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जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ‘न्याय’ को जिंदा रखने के लिए जरूरी था आपका डटे रहना, क्योंकि कोर्टरूम को भी केजरीवाल बनाना चाहते थे अपनी ‘टुच्ची राजनीति’ का अड्डा

केजरीवाल ने एक चतुर राजनेता की तरह दाँव चला और अपनी कुटिल बुद्धि से टुच्ची राजनीति को कोर्ट तक खींच लिया। हालाँकि, जस्टिस शर्मा केजरीवाल के खिलाफ तनकर खड़ी हो गईं और उनके प्रोपेगेंडा को ध्वस्त कर दिया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने शराब नीति केस (एक्साइज पॉलिसी केस) में AAP के संयोजक अरविंद केजरीवाल की उस माँग को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के इस मामले की सुनवाई से ‘रिक्यूजल’ (खुद को केस से अलग करने) की माँग की गई थी। यह कोई सीधा सा फैसला भर नहीं है बल्कि केजरीवाल के उस प्रोपेगेंडा को कानून का हंटर है जिसमें वो यह तय करने की कोशिश कर रहे थे कि कौन सा जज निष्पक्ष है और कौन नहीं।

केजरीवाल खुद को बेशक लोकतंत्र का मसीहा बताते ना थकते हों लेकिन उनकी यह दलील या कहें तो प्रोपेगेंडा लोकतंत्र की उस बुनियादी आत्मा के खिलाफ भी है जिसमें न्यायपालिका को स्वतंत्र और निष्पक्ष माना गया है। इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस शर्मा ने केजरीवाल के प्रोपेगेंडा के खिलाफ तल्ख टिप्पणियाँ की और साफ कर दिया कि वह इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग नहीं करने वाली हैं।

जज की क्षमता का फैसला नेता नहीं ऊपरी अदालत करेगी: जस्टिस शर्मा

दरअसल, अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपितों ने कहा था कि जस्टिस शर्मा पहले भी उनके खिलाफ फैसले दे चुकी हैं, इसलिए उन्हें इस केस की सुनवाई नहीं करनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जज के बच्चों का नाम केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में है और इससे ‘हितों का टकराव’ हो सकता है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में सख्त लहजे में कहा, “किसी जज की क्षमता (कम्पीटेंस) का फैसला कोई पक्षकार (लिटिगेंट) या नेता नहीं कर सकता। यह काम केवल ऊपरी अदालत का होता है। उन्होंने कहा कि कोई भी राजनेता इस सीमा को पार नहीं कर सकता और जज की योग्यता पर फैसला नहीं दे सकता।”

साथ ही उन्होंने कहा, “हर बार मुकदमा लड़ने वाला व्यक्ति जीत नहीं सकता। अगर उसे लगता है कि फैसला गलत या एकतरफा है तो उसका आकलन भी केवल ऊपरी अदालत ही करेगी। जैसे जिला अदालत (डिस्ट्रिक्ट कोर्ट) के फैसले को हाईकोर्ट (HC) देखती है और हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट (SC) जाँचती है।” उन्होंने कहा कि सिर्फ इस बात से कि किसी पक्षकार को यह डर है कि उसे इस कोर्ट से राहत नहीं मिलेगी वह जज पर पक्षपात का आरोप लगाने का आधार नहीं बन सकता।

यूँ तो जस्टिस शर्मा का बयान न्याय व्यवस्था के एक बुनियादी सिद्धांत को समझाने के लिए ही है लेकिन इसे समझना बेहद अहम है। न्यायपालिका में एक तय प्रक्रिया होती है। अगर किसी को लगता है कि निचली अदालत का फैसला गलत है, तो उसके लिए एक रास्ता पहले से बना हुआ है और वो है अपील का रास्ता। जैसे- जिला अदालत के फैसले को हाई कोर्ट देखता है और हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट देखता है। यानी किसी फैसले की सही या गलत होने की जाँच ऊपरी अदालत करती है, न कि वह व्यक्ति जो केस हार रहा है या जिसे फैसला पसंद नहीं आया।

जस्टिस शर्मा का दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि ‘हर मुकदमा लड़ने वाला व्यक्ति जीत नहीं सकता’। इसका मतलब यह है कि अदालत में हमेशा एक पक्ष जीतेगा और दूसरा हारेगा। लेकिन हारने वाला पक्ष अगर सिर्फ इस आधार पर जज पर पक्षपात का आरोप लगाने लगे कि उसे राहत नहीं मिली तो यह न्याय व्यवस्था के लिए खतरनाक हो सकता है। अगर ऐसा मान लिया जाए तो हर असंतुष्ट पक्षकार जज बदलने की माँग करेगा और आगे चलकर इससे अदालतों का काम रुक जाएगा और न्याय प्रक्रिया प्रभावित होगी।

ताकि जनता के मन में जजों की निष्पक्षता बनी रही

केजरीवाल ने जो इस मामले पर प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू किया है उसका मकसद यही है कि किसी भी तरह लोगों के मन में जस्टिस शर्मा को लेकर भ्रम पैदा किया जा सके। इससे होता ये कि अगर कल को फैसला केजरीवाल के खिलाफ भी आता तो वो यह कहना शुरू कर देते कि यही तो उन्हें पहले से उम्मीद थी। वहीं, उनके पक्ष में फैसला देने पर जस्टिस शर्मा के दबाव में आने को लेकर सवाल उठने शुरू हो जाते। लेकिन जस्टिस शर्मा ने न्याय के सिद्धांत को सबसे आगे रखा और केजरीवाल को खूब खरी-खरी भी सुनाई।

जस्टिस शर्मा ने जज पर हमलों पर संस्था पर हमला बताते हुए कहा, “जज किसी वादी के मन में पूर्वाग्रह से पैदा हुए बेबुनियाद शक को दूर करने या मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर सुनवाई से खुद को अलग नहीं कर सकता। इस तरह का खतरा न केवल हाईकोर्ट्स तक पहुँचेगा, बल्कि जिला कोर्ट तक भी जाएगा।” उन्होंने साफ-साफ कहा कि अगर आज वो इस फैसले से खुद को अलग कर लेती हैं तो जनता के मन में यह धारणा बना जाएगी कि जज किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विरोध में काम करते हैं।

जजों को हटाने की माँग कहाँ जाकर रुकेगी?

केजरीवाल की इस माँग को मान लिया जाए तो फिर यह माँग कहा जाकर रुकेगी? जजों के भी परिवार हैं, उनके बच्चे हैं और वो कुछ ना कुछ काम करते ही होंगे। ऐसे में अगर हर बात को जजों के परिवार से जोड़कर पूर्वाग्रह पैदा कर लिया जाए तो यह नजीर कितनी खतरनाक हो सकती है। कल को जिसके भी पक्ष में फैसला नहीं आएगा वो जज पर इल्जाम लगा देगा, उसे बदलने की माँग करने लगेगा और फिर जजों-न्याय व्यवस्था के खिलाफ एक अंतहीन चक्र शुरू हो जाएगा।

न्यायपालिका की पूरी व्यवस्था इस भरोसे पर टिकी होती है कि जज निष्पक्ष होकर कानून के अनुसार फैसला करेंगे। अगर हर पक्षकार अपनी सुविधा के अनुसार जज बदलवाने लगे, तो यह ‘फोरम शॉपिंग’ जैसी स्थिति पैदा कर देता है। इसके बाद लोग उस जज की तलाश करेंगे जो उन्हें लगेगा कि वो उनके पक्ष में फैसला दे सके। इससे न सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया कमजोर होती है बल्कि यह संदेश भी जाता है कि अदालतें दबाव में आ सकती हैं और यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।

जस्टिस शर्मा का कहना है कि केजरीवाल ने मनगढ़ंत और अटकलों पर आधारित आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि यह उनका पक्का फर्ज बन जाता है कि वह इसका बेखौफ होकर जवाब दें। उन्होंने कहा, “बदकिस्मती से मुझे दो मुकदमेबाजों के बीच का झगड़ा नहीं बल्कि एक मुकदमेबाज और मेरे एक जज के बीच का झगड़ा सुलझाना है। कोई भी जज, किसी मुक़दमेबाज के मन में पक्षपात को लेकर पैदा हुए बेबुनियाद शक को दूर करने के लिए, या मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर खुद को केस से अलग नहीं कर सकता।”

उन्होंने केजरीवाल को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “यह अदालत अपने और इस संस्था के सम्मान के लिए खड़ी रहेगी, भले ही यह मुश्किल क्यों न लगे। अगर ऐसे आधारों पर खुद को केस से अलग करने की बात मान ली जाती है तो इससे हमारी न्याय प्रक्रिया पर खतरा पैदा हो जाएगा। तब इसे ‘मैनेज्ड जस्टिस’ (प्रबंधित न्याय) कहा जाएगा।”

इसे इस तरह समझिए कि अगर बिना सबूतों के जजों की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जाएँ और उन्हें हटाने की माँग की जाए तो यह धीरे-धीरे एक ट्रेंड बन सकता है। इसके चलते जजों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ता है और वे विवादास्पद मामलों में निर्णय लेने से हिचक सकते हैं। इससे न्याय मिलने में देरी होगी और आम जनता का विश्वास न्याय व्यवस्था से उठ सकता है। इसलिए रिक्यूजल की माँग केवल असाधारण परिस्थितियों में ठोस और प्रमाणिक आधार पर ही होनी चाहिए न कि इसे एक राजनीतिक या कानूनी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाए।

केजरीवाल का इतिहास रहा है बेबुनियाद आरोपों की ‘टुच्ची राजनीति’

अरविंद केजरीवाल की राजनीति की शुरुआत आरोप लगाने वाले अंदाज में ही हुई थी। बिना ठोस सबूतों के गंभीर आरोप लगाना, नैतिकता की ऊँची बातें करना और फिर उन्हीं आरोपों को राजनीतिक हथियार बनाकर जनभावनाओं को प्रभावित करना। यही उन्होंने राजनीति में किया और यही कोशिश अब वो कोर्ट में भी करने की कोशिश कर रहे हैं।

दरअसल, केजरीवाल का राजनीतिक उदय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुआ। उस समय उन्होंने और उनकी टीम ने राजनीतिक दलों, उद्योगपतियों या सरकारी संस्थाओं पर। उस दौर में व्यवस्था से नाराज जनता के एक बड़ने वर्ग ने इन आरोपों को बिना ज्यादा सवाल किए स्वीकार कर लिया। लेकिन राजनीति और न्यायपालिका के बीच एक बहुत बड़ा अंतर है राजनीति में धारणा काम करती जाती है जबकि अदालत में केवल तथ्य और सबूत ही मायने रखते हैं।

यह ध्यान रखना चाहिए कि लोकतंत्र में न्यायपालिका अहम स्तंभ होती है। यदि राजनीतिक लाभ के लिए उस पर भी संदेह किए जाने लगेगा तो यह केवल एक व्यक्ति या एक पार्टी का मुद्दा नहीं रहता बल्कि यह पूरे लोकतांत्रिक ढाँचे के लिए खतरा बन जाता है। जब जनता के सामने बार-बार यह नैरेटिव बनाया जाता है कि ‘अगर फैसला हमारे पक्ष में नहीं आया, तो सिस्टम ही गलत है’ तो यह न्याय व्यवस्था में विश्वास को कमजोर करता है।

यह रास्ता खतरनाक है। क्योंकि यह धीरे-धीरे यह एक प्रवृत्ति बन जाती है। अगर हर हार के बाद न्यायपालिका पर ही सवाल उठाए जाएँगे तो आम जनता का भरोसा किस पर रहेगा? लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है लेकिन संस्थाओं की गरिमा को गिराकर राजनीति करना पूरे सिस्टम को कमजोर करता है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि आरोपों की राजनीति ने केजरीवाल को सत्ता तक पहुँचाया था लेकिन वही राजनीति अब उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बनती सकती है। क्योंकि जब वही तरीका अदालत में अपनाया जाता है, तो वह न केवल असफल होता है बल्कि उल्टा नुकसान भी पहुँचाता है।

केजरीवाल ने एक चतुर राजनेता की तरह दाँव चला और अपनी कुटिल बुद्धि से टुच्ची राजनीति को कोर्ट तक खींच लिया। हालाँकि, जस्टिस शर्मा केजरीवाल के खिलाफ तनकर खड़ी हो गईं और उनके प्रोपेगेंडा को ध्वस्त कर दिया।

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शिव
शिव
7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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