इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार (10 फरवरी 2026) को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि जाति जन्म से तय होती है और अंतरजातीय विवाह या धर्म परिवर्तन के बाद भी नहीं बदलती।
यह टिप्पणी जस्टिस अनिल कुमार ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम से जुड़े एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान की। मामला एक अनुसूचित जाति (SC) की महिला से जुड़ा है, जिसने अपनी जाति से बाहर विवाह किया था।
इस केस में दिनेश और आठ अन्य लोगों ने SC/ST एक्ट के तहत विशेष जस्टिस के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें IPC की धाराएँ 323 (मारपीट), 506 (धमकी), 452 (घर में घुसकर हमला) और 354 (महिला की मर्यादा भंग करने की कोशिश) के साथ-साथ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) के तहत ट्रायल का सामना करने का आदेश दिया गया था। हालाँकि हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी।
महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपित ने उसके साथ मारपीट की, गाली-गलौज की और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। उसने शिकायत में बताया कि इस घटना में वह समेत तीन लोग घायल हुए थे। यह घटना उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में हुई थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि FIR और शिकायत में बताई गई दोनों घटनाएँ एक ही दिन और एक ही समय की हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपितों का यह दावा कि शिकायत बदले की भावना से दर्ज कराई गई है, स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि शिकायत में साफ तौर पर मारपीट और जातिसूचक गालियों का जिक्र है और तीन लोगों के घायल होने की बात भी सामने आई है। ऐसे में अपील में कोई दम नहीं है और इसे खारिज किया जाना सही है।
कोर्ट ने दलीलें सुनीं और अपना फैसला सुनाया
अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि उन्हें झूठा फंसाया गया है और मौजूदा शिकायत से पहले महिला के खिलाफ ही एक FIR दर्ज की गई थी। उनका कहना था कि मेडिकल रिपोर्ट रिकॉर्ड में मौजूद है, जिससे साबित होता है कि उनके परिवार के अन्य लोग भी इस घटना में घायल हुए थे।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि महिला मूल रूप से पश्चिम बंगाल की रहने वाली है और वहाँ वह SC/ST समुदाय से संबंधित थी। लेकिन उसने जाट समुदाय के व्यक्ति से शादी कर ली है। आरोपितों का कहना था कि महिला ने यह सच छिपाया और खुद को अब भी SC/ST समुदाय की सदस्य बताकर मामला दर्ज कराया। उनके अनुसार, जब उसने जाट समुदाय के व्यक्ति से विवाह कर लिया, तो वह खुद को SC/ST समुदाय की महिला नहीं बता सकती।
आरोपितों ने आगे कहा कि किसी दूसरी जाति में विवाह करने के बाद महिला अपनी मूल जाति खो देती है और पति की जाति में शामिल हो जाती है। इसलिए उनके खिलाफ SC/ST एक्ट समेत अन्य धाराओं में कार्रवाई करना कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।
हालाँकि कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी मामले में क्रॉस-केस (दोनों पक्षों की ओर से दर्ज मुकदमा) होना, दूसरी पार्टी की शिकायत को खारिज करने का आधार नहीं बनता। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपितों को तलब करने में कोई अवैधता नहीं है।
कोर्ट ने साफ कहा कि यह तर्क कि जाट समुदाय के व्यक्ति से शादी करने के बाद महिला ने अपनी जाति खो दी, पूरी तरह बेबुनियाद है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर सकता है, लेकिन उसकी जाति नहीं बदलती। विवाह से भी जाति में कोई बदलाव नहीं होता। इसलिए आरोपितों की यह दलील टिकाऊ नहीं है। इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी।

विशेष न्यायाधीश, SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम का आदेश
SC/ST (अत्याचार निवारण) एक्ट की कोर्ट में विशेष न्यायाधीश संजीव कुमार सिंह ने 27 जुलाई 2022 को ज्योतिराय देवी की शिकायत पर फैसला सुनाया। ज्योतिराय देवी ने कोर्ट से माँग की थी कि दिनेश, महेंद्र, सतीश, लोटन, भारत भूषण, टिकेश, अजीत, सुभाष, रिंकू, राजेश देवी और मंजू देवी को मुकदमे के लिए तलब किया जाए और उन्हें सजा दी जाए।
ज्योतिराय देवी ने खुद को अनुसूचित जाति (SC) का बताया और आरोप लगाया कि आरोपित जाट समुदाय के प्रभावशाली लोग हैं। कोर्ट के आदेश में दर्ज है कि पिछले साल उन्होंने गाँव प्रधान का चुनाव लड़ा था, जिसके बाद से आरोपितों से उनकी रंजिश चल रही थी।
शिकायत के मुताबिक 6 सितंबर 2021 को वह अपने घर के आंगन में खाना बना रही थीं, तभी उनके आंगन में कुछ ईंटें फेंकी गईं। उन्होंने इसका विरोध किया तो आरोप है कि दिनेश और महेंद्र लाठी लेकर घर में घुस आए।
भारत भूषण के पास देसी तमंचा था, टिकेश के हाथ में लोहे की पाइप थी, अजीत के पास हंसिया था और शुभम व रिंकू ईंट और डंडे लिए हुए थे। वहीं राजेश देवी के हाथ में भी ईंट थी और मंजू देवी भी डंडा लिए हुए बताई गईं।
शिकायत के अनुसार, आरोपित ने ज्योतिराय देवी और उनके परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट की और गाली-गलौज की। आरोप है कि वह गाँव में खुलकर अपनी बात रखती थीं और खुद को एक नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रही थीं, इसी वजह से आरोपित उन्हें सबक सिखाना चाहते थे।
शिकायत में कहा गया कि आरोपितों ने उन्हें धक्का देकर गिरा दिया और आपत्तिजनक बातें कहीं। इसी दौरान दिनेश ने उनके साथ अश्लील हरकत करते हुए उनके निजी अंगों को पकड़ लिया। वहीं महेंद्र, सतीश, राजेश देवी और मंजू देवी ने लाठी-डंडों और ईंटों से उनकी पिटाई की।
आरोप यह भी है कि भारत भूषण ने जान से मारने की नीयत से उनके परिवार वालों पर फायरिंग की। हालाँकि वे बाल-बाल बच गए, लेकिन ज्योतिराय देवी को चोटें आईं। शोर सुनकर पड़ोस के धर्मवीर और सीताराम मौके पर पहुँचे और बीच-बचाव करने की कोशिश की। इस दौरान आरोपितों ने उन्हें भी धमकाया और ज्योतिराय देवी को जान से मारने की धमकी देते हुए वहाँ से चले गए।
पुलिस शिकायत और कोर्ट के फैसले पर कोई कार्रवाई नहीं
शिकायत में यह भी कहा गया कि घटना के बाद ज्योतिराय देवी रिपोर्ट दर्ज कराने थाने पहुँचीं, लेकिन पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज नहीं की। इसके बाद उन्होंने 21 सितंबर 2021 को अलीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को लिखित आवेदन दिया। हालांकि, इसके बावजूद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।

मामले में ज्योतिराय देवी का बयान दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 200 और 202 के तहत दर्ज किया गया। उन्होंने अपने, विष्णु कुमार और रमेश की मेडिकल जाँच के रिपोर्ट की फोटोकॉपी भी SSP को सौंपने की बात कही।
इससे पहले उन्होंने धारा 156(3) CrPC के तहत भी एक आवेदन दिया था, जिस पर पुलिस स्टेशन से रिपोर्ट तलब की गई। उस रिपोर्ट में बताया गया कि दिनेश ने अलीगढ़ जिले के खैर थाने में आईपीसी की धाराएँ 147, 323, 308, 504 और 506 के तहत उनके पति विष्णु कुमार और आठ अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी।
ज्योतिराय देवी ने अपने बयान में कहा कि संबंधित मेडिकल रिपोर्ट भी दी गई थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि घटना के लिए सभी विपक्षी पक्ष जिम्मेदार हैं। हालाँकि, उनके गवाह और पति विष्णु कुमार ने अपने बयान में यह नहीं कहा कि राजेश देवी और मंजू देवी इस अपराध में शामिल थे। इस आधार पर उनके खिलाफ समन जारी करना उचित नहीं बताया गया।
फिर भी आदेश में कहा गया कि शिकायत से जुड़े साक्ष्यों की जांच के आधार पर IPC की धाराएँ 323 (मारपीट), 506 (धमकी), 452 (घर में घुसना) और 354 (महिला की मर्यादा भंग) तथा SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है। इसलिए उन्हें ट्रायल के लिए तलब करना उचित है।

कोर्ट ने दिनेश, महेंद्र, सतीश, लोटन, भारत भूषण, टिकेश, अजीत, सुभाष और रिंकू को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराएँ 323 (मारपीट), 506 (धमकी), 452 (घर में घुसना) और 354 (महिला की मर्यादा भंग) के साथ-साथ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत ट्रायल का सामना करने का आदेश दिया।
कोर्ट ने शिकायतकर्ता को निर्देश दिया कि वह एक सप्ताह के भीतर आवश्यक प्रतिरक्षा/दस्तावेज प्रस्तुत करे। साथ ही आरोपितों को 18 सितंबर 2022 को निर्धारित अगली सुनवाई में उपस्थित होने का भी आदेश दिया गया।

लोटन सिंह की FIR में विष्णु और उसके साथियों पर आरोप
मथना गाँव के लोटन सिंह (पुत्र भगवान सहाय) ने 7 सितंबर 2021 को खैर थाने में एक FIR दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि गाँव प्रधान (प्रधानी) के चुनाव में वोट न देने को लेकर विष्णु और उसके साथियों से उनकी रंजिश चल रही थी।
अपनी शिकायत में उन्होंने कहा कि 6 सितंबर 2021 की शाम करीब 6:30 बजे श्याम सिंह (पुत्र रमेश), जुगेंद्र सिंह (पुत्र रामलाल), विष्णु, सीताराम, महेंद्र सिंह, लाल सिंह उर्फ लालू (पुत्र यशवीर), हरीकिशन उर्फ कालू और श्याम सिंह उर्फ श्याम लाठी-डंडे और ईंट लेकर जबरन उनके घर में घुस आए और मारपीट शुरू कर दी।
उन्होंने आगे बताया कि शोर सुनकर गिर्राज के बेटे दिनेश और देवदत्त के बेटे सतीश बीच-बचाव के लिए पहुँचे, लेकिन हमलावरों ने उन्हें भी पीट दिया। शिकायतकर्ता के अनुसार, “मेरे बेटे भारत और दिनेश को बुरी तरह पीटा गया। उनके सिर में गंभीर चोटें आई हैं और मुझे भी चोटें लगी हैं।”
उन्होंने आरोप लगाया कि मारपीट बेहद क्रूर थी। “मैं गंभीर हालत में थाने पहुँचा था। कल रिपोर्ट दर्ज नहीं करा सका, इसलिए आज आया हूँ,” उन्होंने सख्त कार्रवाई की माँग करते हुए कहा। इस मामले में पुलिस ने IPC की धाराएँ 147 (दंगा), 323 (मारपीट), 308 (गंभीर चोट पहुंचाने का प्रयास) और 452 (घर में घुसकर हमला) के तहत केस दर्ज किया।
इस फैसले से दलित ईसाई आरक्षण का रास्ता खुल सकता है
यह फैसला भले ही दो पक्षों के बीच विवाद को सुलझाने के संदर्भ में दिया गया हो, लेकिन इसके सामाजिक असर हो सकते हैं। खासतौर पर कोर्ट की यह टिप्पणी कि अंतरजातीय विवाह के बाद भी महिला की SC/ST जाति की पहचान बनी रहती है और धर्म परिवर्तन से भी जाति नहीं बदलती कई नई बहसों को जन्म दे सकती है।
इस व्याख्या के आधार पर आशंका जताई जा रही है कि वे लोग जिन्होंने ईसाई या अन्य धर्म अपनाया है, वे भी SC/ST आरक्षण में हिस्सेदारी का दावा कर सकते हैं, जबकि मौजूदा व्यवस्था के तहत यह लाभ मुख्य रूप से हिंदू, सिख और बौद्ध समुदाय के अनुसूचित जाति/जनजाति वर्गों के लिए निर्धारित है।
गौरतलब है कि पहले सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुका है कि ईसाई धर्म अपनाने पर व्यक्ति अपनी जाति की पहचान खो देता है। कोर्ट ने कहा था कि “धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति को उसकी पूर्व जाति से नहीं पहचाना जा सकता।” साथ ही यह भी रेखांकित किया गया था कि आरक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को दूर कर सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है। यहाँ तक कि केवल आरक्षण लाभ पाने के लिए हिंदू धर्म में वापस आना भी संविधान के साथ छल माना गया है।
भारतीय अदालतें लगातार यह कहती रही हैं कि जो लोग हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई बन चुके हैं, वे SC आरक्षण के हकदार नहीं हैं। पिछले वर्ष इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के जिलाधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे ऐसे लोगों की पहचान करें जिन्होंने धर्म परिवर्तन के बावजूद SC दर्जे का लाभ लिया है, इसे संविधान के साथ धोखा बताया गया था।
दूसरी ओर, सैद्धांतिक रूप से ईसाई धर्म या अन्य मजहबों में जाति व्यवस्था नहीं मानी जाती। लेकिन भारत में ईसाई समुदाय के भीतर भी सामाजिक स्तर पर जातिगत पहचान देखने को मिलती है। कई लोग धर्म परिवर्तन के बाद भी अपनी पुरानी जातिगत पहचान को सामाजिक रूप से बनाए रखते हैं और इसी आधार पर आरक्षण की माँग उठती रहती है।
आलोचकों का तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म त्याग देता है, तो उसके साथ जुड़ी मूल सामाजिक संरचना को भी छोड़ना चाहिए। वहीं, यह भी कहा जाता है कि कुछ मिशनरी संगठनों द्वारा निचली जातियों के हिंदुओं को यह कहकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया जाता है कि वहाँ भेदभाव नहीं है। ऐसे में यदि वास्तविकता अलग हो, तो घर वापसी की राह भी खुली रहती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि ईसाई या अन्य धर्मों में परिवर्तित लोगों को भी SC/ST आरक्षण का लाभ दिया जाता है, तो इससे उन हिंदू SC/ST समुदायों पर सीधा असर पड़ेगा जो पहले से सीमित सीटों और नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। नए दावेदार जुड़ने से शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में अवसर और कम हो सकते हैं, जिससे पहले से वंचित वर्गों के लिए आगे बढ़ना और मुश्किल हो जाएगा।
कुछ लोग यह भी तर्क देते हैं कि सरकार हिंदू मंदिरों और धार्मिक स्थलों से ही कर और दान का प्रबंधन करती है, इसलिए आरक्षण को हिंदू समाज के वंचित वर्गों के उत्थान का एक माध्यम माना जाता है। ऐसे में यदि आरक्षण का दायरा बिना स्पष्ट नीति के व्यापक किया गया, तो उसके मूल उद्देश्य और स्वरूप पर असर पड़ सकता है।
इस तरह, इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया फैसले में की गई टिप्पणियाँ आगे चलकर कई कानूनी और सामाजिक चुनौतियाँ खड़ी कर सकती हैं, खासकर हिंदू SC/ST समुदाय से जुड़े आरक्षण के प्रश्न पर।
( मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। )


