के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की अपनी टीम में ही इस समय दो गुट बन गए हैं और दोनों के बीच जबरदस्त खींचतान चल रही है। एक गुट उन लोगों का है जो देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति को संभालते हैं। इनका कहना है कि अगर यह युद्ध और लंबा खिंचा, तो पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। उन्हें डर है कि अगर आम जनता को महँगा पेट्रोल खरीदना पड़ा, तो वे ट्रंप के खिलाफ हो जाएँगे और उनका समर्थन करना बंद कर देंगे। इसलिए, ये सलाहकार ट्रंप को समझा रहे हैं कि हमें अब युद्ध रोक देना चाहिए और दुनिया से कह देना चाहिए कि हमने अपना काम पूरा कर लिया है।
वहीं दूसरी तरफ, ट्रंप की टीम में कुछ ऐसे नेता भी हैं जो युद्ध को जारी रखने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि अगर अभी हमला रोक दिया गया, तो ईरान इसे अपनी जीत समझेगा और बहुत जल्द परमाणु बम बना लेगा। उन्हें डर है कि अधूरा छोड़ा गया काम आगे चलकर अमेरिकी सैनिकों के लिए और भी बड़ा खतरा बन सकता है। उनका तर्क है कि ईरान को अभी पूरी तरह कमजोर करना जरूरी है।
अब राष्ट्रपति ट्रंप इन दोनों गुटों के बीच बुरी तरह फँसे हुए हैं। वे एक तरफ अपने उन समर्थकों को खुश रखना चाहते हैं जिन्होंने उन्हें इसलिए वोट दिया था क्योंकि उन्होंने दावा किया था कि वे अमेरिका को किसी नई जंग में नहीं फँसाएँगे। लेकिन दूसरी तरफ, वे दुनिया को यह भी दिखाना चाहते हैं कि वे एक मजबूत नेता है और दुश्मनों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। इसी दुविधा की वजह से वे कोई एक ठोस फैसला नहीं ले पा रहे हैं।
क्या युद्ध रोकने का मतलब ‘हार’ होगा?
अगर राष्ट्रपति ट्रंप आज अचानक युद्ध रोकने और अपनी सेना को वापस बुलाने का फैसला करते हैं, तो दुनिया इसे अलग-अलग नजरिए से देखेगी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि अमेरिका का मकसद अधूरा रह जाएगा। जब यह लड़ाई शुरू हुई थी, तब अमेरिका ने कहा था कि वह ईरान की सरकार को बदल देगा या उसके परमाणु प्रोग्राम को पूरी तरह खत्म कर देगा। लेकिन अगर ईरान की सरकार अपनी जगह टिकी रहती है, तो दुनिया भर के लोग यही कहेंगे कि अमेरिका वह नहीं कर पाया जो उसने ठान रखा था। इसे एक अधूरी जीत ही माना जाएगा।
वहीं दूसरी ओर, ईरान इस स्थिति का पूरा फायदा उठाएगा। जानकारों का मानना है कि इतनी भारी बमबारी झेलने के बाद भी अगर ईरान का ढांचा और सरकार बच जाती है, तो वह इसे अपनी बहुत बड़ी जीत बताएगा। वह पूरी दुनिया में ढिंढोरा पीटेगा कि उसने सबसे ताकतवर देश अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इससे ईरान का मनोबल और बढ़ जाएगा और वह अपने समर्थकों के बीच पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरेगा।
इसके अलावा, इसमें एक बड़ा खतरा यह भी है कि अगर युद्ध अभी रुक जाता है, तो ईरान के पास हथियार बनाने का सामान, जैसे- यूरेनियम, मिसाइलें और ड्रोन अभी भी बचे हुए हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जंग रुकने के बाद ईरान चुप नहीं बैठेगा, बल्कि वह और भी ज्यादा खतरनाक बन सकता है। ईरान दोबारा अपनी ताकत जुटाएगा और भविष्य में अमेरिका या उसके साथियों के लिए पहले से कहीं बड़ी चुनौती पेश कर सकता है।
वेनेजुएला वाली ‘गलतफहमी’ और ईरान की हकीकत
खबरों की मानें तो राष्ट्रपति ट्रंप को लगा था कि ईरान को हराना उतना ही आसान होगा जितना वेनेजुएला के साथ हुआ था। अभी इसी साल जनवरी में जिस तरह एक छोटी सी कार्रवाई में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया गया और वहाँ के तेल के कुओं पर कब्जा हो गया, ट्रंप को लगा कि ईरान में भी बस कुछ दिनों की ‘सैर’ (छोटी कार्रवाई) जैसी बात होगी। लेकिन ईरान उम्मीद से कहीं ज्यादा सख्त निकला। उसके पास ने सिर्फ अच्छे हथियार हैं, बल्कि वहाँ की सरकार और लोग भी अपनी विचारधारा पर अड़े हुए हैं। ट्रंप ने जैसा सोचा था वैसा कुछ नहीं हुआ, न तो वहाँ की सरकार गिरी और न ही वहाँ के लोग अपनी सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे। इस वजह से ट्रंप की पूरी प्लानिंग फेल होती नजर आ रही है।
अब ट्रंप के सामने एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। अगर उन्हें तेल की सपलाई फिर से शुरू करानी है और दुनिया भर में बढ़ती पेट्रोल की कीमतों को रोकना है, तो उन्हें इस समुद्री रास्ते को सुरक्षित बनाना होगा। लेकिन इसे सुरक्षित करने का इकलौता तरीका यह है कि वे अपनी सेना को ईरान की जमीन पर उतारें और वहाँ कब्जा करें। ट्रंप हमेशा से कहते आए हैं कि वे अपनी सेना को ऐसी ‘बेवकूफाना’ जमीनी लड़ाइयों में नहीं झोकना चाहते जहाँ अमेरिकी सैनिकों की जान जाए। लेकिन दूसरी तरफ, तेल की कमी की वजह से जो महँगाई बढ़ रही है, उसे रोकने के लिए उनके पास अब ऑप्शन खत्म होते जा रहे हैं।
घरेलू राजनीति और मिड टर्म चुनाव
अमेरिका में इसी साल नवंबर के महीने में चुनाव होने वाले हैं। ट्रंप और उनकी पार्टी के लिए ये चुनाव बहुत जरूरी हैं क्योंकि वे संसद में अपनी ताकत और अपनी कुर्सी बचाए रखना चाहते हैं। ऐसे समय में कोई भी नेता नहीं चाहता कि जनता उससे नाराज हो। लेकिन ईरान के साथ चल रहा यह युद्ध ट्रंप के लिए गले की हड्डी बन गया है।
अमेरिका के आम चुनाव में एक पुरानी कहावत है कि वहाँ का वोटर ‘लोकतंत्र’ जैसी बड़ी-बड़ी बातों से ज्यादा अपनी जेब की परवाह करता है। अमेरिकी लोगों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि उनकी गाड़ी में डलने वाले पेट्रोल (गैस) की कीमत क्या है। अगर यह युद्ध ऐसे ही खिंचता रहा और पेट्रोल के दाम 5-6 डॉलर तक पहुँच गए, तो लोग महँगे पेट्रोल का गुस्सा ट्रंप पर निकालेंगे। इससे ट्रंप की लोकप्रियता तेजी से गिर सकती है और वे चुनाव हार भी सकते हैं।
इसके अलावा, ट्रंप के अपने कुछ बहुत खास दोस्त और सलाहकार, जैसे स्टीव बैनन और टकर कार्लसन, उन्हें लगातार एक ही बात याद दिला रहे हैं। उनका कहना है कि ‘ट्रंप साहब, जनता आपको दोबारा चुनकर इसलिए लाई थी ताकि आप दुनिया भर में चल रही लड़ाइयों को रुकवा सकें, न कि अमेरिका को किसी नए और बड़े युद्ध में फँसा दें।’ ये लोग ट्रंप पर दबाव बना रहे हैं कि वे अपने वादे पर कायम रहें और इस जंग को जल्दी खत्म करें, वरना उनके अपने समर्थक ही उनसे मुँह मोड़ सकते हैं।
ईरान का परमाणु कार्ड: सबसे बड़ी चिंता
खुफिया जानकारी देने वाली एजेंसियों का कहना है कि ईरान के पास परमाणु बम बनाने वाला सामान (यूरेनियम) बहुत बड़ी मात्रा में मौजूद है। भले ही अमेरिका ने ऊपर से खूब बम बरसाए हों, लेकिन ईरान ने अपना कीमती सामान और परमाणु मशीनें जमीन के बहुत नीचे गहरे बंकरों में छुपा रखी हैं। डर इस बात का है कि अगर अमेरिका अभी हमला रोक देता है और अपनी सेना हटा लेता है, तो ईरान उस सामान को बाहर निकालकर कुछ ही हफ्तों के भीतर परमाणु बम तैयार कर सकता है।
इसी वजह से ईरान के पड़ोसी देश, जैसे सऊदी अरब और UAE, काफी घबराए हुए हैं। उन्हें लग रहा है कि अमेरिका ने यह लड़ाई शुरू तो कर दी, लेकिन अब वह बिना काम पूरा किए ही उन्हें बीच रास्ते में छोड़कर भाग रहा है। इन देशों को डर है कि अमेरिका के जाने के बाद ईरान पहले से भी ज्यादा ताकतवर और खतरनाक हो जाएगा और फिर वह अपने इन पड़ोसी देशों को परेशान करेगा। उन्हें लगता है कि अगर इस बार ईरान का परमाणु प्रोग्राम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, तो आने वाले समय में उनके लिए बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाएगी।
ट्रंप के लिए ‘नो-विन’ सिचुएशन?
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस समय एक ऐसे जाल में फँस गए हैं जहाँ से निकलना बहुत मुश्किल है। उनके सामने ऐसी स्थिति है कि वे न तो इस युद्ध को पूरी तरह जीत पा रहे हैं और न ही आसानी से इस लड़ाई को बंद कर पा रहे हैं।
ट्रंप का सबसे बड़ा वादा था ‘अमेरिका फर्स्ट’ यानी अमेरिका को दुनिया की लड़ाइयों से दूर रखकर अपने देश को मजबूत बनाना। लेकिन अब उनका यह वादा उनके ‘कमांडर’ वाले रूप से टकरा रहा है। मुसीबत यह है कि अगर वे अभी युद्ध रोक देते हैं, तो इजरायल और उनकी अपनी पार्टी के कुछ सख्त नेता उन्हें ‘डरपोक’ या ‘कमजोर’ कहेंगे। लेकिन अगर वे युद्ध जारी रखते हैं, तो अमेरिका की अर्थव्यवस्था (पैसे और बाजार की हालत) बिगड़ सकती है और पूरा मिडिल ईस्ट एक ऐसी भयानक आग में जल सकता है जिसे बुझाना नामुमकिन हो जाएगा।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि ट्रंप जिस मकसद से युद्ध में उतरे थे यानी ईरान की सरकार को उखाड़ फेंकना… वह अभी पूरा होता नहीं दिख रहा। जासूसी एजेंसियाँ साफ कह रही हैं कि ईरान की सरकार इतनी जल्दी गिरने वाली नहीं है। ऐसे में मुमकिन है कि ट्रंप कोई बीच का रास्ता चुनें। वे ईरान के कुछ और बड़े ठिकानों पर बमबारी करके दुनिया से कह सकते हैं कि ‘हमारा काम पूरा हुआ’ और फिर से पुराने तरीके से ईरान पर पाबंदियाँ लगाना शुरू कर दें। यह ट्रंप के लिए उनके पूरे कार्यकाल की सबसे बड़ी और कठिन परीक्षा है।


