Homeविचारराजनैतिक मुद्देराहुल गाँधी रो रहे जिस 'गेरिमांडरिंग' का रोना, भारत को सच में उसकी जरूरत:...

राहुल गाँधी रो रहे जिस ‘गेरिमांडरिंग’ का रोना, भारत को सच में उसकी जरूरत: समझें- लोकतंत्र को बचाने के लिए डीलिमिटेशन क्यों है जरूरी

राहुल गाँधी फर्जी और भड़काऊ आरोप लगा रहे हैं। हकीकत में भारत को इस तरह के निष्पक्ष डेलिमिटेशन की सख्त जरूरत है। मुस्लिम आबादी वाले कुछ इलाकों में 'मुस्लिम वीटो' की वजह से लोकतंत्र की जड़ें हिल रही हैं। जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, वहाँ गैर-मुस्लिम उम्मीदवार कभी नहीं जीत पाते। जीतना तो छोड़िए, राजनीतिक दल उन सीटों पर गैर-मुस्लिम उम्मीदवार तक नहीं उतारते।

संसद सत्र के बीच राहुल गाँधी ने एक्स पर ट्वीट कर बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी सभी सीटों को गेरिमांडरिंग (सीमा पुनर्निर्धारण) करके फायदा उठाना चाहती है। उन्होंने दावा किया कि प्रस्तावित बिल संवैधानिक सुरक्षा हटा रहे हैं, जिससे सरकार खुद डेलिमिटेशन कमीशन नियुक्त कर निर्देश दे सकेगी।

राहुल ने असम और जम्मू-कश्मीर के उदाहरण दिए जहाँ बीजेपी ने कथित तौर पर विरोधी क्षेत्रों को तोड़ा और वोटरों को बराबर नहीं रखा। कुछ सीटों पर 25 लाख वोटर तो कुछ पर सिर्फ 8 लाख… कुछ लोकसभा सीट में 12 विधानसभा सीटें, तो कुछ पर 6 राहुल का कहना है कि मोदी सरकार चुनाव आयोग पर कब्जा कर चुकी है, अब डेलिमिटेशन पर भी कब्जा करना चाहती है। कॉन्ग्रेस इसे नहीं होने देगी।

राहुल गाँधी की बातों में कितनी सच्चाई?

लेकिन सच्चाई यह है कि राहुल गाँधी फर्जी और भड़काऊ आरोप लगा रहे हैं। हकीकत में भारत को इस तरह के निष्पक्ष डेलिमिटेशन की सख्त जरूरत है। मुस्लिम आबादी वाले कुछ इलाकों में ‘मुस्लिम वीटो’ की वजह से लोकतंत्र की जड़ें हिल रही हैं। जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, वहाँ गैर-मुस्लिम उम्मीदवार कभी नहीं जीत पाते। जीतना तो छोड़िए, राजनीतिक दल उन सीटों पर गैर-मुस्लिम उम्मीदवार तक नहीं उतारते। अकेले यूपी में ही ऐसी कई लोकसभा-विधानसभा सीटें हो चली हैं, जिसमें से एक रामपुर ही है।

मुस्लिम बाहुल सीटों होने की स्थिति में दूसरे समुदायों का अधिकार छिन जाता है, इलाके गेट्टो (घेट्टो) बन जाते हैं, हिंदू भगाए जाते हैं और तुष्टीकरण की राजनीति चलती है। आम जनता से पूछ लीजिए तो हर कोई कहेगा कि वोट का बराबर अधिकार चाहिए, किसी एक समुदाय का वीटो नहीं चलेगा। हालाँकि बीजेपी ऐसा कुछ गैरकानूनी नहीं कर रही है, लेकिन अगर निष्पक्ष तरीके से किया जाए तो यह लोकतंत्र को मजबूत ही करेगा।

क्या है मुस्लिम वीटो

मुस्लिम वीटो का मतलब समझिए। जहाँ मुस्लिम आबादी 40-50 प्रतिशत से ज्यादा है, वहाँ वे ब्लॉक वोटिंग करते हैं। सारे वोट एक तरफ जाते हैं। नतीजा? गैर-मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट ही नहीं मिलता या मिले तो हार जाता है। उदाहरण लीजिए केरल का मलप्पुरम लोकसभा क्षेत्र। यहाँ मुस्लिम आबादी 70 प्रतिशत से ज्यादा है।

आज से नहीं बल्कि आजादी के बाद यानी साल 1952 से ही इस सीट पर आज तक हमेशा मुस्लिम उम्मीदवार ही जीतता है। हिंदू या ईसाई उम्मीदवार का नामोनिशान नहीं होता। इसी तरह बिहार का किशनगंज, पश्चिम बंगाल के कई सीटें जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, वहाँ हिंदू उम्मीदवार का जीतना लगभग नामुमकिन होता है।

बता दें कि असम में डेलिमिटेशन से पहले 35 विधानसभा सीटें मुस्लिम बहुसंख्यक थीं, जो अब घटकर 20 रह गई हैं। इससे साफ है कि पहले वीटो था इन इलाकों में।

समझिए कैसे पड़ता है फर्क, ये उदाहरण आँखें खोलने वाले हैं

इस वीटो का असर सड़क पर भी दिखता है। इलाके गेट्टो बन जाते हैं। हिंदू परिवार डर के मारे भाग जाते हैं। 2016 में उत्तर प्रदेश के कैराना में भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने खुलासा किया था कि 346 हिंदू परिवार मुस्लिम अपराधी गिरोहों के डर से भाग गए। उनकी दुकानें लूटी गईं, महिलाओं पर हमले हुए, लेकिन पुलिस भी कुछ नहीं कर सकी। क्योंकि लखनऊ में मुस्लिम हितैषी सरकार मौजूद रही। जनप्रतिनिधि भी उसी समुदाय से।

इसी तरह दिल्ली के हौज काजी इलाके में 2019 में मंदिर तोड़ने की घटना हुई। तनाव बढ़ा तो हिंदू परिवारों ने सोचा कि सुरक्षित मुस्लिम-बहुल इलाकों में रहना ठीक नहीं। इसके आगे की कड़ी देखिए कि साल 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के बाद सीलमपुर-मुस्तफाबाद जैसे इलाकों में हिंदू और मुस्लिम दोनों गेट्टो में शिफ्ट हो गए। इसकी वजहसे हिंदू कमजोर पड़कर भागे और इसके नतीजे क्या होते हैं? ऐसी स्थिति में विकास रुक जाता है, अपराध बढ़ता है, हिंदू-मुस्लिम अलगाव गहराता है।

यह तुष्टीकरण की राजनीति का नतीजा है। ठीक वैसे जैसे 1932 का कम्यूनल अवॉर्ड। उस समय अंग्रेजों ने मुसलमानों को अलग इलेक्टोरेट दे दिया। इसका नतीजा क्या हुआ? इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों के इस तरह से मुस्लिम लीग मजबूत होती चली गई और भारत देश का ही 3 टुकड़ों में विभाजन हो गया।

आज भी वही खेल चल रहा है। मुस्लिम वीटो वाली सीटों पर पार्टियाँ मस्जिद-मदरसे, ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दों पर तुष्टीकरण करती हैं। विकास, शिक्षा, नौकरी सब पीछे छूट जाता है। हिंदू परिवारों का पलायन आम हो गया है। असम, पश्चिम बंगाल, केरल, यूपी के कुछ जिलों में यह सिलसिला चल रहा है।

राहुल गाँधी कहते हैं कि बीजेपी ने असम और जम्मू-कश्मीर में डेलिमिटेशन हाइजैक किया। लेकिन सच्चाई उलट है। असम में डेलिमिटेशन से मुस्लिम बहुसंख्यक सीटें घटीं क्योंकि आबादी के हिसाब से निष्पक्ष बंटवारा हुआ। जम्मू-कश्मीर में जम्मू (हिंदू बहुल) को ज्यादा सीटें मिलीं, कश्मीर (मुस्लिम बहुल) को कम। यह गेरिमांडरिंग नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सच्चाई है, आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व।

समझें- दक्षिण के राज्यों को होगा कितना फायदा

यहाँ ये समझना जरूरी है कि 1971 की जनगणना पर आधारित सीटें 1976 से फ्रीज हैं। तब से लेकर अब तक उत्तर भारत और मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में आबादी तेजी से बढ़ी, जबकि दक्षिण के राज्य पीछे छूट गए। नया डेलिमिटेशन इसी असमानता को दूर करेगा।

गृह मंत्री अमित शाह ने दक्षिण के पाँचों राज्यों कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल का नाम लेकर बताया कि परिसीमन के बाद किस राज्य की सीटें कितनी होंगी। कर्नाटक राज्य का लोकसभा के 543 में सदस्यों में 28 सांसद हैं। कर्नाटक का लोकसभा में प्रतिनिधित्व 5.15 प्रतिशत है। बिल पारित होने और संविधान संशोधन होने के बाद कर्नाटक के सांसदों की संख्या 28 से बढ़कर 42 हो जाएगी, और लोकसभा में कर्नाटक का प्रतिनिधित्व 5.14 प्रतिशत हो जाएगा। इस तरह से कर्नाटक को जरा भी नुकसान नहीं होगा।

गृह मंत्री ने कहा कि अभी लोकसभा में तमिलनाडु के 39 सांसद हैं और लोकसभा में तमिलनाडु का प्रतिनिधित्व 7.18 प्रतिशत है, परिसीमन के बाद तमिलनाडु के सांसदों की संख्या बढ़कर 59 हो जाएगी और तमिलनाडु की हिस्सेदारी 7.23 प्रतिशत हो जाएगी। गृह मंत्री ने कहा कि नए सदन में सांसदों की कुल संख्या 816 होगी।

दक्षिण भारत के आखिरी राज्य केरल का जिक्र करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि केरल की अभी 20 सीटें हैं और यहाँ की हिस्सेदारी 3.68 प्रतिशत है, लेकिन परिसीमन लागू होने के बाद केरल की सीटें 30 हो जाएगी और हिस्सेदारी 3.67 प्रतिशत हो जाएगी।

राहुल गाँधी को वोटबैंक छिटकने का डर

हालाँकि राहुल गाँधी के आरोपों को देखें तो बीजेपी ऐसा कुछ कर भी नहीं रही बल्कि वो प्रस्तावित बिल पारदर्शी नीति और व्यापक चर्चा के बाद डेलिमिटेशन चाहती है, लेकिन राहुल गाँधी डर रहे हैं क्योंकि उनका वोट बैंक टूट सकता है। लेकिन आम जनता जानती है कि लोकतंत्र में हर वोट बराबर होना चाहिए। कोई समुदाय वीटो नहीं चला सकता। अगर सीटें आबादी के हिसाब से बंटेंगी तो मुस्लिम-बहुल गेट्टो टूटेंगे, हिंदू परिवार सुरक्षित रहेंगे, तुष्टीकरण बंद होगा और विकास सबके लिए होगा।

राहुल गाँधी का आरोप सिर्फ राजनीतिक चाल है। हकीकत यह है कि भारत को निष्पक्ष डेलिमिटेशन की जरूरत है। इससे सड़क पर शांति आएगी, चुनाव में सच्चा प्रतिनिधित्व होगा और लोकतंत्र मजबूत बनेगा। बीजेपी अगर यह करती है तो यह देश की भलाई के लिए करेगी। आम आदमी तो यही चाहता है। जिसमें न कोई वीटो हो, न कोई तुष्टीकरण हो, अगर कुछ हो तो वो है समान न्याय।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

PM सूर्य घर योजना में लखनऊ बना देश का नंबर-1 सोलर जिला, नागपुर-सूरत को पछाड़ा: समझें कई श्रेणियों में शीर्ष स्थान पाकर कैसे UP...

पीएम सूर्य घर पुरस्कार समारोह में उत्तर प्रदेश ने विभिन्न श्रेणियों में शीर्ष स्थान हासिल कर अपना परचम लहराया है

अमेरिका-ईरान शांति समझौते से भारत को फायदा ही फायदा, कच्चे तेल की कम कीमतों से मिलेगी महँगाई से राहत-मजबूत होगा रुपया: समझें विकास की...

अमेरिका-ईरान शांति समझौता भारत के लिए हर मोर्चे पर एक 'मास्टरस्ट्रोक' साबित होने जा रहा है। भारत के लिए साल 2026 की यह सबसे सकारात्मक खबर है।
- विज्ञापन -