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पहले तोड़े हिंदू-जैन मंदिर, तब भरूच में खड़ी हुई जामा मस्जिद: जानिए क्या बताता है इतिहास, दस्तावेजों में सब दर्ज

कई ऐतिहासिक दस्तावेज इस बात पर एकमत हैं कि भरूच की यह जामा मस्जिद अलाउद्दीन खिलजी के समय में बनाई गई थी। खिलजी एक हमलावर था, जिसने भारत में हिंदुओं की आस्था पर चोट करते हुए कई मंदिरों को तोड़ा था। सोमनाथ मंदिर भी उन्हीं में से एक था।

भरूच शहर की जामा मस्जिद एक बार फिर विवादों के घेरे में है। दो दिन पहले, अखिल भारतीय संत समिति के संतों ने आरोप लगाया कि मस्जिद ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) से सुरक्षित होने के बावजूद वहाँ अवैध निर्माण किया गया है और पुरातत्व विभाग के नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। संतों ने इन आरोपों के साथ धरना प्रदर्शन किया। आखिरकार पुलिस प्रशासन को बीच-बचाव करना पड़ा और कार्रवाई का भरोसा देते हुए दो महीने का समय माँगा। संतों ने भी पुलिस पर भरोसा जताते हुए धरना खत्म कर दिया है और अब गेंद पुलिस के पाले में है।

धरने और संतों की माँगों के बीच अब एक पुराना मुद्दा फिर से चर्चा में है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भरूच की यह जामा मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई गई थी? क्या यहाँ अतीत में हिंदू और जैन मंदिर थे? इतिहास और उस दौर की किताबें इस बारे में क्या कहती हैं, आइए जानते हैं।

इसका सबसे हालिया जिक्र सीताराम गोयल की एडिट की हुई किताब ‘हिंदू टेंपल्स: व्हॉट हैपन्ड टू देम’ (Hindu Temples: What Happened to Them) में मिलता है। वैसे तो यह किताब मुख्य रूप से राम जन्मभूमि विवाद पर केंद्रित थी, लेकिन इसमें एक अलग हिस्सा उन मस्जिदों और धार्मिक ढाँचों का भी है, जिन्हें भारत में मंदिरों को नष्ट करके बनाया गया था। इस किताब में राज्य और जिले के हिसाब से ऐसी मस्जिदों की पूरी सूची दी गई है।

सीताराम गोयल की किताब की क्रमवार सूची में अगर हम गुजरात वाला हिस्सा खोलें और भरूच जिले को देखें, तो सबसे पहला नाम ‘जामा मस्जिद’ का ही आता है। इसमें उल्लेख है कि इस मस्जिद का निर्माण साल 1321 में किया गया था। साथ ही यह भी साफ लिखा गया है कि मस्जिद को बनाने में हिंदू और जैन मंदिरों की सामग्री (स्तंभ और अवशेष) का इस्तेमाल किया गया था।

इसी पुस्तक का दूसरा भाग है- ‘द इस्लामिक एविडेंस’ (The Islamic Evidence)। यहाँ भी भरूच की इस मस्जिद का जिक्र मिलता है। मुगल काल के दस्तावेजों का हवाला देते हुए लिखा गया है कि भरूच की जामा मस्जिद में हिंदू और जैन मंदिरों के खंभों का उपयोग हुआ है।

कई ऐतिहासिक दस्तावेज इस बात पर एकमत हैं कि भरूच की यह जामा मस्जिद अलाउद्दीन खिलजी के समय में बनी थी। खिलजी एक आक्रामक हमलावर था, जिसने भारत में हिंदुओं की आस्था पर चोट करते हुए कई मंदिरों को तोड़ा था। सोमनाथ मंदिर भी उन्हीं मंदिरों में से एक था।

प्रसिद्ध इतिहासकार अमीर खुसरो लिखते हैं कि साल 1300 में खिलजी ने गुजरात के मंदिरों को निशाना बनाया और इस काम के लिए उलुघ खान को गुजरात भेजा। उलुघ खान सबसे पहले सोमनाथ आया, यहाँ उसने मंदिर तोड़ा और जमकर लूटपाट की। इसके बाद वह खंभात की ओर बढ़ा। अमीर खुसरो के अनुसार, खंभात के बाद उसने तटीय इलाकों के कई शहरों में तबाही मचाई और मंदिर ध्वस्त किए। भरूच भी इन्हीं तटीय शहरों में से एक था।

1832 में UK में जन्में पुरातत्वविद (Archaeologist) जेम्स बर्गेस ने भारत में काफी काम किया। वे 1886 से 1889 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के महानिदेशक (DG) भी रहे। उससे पहले वे पश्चिमी भारत के पुरातत्व विभाग के निदेशक थे। उन्होंने पश्चिमी भारत के ऐसे कई ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया और जो कुछ देखा, उसे अपनी डायरी और किताबों में दर्ज किया।

जेम्स बर्गेस ने अपनी किताब ‘ऑन द मुहम्मडन आर्किटेक्चर ऑफ भरूच, खंभात, धोलका, चंपानेर एंड महमूदबाद इन गुजरात’ में भरूच की इस मस्जिद का विशेष उल्लेख किया है।

इस जगह का परिचय देते हुए जेम्स बर्गेस लिखते हैं कि लगभग 1297 के आसपास खिलजी के आदेश पर भरूच में हमले शुरू हुए थे। इन हमलों के दौरान हिंदू मंदिर निशाने पर थे। जैसा कि अन्य जगहों पर हुआ, भरूच में भी हिंदू और जैन मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया और उन्हीं मंदिरों की सामग्री (खंभों और पत्थरों) का उपयोग करके ‘जामा मस्जिद’ खड़ी की गई।

बर्गेस ने अपनी किताब में मस्जिद के नक्शे और तस्वीरों के साथ पूरी जानकारी दी है, जिससे यह बात और स्पष्ट होती है। निर्माण की बारीकियों बताते हुए बर्गेस कहते हैं कि मस्जिद के खंभों के बीच की दूरी एक समान नहीं है। कहीं यह दूरी 8 फीट है, कहीं 13 फीट, तो कहीं 10 फीट। माप में इस अंतर की वजह से मस्जिद के गुंबदों के आकार में भी कमियाँ रह गई थीं।

बर्गेस की किताब से आभार

बर्गेस लिखते हैं कि निर्माण में यह ऊँच-नीच इसलिए है क्योंकि इसमें हिंदू मंदिरों की सामग्री का इस्तेमाल किया गया था। मस्जिद की छत का कुछ हिस्सा पुराने जैन और हिंदू मंदिरों के छोटे गुंबदों से लिया गया है। वहीं, कुछ खंभों पर जानवरों की कलाकृतियाँ बनी हुई हैं, जो साफ तौर पर दर्शाती हैं कि ये स्तंभ हिंदू मंदिरों के थे।

मस्जिद की पिछली दीवार पर बनी ‘मेहराब’ (दीवार में अर्धगोलाकार जगह) का जिक्र करते हुए बर्गेस लिखते हैं कि इसकी बनावट गुजरात की सामान्य मस्जिदों जैसी नहीं है। यहाँ तक कि तीनों मेहराबों की निर्माण शैली भी एक-दूसरे से काफी अलग दिखाई देती है।

आगे वे आंगन (कोर्टयार्ड) के बारे में लिखते हुए बताते हैं कि प्रवेश द्वार पर लगा संगमरमर का दरवाजा स्पष्ट रूप से किसी जैन मंदिर का लगता है। इस पर जैन धर्म से जुड़ी आकृतियाँ भी दिखाई देती हैं। बर्गेस ने यह भी नोट किया है कि इनमें से ज्यादातर आकृतियों को जानबूझकर नष्ट कर दिया गया था।

बर्गेस की किताब से आभार

‘भरूच जिला डायरेक्टरी की रिपोर्ट’ नाम के एक दस्तावेज में लिखा है कि खिलजी के समय में प्राचीन शहर पर आक्रमण हुआ था और उसी दौरान जैन देरासर (मंदिर) पर कब्जा करके वहाँ मस्जिद बनाई गई थी।

इसी रिपोर्ट में मंदिरों की लिस्ट में ‘शामलिया विहार’ नाम के एक देरासर (मंदिर) का उल्लेख मिलता है, जिसके बारे में यह नोट किया गया है कि बाद में मुस्लिम शासकों के समय इसे भी तोड़कर मस्जिद बना दिया गया था।

भरूच जिला कलेक्टर की आधिकारिक वेबसाइट पर भी यह दर्ज है कि जामा मस्जिद का निर्माण प्राचीन जैन मंदिरों के अवशेषों से किया गया था। इसके अलावा, इसमें बताया गया है कि मस्जिद का अधिकांश हिस्सा मंदिर की सामग्री से बना है। वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि इसके पत्थर मंदिरों से लिए गए थे और इसकी ‘मेहराब’ में हिंदू मंदिर के चिह्न (निशान) मौजूद हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन तमाम दस्तावेजों और ऐतिहासिक साक्ष्यों में कहीं भी कोई विरोधाभास नहीं दिखता है। सभी की जानकारी एक-दूसरे से पूरी तरह मेल खाती है। यहाँ तक कि सरकारी वेबसाइट भी इन सभी तथ्यों की पुष्टि करती है।

यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती भाषा में लिखी गई है। मेघल सिंह परमार की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

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મેઘલસિંહ પરમાર
મેઘલસિંહ પરમાર
ઇતિહાસ-રાજકારણમાં રુચિ ધરાવતો, ઘટનાઓના ઊંડાણમાં જઈને બૃહદ પરિપેક્ષથી જોવામાં-લખવામાં વિશેષ રસ ધરાવતો પત્રકાર. ક્યારેક લેખક, ક્યારેક રિસર્ચર, ક્યારેક ફેક્ટચેકર.

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