जर्मनी दौरे के वक्त भारत विरोधी तत्वों से मुलाकात करने के कारण राहुल गाँधी इस समय हर जगह से घिरे हुए हैं। ऐसे में गाँधी परिवार के वफादार व सैम पित्रौदा ने उनके बचाव में मीडिया में बयान दिया है। पित्रौदा ने कहा कि कॉन्ग्रेस को इससे फर्क ही नहीं पड़ता कि उनके नेता जहाँ जा रहे हैं वहाँ उनसे कौन लोग मिलेंगे। पित्रौदा ने यह बयान इंडिया टुडे की पत्रकार मौसमी सिंह के साथ बातचीत में दिया।
पित्रौदा से ऑन कैमरा पत्रकार ने जब पूछा कि जर्मनी में राहुल गाँधी सेंट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी (CEU) में कॉर्नलिया वोल से मिले, जो संस्थान की ट्रस्टी हैं और इस यूनिवर्सिटी को जॉर्ज सोरोस की फंडिंग भी है। उस समय पित्रौदा भड़क गए। इस बातचीत को 12.00 मिनट पर देख सकते हैं। आगे मौसमी सिंह ने यह भी पूछा कि अक्सर कॉन्ग्रेस का जॉर्ज सोरोस से नाम जुड़ता है।
सवाल पूरा होने से पहले ही सैम पित्रौदा कहते हैं, “सब बकवास है। बिल्कुल बकवास है।” राहुल गाँधी के बचाव में पित्रौदा कहते हैं, “जब हम यूनिवर्सिटी जाते हैं, तो हम नहीं देखते कि कौन-किसके साथ जुड़ा हुआ है। इससे हमारा कोई मतलब नहीं है। हम यूनिवर्सिटी जाते हैं, हम एक सार्वजनिक जगह जाते हैं। अगर उनका जोर्ज सोरोस के साथ संबंध हुआ भी, तो हमे पता नहीं है। और हमे कोई फर्क भी नहीं पड़ता है।”
मौसमी सिंह फिर सीधे तौर पर पूछती हैं कि राहुल गाँधी अक्सर भारत-विरोधी लोगों से मुलाकात करते हैं, यह कितना सही है? सवाल पर सैम पित्रौदा चिढ़ जाते हैं और कहते हैं कि सब ‘झूठ’ है। वह कहते हैं, “हम ऐसा क्यों ही करेंगे, हमे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है।” पित्रौदा यहाँ तक कहते हैं कि ऐसा कौन ही करेगा। वह फिर दोहराते हैं, “अगर हम किसी यूनिवर्सिटी जाते हैं, तो वहा बैठे दर्शक का किसी से ऐसे किसी व्यक्ति से कनेक्शन है, तो हमारा उस पर नियंत्रण नहीं है। हमें फर्क नहीं पढ़ता है।”
सैम पित्रौदा का जॉर्ज सोरोस के समर्थन में बयान
1984 में हुए सिखों के नरसंहार को भी ‘हुआ तो हुआ’ कह कर जायज ठहरा चुके सैम पित्रौदा ने जॉर्ज सोरोस और कॉन्ग्रेस कनेक्शन के आरोपों का बचाव पहली बार नहीं किया है। जॉर्ज सोरोस, जिसपर भारत-विरोधी गतिविधियों को फंड करने वाले लोगों से जुड़े होने के आरोप है, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ नैरेटिव फैलाता है। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस के सैम पित्रौदा ने पहले भी कई बार सार्वजनिक तौर पर जॉर्ज सोरोस के समर्थन में बयान दे चुके हैं।
04 जनवरी 2025 को ओवरसीज कॉन्ग्रेस के वेस्ट कोस्ट महासचिव शन्मुगवेल शंकरन द्वारा आयोजित एक वर्चुएल बैठक में सैम पित्रौदा ने कहा कि भारत में ‘सिविल सोसाइटी’ यानी सामाजिक संगठनों को काम करने की आजादी नहीं दी जा रही है। उन्होंने दावा किया कि कई मामलों में सिविल सोसाइटी को काम करने से रोका जाता है।
पित्रौदा ने कहा कि अगर अमेरिका से भारत के किसी NGO को दान भेजना हो, तो यह बहुत मुश्किल काम बन गया है। उन्होंने कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि यह प्रक्रिया इतनी जटिल क्यों है, लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि हर कोई डरा हुआ है।
यहाँ जॉर्ज सोरोस पर हो रहे हमलों का जिक्र करते हुए पित्रौदा ने कहा कि उन्हें यह सब समझ में नहीं आता। उनके मुताबिक, सोरोस अपना काम कर रहे हैं और बाकी लोग अपना काम करें। अगर किसी को उनसे सहमति नहीं है तो यह ठीक है, लेकिन यह कहना कि वह भारत में दखल दे रहे हैं, सही नहीं है। पित्रौदा ने कहा कि भारत में इस तरह की बहस और चर्चा का माहौल बन गया है।
यहाँ सैम पित्रौदा की बातों से लगता है कि वे चाहते हैं कि भारत जॉर्ज सोरोस को भारत-विरोधी गतिविधियों की फंडिंग करने और भारत-विरोधी नैरेटिव को बेरोकटोक आगे बढ़ाने की अनुमति दे दें। साथ ही लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई मोदी सरकार के शासन को कमजोर करने की भी अनुमति दी जानी चाहिए।
जर्मनी में जाकर राहुल गाँधी का भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला
जॉर्ज सोरोस का कॉन्ग्रेस से कनेक्शन पर सवाल एक बार फिर राहुल गाँधी की हाल ही में पाँच दिवसीय जर्मनी यात्रा के बाद उठने शुरू हुए हैं। जहाँ राहुल गाँधी भारत-विरोधी जॉर्ज सोरोस की फंडेड यूनिवर्सिटी पहुँचते हैं और उस अंतरराष्ट्रीय मंच का इस्तेमाल वह भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं पर तीखी बयानबाजी के लिए करते हैं।
बर्लिन और बाद में हर्टी स्कूल में संबोधित करते हुए राहुल गाँधी भारत में ‘निष्पक्ष’ चुनाव न होने का दावा करते हैं। वे कहते हैं कि हरियाणा विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने जीता था और 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में गड़बड़ी की गई। इन बयानों से विदेश की धरती का इस्तेमाल कर भारत को ही निशाना बनाते हैं।
हालाँकि, राहुल गाँधी के ये दावे कई बार गलत साबित हो चुके हैं। खास तौर पर ऑपइंडिया चुनाव आयोग के आधिकारिक आँकड़ों और रिकॉर्ड के आधार पर इन दावों को विस्तार से खारिज कर चुकी है। जर्मनी में वही पुराने दावे दोहराते हैं, क्योंकि वहाँ की जनता भारत की चुनावी प्रक्रिया से परिचित नहीं है।
जॉर्ज सोरोस और कॉन्ग्रेस का कनेक्शन
सैम पित्रौदा ने जॉर्ज सोरोस के साथ कॉन्ग्रेस के जिस कनेक्शन का इनकार किया है, उसकी सच्चाई जगजाहिर है। हंगरी-अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस भारत-विरोधी नैरेटिव, खासकर मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बनाने में सक्रिय है और इस पूरे मामले में कॉन्ग्रेस के कुछ नेताओं की भूमिका भी सामने आती है। लेकिन कॉन्ग्रेस इसे मानने को तैयार ही नहीं है।
जॉर्ज सोरोस की संस्था ओपन सोसायटी फाउंडेशन (OSF) दुनिया के कई देशों में NGO, मीडिया संस्थानों और सामाजिक संगठनों को फंडिंग देती रही है। इनमें से ही भारत में भी कुछ ऐसे संगठन और मीडिया प्लेटफॉर्म्स हैं, जिन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सोरोस नेटवर्क से फंडिंग मिली है। और ये भारत सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा रचने में सक्रिय हैं।
हंगरी-अमेरिकी सोरोस खुद भी कई बार सार्वजनिक मंचों से भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर सवाल उठा चुका है। संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई बीजेपी नेताओं ने भी OCCRP की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि इनमें भारत के उद्योगपतियों के खिलाफ नैगेटिव नैरेटिव होते हैं।
BJP का आरोप है कि कॉन्ग्रेस, खास तौर पर राहुल गाँधी इन OCCRP रिपोर्टों का राजनीतिक फायदा उठाते हैं और उन रिपोर्टों को आधार बना कर सरकार को बदनाम करते हैं। इसका उदाहरण उन्होंने अडानी समूह और कोविड-19 जैसे मुद्दों पर उठाई गई रिपोर्टों को बताया।
संसद हंगामे के दौरान BJP ने यह भी कहा कि OCCRP की रिपोर्टों का समय-समय पर संसद सत्र के साथ तालमेल है, जिससे लगता है कि जैसे विदेशी प्रभाव और कॉन्ग्रेस मिलकर सरकार के कामकाज को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष पर यह आरोप लगाया गया कि राहुल गाँधी और OCCRP के बयानों में एक ‘त्रिकोणीय गठजोड़’ (Triangle Nexus)- सोरोस, OCCRP और कॉन्ग्रेस। इसका लक्ष्य भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करना है।


