Tuesday, April 14, 2026
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न्यूजलॉन्ड्री चाहता है मोदी सरकार बदले नीति, बढ़ाए पाकिस्तान की ओर दोस्ती का ‘हाथ’: ‘अमन की नई आशा’ जगाने में जुटा प्रोपेगेंडा ग्रुप

पाकिस्तान के इस्लामी कट्टरपंथ और सैन्य दबदबे को नकारते हुए न्यूज़लॉन्ड्री उदारवादी पाकिस्तान का भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहा है। ये साझा उपमहाद्वीपीय विरासत की बात करता है। वह ये कहने की कोशिश कर रहा है कि पाकिस्तानी युवा भारत के साथ रिश्ते सुधारने का इच्छुक है और भारत को अपनी नीति बदलनी चाहिए

भारत जब भी पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम उठाता है, भारत के वाम-उदारवादी लोग खुद ‘अमन की आशा’ करते हुए तरह- तरह के तर्क देने लगते हैं। ये वर्ग इस बात को भी नजरअंदाज कर देता है कि पाकिस्तानी फौज और सरकार समर्थित इस्मालिक जिहादी मानसिकता भारत को दशकों से लहुलुहान कर रही है। ये लोग भारत के विभाजन और ‘टू नेशन थ्योरी’ को भी नकारने की कोशिश करते हैं, जिसकी वजह से इस्लामिक देश के रूप में पाकिस्तान का जन्म हुआ।

प्रोपेगेंडा वर्ग अब सांस्कृतिक आदान-प्रदान, बॉलीवुड, पाकिस्तानी फिल्में, साझा उपमहाद्वीपीय पहचान जैसे तमाम पहलुओं की बात करने लग जाते हैं ताकि भारत और पाकिस्तान को एक साथ लाया जा सके।

वामपंथी प्रोपेगेंडा वाले न्यूज़लॉन्ड्री ने भी अब ऐसा ही सुझाव दिया है। न्यूजलॉन्ड्री चाहता है कि भारत पाकिस्तान को लेकर अपनी रणनीति में बदलाव करे। लेखिका अल्पना किशोर ने “भारत की पाक रणनीति को 2025 में सुधार की आवश्यकता ” शीर्षक वाले लेख में इसका जिक्र किया है। इसमें मोदी सरकार के पाकिस्तान के प्रति नजरिए की आलोचना की गई है। इसमें कहा गया है कि भारत ने पाकिस्तान में आ रहे सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव को नकारते हुए सिर्फ सैन्य प्रभुत्व और सरकार पर उसके नियंत्रण पर ध्यान दे रहा है।

न्यूजक्लिक की तस्वीर

लेख के मुताबिक पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को युद्ध की कार्रवाई के रूप में देखना, पहलगाम में जिहादी हमले के बाद सिंधु जल संधि को रद्द करना और बॉलीवुड समेत भारत के तमाम मनोरंजन उद्योग में पाकिस्तानी कलाकारों को मौका नहीं देना गलत है।

न्यूज़लॉन्ड्री के लेख में लिखा है, “एक राज्य के रूप में दुश्मन – इसका मतलब है कि उसके लोग दुश्मन हैं। यह 1980 से एक अलग दुनिया है। आज के युद्धों के लिए ऐसे जवाबों की आवश्यकता है जो 2025 में कारगर हों।”

इसमें आगे कहा गया है कि पिछले कुछ वर्षों में हालात में काफी बदलाव आया है। जिया उल हक का जमाना चला गया जब बहुत से लोग जिया के इस्लामिक सोच से इत्तेफाक रखते थे। टू नेशन थ्योरी से लोग सहमत थे और कश्मीर इनके लिए अहम मुद्दा था।

सबसे पहले दो नेशन थ्योरी की बात करते हैं, ये सिद्धांत नस्ल से ज्यादा धर्म से जुड़ा मुद्दा है। सर सैयद अहमद खान की दी हुई द्वि-राष्ट्र सिद्धांत में मूलतः यह कहा गया था कि मुसलमान हिंदुओं के साथ मिलकर नहीं रह सकता इसलिए उनका एक अलग राष्ट्र होना चाहिए।

सैयद अहमद खान ने 1876 में कहा था, “मुझे अब पूरा यकीन हो गया है कि हिंदू और मुसलमान कभी एक साथ एक राष्ट्र के रूप में नहीं रह सकते क्योंकि उनका धर्म और जीवन-शैली एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है।”

बाद में भी उन्होंने कहा, “दोस्तों, भारत में दो प्रमुख राष्ट्र रहते हैं जो हिंदू और मुसलमान के नाम से जाने जाते हैं… हिंदू या मुसलमान होना आंतरिक आस्था का विषय है जिसका आपसी रिश्तों और बाहरी परिस्थितियों से कोई लेना-देना नहीं है।”

बारह साल बाद उन्होंने कहा, “अब मान लीजिए कि अंग्रेजी समुदाय और सेना अपनी सारी तोपें, शानदार हथियार और बाकी सब कुछ लेकर भारत छोड़ दें, तो फिर भारत का शासक कौन होगा?… क्या यह संभव है कि इन परिस्थितियों में दो राष्ट्र – मुसलमान और हिंदू – एक ही सिंहासन पर बैठें और समान शक्तिवान रहें? कतई नहीं। ये बहुत आवश्यक है कि उनमें से एक दूसरे पर विजय प्राप्त करे। यह आशा करना कि दोनों समान रह सकें, असंभव और अकल्पनीय है। लेकिन जब तक एक राष्ट्र दूसरे पर विजय प्राप्त नहीं कर लेता और उसे अपने मुताबिक नहीं बना लेता, तब तक देश में शांति स्थापित नहीं हो सकती।”

लेख में आगे पाकिस्तानी अमीरों और नए पीढ़ी को एक तरह का ‘गेमचेंजर’ बताया गया है। अल्पना किशोर जोर देकर कहती हैं कि पाकिस्तानी नई पीढ़ी सोशल मीडिया का इस्तेमाल “अपने पूर्वजों की पसंद और वैचारिक मान्यताओं पर सवाल उठाने, आधिकारिक बयानों का खंडन करने और वैश्विक स्तर पर संवाद करने के लिए कर रहा है। ये लोग जिहादियों की निंदा करने, दूसरों के साथ जुड़ने और आधुनिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में कामयाब रहे हैं।”

यह सच है कि पाकिस्तानी युवाओं का एक बड़ा वर्ग, खासकर जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के समर्थक और पीटीआई के नेता पाकिस्तानी सेना के भ्रष्ट तौर-तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन बड़ी आबादी अभी भी टू नेशन थ्योरी को बहुत महत्व देती है। वे अभी भी ये मानते हैं कि मुसलमान हिंदुओं के साथ शांतिपूर्वक मिलजुल कर नहीं रह सकते क्योंकि इस्लामी विश्वास के अनुसार हिन्दू काफिर हैं।

यह भी तर्क दिया जाता है कि विदेशों में साथ-साथ पढ़ाई और काम करने से पाकिस्तानी और भारतीय एक-दूसरे के करीब आए हैं। उनमें दोस्ती और लगाव बढ़ा है। हालाँकि ये कहना गलत नहीं होगा कि विदेशों में प्रवासी संबंधों का पाकिस्तान के रवैये पर असर नहीं पड़ता है। यहाँ तक कि विदेशों में रहने वाले कई पाकिस्तानी ‘शर्मिंदगी’ से बचने के लिए खुद को भारतीय होने का झूठा दावा करते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि वे खुद को भारतीय मानते हैं या भारत समर्थक हैं।

न्यूज़लॉन्ड्री का ‘अमन की आशा’ लेख पाकिस्तान में एक साझा उपमहाद्वीपीय पहचान को लेकर ज्यादा पॉजिटिव रुख रखता है। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान की सैन्य और खुफिया तंत्र के असर को कम करके आँकता है। दरअसल ये दोनों ही भारत विरोधी पाकिस्तान की जड़ में है।

लेख बताता है कि पाकिस्तानी युवाओं का वैश्विक दृष्टिकोण ऐसा है कि ये लोग भारतीय सांस्कृतिक विरासत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। चाहे वह बॉलीवुड, ओटीटी, सोशल मीडिया से हो। न्यूज़लॉन्ड्री आगे लिखता है कि भारत में ‘अंधराष्ट्रवादी’ फ़िल्मों के उभरने के बावजूद ये विरासत पाकिस्तानी नई पीढ़ी को जोड़ रहा है। यहाँ अंधराष्ट्रवाद कहने का मतलब भारत-पाक विषयों पर आधारित फ़िल्मों से है।

लेकिन पूर्व पाकिस्तानी सेना प्रमुख परवेज़ मुशर्रफ़ भी बॉलीवुड फ़िल्मों और संगीत के बड़े प्रशंसक थे, इससे ये हकीकत तो नहीं बदल जाती कि 1999 के कारगिल युद्ध के लिए वे जिम्मेदार थे। उन्होंने तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके भारतीय समकक्ष अटल बिहारी वाजपेयी के बीच हुए लाहौर समझौते के साथ विश्वासघात किया। वर्षों बाद बॉलीवुड प्रेमी पाकिस्तानी सेना प्रमुख मुशर्रफ ने कारगिल के विश्वासघात को एक ‘सफल’ अभियान बताया और नवाज शरीफ की कारगिल से पाकिस्तानी सैनिकों की वापसी के आदेश की भी निंदा की।

युवा पाकिस्तानी पीढ़ी फिल्मों, ओटीटी प्लेटफॉर्म या सोशल मीडिया के माध्यम से भारतीय संस्कृति से जुड़ सकती है, लेकिन यह सांस्कृतिक आत्मीयता भारत के खिलाफ पाकिस्तानी षड़यंत्र को रोक देगा इसकी गारंटी कौन देगा? पाकिस्तान के समर्थन से भारत में हुई बड़ी घटनाओं, चाहे वह मुंबई में हुआ सीरियल ब्लास्ट हो, 26/11 हो, संसद हमला हो या उरी- पहलगाम हमला हो आज तक पाकिस्तान ने आतंकवादियों के शामिल होने की बात स्वीकार नहीं की है।

पहलगाम हमले के दौरान लश्कर-ए-तैयबा की शाखा, द रेजिस्टेंस फ्रंट से जुड़े एक पूर्व पाकिस्तानी सेना अधिकारी सहित दूसरे आतंकवादियों ने निर्दोष पर्यटकों को मारा। लेकिन गैर-मुस्लिम होने की पहचान साबित होने के बाद पर्यटकों को गोली मारी। पीड़ितों से कलमा पढ़ने के लिए कहा गया था और ऐसा न करने पर गोली मार दी गई थी। कई पाकिस्तानी हस्तियों और यहाँ तक कि आम लोगों ने भी हमले की निंदा की। हालाँकि, हमले की निंदा में एक आम बात यह दिखी कि उन्होंने इस्लाम को जिहादी मानसिकता और आतंकवादियों की प्रेरणा से अलग कर दिया। “आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता”, “इस्लाम नफरत नहीं सिखाता” और इसी तरह के कई संदेश आए।

जिहादी हमले की निंदा करने से ज़्यादा पाकिस्तानी इस बात पर ध्यान देते हैं कि इसे इस्लामी आतंकवाद न कहा जाए। ये हिन्दुओं के प्रति नफरत नहीं बल्कि आतंकी कार्रवाई है जिसकी जद में हिन्दू-मुस्लिम सभी हैं- ये साबित करने की कोशिश की जाती है।

अगर हमें जिहादी आतंकवाद के खतरे से सही मायने में निपटना है, तो एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए कि टू नेशन थ्योरी भारत के विभाजन का आधार था। पाकिस्तान का निर्माण हिन्दू घृणा की वजह से हुआ है, न कि विकास या दूसरी वजहों से

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Shraddha Pandey
Shraddha Pandey
Shraddha Pandey is a Senior Sub-Editor at OpIndia, where she has been sharpening her edge on truth and narrative. With three years in experience in journalism, she is passionate about Hindu rights, Indian politics, geopolitics and India’s rise. When not dissecting and debunking propaganda, books, movies, music and cricket interest her. Email: [email protected]

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