— India in the UK (@HCI_London) June 5, 2026
आधिकारिक बयान में भारतीय उच्चायोग ने कहा, “4 जून 2026 को, भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश ने आयोजकों के निमंत्रण पर लंदन विश्वविद्यालय के बर्कबेक स्थित कॉलेज के एक कार्यक्रम में शामिल हुए। इसमें उन्हें ‘एआई और अंतर्राष्ट्रीय कानून’ पर लेक्चर देना था।”
उनके भाषण के बाद एक अच्छी चर्चा हुई। इस दौरान एक व्यक्ति ने कार्यक्रम में बाधा डालने की कोशिश की। दर्शकों का ऐसा अशोभनीय व्यवहार अस्वीकार्य है और मर्यादा के विपरीत है। मतभेद एक लोकतांत्रिक समाज का स्वाभाविक हिस्सा हैं, हालाँकि इसे सभ्य और सम्मानजनक तरीके से व्यक्त किया जाना चाहिए।
वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि एक प्रतिभागी भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति को लेकर सवाल उठाते हुए दिखाई दे रहा है। मुख्य न्यायाधीश लंदन विश्वविद्यालय के बर्कबेक कॉलेज में ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अंतर्राष्ट्रीय कानून’ पर लेक्चर देने के लिए गए थे।
In the 1st video, the lady interrupting CJI Suryakant is not a student but a Professor of Geography and anti-India activist, Kalpana Wilson. She is daughter of Amrit Wilson whose OCI was cancelled by GoI few months ago. She is ideologically aligned to India's CPI(ML). She has a… https://t.co/AeXxhRa7Ma
— Stop Hindu Hate Advocacy Network (SHHAN) (@HinduHate) June 7, 2026
वहाँ मौजूद एक महिला ने पहले मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों का जिक्र किया और फिर उनसे असहमति के बारे में पूछा। उन्होंने कहा, “ माननीय न्यायाधीश ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में लोकतंत्र की रक्षा के भारतीय इतिहास के बारे में कुछ बहुत महत्वपूर्ण बातें कही हैं। लेकिन, हमें देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई कानूनी विशेषज्ञों से पता चल रहा है कि भारत में ‘असहमति ‘ को लेकर काफी चिंता है। और ऐसा लगता है कि यह ‘चिंता’ कुछ हद तक माननीय न्यायाधीश के भाषण में भी झलकती है।” इससे पहले कि वह अपना प्रश्न पूरा कर पातीं, मंच पर मौजूद मॉडरेटर ने प्रश्न को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह चर्चा के विषय से संबंधित नहीं था।
बाद में महिला की पहचान अमृत विल्सन की बेटी कल्पना विल्सन के रूप में हुई। कल्पना बिरबेक विश्वविद्यालय में भूगोल की प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।
कल्पना विल्सन कौन हैं?
बिरबेक विश्वविद्यालय में कल्पना विल्सन के प्रोफाइल के अनुसार , वे सामाजिक विज्ञान विषय में सीनियर प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं और उनका कार्य अंतरराष्ट्रीय विकास और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में रिसर्च पर है। उन्होंने नस्ल/लिंग, श्रम, नव-उदारवाद और प्रजनन अधिकारों एवं न्याय से संबंधित विषयों पर शोध किया है, जिसमें विशेष रूप से दक्षिण एशिया और उसके प्रवासी समुदायों पर ध्यान दिया गया है।
कल्पना ने ससेक्स विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में बीए (ऑनर्स) और एरिया स्टडीज (दक्षिण एशिया) में एमए किया है। उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय के एसओएएस से राजनीतिक अर्थशास्त्र में पीएचडी भी की है। बिरबेक कॉलेज ज्वाइंन करने से पहले, वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और एसओएएस में कार्यरत थीं। हालाँकि उनकी अकादमिक उपलब्धियाँ भारत-विरोधी गतिविधियों को छिपा नहीं सकतीं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उनके बायो से पता चलता है कि वे ‘नस्लवाद और अंतरराष्ट्रीय विकास, लिंग, नवउदारवाद, साम्राज्यवाद और हिंदुत्व फासीवाद’ के बारे में लिखती हैं और खुद को ‘मार्क्सवादी नारीवादी’ बताती हैं। कल्पना ने सीपीआई (एमएल) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से हुई है। उनकी एक बेटी अनन्या है।
वामपंथी और भारत-विरोधी नेटवर्कों के साथ उनका जुड़ाव
कल्पना विल्सन का वामपंथी और भारत-विरोधी नेटवर्कों से जुड़ाव केवल अकादमिक लेखन तक सीमित नहीं है। वह नियमित रूप से ऐसे मंचों और अभियानों में शामिल होती रही हैं, जो भारत, भाजपा, आरएसएस और हिंदू संगठनों को फासीवादी, बहुसंख्यकवादी और दमनकारी के रूप में चित्रित करते हैं। साथ ही राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों और इससे जुड़े आरोपितों का समर्थन भी करती हैं।
लेस्टर हिंसा के लिए हिंदुओं को दोषी ठहराना
2022 में कल्पना विल्सन और उनकी मां अमृत विल्सन के साथ-साथ उनसे जुड़े ग्रुप ने ब्रिटेन के लीसेस्टर में हुई सांप्रदायिक हिंसा के लिए हिंदुओं को दोषी ठहराया। शहर में हिंदुओं के साथ हुई टारगेटेड हिंसा और धमकियों को मानने के बजाय, तनाव के लिए ‘हिंदुत्व’ को जिम्मेदार माना। उन्होंने लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग के बाहर भी प्रदर्शन किया, जिसे उन्होंने ब्रिटेन की राजनीति में हिंदुत्व के बढ़ते प्रभाव के रूप में वर्णित किया। लीसेस्टर हिंसा पर OpIndia की विस्तृत रिपोर्ट यहाँ देखी जा सकती है।
भारत से जुड़े मुद्दों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
यही नेटवर्क भारत से जुड़े कई मुद्दों पर विरोध प्रदर्शनों में भी शामिल रहा है। उन्होंने पाकिस्तान का कर्ज माफ करने, भारत में अवैध निर्माणों पर बुलडोजर कार्रवाई के खिलाफ, फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, जिसे उन्होंने “त्रासदी को प्रचार में बदलना” बताया, भारत में किसानों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया और 2002 के गुजरात हिंसा के विरोध में एक कैंडल मार्च निकाला, जिसे उन्होंने मोदी विरोधी नजरिए से पेश किया।
साम्यवादी राजनीति और पूँजीवाद पर हमले
कल्पना विल्सन की वैचारिक स्थिति ने भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर उनके लेखन को भी प्रभावित किया है। एक कम्युनिस्ट मार्क्सवादी के रूप में, उन्होंने भारत में पूँजीवाद का विरोध किया है और बड़े औद्योगिक घरानों पर असमानता फैलाने और हिंदुत्व के विकास में योगदान देने का आरोप लगाया है। उन्होंने आरएसएस, भाजपा और अन्य हिंदू समूहों को ‘पूँजीवादी समर्थक’ बताया है। उनके लेख कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, मार्क्सवादी लेनिनवादी मुक्ति (सीपीआई (एमएल)) की वेबसाइट पर प्रकाशित हुए हैं, जो वामपंथी राजनीतिक नेटवर्कों के साथ उनके संबंधों को और भी स्पष्ट करते हैं।
कर्नाटक में हिजाब विवाद पर क्या बोली कल्पना
कर्नाटक में हिजाब विवाद के दौरान, कल्पना विल्सन ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि वह मुस्लिम लड़कियों को केवल इसलिए कॉलेजों में दाखिले से वंचित कर रही है, क्योंकि वे हिजाब पहनकर अपनी आस्था व्यक्त करती हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि मुस्लिम छात्राओं को इस्लाम विरोधी गिरोह तंज कसते हैं। मुस्लिम छात्राओं को परेशान किया जा रहा था। विवाद को लेकर उन्होंने जो लिखा, उसमें एक बार फिर भारत को अल्पसंख्यकों के प्रति शत्रुतापूर्ण देश के रूप में चित्रित करने की कोशिश की गई, जबकि बहस के कानूनी पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया गया। कर्नाटक हिजाब विवाद का विस्तृत विवरण यहाँ देखा जा सकता है।
In the 1st video, the lady interrupting CJI Suryakant is not a student but a Professor of Geography and anti-India activist, Kalpana Wilson. She is daughter of Amrit Wilson whose OCI was cancelled by GoI few months ago. She is ideologically aligned to India's CPI(ML). She has a… https://t.co/AeXxhRa7Ma
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स्टेन स्वामी का समर्थन किया कल्पना ने
कल्पना विल्सन ने भी स्टैन स्वामी का समर्थन किया। स्टैन पर एनआईए ने प्रतिबंध लगा दिया था। सीपीआई (माओवादी) से जुड़ा जेसुइट पादरी है। स्वामी को एल्गर परिषद मामले में गिरफ्तार किया गया था और उन पर एक बड़े माओवादी षड्यंत्र का हिस्सा होने का आरोप लगा था। विल्सन का स्वामी को समर्थन करना उस व्यापक वामपंथी अभियान के अनुरूप था, जिसमें उन्हें मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में पेश किया गया था। इस दौरान जाँच एजेंसी ने जो पादरी स्ट्रैन पर गंभीर आरोप लगाए, उसे कम करके आंका गया।

भारत-यूरोपीय यूनियन शिखर सम्मेलन में शामिल हुई
2021 में कल्पना विल्सन AIMC और द लंदन स्टोरी फाउंडेशन द्वारा प्रायोजित भारत-ईयू शिखर सम्मेलन में वक्ताओं में से एक थीं। पैनल में आनंद ग्रोवर, क्रिस्टोफ़ जैफ़्रेलॉट, प्रद्युम्न जयराम, नोदीप कौर, रविंदर कौर, इंडियन काउंसिल ऑफ इंटरनेशनल मुस्लिम्स के उमैर खान, सीपीआई (एमएल) सदस्य कविता कृष्णन, हर्ष मंदर, निखिल मंडलपार्थ और हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स की श्राव्या ताडेपल्ली, द लंदन स्टोरी फाउंडेशन की रितुम्ब्रा मनुवी, रकीब हामिद नाइक, करुणा नंदी, आकार पटेल, पामेला फिलिपोस, एन राम, मनु सेबेस्टियन, प्रतीक सिन्हा, अशोक स्वैन, ऑड्रे ट्रुश्के और रिचर्ड विल्सन सहित कई जाने-माने भारत-विरोधी वक्ता शामिल थे।
‘भारत नरसंहार के कगार पर: नरसंहार की रोकथाम’ पर चर्चा
कल्पना “भारत नरसंहार के कगार पर: नरसंहार की रोकथाम” शीर्षक वाले कार्यक्रम में एक वक्ता भी थीं। इस कार्यक्रम में ऑस्ट्रेलियाई ग्रीन्स पार्टी के सदस्य डेविड शूब्रिज, जेनेट राइस और ली रियानन, द ह्यूमनिज्म प्रोजेक्ट के हारून कासिम, कंचा इलाइया शेफर्ड, सीपीआई (एमएल) सदस्य कविता कृष्णन, मैसी विश्वविद्यालय के मोहन दत्ता, पीटर फ्रेडरिक, आम आदमी पार्टी से जुड़े पूर्व आईपीएस अधिकारी आरबी श्रीकुमार, तीस्ता सेतलवाद, आईएएमसी के राशिद अहमद, दिल्ली दंगों की आरोपी सफूरा जरगर, द पोलिस प्रोजेक्ट की सुचित्रा विजयन, आकार पटेल, रकीब हामिद नाइक, ऋतुम्ब्रा मनुवी, हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स की सुनीता विश्वनाथ और अंगना चटर्जी शामिल थे।
‘हिंदू विरोध’ को किया खारिज
एक दूसरे कार्यक्रम में कल्पना विल्सन और केवल भारडिया ने ‘हिंदू-विरोधी मिथक का पर्दाफाश, फासीवाद-विरोधी एकजुटता का निर्माण’ वाले टॉपिक में हो रही चर्चा में भाग लिया। इस दौरान, विल्सन ने कहा कि बांग्लादेश में मंदिरों पर हुए हमलों और हत्याओं को हिंदू-विरोधी भावना कहना ‘सही नहीं’ है। उन्होंने दावा किया कि दक्षिण एशिया में औपनिवेशिक काल से ही सांप्रदायिक और धार्मिक हिंसा होती है और भारत में हिंदुत्व के उदय और अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से हवा मिल गई है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि हिंदुओं पर हमले मुसलमानों और यहूदियों पर हमलों की तरह वैश्विक नहीं हैं।
विश्व स्तर पर हिंदुत्व के खिलाफ सम्मेलन का समर्थन किया
विल्सन ने ‘वैश्विक हिंदुत्व विघटन’ सम्मेलन का भी समर्थन किया, जो एक विवादास्पद आयोजन था और जिसने हिंदू धर्म और हिंदुत्व के बीच अंतर करने का दावा किया। इसमें कई लोगों ने हिंदुत्व का विरोध करने की आड़ में हिंदू पहचान, हिंदू संगठनों और हिंदू सभ्यतागत दावों को प्रभावी ढंग से टारगेट करने वाले तर्क दिए।
‘वैश्विक हिंदुत्व का विघटन’ एक तीन दिवसीय सम्मेलन था, जिसे 45 से अधिक विश्वविद्यालयों के 60 से अधिक विभागों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। इनमें से अधिकांश अमेरिका के थे। यह सम्मेलन सितंबर 2021 में आयोजित हुआ था। सम्मेलन से कई हिंदू विरोधी तत्व जुड़े हुए थे, जिनमें ऑड्रे ट्रुश्के , आनंद पटवर्धन और नंदिनी सुंदर शामिल थे।
द पोलिस प्रोजेक्ट और भारत-विरोधी कश्मीरी विचारों का संबंध
2019 में द पोलिस प्रोजेक्ट के साथ एक बातचीत में कल्पना विल्सन ने ‘हिंदू फासीवाद’ और हिंदुत्व विचारधारा के बारे में बात की। द पोलिस प्रोजेक्ट अपने भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। इसकी सह-संस्थापक सुचित्रा विजयन कश्मीर पर अलगाववादी विचारों का समर्थन करती रही हैं और ऐसे मंचों पर दिखाई देती रही हैं, जहाँ पाकिस्तान समर्थित भारत-विरोधी आवाजें भी मौजूद रही हैं। इंटरव्यू में विल्सन ने अनुच्छेद 370 और 35ए को निरस्त करने का विरोध किया और दावा किया कि संवैधानिक परिवर्तनों के बाद बाहरी लोग जमीन खरीदकर कश्मीर को लूट रहे हैं।

अनुच्छेद 370, कोविड लॉकडाउन और फासीवाद के आरोप
कश्मीर पर उनके विचार अलगाववादियों और वामपंथी संगठनों की ‘आवाज’ लग रहे थे। उनके शब्दों और भाषा काफी मिलते-जुलते लग रहे थे। 2020 में भारत में कोविड लॉकडाउन के वक्त उन्होंने ‘अधिकारों का दमन, नफरत को बढ़ावा: भारत में फासीवाद और कोविड-19’ शीर्षक से एक लेख लिखा।
इसमें विल्सन ने मोदी सरकार पर महामारी का इस्तेमाल धार्मिक और जाति आधारित नफरत को भड़काने के लिए करने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी दावा किया कि अनुच्छेद 370 को निरस्त करके, भारत इजरायली शैली के ‘बस्तीवादी उपनिवेशवाद’ के माध्यम से कश्मीर पर ‘कब्जा’ कर रहा है और आंशिक इंटरनेट बंद करके कश्मीरियों को आधारभूत जानकारियों से भी महरूम किया जा रहा है।
मोदी सरकार पर बार-बार हमले
उनके लेखन में बार-बार मोदी सरकार को फासीवादी और हिंदू वादी बताया गया। अपने लेख में उन्होंने दावा किया कि भारत में महामारी ने वामपंथियों के बीच पहले से मौजूद इस धारणा की पुष्टि कर दी है कि यह शासन फासीवाद का एक ऐसा रूप है जिसमें हिंदू वर्चस्ववाद और नवउदारवाद आपस में जुड़े हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि महामारी के दौरान मोदी सरकार का मुख्य उद्देश्य वायरस को अपने वैचारिक अभियान के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना था।
उमर खालिद के लिए समर्थन और यूएपीए को खत्म करने की माँग
कल्पना विल्सन ने 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों से जुड़े साजिश के आरोपित उमर खालिद का समर्थन किया । खालिद को अदालतों ने जमानत देने से इनकार कर दिया है, क्योंकि अदालतों ने पूर्व नियोजित साजिश और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की यात्रा के दौरान अशांति फैलाने के प्रयास का हवाला दिया है।
Who are the criminals? #FreeAllPoliticalPrisoners #repealUAPA pic.twitter.com/j1TiNccEnP
— Kalpana Wilson (@KalpanaWilson) September 19, 2020
विल्सन ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम को निरस्त करने की मांग की है और उमर खालिद समेत तथाकथित राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग की है। बड़े षड्यंत्र में उमर खालिद की भूमिका का विवरण यहां देखा जा सकता है और 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों का विवरण यहां देखा जा सकता है ।
स्वच्छ भारत अभियान पर हमला
भारत सरकार के कल्याणकारी और विकास योजनाओं पर भी कल्पना विल्सन ने हमला किया था। 2017 में उन्होंने लिंचिंग, विकास और स्वच्छ भारत अभियान के बीच एक अजीबोगरीब तुलना की और दावा किया कि स्वच्छ भारत मिशन गरीबों के साथ क्राइम था। यह टिप्पणी स्वच्छता और जन कल्याणकारी योजनाओं पर उनकी सोच को दर्शाता है।
एसएएसएफ पैनल और कश्मीर को ‘आजाद’ करने की पैरवी
CPI(ML) ने लंदन के SOAS में दक्षिण एशिया एकजुटता समूह (SASG) द्वारा आयोजित “फासीवाद का प्रतिरोध, एकजुटता का निर्माण, भारत-कश्मीर और उससे आगे” शीर्षक वाली एक चर्चा में हिस्सा लिया था। 2019 में आयोजित इस कार्यक्रम में कविता कृष्णन, दिब्येश आनंद, अमृत विल्सन, कल्पना विल्सन, सतपाल मुमा, सज्जाद हसन, राजरत्न अंबेडकर, निताशा कौल समेत कई लोगों ने भाग लिया। CPI(ML) के लेख में कश्मीर को ‘आजाद’ करने की वकालत की गई। विल्सन को एक बार फिर उस तंत्र में शामिल किया गया, जो नियमित रूप से भारत के आंतरिक मामलों का अंतर्राष्ट्रीयकरण करता है और अलगाववादी विचारों को बढ़ावा देता है।
चंदन गुप्ता हत्याकांड के फैसले में एनआईए की अदालत ने एसएएसजी की निंदा की। कोर्ट ने एलायंस फॉर जस्टिस एंड अकाउंटेबिलिटी (न्यूयॉर्क), सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (मुंबई), इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (वाशिंगटन डीसी), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (नई दिल्ली), रिहाई मंच (लखनऊ), साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप (लंदन) और यूनाइटेड अगेंस्ट हेट (नई दिल्ली) सहित कुछ गैर-सरकारी संगठनों के प्रभाव पर चिंता व्यक्त की।
कोर्ट ने कहा, “सांप्रदायिक भावना वैचारिक स्तर पर सूक्ष्म रूप से घुसपैठ करती है और अक्सर ऐसे गैर-सरकारी संगठनों की रिपोर्टों और हस्तक्षेपों के माध्यम से प्रकट होती है। इस अदालत ने अक्सर देखा है कि जब राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल आरोपियों को मुकदमे के लिए लाया जाता है, तो इन गैर-सरकारी संगठनों से कथित तौर पर जुड़े कुछ वकील वकालतनामा लेकर उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए पहले से ही मौजूद होते हैं।” अदालत ने इन गैर-सरकारी संगठनों के फंडिंग पर भी सवाल उठाए।
सीपीआई (एमएल) की प्रशंसा और एनआईए पर आरोप
2014 में द गार्जियन में छपे लेख में कल्पना विल्सन ने बिहार के एक गाँव में CPI(ML) की चुनाव में जीत की प्रशंसा की। इसका शीर्षक था ‘सिर्फ भारत के मध्यम वर्ग को ही नरेंद्र मोदी से समस्या नहीं है ‘। लेख में उन्होंने पटना विस्फोटों के बाद मोदी की रैली के दौरान हुई गिरफ्तारियों के संबंध में भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) पर गंभीर आरोप लगाए। इसमें दावा किया गया कि मुस्लिम युवकों को हिरासत में लेकर उनसे झूठे बयान निकलवाने के लिए उन्हें प्रताड़ित किया गया। ये आरोप बिना किसी विश्वसनीय सबूत के लगाए गए थे।
कम्युनिस्ट वेबसाइट के लिए लेखन
कम्युनिस्ट वेबसाइट सैल्वेज के लिए ‘हेज फंड, प्रचार और हिंदू फासीवाद’ शीर्षक से लिखे एक लेख में विल्सन ने आरएसएस, गौ संरक्षण समूहों, जाति व्यवस्था, गुजरात 2002 की घटना, गरीबी, कुपोषण, पूंजीवाद और ब्रिटिश उपनिवेशवाद को जोड़कर हिंदुत्व पर हमला किया। इसी लेख में उन्होंने हिंदुत्व को औपनिवेशिक, ब्राह्मणवादी, पितृसत्तात्मक और पुरुषवादी बताया और दावा किया कि यह हिंदू धर्म को एकरूप करने का प्रयास है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिंदुत्व में उन हिंदू देवी-देवताओं के मंदिरों को नष्ट करना शामिल है, जिनकी उत्पत्ति स्वदेशी धर्मों या दलितों द्वारा पूजे जाने वाले धर्मों से हुई है।
भारत के खिलाफ अभियानों पर हस्ताक्षर किया था विल्सन ने
कल्पना विल्सन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों और कर्मचारियों पर कथित हमलों की निंदा करने वाले पत्रों पर हस्ताक्षर करने वालों में से एक हैं। उन्होंने रोहित वेमुला मामले का मुद्दा उठाया और महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा को लेकर केन्द्र सरकार की आलोचना की। उनकी सक्रियता, लेखन और सार्वजनिक भागीदारी भारत, मोदी सरकार, हिंदू संगठनों और हिंदुत्व के विरुद्ध है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वे वामपंथी, इस्लामी विचारधारा से जुड़े और भारत विरोधी संगठनों के साथ एकजुटता दिखाती हैं।
कल्पना विल्सन की मां का ओसीआई कार्ड रद्द, दिल्ली उच्च न्यायालय से कोई राहत नहीं
कल्पना विल्सन की मां अमृत विल्सन के भारत विरोधी रुख के कारण ओसीआई विशेषाधिकार खत्म हो गए थे। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोर्ट ने इस मामले में यह कहते हुए हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया कि न्यायालय देश को बदनाम करने की इजाजत नहीं दे सकता। विल्सन ने भारत सरकार की नीतियों की सार्वजनिक रूप से आलोचना की है।
उन्होंने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का विरोध किया है। उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की कड़ी आलोचना की है। अक्सर उन्हें फासीवादी कहा है।
गौरतलब है कि एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी या एनपीआर के कार्यान्वयन के लिए कोई परिचालन नियम अधिसूचित नहीं किए गए। घरेलू राजनीति की आलोचना के अलावा, विल्सन ने अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में भी भाग लिया है जहाँ भारत के विधायी उपायों को इस्लामोफोबिक और ‘जातीय सफाई’ की दिशा में उठाया गया कदम बताया गया।
उन्होंने लीसेस्टर में हुई अशांति के संबंध में भी बयान दिए। उन्होंने दावा किया कि आरएसएस समर्थकों को हिंसा भड़काने और हिंदुओं को पीड़ित के रूप में पेश करने की कहानी को मजबूत करने के लिए वहाँ भेजा गया था। इन दावों का कई संगठनों और लेखकों ने कड़ा विरोध किया। साथ ही, हिंदू घरों और मंदिरों पर इस्लामी भीड़ के हमले को सबूत के तौर पर पेश किया।
विल्सन ब्रिटेन स्थित दक्षिण एशिया एकजुटता समूह से जुड़ी रही हैं। इसने भारतीय उच्चायोग के बाहर विरोध प्रदर्शन किए और सोशल मीडिया पर भाजपा और आरएसएस की आलोचना की। इस समूह ने कश्मीर में हो रहे घटनाक्रमों को अलगाववादी विचारों से मेल खाने वाले नजरिए से पेश किया है और भारत को ‘आक्रामक देश’ के रूप में पेश करने की कोशिश की।
अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद अलगाववादी अभियानों से जुड़े प्रतीकात्मक चित्रों का उपयोग करके उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी गतिविधियाँ तेज कर दी। इस तरह से देखा जाए तो माँ और बेटी दोनों का भारत विरोधी गतिविधियों का लंबा इतिहास रहा है।
मुख्य न्यायाधीश के प्रति नाराजगी को एक अलग घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। कल्पना की उपस्थिति ही उनके इतिहास और पूर्व बयानों को देखते हुए उनके इरादों को बयाँ करती हैं।
(यह मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया लेख है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)


