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गुजारा भत्ता की मार ने पुरुषों को बनाया कर्जदार: तलाक की प्रक्रिया में लुटती बचत और समाज की बेरुखी से जूझती जिंदगी

एक आदमी जो अपने परिवार का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी उठाता है, अचानक कर्ज़ में डूब जाता है। वह न केवल अपनी बचत खोता है, बल्कि कई मामलों में अपने जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करता है।

जब एक पुरुष तलाक का सामना करता है, तो उसका आर्थिक संतुलन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 42% पुरुष गुज़ारा भत्ता (alimony) चुकाने के लिए ऋण लेने पर मजबूर हुए हैं। यह सिर्फ एक संख्या नहीं है, यह उन हजारों पुरुषों की सच्चाई बयां करती है, जो कानूनी दायित्व निभाने के लिए अपनी बचत और सम्मान, दोनों खो रहे हैं।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि करीब 49% पुरुषों ने तलाक की प्रक्रिया में 5 लाख रुपए से अधिक खर्च किए जबकि कई को अपनी आर्थिक स्थिरता वापस पाने में वर्षों लग जाते हैं। सोचिए, एक आदमी जो अपने परिवार का भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी उठाता है, अचानक कर्ज में डूब जाता है। वह न केवल अपनी बचत खोता है बल्कि कई मामलों में अपने जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करता है।

मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर

तलाक केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी पुरुषों को तोड़ देता है। कई पुरुष खुद को अकेला महसूस करते हैं, और उनके आत्म-सम्मान में कमी आती है। अध्ययनों से पता चला है कि तलाक के बाद पुरुषों में अवसाद (depression) और चिंता (anxiety) की दर तेज़ी से बढ़ जाती है।

वे अक्सर सोचते हैं कि समाज में उनकी पहचान अब क्या रह गई है। यह अकेलापन और असुरक्षा उन्हें और भी गंभीर मानसिक समस्याओं की ओर धकेल देती है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि पुरुष अपनी भावनाएँ साझा नहीं कर पाते क्योंकि समाज उनसे हमेशा मज़बूत बने रहने की उम्मीद करता है।

बच्चों से दूरी: एक पिता का सबसे बड़ा दर्द

बच्चे भी इस प्रक्रिया के शिकार होते हैं। माता-पिता के बीच तनाव उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

एक पिता, जो अपने बच्चों के लिए हर संभव कोशिश करता है, अचानक खुद को उनकी ज़िंदगी से दूर पाता है। कई बार, तलाक के बाद पिता को बच्चों की कस्टडी नहीं मिलती, जिससे उनका भावनात्मक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। बच्चे भी इस स्थिति को समझ नहीं पाते और इससे उन्हें भी गंभीर मानसिक आघात पहुँचता है।

सामाजिक कलंक और पुरुषों की पहचान

तलाक के बाद पुरुषों को समाज में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें अक्सर ‘असफल’ या ‘दोषी’ के लेबल के साथ देखा जाता है। यह सामाजिक कलंक उनकी मानसिक स्थिति को और भी बिगाड़ देता है।

कई पुरुषों का मानना है कि तलाक के बाद उनकी पहचान ही खत्म हो गई है, जिससे वे और अधिक अकेलापन महसूस करते हैं। अक्सर उन्हें अपने दोस्तों और परिवार से भी भावनात्मक समर्थन नहीं मिलता।

अब समय है समान न्याय की दिशा में कदम बढ़ाने का

तलाक एक जटिल सामाजिक और कानूनी मुद्दा है जो केवल महिलाओं को नहीं, बल्कि पुरुषों को भी गहराई से प्रभावित करता है। हमें इस भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए और समान न्याय सुनिश्चित करने के लिए एकजुट होना चाहिए।

गुज़ारा भत्ता और अन्य कानूनी नीतियाँ निष्पक्ष होनी चाहिए ताकि दोनों पक्षों की वास्तविक आर्थिक स्थिति का ध्यान रखा जा सके। हमें एक ऐसे समाज की आवश्यकता है, जहाँ दोनों पक्षों की समस्याओं को समान रूप से समझा जाए और उन्हें सुलझाने के लिए उचित उपाय किए जाएँ। ताकि तलाक की प्रक्रिया में हर किसी की आवाज़ सुनी जाए और कोई भी व्यक्ति इस कठिनाई में अकेला न महसूस करे।

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Barkha Trehan
Barkha Trehan
Activist | Voice Of Men | President, Purush Aayog | TEDx Speaker | Hindu Entrepreneur | Director of Documentary #TheCURSEOfManhood http://youtu.be/tOBrjL1VI6A

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