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‘इसको बताना है… अंजाम क्या होता है’: उमेश कोल्हे की हत्या में यूसुफ खान को जमानत देने से बॉम्बे HC का इनकार, कहा- समाज को आतंकित करना चाहते थे

कोर्ट ने कहा कि NIA द्वारा पेश सबूत यह दिखाते हैं कि यह न तो साधारण आपराधिक साजिश थी और न ही कोई अकेली हिंसक घटना। हत्या की योजना, तरीका और मंशा समाज की व्यवस्था और सामूहिक चेतना को झकझोरने वाली है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार (20 जनवरी 2026) को अमरावती के केमिस्ट उमेश कोल्हे की हत्या के मामले में आरोपित पशु चिकित्सक यूसुफ खान को जमानत देने से इनकार कर दिया। उमेश कोल्हे की 2022 में हत्या इसलिए की गई थी क्योंकि उन्होंने बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के समर्थन में वॉट्सऐप पर एक संदेश भेजा था। जमानत खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पहली नजर में यह मामला सिर्फ हत्या का नहीं बल्कि एक आतंकी गिरोह बनाने का है। अदालत के अनुसार, नूपुर शर्मा के बयान को लेकर आरोपियों ने अपने मजहब का अपमान मानते हुए बदला लेने की साजिश रची और आम लोगों में डर फैलाने के मकसद से यह हत्या की गई।

जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस श्याम सी. चांडक की पीठ ने कहा कि NIA द्वारा पेश सबूत यह दिखाते हैं कि यह न तो साधारण आपराधिक साजिश थी और न ही कोई अकेली हिंसक घटना। हत्या की योजना, तरीका और मंशा समाज की व्यवस्था और सामूहिक चेतना को झकझोरने वाली है। इसी वजह से UAPA कानून के तहत आरोपित को जेल में रखना सही ठहराया गया।

यूसुफ खान के वकील ने दलील दी कि यह मामला सिर्फ व्यापारिक विवाद का है लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पूरे घटनाक्रम को देखें तो आरोपित ने जानबूझकर उकसाया, पीड़ित की पहचान उजागर की और ऐसी घटनाओं की कड़ी में शामिल रहा, जिसका अंत एक निर्मम हत्या में हुआ ताकि समाज में डर का संदेश दिया जा सके।

उमेश कोल्हे की हत्या की पृष्ठभूमि

उमेश कोल्हे, महाराष्ट्र के अमरावती में दवाइयों की दुकान चलाते थे। 21 जून 2022 की रात दुकान बंद कर घर लौटते समय उनकी हत्या कर दी गई। यह हत्या नूपुर शर्मा के बयान को लेकर हुई हिंसा की पृष्ठभूमि में हुई थी। कोल्हे ने 14 जून 2022 को एक व्हाट्सएप ग्रुप में नूपुर शर्मा के समर्थन में फोटो और संदेश साझा किया था। ऐसे ही पोस्ट करने वाले कई लोगों को माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया लेकिन कोल्हे को जानबूझकर निशाना बनाया गया। अभियोजन के अनुसार यह हत्या अचानक नहीं बल्कि सोच-समझकर की गई साजिश का नतीजा थी।

यूसुफ खान की भूमिका और ‘व्यापारिक रंजिश’ वाली दलील क्यों हुई खारिज

कोर्ट ने यूसुफ खान को इस हत्या की छोटी कड़ी या संयोगवश जुड़ा व्यक्ति नहीं माना। यूसुफ खान एक पशु चिकित्सक है और उमेश कोल्हे को पहले से जानता था। वह नियमित रूप से कोल्हे की दुकान से दवाइयाँ खरीदता था। दोनों एक वॉट्सऐप ग्रुप ‘ब्लैक फ्रीडम’ के सदस्य थे, जिसमें वेटरनरी केमिस्ट और मेडिकल प्रतिनिधि थे। इस ग्रुप में यूसुफ खान अकेला मुस्लिम सदस्य था।

कोर्ट ने कहा कि खान नूपुर शर्मा के समर्थन में कोल्हे की पोस्ट से आहत था। उसका दावा था कि वह सिर्फ कोल्हे के कारोबार का बहिष्कार कराना चाहता था। हालाँकि, हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर इस दलील को अविश्वसनीय बताया।

कोर्ट ने कहा कि अगर मकसद सिर्फ व्यापार रोकना होता तो यह संदेश केवल ग्राहकों तक सीमित रहता। खान ने वह पोस्ट कई वॉट्सऐप ग्रुपों और ऐसे लोगों तक फैलाया जिनका कोल्हे से कोई कारोबारी संबंध नहीं था। इससे साफ पता चला कि उसका उद्देश्य आर्थिक दबाव नहीं बल्कि उकसाना और निशाना बनाना था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि खान पढ़ा-लिखा और पेशेवर व्यक्ति था और उस समय के संवेदनशील माहौल को समझ सकता था। इसके बावजूद उसने हालात शांत करने के बजाय भड़काऊ संदेश फैलाया। यही बात जमानत के समय उसके खिलाफ गई।

वॉट्सऐप संदेश, मोबाइल नंबर में बदलाव और मंशा कैसे साबित हुई

कोर्ट के फैसले में यूसुफ खान द्वारा भेजे गए व्हाट्सएप संदेश को बेहद अहम माना गया। कोर्ट ने पाया कि उमेश कोल्हे की पोस्ट का स्क्रीनशॉट लेने से पहले खान ने जानबूझकर कोल्हे के मोबाइल नंबर में हेर-फेर की और नंबर दोबारा सेव किया ताकि उसकी पहचान और संपर्क जानकारी ज्यादा लोगों तक पहुँचे।

इसके बाद यूसुफ खान ने हिंदी में भड़काऊ संदेश लिखकर लोगों से कहा कि कोल्हे को ‘सबक’ सिखाया जाए। इस मेसेज में लिखा था, “अमित मेडिकल प्रभात ताकीज तहसील के सामने इसको बताना है कि जिन लोगों के भरोसे कमाई की उनसे ही दुश्मनी का अंजाम क्या होता है, इस मेसेज को ज्यादा से ज्यादा ग्रुप में सेंड करें।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि खान ने संदेश सिर्फ एक बार नहीं बल्कि कई प्लेटफॉर्म पर फैलाया और इसके तुरंत बाद एक अन्य आरोपित (आरोपित नंबर-5) से मुलाकात की। अदालत के अनुसार, यह घटनाक्रम उकसावे से साजिश तक की साफ कड़ी दिखाता है, न कि कोई भावनात्मक या अचानक की गई हरकत।

फोन रिकॉर्ड, बैठकें और पर्दे के पीछे की भूमिका पर अदालत की टिप्पणी

कोर्ट ने जमानत खारिज करते हुए यूसुफ खान और आरोपित नंबर-5 के बीच हुई फोन बातचीत को अहम माना। रिकॉर्ड के अनुसार, हत्या से पहले और बाद में दोनों के बीच 25 फोन कॉल हुए। गवाहों के बयान और लोकेशन डेटा के साथ इन कॉल्स को साजिश में शामिल होने का मजबूत सबूत माना गया।

अभियोजन ने कहा कि आरोपित नंबर-5, खान और अन्य आरोपियों के बीच कड़ी की तरह काम कर रहा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साजिश में शामिल होने के लिए हर बैठक में मौजूद रहना जरूरी नहीं होता।

कोर्ट ने यह भी पाया कि 9 जून 2022 को खान की लोकेशन रोशन हॉल के पास थी, जहाँ नूपुर शर्मा के बयान के खिलाफ FIR को लेकर बैठक हुई थी। इसके बाद उसकी लगातार बातचीत और सह-आरोपितों से संपर्क से यह साबित हुआ कि वह शुरू से ही योजना का हिस्सा था। अदालत ने कहा कि खान ने भड़काऊ संदेश फैलाने के बाद खुद को हत्या की सीधी कार्रवाई से दूर रखा लेकिन पर्दे के पीछे रहकर साजिश को आगे बढ़ा रहा था।

अदालत ने साजिश को कैसे समझा और UAPA क्यों लगा

अदालत ने इस साजिश को अलग-अलग घटनाओं के बजाय पूरी घटनाक्रम की कड़ी के रूप में समझा। अभियोजन के अनुसार, यूसुफ खान का भड़काऊ संदेश इस साजिश की शुरुआत था। इसके बाद उसने आरोपित नंबर-5 से मुलाकात की, जो कोल्हे की पोस्ट से नाराज था। फिर आरोपित नंबर-5 अन्य आरोपितों से गौसिया हॉल में मिला जहाँ उमेश कोल्हे की सोशल मीडिया पोस्ट पर विस्तार से चर्चा हुई है।

कोर्ट ने बताया कि 19 जून 2022 को हुई बैठक में यह तय किया गया कि कोल्हे को उनके धर्म का अपमान करने की ‘सजा’ के तौर पर मारा जाएगा और हत्या का तरीका भी तय हुआ। 20 जून को पहली कोशिश नाकाम रही क्योंकि दुकान बंद थी। 21 जून की रात रेकी के बाद कोल्हे पर गर्दन पर चाकू से हमला कर हत्या कर दी गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि साजिश को सीधे सबूतों से नहीं बल्कि व्यवहार, बातचीत और हालात से साबित किया जा सकता है। खान के मामले में रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से साजिश में उसकी सहमति साफ दिखती है।

कोर्ट ने आरोपियों को ‘आतंकी गिरोह’ बताते हुए कहा कि यह हत्या निजी बदले के लिए नहीं बल्कि समाज में डर फैलाने के लिए की गई थी। अदालत ने माना कि यह संदेश देना मकसद था कि कुछ विचारों का समर्थन करने पर हिंसक अंजाम भुगतना पड़ेगा। इसी वजह से UAPA की धाराएँ लागू की गईं और जमानत से इनकार किया गया।

यूसुफ खान की जमानत खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया कि विचारधारा से प्रेरित हिंसा, चाहे वह डिजिटल उकसावे से ही क्यों न शुरू हुई हो उसे हल्के में नहीं लिया जाएगा। अदालत ने कहा कि बोलने की आजादी को ‘सजा’ देने और पूरे समाज को डराने के लिए की गई लक्षित हत्याओं को निजी रंजिश या व्यापारिक विवाद बताकर कमजोर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साजिश हर चरण में दिखने वाली नहीं होती। कोई व्यक्ति अंतिम वार से दूर रहकर भी चुपचाप और सोच-समझकर भूमिका निभा सकता है और तब भी उसकी आपराधिक जिम्मेदारी बनी रहती है। अदालत ने कहा कि जब हिंसा का मकसद केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि समाज में डर फैलाना और दूसरों की आवाज दबाना हो, तो UAPA लागू होता है। खान की जमानत खारिज करना सजा नहीं बल्कि अपराध की गंभीरता और शुरुआती सबूतों का कानूनी नतीजा है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

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Anurag
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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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