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ध्रुव राठी और कॉन्ग्रेस का ‘गिग वर्कर्स’ वाला प्रोपेगेंडा हुआ फ्लॉप: 31 दिसंबर को नहीं रुकी डिलीवरी, ऑपइंडिया के रियलिटी चेक में सच आया सामने

अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि ध्रुव राठी जैसे 'करोड़पति यूट्यूबर्स' के लिए एक दिन की कमाई छोड़ने का ज्ञान देना आसान है, लेकिन उन गिग वर्कर्स के लिए जो हाड़-तोड़ मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालते हैं, काम ही उनकी पूजा है।

बीते कई दिनों से सोशल मीडिया और वामपंथी पोर्टल्स द्वारा यह माहौल बनाया जा रहा था कि 31 दिसंबर 2025 को देश के करोड़ों गिग वर्कर्स (स्विगी, ज़ोमैटो, ज़ेप्टो और ब्लिंकिट के डिलीवरी पार्टनर्स) हड़ताल पर रहेंगे। ध्रुव राठी जैसे यूट्यूबर और कॉन्ग्रेस समर्थित संगठनों ने पूरी ताकत लगा दी थी कि नए साल के जश्न के मौके पर देश की सेवाओं को ठप कर दिया जाए।

लेकिन ऑपइंडिया के रियलिटी टेस्ट और ग्राउंड रिपोर्ट में यह दाँव पूरी तरह उल्टा पड़ता नजर आया। काम पर निकले युवाओं और सामान्य रूप से होती डिलीवरी ने यह साफ कर दिया कि भड़काने की साजिशें पूरी तरह ‘फ्लॉप’ रही हैं।

राघव चड्ढा की मौजूदगी और ध्रुव राठी का प्रोपेगेंडा

दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर में आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा को गिग वर्कर्स के साथ देखा गया। राघव चड्ढा ने इसे संसद में उठाए गए मुद्दों से जोड़ने की कोशिश की, ताकि हड़ताल को एक राजनीतिक आधार दिया जा सके।

वहीं, जर्मनी में बैठे यूट्यूबर ध्रुव राठी ने वीडियो जारी कर लोगों से अपील की थी कि वे 31 दिसंबर को इन ऐप्स का इस्तेमाल न करें और गिग वर्कर्स से अपनी एक दिन की कमाई छोड़ने को कहा। देखते ही देखते पूरा लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम इस मुहीम में कूद पड़ा, लेकिन असलियत में जमीन पर इसका कोई असर नहीं दिखा।

ऑपइंडिया का रियलिटी टेस्ट: डिलीवरी जारी, हड़ताल गायब

ऑपइंडिया की पत्रकार ने इस कथित हड़ताल की सच्चाई जानने के लिए खुद ग्राउंड जीरो से जाँच की। जब उन्होंने ऐप्स पर ऑर्डर प्लेस किए, तो न केवल ऑर्डर आसानी से स्वीकार किए गए, बल्कि समय पर डिलीवर भी हुए।

डिलीवरी करने आए युवाओं से जब बातचीत की गई, तो उन्होंने साफ कहा, “हम अपनी कमाई नहीं छोड़ सकते, हमें काम करना है।” युवाओं ने किसी भी तरह की हड़ताल का हिस्सा होने से इनकार कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि प्रोपेगेंडा चलाने वाले लोग असल श्रमिकों की जरूरतों से कोसों दूर हैं।

संजय गावा और कॉन्ग्रेस का संदिग्ध कनेक्शन

वहीं, गिग वर्कर्स की हड़ताल पर जाने के बारे में जब ऑपइंडिया के पत्रकार ने जाँच की, तो इस दौरान एक संगठन का नाम ऑल इंडिया गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स (AIGPWU) सामने आया, जिसके अध्यक्ष संजय गावा हैं। यह संगठन सीधे तौर पर कॉन्ग्रेस से जुड़ा हुआ है और गावा की तस्वीरें मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गाँधी के साथ मौजूद हैं।

जब ऑपइंडिया ने संजय गावा को फोन किया, तो पहले उन्होंने कहा कि उन्हें हड़ताल के बारे में कुछ पता ही नहीं है। लेकिन जब दोबारा फोन किया गया, तो वे अपनी बात से पलट गए और दावा करने लगे कि उनका संगठन इसमें शामिल है। एक राष्ट्रीय अध्यक्ष का अपनी ही तथाकथित हड़ताल पर इस तरह का विरोधाभासी बयान पूरी साजिश की कलई खोल देता है।

देश को ठप करने की पुरानी ‘टूलकिट’

यह पहली बार नहीं है जब किसी विशेष वर्ग को भड़काकर देश में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की गई हो। चाहे लेबर कोड बिल हो, किसान आंदोलन हो या ट्रक ड्राइवरों की हड़ताल- हर बार एक ही पैटर्न दिखाई देता है।

केंद्र सरकार ने पहले ही नए लेबर कोड में गिग वर्कर्स के हितों का ध्यान रखा है, लेकिन वामपंथी और कॉन्ग्रेसी मानसिकता वाले लोग केवल राजनीति चमकाने के लिए इन युवाओं की आजीविका को खतरे में डाल रहे हैं। जिस तरह इन ताकतों ने कभी कानपुर जैसे औद्योगिक हब को हड़तालों के जरिए खंडहर बना दिया था, अब वैसी ही कोशिश नए भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ की जा रही है।

प्रोपेगेंडा हार गया, पेट की भूख जीत गई

अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि ध्रुव राठी जैसे ‘करोड़पति यूट्यूबर्स’ के लिए एक दिन की कमाई छोड़ने का ज्ञान देना आसान है, लेकिन उन गिग वर्कर्स के लिए जो हाड़-तोड़ मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालते हैं, काम ही उनकी पूजा है।

31 दिसंबर को देश की जनता को परेशान करने और अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने का जो सपना लुटियंस दिल्ली और विदेशी जमीन पर बैठकर देखा गया था, उसे भारत के मेहनतकश युवाओं ने सड़क पर उतरकर और अपना काम जारी रखकर चकनाचूर कर दिया है। माहौल बनाने की सारी कोशिशें फेल रहीं और सच्चाई की जीत हुई।

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