विदेशी मीडिया जब भी भारत की खबर लिखते हैं तो लगता है कि मानो यहाँ लोकतंत्र बचा ही नहीं है। भारत के विरोध में रहने वाले लोगों में पश्चिमी मीडिया का एक बड़ा वर्ग अपने ‘नायक’ खोजने की कोशिश करता है। ताजा उदाहरण द गार्जियन का है, जिसने दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के ‘मास्टमाइंड’ उमर खालिद को ‘नायक’ के तौर पर दिखाया है।
वही उमर खालिद, जो JNU के दिनों से ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ गैंग का चमकता सितारा रहा है। वही उमर खालिद, जो साल 2020 में दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड है और UAPA में जेल में बंद है। लेकिन द गार्जियन के आर्टिकल से लगता है कि उमर खालिद कोई अपराधी नहीं बल्कि ‘राजनीतिक कैदी’ है।
ये द गार्जियन भारत में खुलकर उन लोगों का समर्थन करता है, जो देशद्रोह के मामले में जेल में बंद हैं।
पाँच साल से जेल में क्यों है ?
द गार्जियन का रोना यह है कि उमर खालिद ‘बिना दोषी’ करार जेल में बंद है, जिसकी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ सरकार है, जो विरोध की आवाजों को कुचल रही है। तो यहाँ गार्जियन को यह जानने की जरूरत है कि नरेंद्र मोदी जेल में नहीं डालते हैं बल्कि कोर्ट भेजता है।
बात रही ‘बिना दोषी’ करार जेल में होने की तो उमर खालिद की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि खालिद के वकील ही जानबूझकर देरी कर रहे हैं। विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने कहा कि 2023 से 2024 के बीच कुल 14 तारीखों में से 7 बार सुनवाई खालिद के वकीलों ने ही टलवाई।
दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में भी साफ लिखा है कि कैसे दंगों से पहले बैठकों की योजना बनी, कौन-कौन शामिल हुआ और किसने कब-कब उकसाने वाले भाषण दिए। इसके आधार पर उमर खालिद और उनके सहयोगी जेल में बंद हैं।
गार्जियन ने लिखा- ‘खालिद तो दिल्ली में थे ही नहीं।’ लेकिन सच ये है कि उसकी साजिश सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं थी। महाराष्ट्र से लेकर शाहीन बाग तक, सब जगह उनका नेटवर्क काम कर रहा था। पुलिस की रिपोर्ट में भी सामने आया कि महाराष्ट्र के अमरावली में 17 फरवरी 2020 को भड़काऊ भाषण दिया था, जिसे पुलिस ने दंगा भड़ाकने की योजना के रूप में मामले की जाँच में इस्तेमाल किया था।
‘राजनीतिक कैदी’ है उमर खालिद?
उमर खालिद को द गार्जियन लिखता है कि वो ‘राजनीतिक कैदी’ है। लेकिन यह शब्द असल में उन देशों के लिए इस्तेमाल होता है, जहाँ तानाशाही है और लोग सिर्फ सरकार की आलोचना करने पर जेल में डाल दिए जाते हैं।
अगर सचमुच ऐसा होता तो देश का पूरा विपक्ष आज सलाखों के पीछे होता और मीडिया, जो सरकार की नीतियों पर सवाल खड़ा करता है, वो भी अपना काम निष्पक्ष रूप से नहीं कर पाता। तो क्या आज सारा विपक्ष जेल में है या सारे पत्रकार जेल में है? तो फिर उमर खालिद को केस अलग क्यों है?
क्योंकि यह केस सिर्फ सरकार की आलोचना का नहीं है। यह मामला देश में साजिश रचने और दंगा भड़काने को लेकर है। ऐसे में द गार्जियन उमर खालिद जैसे लोग को राजनीतिक कैदी बताकर आतंकवादियों का गुणगान करने जैसा है।
अमनेस्टी इंटरनेशनल का उमर खालिद को सपोर्ट
द गार्जियन ने अमनेस्टी इंटरनेशनल और कुछ अन्य विदेशी संगठन के बयान का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि ‘उमर खालिद को तुरंत रिहा करो।’
ये वही अमनेस्टी है, जिसके भारत में फंडिंग पर ही सवाल उठे और भारत सरकार ने दुकान बंद कर दी क्योंकि इसका इस्तेमाल भारत-विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने में किया जा रहा था। तो साबित तो यही हो जाता है कि एक भारत-विरोधी संगठन तो एक देशद्रोही को नायक बनाएगा ही।
मोदी सरकार मुस्लिम-बुद्धिजीवी की आवाज दबा रहे हैं?
द गार्जियन ने उमर खालिद की पार्टनर बानोज्योत्सना लाहिरी के बयान भी छापे, जिसमें वो कह रही हैं कि मोदी सरकार मुस्लिम, बुद्धिजीवी और निर्भीक आवाजों से नफरत करती है।
यहाँ मोदी सरकार को मुस्लिम-विरोधी दर्शाया गया है फिर खुद ढींगरा फोड़ने आ जाते हैं कि सरकार मुस्लिम-विरोधी है। असल में सच यह है कि सरकार का मुद्दा न तो मुस्लिम है, न बुद्धिजीवी बल्कि असल परेशानी देश-विरोधी गतिविधियों से है।
यहाँ द गार्जियन देश तोड़ने की बात करने वाले उमर खालिद को बुद्धिजीवी बता रही है। और यह भी चाहती है कि सरकार उस पर कोई कार्रवाई भी न करे।
यहाँ उसकी पार्टनर लाहिरी ने बताया, जिसे द गार्जियन ने बड़े भावुक अंदाज में लिखा कि उमर खालिद हफ्ते में 30 मिनट परिवार से वीडियो कॉल करते हैं और वो जेल में अब तक 300 से ज्यादा किताबें पढ़ चुका है।
अब सवाल यह है कि आतंकियों को कहीं भी ये सारी सुविधाएँ दी जाती हैं। अगर भारत में लोकतंत्र न होता तो क्या खालिद जेल में किताबें पढ़ सकता और क्या हर हफ्तें अपने परिवार से वीडियो कॉल पर बात हो पाती। असलियत यह है कि भारत की जेलें अब भी उसके ‘मानवाधिकार’ का सम्मान कर रही हैं, बावजूद इसके कि उस पर देश को दंगों में झोंकने का आरोप है।
विदेशी मीडिया का दोगलापन
जब भी भारत में किसी मुस्लिम कानून के शिकंजे में आता है तो विदेशी मीडिया तुरंत एक्टिव हो जाता है और अपराधी को नायक के रूप में पेश करना चालू कर देता है।
यही वजह है कि द गार्जियन भी उमर खालिद की दंगे भड़काने की साजिश को शांतिप्रिय प्रदर्शन बता रही है और भारत में उसके खिलाफ मोदी सरकार का अत्याचार के रूप में पेश कर रही है।
द गार्जियन यह नहीं लिखता कि खालिद के भाषणों और गतिविधियों से पूरे देश में CAA-NRC विरोध के नाम पर हिंसा फैली थी। उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बंगाल में पुलिसकर्मियों तक पर हमला हुआ। लेकिन गार्जियन की कलम से ये सब गायब हो जाता है। गार्जियन कभी यह नहीं लिखता कि दंगों में मारे गए ज्यादातर निर्दोष हिंदू थे और खालिद जैसे चेहरे इस षड्यंत्र को हवा दे रहे थे।
सच यह है कि द गार्जियन और एमनेस्टी जैसे विदेशी संगठन भारत की छवि खराब करने का एजेंडा चला रहे हैं। इन्हें लोकतंत्र, मानवाधिकार या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता नहीं है। इनका असली मकसद मोदी सरकार को बदनाम करना है और भारत को दमनकारी राष्ट्र के रूप में दिखाना है।


