Wednesday, September 23, 2020
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देश हित से समझौता नहीं, लुटियंस मीडिया का मिट गया है वजूद: OpIndia के साथ अर्नब गोस्वामी का Exclusive इंटरव्यू

"मैं नहीं चाहता कि चंद एजेंडा फैलाने वाले डिजिटल मीडिया समूह लोगों की आवाज़ बनने का दावा करें। ऐसे डिजिटल मीडिया समूह सिर्फ झूठ परोसते हैं। हमें अपने देश में भारतीय डिजिटल मीडिया समूहों की ज़रूरत है। हमें साथ मिल कर ऐसे लोगों को जवाब देना होगा, जिन्हें देश हित की कोई परवाह ही नहीं है।"

आज 1 सितंबर 2020 को Opindia की संपादक नुपूर शर्मा ने रिपब्लिक टीवी के चीफ अर्नब गोस्वामी का साक्षात्कार किया। साक्षात्कार के दौरान उन्होंने देश के कई बड़े मुद्दों पर अपना नज़रिया रखा। लगभग दो घंटे से कुछ कम समय तक चले इस साक्षात्कार में कई बड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई।

सबसे पहले अर्नब गोस्वामी से रिपब्लिक टीवी शुरू करने को लेकर सवाल पूछा गया। आखिर क्यों उन्होंने टाइम्स नाउ छोड़ कर रिपब्लिक टीवी शुरू किया। जिस पर अर्नब ने कहा कि वह टाइम्स नाउ की नींव रखने वाले लोगों में एक थे। उन्होंने चैनल के लिए फंड्स तक इकट्ठा किए थे।

उन्होंने बताया कि कैसे अलग-अलग जगहों से फंड इकट्ठा किए और चैनल शुरू करने की तैयारी की। जिसका मतलब यह था कि चैनल की नींव शून्य से रखी गई थी। लेकिन इतना होने के बावजूद वह सहज नहीं थे और ऐसे हालात बने कि उनके लिए आदेश लेना मुश्किल हो गया।

अर्नब का कहना था कि वहाँ काम करने की पाबंदी महसूस हुई, जिसके बाद उन्होंने अपनी पूरी टीम के साथ कुछ नया शुरू करने की योजना बनाई। इसके बाद अर्नब ने कहा कि जितने लोगों ने काल मार्क्स को नहीं पढ़ा है, वह वामपंथी होने का दावा नहीं कर सकते हैं।

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फिर उन्होंने पूछा कि जितने भी चैनल (खासकर एनडीटीवी) के पत्रकार या संवाददाता मार्क्सवादी होने का दावा करते हैं, उनमें से कितनों ने मार्क्स को पढ़ा है? इसलिए वामपंथी शब्द को गाली देना बंद करिए। उनका कहना था कि काम के दौरान उन्हें पूरी स्वतंत्रता चाहिए थी लेकिन जब ऐसा नहीं होता था, तब वह आगे नहीं बढ़ पाते थे। इसलिए उन्होंने अपना चैनल शुरू किया। 

इसके बाद उनसे सवाल किया गया कि रिपब्लिक भारत शुरू करने से लेकर आज तक को पीछे छोड़ने के दौरान सफ़र कैसा रहा? इस पर अर्नब ने कहा कि वह इसमें रुपए के लिए नहीं हैं, उनके लिए रिपब्लिक ब्रांड सबसे महत्वपूर्ण है। अब ज़्यादा लोग उन पर भरोसा करते हैं लेकिन लुटियंस में बहुत से लोगों को इस बात से परेशानी होती है। फिर अर्नब ने कहा उनके लिए संस्थान की ब्रांड वैल्यू सबसे अहम है क्योंकि इससे लोगों का भरोसा जुड़ा हुआ है।

अर्नब गोस्वामी ने इसके बाद कहा कि आज एक समाचार समूह के मालिक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह पता करना है कि उसका कर्मचारी (संपादक) किस गाड़ी से चलता है। उनके मुताबिक़ एक समाचार समूह का मालिक यह साबित करने में लगा हुआ है कि पत्रकारों का कोई अर्थ नहीं है, न ही पत्रकारों की कोई ज़रूरत है। उन्हें लगता है कि वो पत्रकारों के बिना अपना संस्थान चला सकते हैं और ऐसे लोगों से किसी को परेशानी नहीं होती है।

फिर अर्नब से सवाल किया गया कि उनका चैनल पूरी तरह वन मैन शो है, उनके बिना रिपब्लिक सफल नहीं हो सकता। इसी सवाल में यह भी जुड़ा था कि उनकी पत्रकारिता में काफी शोर है। इसके जवाब में अर्नब ने अपने चैनल के कई एंकर के बारे में बताया, जिनकी रेटिंग अन्य चैनलों की तुलना में काफी बेहतर है। उन्हें भी लाखों लोग देखते और पसंद करते हैं। लोग उनके स्क्रीन पर आने का इंतज़ार करते हैं। अगर कोई उनकी तरफ नहीं देखता चाहता तो यह उनकी निजी और पेशेवर निराशा है।

अपनी शैली की लाउडनेस (शोर-शराबे) पर जवाब देते हुए अर्नब ने कहा कि सुशांत सिंह मामले ने लुटियंस के लोगों के चेहरे का नकाब उतार दिया है। और जब तक एक मुद्दे पर काफी समय के लिए बात नहीं करेंगे, तब तक उस मुद्दे पर न्याय नहीं होगा। फिर अर्नब ने कहा कि अगर वो किसी मुद्दे पर लंबे समय तक बात न करें तो क्या सिर्फ एक दिन उस पर एक बार बात करें?

उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि तमाम झूठे लोग जिनकी शाहीन बाग़ के साथ मीडिया साझेदारी (पार्टनरशिप) थी, क्या उन्होंने इस मुद्दे पर लंबे समय तक बात की? उन लोगों को सड़क बंद करने का अधिकार किसने दिया? उन्होंने इतने लंबे समय तक सड़क क्यों जाम की? मास्क पहने हुए तमाम लोग जामिया के पुस्तकालय में क्यों दाखिल हुए थे? लोग शाहीन बाग़ में कविताएँ पढ़ रहे थे और मानवाधिकार का इससे बड़ा मज़ाक क्या होता कि देश की राजधानी में लोग चल नहीं सकते हैं।

हाल ही में अर्नब पर बनाया गया एक मीम भी खूब चर्चा में रहा। एक छोटी से वीडियो क्लिप, जिसमें वह कहते हुए नज़र आ रहे हैं, “मुझे ड्रग्स दो, मुझे चरस दो, गाँजा दो।” इस बात के जवाब में उन्होंने कहा

“मैं रिया चक्रवर्ती की ड्रग पेडलर (ड्रग्स बेचने वाले व्यक्ति) से बातचीत की व्हाट्सएप चैट का ज़िक्र कर रहा था। उसमें रिया चक्रवर्ती ने साफ़ तौर पर कहा था – मुझे ड्रग्स दो। लेकिन कुछ फर्जी लोगों ने उस हिस्से को एडिट किया और सोशल मीडिया पर चला दिया। अब उन्हें देखने वाला कोई नहीं है तो वो अर्नब की 5-6 सेकेंड की क्लिप चला रहे हैं। ऐसे लोगों को मुझे रॉयल्टी देनी चाहिए।”

अर्नब से मीडिया ट्रायल पर भी सवाल किया गया। जिसमें उनसे यह पूछा गया कि मीडिया ट्रायल लोगों की छवि को नुकसान पहुँचाते हैं। इसकी वजह से एक इंसान बहुत निराश भी होता है, खासकर अगर वह निर्दोष है। इसके जवाब में अर्नब ने कई मामलों का ब्यौरा दिया, जिनमें मीडिया ट्रायल की वजह से सकारात्मक नतीजे हासिल हुए थे। इसमें निर्भया रेप केस, जेसिका लाल केस मुख्य हैं।

फिर उन्होंने एनडीटीवी पर सवाल करते हुए कहा कि उपहार केस में उन्होंने कितनी लड़ाई लड़ी? क्या वह अंत तक न्याय के लिए लड़े? उन्हें सुनंदा पुष्कर के लिए भी मीडिया ट्रायल करना चाहिए था। 

अर्नब गोस्वामी से यह सवाल भी किया गया कि उन्होंने इतने कम दिनों में हिंदी कैसे सीख ली? इस पर उन्होंने बताया कि उनकी टीम के सदस्यों ने कहा कि वो एक वाक्य हर 10 मिनट में दोहराया करें। वह वाक्य था – ‘मुझे हिंदी नहीं आती है।’ इस वाक्य में उन्होंने एक और बात जोड़ दी, ‘मेरी नियत साफ़ है।’

इसके बाद पत्रकारिता में निष्पक्षता पर जवाब देते हुए अर्नब ने कहा, “यह पूरी तरह बकवास है। इस पेशे का एक व्यक्ति भी निष्पक्ष नहीं है लेकिन मेरे पास यह कहने की हिम्मत है कि मैं न्यूट्रल (निष्पक्ष) नहीं हूँ।” 

राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अपना नज़रिया रखते हुए अर्नब ने कहा कि राष्ट्रवाद देश को जोड़ने का एक ज़रिया होना चाहिए। अफ़सोस लोगों को इसके सही मायने नहीं पता हैं और समाज ऐसे लोगों के प्रति जवाबदेह नहीं है। उन्होंने बताया कि जो कुछ भी किया है, वह देश के लिए किया है।

उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि 26/11 आतंकवादी हमलों के बाद जिस तरह उन्होंने पाकिस्तान पर सवाल खड़े किए, वह राष्ट्रवाद ही था। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ना भी राष्ट्रवाद था, निर्भया मुद्दे पर बात करना राष्ट्र्वाद था। इसके बाद उन्होंने कहा कि वो इस बात पर गर्व करते हैं और ऐसी किसी बहस में नहीं पड़ना चाहते कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद में क्या फर्क है?

डिजिटल मीडिया पर अपना पक्ष रखते हुए भी अर्नब ने कई अहम बातें कहीं। उन्होंने कहा

“मैं नहीं चाहता कि चंद एजेंडा फैलाने वाले डिजिटल मीडिया समूह लोगों की आवाज़ बनने का दावा करें। ऐसे डिजिटल मीडिया समूह सिर्फ झूठ परोसते हैं। यह न तो अपनी फंडिंग को लेकर पारदर्शी हैं और न ही अपने तौर-तरीकों को लेकर। इसमें बहुत से ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो भारत के नागरिक तक नहीं हैं, यह सब रुकना चाहिए। हमें अपने देश में भारतीय डिजिटल मीडिया समूहों की ज़रूरत है। हमें साथ मिल कर ऐसे लोगों को जवाब देना होगा, जिन्हें देश हित की कोई परवाह ही नहीं है।” 

अंत में लुटियंस मीडिया पर बोलते हुए अर्नब ने कहा कि अब ऐसे लोगों का कोई वजूद नहीं रहा। जनता ने उन्हें सिरे से नकार दिया है, यह हारे हुए लोग हैं। इन्हें खुद को किसी न किसी कोने में छिपने की ज़रूरत है क्योंकि ऐसे लोगों का समय ख़त्म हो चुका है।

इसके बाद आने वाली नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए अर्नब ने कहा कि इन्हें मूलभूत तौर तरीकों पर ध्यान देने और सीखने की ज़रूरत है। उनके अनुसार जिस इंसान की जानकारी और समझ मीडिया के जिस पहलू पर हो, उसे उस पर ही काम करना चाहिए, उस स्किल को और तराशना चाहिए। सोशल मीडिया की बहस में पड़ कर समय बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं है।

अर्नब गोस्वामी ने यह भी समझाया कि नए लोगों को अपने लिखने का तरीका सुधारने की ज़रूरत है। उन्हें पता होना चाहिए कि एक ख़बर कैसे तैयार की जाती है। खबर कैसे एडिट की जाती है, खबर कहानी के रूप में कैसे बढ़ाई और सुनाई जाती है।     

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Editorial Deskhttp://www.opindia.com
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