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शशि थरूर ने कूटनीति के मोर्चे पर सोनिया गाँधी को दिखाया आईना, ईरान युद्ध पर चुप्पी और संयम को बताया ताकत: कहा- ये कायरता नहीं, पढ़ें- इंटरव्यू की अहम बातें

थरूर ने सोनिया गाँधी के इस रुख से अलग हटते हुए कहा कि निंदा और संवेदना में फर्क होता है। उनके मुताबिक हर घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं होता, बल्कि कई बार संतुलित और सोच-समझकर दिया गया संदेश ही देश के हित में होता है।

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव को लेकर जहाँ कॉन्ग्रेस लगातार केंद्र सरकार पर ‘चुप्पी’ साधने का आरोप लगा रही है, वहीं कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपनी ही पार्टी की लाइन से अलग रुख अपनाते हुए मोदी सरकार की नीति का समर्थन किया है। थरूर ने इसे ‘जिम्मेदार कूटनीति’ करार देते हुए कहा कि ऐसे समय में ‘संयम’ ही सबसे बड़ी ताकत होती है, न कि कमजोरी।

संयम को बताया ताकत, सरकार की नीति का समर्थन

न्यूज एजेंसी ANI से बातचीत में थरूर ने कहा कि अगर वह किसी कॉन्ग्रेस सरकार को सलाह देते, तो भी यही कहते कि इस समय संयम बरतना चाहिए। उन्होंने साफ कहा, “अगर मैं कॉन्ग्रेस सरकार को सलाह दे रहा होता, तो मेरी सलाह होती कि इस समय संयम बरतें। संयम का मतलब आत्मसमर्पण नहीं है, यह एक ताकत है, यह दिखाने का एक तरीका है कि हम अपने हितों को जानते हैं और सर्वप्रथम उनकी रक्षा के लिए कार्य करेंगे।”

थरूर के अनुसार, भारत की चुप्पी को युद्ध के समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति है। इससे भारत अपने हितों की रक्षा करते हुए कूटनीतिक बातचीत के रास्ते खुले रख सकता है।

उन्होंने कहा कि कई बार चुप रहना भी एक प्रभावी रणनीति होती है, जो अनावश्यक टकराव से बचाते हुए शांति की दिशा में आगे बढ़ने का मौका देती है। आलोचकों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि नैतिक आदर्शवाद और वास्तविक कूटनीतिक जरूरतों के बीच फर्क समझना जरूरी है।

सोनिया गाँधी ने उठाए थे सरकार पर सवाल

इससे पहले सोनिया गाँधी ने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा था कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या पर भारत की चुप्पी ‘तटस्थता’ नहीं बल्कि ‘जिम्मेदारी से पीछे हटना’ है। उन्होंने अपने लेख में यह भी कहा था कि भारत और ईरान के संबंध ‘सभ्यतागत और रणनीतिक’ रहे हैं और ऐसे समय में चुप रहना उचित नहीं है।

सोनिया ने लिखा था, “भारत सरकार ने इस हत्या या ईरानी संप्रभुता के उल्लंघन की निंदा करने से परहेज किया है। जब किसी विदेशी नेता की हत्या पर हमारे देश की ओर से संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून के पक्ष में कोई स्पष्ट समर्थन नहीं दिखता और निष्पक्षता छोड़ दी जाती है, तो यह हमारी विदेश नीति की दिशा और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।”

‘कंडेमनेशन और कंडोलेंस में फर्क’ : थरूर

थरूर ने सोनिया गाँधी के इस रुख से अलग हटते हुए कहा कि निंदा और संवेदना में फर्क होता है। उनके मुताबिक हर घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं होता, बल्कि कई बार संतुलित और सोच-समझकर दिया गया संदेश ही देश के हित में होता है।

कॉन्ग्रेस सांसद ने कहा कि भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ से हर साल लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार होता है। देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा भी इसी क्षेत्र से पूरा होता है और करीब 90 लाख भारतीय वहाँ रोजगार से जुड़े हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष के खिलाफ खुलकर कड़ा रुख अपनाना इन महत्वपूर्ण संबंधों को नुकसान पहुँचा सकता है।

थरूर ने अमेरिका के साथ भारत के रणनीतिक संबंधों पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा अमेरिकी नेतृत्व, खासकर डोनाल्ड ट्रंप  अक्सर अपने हितों के खिलाफ जाने वाले देशों के प्रति सख्त रुख अपनाते हैं, इसलिए भारत के लिए रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और चीन के बढ़ते प्रभाव जैसी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए अमेरिका के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना जरूरी है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विदेश नीति कोई नैतिक भाषण देने का मंच नहीं होती, बल्कि यह वह क्षेत्र है जहाँ आदर्शों और शक्ति के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। बिना पर्याप्त प्रभाव के किसी बड़ी ताकत की खुलकर आलोचना करना व्यावहारिक नहीं होता।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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