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नक्सलवाद के खात्मे की HM अमित शाह की डेडलाइन नजदीक, छत्तीसगढ़-ओडिशा में हजारों सरेंडर: जानें- किन योजनाओं से बदल रही तस्वीर

31 मार्च 2026 की डेडलाइन नजदीक आते ही नक्सलवाद कमजोर पड़ रहा है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा में नक्सल मुक्त इलाके, बढ़ते सरेंडर, 2025 की कार्रवाई और बदली जमीनी हकीकत इस बदलाव का सबूत हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद के खात्मे का जो संकल्प लिया गया था, वह अब केवल एक राजनीतिक बयान नहीं रह गया है, बल्कि जमीनी हकीकत में बदलता हुआ दिखाई दे रहा है।

दशकों तक जिन इलाकों को लाल आतंक का गढ़ माना जाता था, जहाँ हिंसा, डर और अस्थिरता आम जनजीवन का हिस्सा बन चुके थे, वहाँ अब धीरे-धीरे शांति, विकास और भरोसे की वापसी हो रही है। जैसे-जैसे तय की गई डेडलाइन करीब आ रही है, वैसे-वैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीर भी बदलती दिख रही है।

नक्सलवाद जिन इलाकों में पैर जमाए बैठा था, वहाँ विकास रुक गया था, प्रशासन कमजोर पड़ गया था और आम लोग डर के साए में जीवन जीने को मजबूर थे। लेकिन हाल के वर्षों में खासतौर से 2025 और 2026 की शुरुआत में हुई निर्णायक कार्रवाइयों ने यह संकेत दे दिया है कि लाल आतंक अब अपने अंतिम दौर में पहुँच चुका है।

नक्सल मुक्त छत्तीसगढ़ के आँकड़े  

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान अब निर्णायक चरण में पहुँच चुका है और नवंबर 2025 से अक्टूबर 2025 के बीच राज्य के कई नक्सल प्रभावित जिलों में बड़ी सफलताएँ दर्ज की गई हैं, जिससे बस्तर अंचल में माओवादी नेटवर्क की पकड़ तेजी से कमजोर हुई है।

नारायणपुर जिले में 25 नवंबर 2025 को 28 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 19 महिलाएँ शामिल थीं और 22 नक्सलियों पर कुल 89 लाख रुपए का इनाम घोषित था, ये सभी दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी से जुड़े थे और पूर्वी बस्तर डिवीजन की मिलिट्री कंपनी नंबर 6 के सक्रिय कैडर रहे, जिनमें पंडी ध्रुव उर्फ दिनेश, दुले मंडावी उर्फ मुन्नी, छत्तीस पोयम और पदनी ओयम जैसे हार्डकोर सदस्य भी शामिल थे, जिन्होंने SLR, INSAS और .303 राइफलें पुलिस को सौंपीं।

नारायणपुर नक्सली सरेंडर (फोटो साभार: ETV Bharat)

नारायणपुर जिले में ही 2025 के दौरान कुल 287 नक्सली मुख्यधारा में लौट चुके हैं, जो इस बात का संकेत है कि यह इलाका अब तेजी से नक्सल प्रभाव से बाहर आ रहा है। इसी तरह कांकेर जिले में नॉर्थ सब-जोनल ब्यूरो से जुड़े 21 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 4 DVCM, 9 ACM और 8 पार्टी सदस्य शामिल थे।

ये सभी केशकाल डिवीजन के कुएमारी और किसकोडो एरिया कमेटी से जुड़े थे और उन्होंने 3 AK-47, 4 SLR, 2 INSAS, 6 .303 और 1 BGL लॉन्चर सहित कुल 18 हथियार जमा किए, जबकि कांकेर के कामतेड़ स्थित BSF कैंप में करीब 50 नक्सलियों ने भी सरेंडर किया, जिनमें बटालियन कमांडर स्तर के कैडर भी शामिल थे।

24 जुलाई 2025 को छत्तीसगढ़ के बीजापुर में 25, दंतेवाड़ा 15, नारायणपुर 8, सुकमा 5 और कांकेर 13 में एक ही दिन में कुल 66 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिन पर ₹1.3 करोड़ से अधिक का इनाम घोषित था, जिससे यह साफ हुआ कि बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा और कांकेर जैसे परंपरागत नक्सल प्रभावित जिले अब धीरे-धीरे उग्रवाद से बाहर निकल रहे हैं।

(फोटो साभार : X_@ITBP_official)

इसके अलावा 15 और 16 अक्टूबर 2025 को छत्तीसगढ़ में दो दिनों के भीतर 197 नक्सलियों ने हथियार डाले, जिसमें 16 अक्टूबर को 170 और 15 अक्टूबर को 27 नक्सली शामिल थे, जो हाल के वर्षों में राज्य का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण अभियान माना जा रहा है।

2025 में अब तक छत्तीसगढ़ में 1000 से अधिक नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं, जबकि 2024–25 के दौरान 500 से अधिक नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए, जिससे बस्तर, नॉर्थ बस्तर, अबूझमाड़, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर, सुकमा और दंतेवाड़ा जैसे इलाकों में नक्सल संगठन की कमर टूट चुकी है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार, जनवरी 2024 में बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद से अब तक छत्तीसगढ़ में 2100 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, 1785 गिरफ्तार हुए और 477 मुठभेड़ों में ढेर किए गए, जबकि अबूझमाड़ और नॉर्थ बस्तर को आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित किया जा चुका है।

छत्तीसगढ़ और ओडिशा : नक्सल मुक्त होते इलाके

ओडिशा के मलकानगिरी जिले में गुरुवार (05 फरवरी 2026) नक्सल विरोधी अभियान को बड़ी सफलता मिली है। यहाँ एक टॉप माओवादी कमांडर सुखराम मरकाम ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया। उस पर 21 लाख रुपए का इनाम घोषित था और वह लंबे समय से फायरिंग, IED ब्लास्ट, अपहरण और आम नागरिकों की हत्या जैसी गंभीर घटनाओं में शामिल रहा है।

मलकानगिरी के SP विनोद पाटिल ने इसे बड़ी कामयाबी बताते हुए कहा कि नक्सलियों के लिए हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का यही सही समय है। उन्होंने बाकी नक्सली कैडरों से भी सरेंडर करने की अपील की। सरेंडर के दौरान आरोपित ने SLR राइफल, कारतूस और दो शक्तिशाली IED भी पुलिस को सौंपे, जिससे इलाके की सुरक्षा और मजबूत हुई है।

(फोटो साभार: दैनिक जागरण)

पुलिस के अनुसार, इस सरेंडर के बाद मलकानगिरी जिला अब प्रभावी रूप से नक्सल मुक्त हो गया है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि लगातार चलाए गए सुरक्षा अभियानों, मजबूत खुफिया तंत्र और प्रशासन की सतर्कता का नतीजा है।

इसी तरह छत्तीसगढ़ के एक बड़े नक्सल प्रभावित इलाके को भी नवंबर 2025 में आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित किया गया था। यह इलाका कभी नक्सली हिंसा और डर का केंद्र हुआ करता था, लेकिन अब वहाँ शांति लौट रही है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और स्थानीय प्रशासन की सक्रियता से नक्सलियों की पकड़ कमजोर पड़ गई।

मलकानगिरी के कुछ हिस्सों को भी हाल ही में नक्सल मुक्त घोषित किया गया है। पहले जहाँ पुलिस का पहुँचना भी खतरे से खाली नहीं था, अब वहाँ चौकियाँ मजबूत हो रही हैं, सड़कें बन रही हैं, संचार सुविधाएँ बेहतर हो रही हैं और सरकारी योजनाएँ आम लोगों तक पहुँच रही हैं।

ये घटनाएँ इस बात का साफ संकेत हैं कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक दौर में पहुँच चुकी है। पुलिस और प्रशासन की मेहनत से प्रभावित इलाकों में धीरे-धीरे सामान्य जीवन लौट रहा है, लोग बिना डर के रह पा रहे हैं और विकास का रास्ता खुल रहा है।

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के गोगुंडा इलाके में सुरक्षाबलों ने माओवादी आतंक के प्रतीक बने कुख्यात नेता रमन्ना के 20 फीट ऊँचे स्मारक को ध्वस्त कर दिया है। CRPF की 74वीं बटालियन ने एंटी-नक्सल ऑपरेशन के तहत इस ढाँचे को विस्फोट के जरिए जमींदोज किया।

फोटो साभार – ईटीवी भारत

यह स्मारक माओवादी संगठन के लिए डर और वैचारिक प्रचार का माध्यम था, जिसे खत्म कर सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर बड़ा प्रहार किया है। यह कार्रवाई बस्तर और सुकमा क्षेत्र को नक्सलमुक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार का वर्ष रहा 2025

साल 2025 को नक्सलवाद के खिलाफ एक निर्णायक और ऐतिहासिक वर्ष माना जा रहा है, क्योंकि इस दौरान सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के खात्मे के लिए बड़े और प्रभावी ऑपरेशन किए।

जंगलों में फैले नक्सली नेटवर्क को खत्म किया गया, कई बड़े नक्सली कमांडरों को मार गिराया गया या गिरफ्तार किया गया और उनके फंडिंग व हथियार सप्लाई के रास्तों पर सख्त कार्रवाई करते हुए रोक लगाई गई।

इस साल सैकड़ों नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए या पकड़े गए, कई बड़े संगठन कमजोर हो गए और बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस के संयुक्त अभियानों से नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या भी घट गई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, नक्सली हिंसा की घटनाओं में पिछले वर्षों की तुलना में बड़ी गिरावट आई है, जिससे साफ है कि सरकार की नीति अब सिर्फ बचाव तक सीमित नहीं रही, बल्कि आक्रामक, मजबूत और निर्णायक हो चुकी है।

पहले कैसे थे हालात? जब डर ही कानून था

नक्सल प्रभावित इलाकों के पुराने हालात पर नजर डालें, तो साफ समझ आता है कि इन क्षेत्रों में सामान्य जीवन इनके लिए कितना मुश्किल था। कई गाँवों में स्कूल सालों तक बंद रहे, क्योंकि शिक्षक और अभिभावक दोनों ही नक्सली हिंसा से डरते थे। स्वास्थ्य सेवाएँ लगभग न के बराबर थीं, डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ का वहाँ पहुँचना मुश्किल माना जाता था।

सड़कें अधूरी थीं, मोबाइल नेटवर्क कमजोर या बिल्कुल नहीं था और बैंकिंग सुविधाएँ लोगों की पहुँच से बाहर थीं। ग्रामीणों से जबरन वसूली आम बात थी और नक्सली फरमान ही कई जगहों पर स्थानीय कानून का रूप ले चुके थे। शाम ढलते ही लोग अपने घरों में कैद हो जाते थे और बच्चों का भविष्य अंधकार में डूबता जा रहा था।

नक्सली केवल हथियारों के बल पर नहीं, बल्कि डर, प्रतीकों और मानसिक दबाव के जरिए लोगों पर काबू पते थे। उनके झंडे, पोस्टर और उनके ‘स्मारक’ आम लोगों के भीतर डर का काम करती थी।

बदलती जमीनी हकीकत: विकास, शिक्षा और भरोसे की वापसी

अब वही इलाके धीरे-धीरे एक नई पहचान की ओर बढ़ रहे हैं। जिन क्षेत्रों में पहले सरकारी गाड़ियाँ भी मुश्किल से पहुँच पाती थीं, वहाँ अब नई सड़कें बन रही हैं, पुल तैयार हो रहे हैं और मोबाइल व इंटरनेट नेटवर्क मजबूत किया जा रहा है। बैंकिंग सेवाएँ, डाक सुविधाएँ और राशन वितरण प्रणाली पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी हो गई हैं।

स्कूल दोबारा खुल रहे हैं, बच्चों की नियमित उपस्थिति बढ़ रही है और युवाओं में शिक्षा व रोजगार को लेकर नई जागरूकता दिखाई दे रही है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सक्रिय हो रहे हैं, एम्बुलेंस सेवाएँ पहुँच रही हैं और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ ग्रामीणों तक पहुँचने लगा है।

छत्तीसगढ़ का सुकमा अब बदलते दौर की नई कहानी लिख रहा है। घने जंगल, मुश्किल भौगोलिक हालात और सीमित सरकारी पहुँच के चलते यहाँ लंबे समय तक ‘लाल आतंक’ पनपता रहा लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं।

केंद्र और राज्य सरकार की पहल पर शुरू हुई ‘आम बगीचा योजना’ ने इलाके की नक्सली पहचान को पलट देना शुरू कर दिया है। छोटे-छोटे बागानों ने ग्रामीणों की आमदनी बढ़ाई है, महिलाओं ने व्यवसाय में कदम रखा है और कुछ तो ‘लखपति दीदी’ बनने की ओर अग्रसर हैं।

यह सिर्फ आर्थिक बदलाव नहीं है बल्कि सुरक्षा, आत्मविश्वास और सामाजिक सोच में भी स्पष्ट सुधार दिख रहा है। जब विकास यहाँ तक पहुँचता है, तो असर केवल पैसों तक सीमित नहीं रहता, यह लोगों की उम्मीदें, हौसला और भविष्य की चुनौतियों से निपटने की शक्ति भी बढ़ाता है।

‘आम बगीचा परियोजना’ का मुख्य उद्देश्य यह है कि ग्रामीण लोग खेती के अलावा स्थायी और टिकाऊ तरीकों से आय हासिल कर सकें। अस्थिरता के बीच छोटे-मोटे खेत और बारहमासी फसलें जोखिम भरी होती हैं। फलों के पेड़, खासकर संकर किस्में, कुछ सालों के भीतर नियमित फल देने लगती हैं और कई वर्षों के लिए आय का स्रोत बन जाता हैं।

मर्काम धूला ने कहा की “प्रशासन की मदद से हमने आम, नींबू और नारियल लगाए, अब कमाई होने वाली है।”

प्रशासन ने देखा कि सुकमा की मिट्टी और जलवायु फलों के लिए अनुकूल है, इसलिए यहाँ बागवानी को बढ़ावा देना मतलब लोगों को लंबे समय के लिए आर्थिक सुरक्षा देना है। साथ ही महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ जैसी योजनाओं से जोड़कर उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ाने की भी कोशिश की जा रही है।

जहाँ पहले डर का माहौल था, वहाँ अब सामान्य जीवन की वापसी हो रही है। लोग खुले तौर पर अपने व्यवसाय शुरू कर रहे हैं, कृषि और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है और विकास की नई उम्मीदें जन्म ले रही हैं।

क्या कहते है आँकड़े

सरकारी और गृह मंत्रालय के ताज़ा आँकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुकी है। संसद में साझा किए गए नवीनतम डेटा के अनुसार, भारत में नक्सली हिंसा अपने चरम वर्ष 2010 की तुलना में करीब 89% तक घट चुकी है।

जहाँ 2010 में 1,936 हिंसक घटनाएँ दर्ज हुई थीं, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर लगभग 218 रह गई है। इसी तरह, नक्सल हिंसा से होने वाली मौतों में भी 91% तक की गिरावट आई है।

2010 में जहाँ 1005 मौतें दर्ज हुई थीं, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर लगभग 93 से 150 के बीच सिमट कर रह गया है। नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 से घटकर 2025 में केवल 11 रह गई है, जबकि सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या 36 से घटकर सिर्फ 3 (बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर छत्तीसगढ़) तक सिमट गई है, जो रेड कॉरिडोर के लगभग पतन का संकेत है।

2025 में ही सुरक्षा बलों ने 317–364 नक्सलियों को मार गिराया, जिनमें 12 से अधिक शीर्ष कमांडर शामिल थे, साथ ही 942-1022 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और लगभग 2000-2337 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जो संगठन के आंतरिक मनोबल के टूटने और सरकार की पुनर्वास नीति की सफलता को दर्शाता है।

बीते एक दशक में 8000 से अधिक नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौट चुके हैं और सरकार की सरेंडर कम रिहैबिलिटेशन नीति, आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण, मासिक वजीफा और रोजगार योजनाओं ने इस बदलाव को गति दी है।

जैसे-जैसे 31 मार्च 2026 की तारीख नजदीक आ रही है, नक्सली संगठनों के भीतर बेचैनी और भ्रम की स्थिति बढ़ती जा रही है। निचले स्तर के कैडर हथियार छोड़ रहे हैं, नेतृत्व संकट गहरा रहा है और संगठन के भीतर अविश्वास की भावना पैदा हो रही है।

फंडिंग नेटवर्क कमजोर पड़ रहे हैं, सप्लाई चैनल टूट रहे हैं और कई नक्सली समूह अपने अस्तित्व को लेकर असमंजस में हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि हाल के समय में बड़ी संख्या में नक्सली स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर चुके हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि लाल आतंक अब अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है।

लाल आतंक से आजाद होती जमीन: बदलती पहचान और नई उम्मीदें

जहाँ पहले बारूद की गंध और हिंसा का साया था, वहाँ अब विकास, शिक्षा और अवसरों की चर्चा हो रही है। नई पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर अधिक आशावान दिखाई दे रही है। छोटे व्यापार, कृषि आधारित उद्यम, पर्यटन और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है।

नक्सल प्रभावित रहे इलाके अब हिंसा की पहचान से बाहर निकलकर विकास और संभावनाओं की पहचान गढ़ने लगे हैं। लोग अपने क्षेत्र को डर से नहीं, बल्कि उम्मीद और अवसर से जोड़कर देखने लगे हैं।

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विवेकानंद मिश्र
विवेकानंद मिश्र
एक पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर। राजनीति, संस्कृति, समाज से जुड़ी अनसुनी कहानियाँ सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध।

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