सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इसी तरह फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्टिंग की आलोचना की है और इस तरह के लेखों को बरगलाने वाला बताया है। लोगों का कहना है कि फाइनेंशियल टाइम्स जैसे मीडिया सिर्फ़ आग में घी डालने का काम करते हैं, आखिर उन्हें कैसे पता कि नकाबपोश राष्ट्रवादी थे? ऐसे संस्थानों के ख़िलाफ़ एक्शन लिया जाना चाहिए।
जब जामिया में पुलिस घुसी थी, तो इन्होने ही पुलिस की निंदा की थी। आज ये पूछ रहे हैं कि जेएनयू में पुलिस क्यों नहीं घुसी? कल जब वामपंथी दंगाइयों को गिरफ़्तार किया जाएगा, मीडिया उनके परिवार का इंटरव्यू लेगा और उन्हें निर्दोष बताएगा। दिल्ली पुलिस ही बलि का बकरा क्यों बने?
सआदत छात्रावास के नाबालिग लड़कों ने ख़ुद दावा किया कि उनके गुदा से ख़ून बहने की ख़बरें झूठी हैं। सीतापुर के रहने वाले 21 साल के इरफ़ान हैदर ने बताया कि 'कुछ मदरसा छात्रों को पुलिस यातना का दंश झेलना पड़ा' जैसी सारी ख़बरें झूठी थीं, इनका कोई आधार नहीं था।
इस समय सोशल मीडिया पर कई सौ या शायद हजारों की तादाद में ऐसे सबूत वायरल हो रहे हैं जो राणा अयूब की फर्जी दावों को झूठा साबित करते हैं। बताते हैं कि सड़कों पर उतरी कट्टरपंथियों की भीड़ न शांतिपूर्ण है और न ही उसका मकसद पाक है।
IIT, फैज, CAA, मोदी-शाह विरोध... मतलब गिरोह विशेष के लिए फेक न्यूज फैलाने का भरपूर मसाला। ऐसे में सिर्फ BBC ही इसमें क्यों आगे रहे! मीडिया के तमाम बड़े नामों ने 'फैज की नज्म हिंदू विरोधी' के टाइटल से खबर चलाई। किसी ने भी सच जानने की कोशिश नहीं की।
लिबरल गैंग को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनका कहा सच है या झूठ। वे केवल अपने एजेंडे की परवाह करते हैं। उसे आगे बढ़ाने के लिए हिंदुओं पर क्रूर अत्याचार करने वाले इस्लामी शासकों का महिमामंडन करते हैं।
कोटा में 962 बच्चों की मौत कॉन्ग्रेस सरकार की नाकामी दिखाती है, इसीलिए वहाँ मीडिया सवाल नहीं पूछ रहा। एक बच्ची के स्वास्थ्य के साथ खेल रहे प्रदर्शनकारी मीडिया के लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं। इस देश के मीडिया की दुर्गति यही है कि जब तक ‘भाजपा’ वाला धनिया का पत्ता न छिड़का गया हो, इन्हें न तो दलित की मौत पर कुछ कहना है, न बड़ी संख्या में नवजात शिशुओं की मृत्यु पर इन्हें वो ज़ायक़ा मिल पाता है।
वर्ष 2019 जाने वाला है और इसी के साथ ऑपइंडिया हिन्दी के भी एक साल पूरे हो रहे हैं। इस साल राजनीति और समाज से ले कर न्यायपालिका और मीडिया से जुड़ी कई ऐसी खबरें थीं, जिन्हें पाठकों ने खूब पढ़ा और पसंद किया। 2020 में हम और भी उत्साह से बने रहेंगे आपके साथ।
फैज की "हम देखेंगे... बस नाम रहेगा अल्लाह का" वाले पर इसी मीडिया गिरोह ने संदर्भ की बात करते हुए लेख पर लेख दे मारे। तो क्या दंगे-आगजनी की जगह पुलिस के निर्णय संदर्भ से परे हो जाते हैं? उसकी व्याख्या क्यों नहीं! क्योंकि ये आपके नैरेटिव को सूट नहीं करता।
CAA विरोध में सिर्फ़ तिरंगा और महात्मा गाँधी की तस्वीर लेकर लोग चल रहे? सब कुछ शांति से हो रहा? देश में कहीं कोई दंगा नहीं? प्रोपेगेंडा पत्रकार राजदीप ने तो यही कहा है। लेकिन सोशल मीडिया पर उन्हें उनकी औकात बता दी गई - फोटो, वीडियो के साथ, प्रमाण देकर।