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राहुल गाँधी के ‘हाइड्रोजन बम’ से समझिए उनकी मानसिकता, आखिर क्यों बार-बार फुस्स हो रहे ‘युवराज’

राहुल गाँधी ने कर्नाटक के अलंद का हवाला देते हुए सॉफ्टवेयर के जरिए बड़े पैमाने पर वोट चोरी का आरोप लगाया। हालाँकि, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि उसने FIR शुरू की थी और फॉर्म 7 के आवेदनों में मतदाता सूची से नाम हटाने से पहले अभी भी मैनुअल सत्यापन की जरूरत होती है।

राहुल गाँधी का ताजा आरोप है कि ऑनलाइन आवेदन पत्र भरने के लिए किसी सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह सब एक टारगेट अभियान के तहत हो रहा है, जिसमें कॉन्ग्रेस मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि चुनाव आयोग ऐसी कोई जानकारी नहीं दे रहा है, जिससे इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करने वालों को ट्रैक किया जा सके।

इसके साथ राहुल गाँधी ने एक ‘संदिग्ध’ की ओर इशारा करने के लिए अपनी PPT में अमित शाह के छायाचित्र का भी इस्तेमाल किया। इसमें मीम्स दिखाए गए, जिनमें शाह किसी कंप्यूटर को देखकर इंस्टाग्राम से लेकर EVM तक को हैक कर रहे हैं।

अब चलिए सबसे पहले फॉर्म 7 पर नजर डालते हैं। इस फॉर्म को निर्वाचन क्षेत्र में पंजीकृत कोई भी वोटर भर सकता है और चुनाव आयोग से किसी का भी नाम हटाने का अनुरोध कर सकता है। इसे लिए केवल नाम हटाने की ठोस वजह देनी होगी, जैसे उस व्यक्ति का घर बदल गया है या उसकी मृत्यु हो गई या चाहे किसी अन्य मतदाता सूची में पहले से पंजीकृत होने का दावा ही क्यों ना हो।

राहुल गाँधी ने एक ऐसे व्यक्ति को लपेटे में लिया जिसने कहा कि उसने कभी किसी और का नाम मतदाता सूची से हटाने का आवेदन नहीं दिया लेकिन डेटा में दिखाया गया है कि उसने आवेदन किया था। इतना ही नहीं, उस आवेदन में इस्तेमाल मोबाइल नंबर भी उसका नहीं है जिसने आवेदन दिया है।

यह जरूर व्यवस्था में कोई कमी हो सकती है लेकिन धोखाधड़ी नहीं जिसे जाँच की जरूरत हो। राहुल गाँधी ने दावा किया कि इस गड़बड़ी का पर्दाफाश कॉन्ग्रेस पार्टी ने किया है, जिसने एक FIR दर्ज कराई है और अब कर्नाटक सरकार के अधीन काम करने वाली CID का इस्तेमाल करके बाकी की जानकारी भी जुटाई जा रही है।

हालाँकि, चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि FIR चुनाव आयोग के ही एक अधिकारी ने दर्ज कराई थी। यानि चुनाव आयोग खुद इस मामले की जाँच कर रहा है न कि इसे छिपाने की कोशिश कर रहा है। जैसा कि राहुल गाँधी ने दिखाने की कोशिश की।

तो चलिए मान लेते हैं कि कोई ‘हैकर’ वाकई कुछ सॉफ्टवेयर और डमी मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल करके कुछ मतदाताओं के नाम हटाने के लिए आवेदन कर रहा है। सच तो यह है कि अगर कोई ‘हैकर’ ऐसा कर रहा है तो ऐसे कई आवेदन (फॉर्म 7) बनाकर जमा कर सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि नाम ‘सफलतापूर्वक’ हटा दिए गए।

एक सफल आवेदन से केवल एक प्रक्रिया शुरू होती है, जिसमें चुनाव आयोग के अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जाँच करनी होती है कि क्या फॉर्म 7 पर दी गई जानकारी वास्तविक है और क्या ऐसे व्यक्ति का नाम वास्तव में मतदाता सूची से हटाया जाना चाहिए।

कम शब्दों में समझें तो यह एक मैनुअल सिस्टम है। ऐसा नहीं है कि आप एक नकली फोन नंबर इस्तेमाल करके OTP सबमिट करें और दूसरे व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से गायब हो जाए।

जबकि राहुल गाँधी ने इस बात का कोई सबूत नहीं दिया कि किसी का नाम सूची से गलत तरीके से क्यों हटाया गया। चुनाव आयोग का कहना है कि फॉर्म 7 के संदिग्ध लेकिन सफलतापूर्वक जमा होने के कारण कोई नाम नहीं हटाया गया है।

लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि भले ही किसी सॉफ्टवेयर द्वारा किसी की नकल करके जानकारी जमा की गई हो (जो अपराध है और सजा के योग्य है) लेकिन जमा की गई जानकारी सही निकली हो और मामले में व्यक्ति का नाम वास्तव में ही हटाने योग्य हो।

यह भी हो सकता है कि BJP का IT सेल (जो CIA और मोसाद से भी बड़ा और शक्तिशाली है) ज्यादा सतर्क हो और पता लगा लेता है कि जिस भी कॉन्ग्रेसी मतदाता ने घर बदला है, उसका नाम हटाने की कोशिश की हो। पन्ना प्रमुख जैसे लोगों की यही जिम्मेदारी होती है। मैंने इस वीडियो में पहले भी समझाया था:

लेकिन पूरी संभावना है कि राहुल गाँधी ने जिस मामले में आरोप लगाए हैं, उसमें BJP IT सेल या पन्ना प्रमुख का कोई हाथ नहीं है। क्योंकि जिस निर्वाचन क्षेत्र (कर्नाटक के अलंद) में कॉन्ग्रेस के मतदाताओं के नाम हटाए जाने की बात कही गई, उस क्षेत्र में विधानसभा चुनाव कॉन्ग्रेस ने जीता था। इतना ही नहीं पिछले चुनाव में भी BJP ने वो सीट जीती थी। अगर ‘हैकर’ BJP का ही था तो BJP IT सेल से अपने ही समर्थकों के नाम मतदाता सूची से नहीं हटवाएगी।

मजाक से हटते हुए, इस ‘हाइड्रोजन बम’ में आग नहीं थी बल्कि धुएँ का वहीं रंग था जो हमने पहले देखा- असल में राहुल गाँधी मतदान प्रणाली की जानी-पहचानी खामियों और कमियों का इस्तेमाल करके चुनावों में धोखाधड़ी करने की किसी बड़ी साजिश को गढ़ रहे हैं।

राहुल गाँधी का सीधा एजेंडा है- Gen Z को बेवकूफ समझना, जो उनकी साजिशों पर यकीन करके सड़कों पर उतरकर हिंसा करेंगे। उन्होंने देखा है कि ऐसे लगभग 100 युवाओं की मौत सरकारों को हराने में मदद कर सकती है। शायद उन्हें यही रास्ता आसान लगता है, जो उन्हें 2029 तक 100 और संसदीय सीटें जीता सके।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में राहुल रौशन ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

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Rahul Roushan
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