भारतीय जनता पार्टी ने इन विज्ञापनों के प्रसारण को रोकने की अपील की थी। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीएल कांताराव की अध्यक्षता वाली कमिटी ने इन विज्ञापनों के प्रसारण की अनुमति को निरस्त करने का फैसला लिया है।
CM योगी ने अपने जवाब में स्पष्ट किया है कि उन्होंने अपने भाषण (जिसके कारण उन पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगा) में केवल छद्म धर्मनिरपेक्षता को उजागर किया था, धर्म के नाम पर वोट नहीं माँगा था। अपने जवाब में उन्होंने यह भी लिखा कि हर नागरिक को अपने धर्म व आस्था की स्वतंत्रता है।
योगी ने कहा था, "जब गठबंधन के नेताओं को अली पर विश्वास है और वह अली-अली कर रहे हैं, तो हम भी बजरंगबली के अनुयायी हैं और हमें बजरंगबली पर विश्वास है।" साथ ही उन्होंने वेस्ट यूपी से हरा रंग साफ़ करने की अपील की थी। आयोग ने दोनों ही बयानों पर आपत्ति जताई है।
टीवी चैनलों के एंकर जो कर रहे हैं, क्या वो प्रोपेगेंडा नहीं है। हर रात चालीस मिनट तक सरकार की हर योजना को बेकार बताना भी प्रोपेगेंडा ही है। आखिर चुनाव आयोग इसके लेवल प्लेइंग फ़ील्ड का निर्धारण करेगा कैसे? क्या मीडिया संस्थानों के लिए कोई तय क़ायदा है जहाँ चुनाव आयोग सुनिश्चित कर सके कि इतने मिनट इस पार्टी की रैली, और इतने मिनट इस पार्टी की रैली कवर की जाएगी?
सच्चाई यह है कि नमो फूड का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कोई लेनादेना नहीं है। वास्तव में, नोएडा में इस नाम का एक रेस्टोरेंट है। जैसा कि फूड सर्च वेबसाइट जोमेटो में भी देखा जा सकता है, नमो फूड के नोएडा में 1 नहीं बल्कि 4 आउटलेट्स हैं। यहीं से पुलिसकर्मियों के लिए लंच ऑर्डर किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर सेंसर बोर्ड फ़िल्म को पास कर देती है तो इसके रिलीज में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन लगातार मिल रही शिकायतों के मद्देनज़र आयोग ने फ़िल्म की रिलीज रोक दी है। आयोग ने कहा कि जबतक आम चुनाव ख़त्म नहीं हो जाते, तबतक ये फ़िल्म रिलीज नहीं होगी।
आम चुनाव से सिर्फ 2 दिन पहले इस इलाके की वोटर लिस्ट जारी की गई है। ऐसे में इतने कम समय में गलती में सुधार हो पाना अब मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन नजर आ रहा है।
चुनाव आयोग ने कॉन्ग्रेस के कैंपेन सॉन्ग के कुछ लाइनों को आपत्तिजनक बताते हुए उसमें बदलाव के लिए कहा था। इन लाइनों में मोदी सरकार द्वारा नफरत फैलाने और समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ भड़काने का आरोप लगाया गया था।